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श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 8

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 8 तमस्त्वज्ञानजं विद्धि मोहनं सर्वदेहिनाम्‌। प्रमादालस्यनिद्राभिस्तन्निबध्नाति भारत॥ ।।8।। हे अर्जुन! सब देहाभिमानियों को मोहित करने वाले तमोगुण को तो अज्ञान से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को प्रमाद (इंद्रियों और अंतःकरण की व्यर्थ चेष्टाओं का नाम 'प्रमाद' है), आलस्य (कर्तव्य कर्म में अप्रवृत्तिरूप निरुद्यमता का नाम 'आलस्य' है) और निद्रा द्वारा बाँधता है।    सत्वगुण और रजोगुण के विपरीत तमोगुण अज्ञानता, आलस्य, प्रमाद आदि को अभिव्यक्त करने वाला होता है और इन प्रवृतियों वाले कर्मों का जन्मदाता होता है। इनके प्रभाव भी व्यापक होते हैं और इनके प्रभाव में जब प्रकृति की चेतना आती है तो प्रकृति इन ऋणात्मक प्रवृत्तियों के द्वारा चेतना यानी पुरुष को बाँध देती है। इसके प्रभाव से व्यक्ति ज्ञान की बातों से दूर भागता है, वह प्रमाद में स्वयम को लिप्त रखना पसंद करता है और गति के विपरीत आलस्य में आनंद पाता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 7

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 7 रजो रागात्मकं विद्धि तृष्णासङ्‍गसमुद्भवम्‌। तन्निबध्नाति कौन्तेय कर्मसङ्‍गेन देहिनम्‌॥ ।।7।। हे अर्जुन! रागरूप रजोगुण को कामना और आसक्ति से उत्पन्न जान। वह इस जीवात्मा को कर्मों और उनके फल के सम्बन्ध में बाँधता है। जैसे सत्वगुण चेतना को प्रकृति से बाँधता है, वैसे ही रजोगुण भी प्रकृति से चेतना यानी पुरुष को बाँधता है। रजोगुण राग उतपन्न करता है। व्यक्ति के अंदर जब सम्बद्धता का भाव आता है तो कामनाओं का जन्म होता है। यह कामना आसक्ति, लोभ, ईर्ष्या आदि भावों को जन्म देता है। ये सारे भाव जो रजोगुण के कारण उतपन्न होते हैं वे कर्म में प्रवृत्त करते हैं और इनकी वजह से पुरुष यानी चेतना प्रकृति से बन्ध जाता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 6

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 6 तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम्‌। सुखसङ्‍गेन बध्नाति ज्ञानसङ्‍गेन चानघ॥ ।।6।। हे निष्पाप! उन तीनों गुणों में सत्त्वगुण तो निर्मल होने के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित है, वह सुख के सम्बन्ध से और ज्ञान के सम्बन्ध से अर्थात उसके अभिमान से बाँधता है।          संसार पुरुष और प्रकृति के युग्म से बना हुआ है। और यह संसार परम् ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है।  ब्रह्म निराकार, निर्लेप है किंतु प्रकृति और पुरुष उसी ब्रह्म की अभिव्यक्ति मात्र हैं।  जब तक पुरुष और प्रकृति का युग्म न बने संसार की उतपत्ति नहीं होती है। पुरुष यानी चेतना की स्वाभाविक गति होती है प्रकृति के साथ जुड़ा रहकर भी मात्र द्रष्टा बने रहना यानी बिना प्रकृति से लिपट हुए उसकी गतिविधियों को जैसा है वैसा ही देखतन। किन्तु प्रकृति तो माया का दूसरा नाम है सो प्रकृति इस चेतना को बांध कर उसे द्रष्टा से भोक्ता बना देती है। ऐसा इसलिए होता है कि चेतना यानी पुरुष तो गुणों से परे होता है किंतु प्रकृति सत्व, रजो और तमो गुण धारण करती है। प्रकृति का कण कण इन तीन गुणों...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 5

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 5 सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः। निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्‌॥ ।।5।। हे अर्जुन! सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण -ये प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुण अविनाशी जीवात्मा को शरीर में बाँधते हैं। चेतना और पदार्थ से प्राणी का जन्म तो होता है किंतु प्रश्न उठता है कि पदार्थ या प्रकृति चेतना यानी आत्मा से किस प्रकार संयुक्त होकर रह पाता है। इस प्रश्न का उत्तर है कि सम्पूर्ण प्रकृति त्रिगुणमयी है यानी प्रकृति और उसके सभी अवयव तीन गुणों वाले होते हैं और यही तीन गुण जो मुख्य रूप से तीन प्रवृत्तियाँ हैं प्रकृति को उसकी चेतना अर्थात आत्मा से संयुक्त रखते हैं। जैसे जैसे ये तीनों गुण समता की स्थिति में आते जाते हैं वे तीनों एक दूसरे के प्रभाव को समाप्त करते जाते हैं। पूर्ण समत्व की स्थिति में इन गुणों का प्रभाव निरस्त हो जाता है और यही प्रलय यानी महानिर्वाण का काल होता है। ये तीन गुण हैं, सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण। यह सम्पूर्ण संसार इन्हीं तीन गुणों के आपसी ताल मेल, आपसी प्रभाव से चलता है। जब जो गुण भारी पड़ता है प्राणी और संसार उसी के अनुरूप व्यवहार करते हैं...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 3 एवं 4

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 3 एवं 4 मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम्‌।  सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत॥ ।।3।। सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः।  तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता॥ ।।4।। हे अर्जुन! मेरी महत्‌-ब्रह्मरूप मूल-प्रकृति सम्पूर्ण भूतों की योनि है अर्थात गर्भाधान का स्थान है और मैं उस योनि में चेतन समुदायरूप गर्भ को स्थापन करता हूँ। उस जड़-चेतन के संयोग से सब भूतों की उत्पति होती है। हे अर्जुन! नाना प्रकार की सब योनियों में जितनी मूर्तियाँ अर्थात शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं, प्रकृति तो उन सबकी गर्भधारण करने वाली माता है और मैं बीज को स्थापन करने वाला पिता हूँ। यह संसार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का संयोग है। इसे ही प्रकृति और पुरुष भी कहा गया है। यही क्रमशः मैटर और कॉन्सियसनेस अर्थात पदार्थ और चेतना भी है। यानी संसार के सभी प्राणी पदार्थ और चेतना के संयोग से उतपन्न होते हैं। यह चेतना ही ईश्वरत्व है। अर्थात सभी प्राणियों में एक ही चेतना का संचार है। मैटर बिना चेतना का अर्थहीन है किंतु चेतना का संचार होते ही मैटर स्वयं के प्रति चैतन्य हो उठ...