श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 68 से 71
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 68 से 71
य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति।
भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥ 68।।
न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः।
भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥ 69।।
अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥ 70।।
श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्॥ 71।।
जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा- इसमें कोई संदेह नहीं है।
उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है तथा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं।
जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद रूप गीताशास्त्र को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ से पूजित होऊँगा- ऐसा मेरा मत है।
जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा।
गीता ज्ञान की वह शिक्षा है जिसे जानकर समझकर और आत्मसात कर व्यक्ति इस संसार में रहकर सभी कर्मों को करता हुआ भी सभी कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है। लेकिन इस शास्त्र को पढ़ने,कहने ,सुनने और अपनाने की शर्त यही है कि पढ़ने वाला, कहने वाला, सुनने वाला और इसका अनुसरण करने वाला व्यक्ति शिक्षक कृष्ण पर उनकी शिक्षा गीता पर पूर्ण विश्वास रखे, प्रेम और श्रद्धा रखे, और उसी में लीन रहे। इसी लिए श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते भी हैं कि जो भी प्रेम से , श्रद्धा से इस शास्त्र को उनको कहेगा जिनको इसपर और श्रीकृष्ण पर श्रद्धा है , जो सुनेगा और जो इनका अनुसरण करेगा वही कर्म, भक्ति, ज्ञान और ध्यान से युक्त हुआ प्रभु का प्रिय होगा अर्थात उसे कर्म बन्धन से मुक्ति और परम् सुख और शांति स्वरूप भगवत्प्राति होगी।
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