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Showing posts from November, 2022

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 24

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 24 समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः। तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः॥ ।।24।। जो निरन्तर आत्म भाव में स्थित, दुःख-सुख को समान समझने वाला, मिट्टी, पत्थर और स्वर्ण में समान भाव वाला, ज्ञानी, प्रिय तथा अप्रिय को एक-सा मानने वाला और अपनी निन्दा-स्तुति में भी समान भाव वाला है। जो व्यक्ति गुणों के प्रभाव में होता है वह स्वयं को गुणों  और उनके प्रभाव से आँकता है। उसे लगता है कि जो कुछ हो रहा है वह सब उससे सम्बन्धित है। वह अपनी पहचान को गुणों और उनके परिणामों के दर्पण में देखता है।    किन्तु हमें ध्यान रखना चाहिए कि प्रकाश का अस्तित्व वस्तु पर निर्भर नहीं करता है। यह सही है कि जब प्रकाश पुन्ज किसी वस्तु पर पड़ता है तो वस्तु दिखती है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि वह वस्तु प्रकाश के अस्तित्व का कारण है। प्रकाश तो है हीं बस हमें उसका भान नहीं हो रहा होता है। जैसे कोइ वस्तु उसके मार्ग में पड़ता है हमें लगता है कि प्रकाश दिख रहा है। यही भ्रम है जो सत्य को सामने नहीं आने देता है। पुरुष प्रकृति से भिन्न है और प्रकृति के बिना भी उसका अ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 23

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 23 उदासीनवदासीनो गुणैर्यो न विचाल्यते। गुणा वर्तन्त इत्येव योऽवतिष्ठति नेङ्‍गते॥ ।।23।। जो साक्षी के सदृश स्थित हुआ गुणों द्वारा विचलित नहीं किया जा सकता और गुण ही गुणों में बरतते (त्रिगुणमयी माया से उत्पन्न हुए अन्तःकरण सहित इन्द्रियों का अपने-अपने विषयों में विचरना ही 'गुणों का गुणों में बरतना' है) हैं- ऐसा समझता हुआ जो सच्चिदानन्दघन परमात्मा में एकीभाव से स्थित रहता है एवं उस स्थिति से कभी विचलित नहीं होता है। गुणातीत व्यक्ति यह समझता है कि प्रकृति में सारी क्रियाएँ चलती रहेंगी लेकिन वह यह बात भी समझता है कि जो कुछ हो रहा होता है उसमें उसका कोई योगदान नहीं है बल्कि सब कुछ तीन गुणों के परस्पर संयोग से घटित हो रहा है । गुणों के इस संयोग से वह स्वयं को अलग रखता है यानी भले वह गुणों की परस्पर क्रियाओं के बीच रहता है लेकिन गुणों से अछूता रहता है। वह मात्र द्रष्टा होता है। गुणों के प्रभाव से न तो वह उत्साहित होता है न ही हतोत्साहित।  वह जानता है कि वह है तब भी यह सब संसार में चलता रहेगा, वह नहीं है तब भी यह सब होते रहेगा। यानी वह जानता है कि वह इन...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 22

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 22 श्रीभगवानुवाच  प्रकाशं च प्रवृत्तिं च मोहमेव च पाण्डव। न द्वेष्टि सम्प्रवृत्तानि न निवृत्तानि काङ्‍क्षति॥ ।।22।। श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! जो पुरुष सत्त्वगुण के कार्यरूप प्रकाश को और रजोगुण के कार्यरूप प्रवृत्ति को तथा तमोगुण के कार्यरूप मोह  को भी न तो प्रवृत्त होने पर उनसे द्वेष करता है और न निवृत्त होने पर उनकी आकांक्षा करता है। जो पुरुष एक सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही नित्य, एकीभाव से स्थित हुआ इस त्रिगुणमयी माया के प्रपंच रूप संसार से सर्वथा अतीत हो गया है, उस गुणातीत पुरुष के अभिमानरहित अन्तःकरण में तीनों गुणों के कार्यरूप प्रकाश, प्रवृत्ति और मोहादि वृत्तियों के प्रकट होने और न होने पर किसी काल में भी इच्छा-द्वेष आदि विकार नहीं होते हैं, यही उसके गुणों से अतीत होने के प्रधान लक्षण है। गुणातीत व्यक्ति उस  व्यक्ति को कहते हैं जो सभी गुणों की उपस्थिति या अनुपस्थिति से अप्रभावित होता है। ऐसा व्यक्ति  सत्त्वगुण के कार्यरूप प्रकाश यानी अन्तःकरण और इन्द्रियादि को आलस्य का अभाव होकर जो एक प्रकार की चेतनता को,  और रजोगुण के ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 21

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 21 अर्जुन उवाच  कैर्लिङ्‍गैस्त्रीन्गुणानेतानतीतो भवति प्रभो। किमाचारः कथं चैतांस्त्रीन्गुणानतिवर्तते॥ ।।21।। अर्जुन बोले- इन तीनों गुणों से अतीत पुरुष किन-किन लक्षणों से युक्त होता है और किस प्रकार के आचरणों वाला होता है तथा हे प्रभो! मनुष्य किस उपाय से इन तीनों गुणों से अतीत होता है? जब यह स्पष्ट है कि गुणों से आगे जाकर यानी गुणों से ऊपर उठकर अर्थात गुणों से मुक्त होकर ही व्यक्ति आत्मा को यानी अपनी चेतना से मिल पाता है, पुरुष प्रकृति से भिन्न स्वयम को पुनः स्थापित कर पाता है तो जो बहुत स्वाभाविक प्रश्न तो उठते हीं हैं मन में कि 1.जो व्यक्ति प्रकृति से भिन्न मात्र पुरुष की स्थिति वाला होता है यानी उसमें गुण नहीं रह जाते हैं मात्र उसकी चेतना यानी आत्मा ही होता है वैसे व्यक्ति को पहचानने के क्या लक्षण होते हैं? 2.ऐसे व्यक्ति का आचरण यानी व्यवहार कैसा होता है? 3.और वो कौन सी विधि है जिससे यह अवस्था प्राप्त की जा सकती है?         इन प्रश्नों का उत्तर पाकर ही व्यक्ति गुणों से मुक्त होने के मार्ग पर बढ़ सकता है। ध्यान रहे कि इसी तरह का...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 20

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 20 गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्‌। जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते॥ ।।20।। यह पुरुष शरीर की  उत्पत्ति के कारणरूप इन तीनों गुणों को उल्लंघन करके जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और सब प्रकार के दुःखों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है।         गुणों के सम्बंध में जब समझ प्राप्त होती है तब गुणों से मुक्ति का मार्ग दिखता है। गुणों से मुक्ति ही चैतन्य की प्राप्ति होती है। मनुष्य का शरीर जिन तत्वों से बना होता है वे हैं  बुद्धि, अहंकार और मन तथा पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच भूत, पाँच इन्द्रियों के विषय। इस प्रकार इन तेईस तत्त्वों का पिण्ड रूप यह स्थूल शरीर प्रकृति से उत्पन्न होने वाले गुणों का ही कार्य है, इसलिए इन तीनों गुणों को इसी की उत्पत्ति का कारण कहा है।        इन सभी की अभिव्यक्ति गुणों के कारण ही होती है। सुख दुख, रोग, कष्ट, हर्ष विषाद आदि जितने तरह के अनुभव हैं ये सब शरीर, मन, बुद्धि और विवेक की अवस्थाएँ भर हैं जो गुणों से व्यक्त होती हैं परंतु इनमें से कोई ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 19

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 19 नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति। गुणेभ्यश्च परं वेत्ति मद्भावं सोऽधिगच्छति॥ ।।19।। जिस समय दृष्टा तीनों गुणों के अतिरिक्त अन्य किसी को कर्ता नहीं देखता और तीनों गुणों से अत्यन्त परे सच्चिदानन्दघनस्वरूप मुझ परमात्मा को तत्त्व से जानता है, उस समय वह मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है       श्रीमद्भागवद्गीता के तेरहवें और चौदहवें अध्याय में बताया गया है कि किस प्रकार प्रकृति और पुरुष(क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ) एक दूसरे से बन्धे होते हैं। पुरुष यानी चेतना मूल रूप से साक्षी मात्र है। प्रकृति गुणों से युक्त होतो है। ये तीन गुण होते हैं, सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण। प्रकृति में सारा कुछ इन्हीं तीन गुणों के कारण घटित होता रहता है। पुरुष बस बना हुआ इन घट रही चीजों का द्रष्टा मात्र होता है अपने मूल रूप में। लेकिन जब प्रकृति से पुरुष का मेल होता है तो यही पुरुष अपनी द्रष्टा की भूमिका को गँवा देता है और गुणों और उनके कारण उतपन्न होने वाले परिणामों को भोगने लगता है। उस पुरुष को, उस चेतना को गुण जनित हर्ष, विषाद, सुख दुख आदि अपने साथ घटित होते लगत...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 18

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 18 ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः। जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः॥ ।।18।। सत्त्वगुण में स्थित पुरुष स्वर्गादि उच्च लोकों को जाते हैं, रजोगुण में स्थित राजस पुरुष मध्य में अर्थात मनुष्य लोक में ही रहते हैं और तमोगुण के कार्यरूप निद्रा, प्रमाद और आलस्यादि में स्थित तामस पुरुष अधोगति को अर्थात कीट, पशु आदि नीच योनियों को तथा नरकों को प्राप्त होते हैं। जैसी मति वैसी गति। जिस प्रकार की प्रवृत्ति होती है व्यक्ति के जीवन की उपब्धि भी वैसी ही होती है। सत्वगुण व्यक्ति को उच्च पद देता है , जबकि रजोगुणी व्यक्ति सामान्य मनुष्य ही बना रह जाता है और तमोगुण की अधिकता के प्रभाव में व्यक्ति का जीवन अधोगामी हो जाता है। विचारवान, बुद्धिमान विवेकी, मोहमुक्त व्यक्ति सांसारिक जीवन जीते हुए भी संसार के अवगुणों से मुक्त होता है जिसे महामानव, साधु, सज्जन आदि कहते हैं । जो व्यक्ति मोह पाश में बंधा हुआ है वह मोह जनित कामनाओं की पूर्ति में ही हमेशा चंचल हुआ औसत दर्जे का व्यक्ति बना जीवन व्यतीत करता है। लेकिन अज्ञान, प्रमाद, आलस्य आदि में डूबे हुए व्यक्...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 17

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 17 सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च। प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च॥ ।।17।। सत्त्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है और रजोगुण से निःसन्देह लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद  और मोह होते हैं और अज्ञान भी होता है। इस सत्य को हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि गुणों का हमारी प्रवृत्ति पर क्या असर होता है। गुणों के प्रभाव से ही व्यक्ति की प्रवृत्ति बनती है। सो व्यक्ति को अपने उत्थान के प्रयास में गुणों के प्रभाव की समझ अवश्य होनी चाहिये। जब व्यक्ति के अंदर सत्वगुण बढ़ता है तो अन्य दोनों गुणों का प्रभाव कमतर हो जाता है और व्यक्ति माया, मोह , लोभ , लालच, ईर्ष्या, क्रोध, घृणा, ईर्ष्या आदि से दूर होकर ज्ञान और वैराग्य की तरफ बढ़ता है। वैराग्य का अर्थ मोह और मोह जनित प्रवृत्तोयों से मुक्ति है।      यदि व्यक्ति के अंदर रजोगुण बढ़े और अन्य गुण घटें तो व्यक्ति में कामनाओं और इक्षाओं वाली प्रवृत्ति बढ़ती है जो व्यक्ति को कामी, लोभी, ईर्ष्यालु,  द्वेष करने वाला बनाती है जिससे व्यक्ति असत्य और हिंसा भी करता है।        और जब तमोगुण की बढ़ोतरी हो...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 14, 15 एवं 16

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 14 , 15 एव 16 यदा सत्त्वे प्रवृद्धे तु प्रलयं याति देहभृत्‌। तदोत्तमविदां लोकानमलान्प्रतिपद्यते॥ ।।14।। रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्‍गिषु जायते। तथा प्रलीनस्तमसि मूढयोनिषु जायते॥ ।।15।। कर्मणः सुकृतस्याहुः सात्त्विकं निर्मलं फलम्‌। रजसस्तु फलं दुःखमज्ञानं तमसः फलम्‌॥ ।।16।। जब यह मनुष्य सत्त्वगुण की वृद्धि में मृत्यु को प्राप्त होता है, तब तो उत्तम कर्म करने वालों के निर्मल दिव्य स्वर्गादि लोकों को प्राप्त होता है। रजोगुण के बढ़ने पर मृत्यु को प्राप्त होकर कर्मों की आसक्ति वाले मनुष्यों में उत्पन्न होता है तथा तमोगुण के बढ़ने पर मरा हुआ मनुष्य कीट, पशु आदि मूढ़योनियों में उत्पन्न होता है। श्रेष्ठ कर्म का तो सात्त्विक अर्थात् सुख, ज्ञान और वैराग्यादि निर्मल फल कहा है, राजस कर्म का फल दुःख एवं तामस कर्म का फल अज्ञान कहा है इन गुणों का प्रभाव व्यक्ति के जीवन पर इतना गहरा होता है कि व्यक्ति का समस्त अस्तित्व ही इन गुणों पर निर्भर करता है। सत्वगुण की वृद्धि से व्यक्ति अति उत्तम कोटि का जीवन प्राप्त करता है जबकि रजोगुण की अधिकता से व्यक्ति के अंदर अत्यधिक इ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 13

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 13 अप्रकाशोऽप्रवृत्तिश्च प्रमादो मोह एव च। तमस्येतानि जायन्ते विवृद्धे कुरुनन्दन॥ ।।13।। हे अर्जुन! तमोगुण के बढ़ने पर अन्तःकरण और इंन्द्रियों में अप्रकाश, कर्तव्य-कर्मों में अप्रवृत्ति और प्रमाद अर्थात व्यर्थ चेष्टा और निद्रादि अन्तःकरण की मोहिनी वृत्तियाँ - ये सब ही उत्पन्न होते हैं। और तमोगुण बढ़ने का परिचायक है कि व्यक्ति अज्ञान से भर जाता है। अज्ञान की अवस्था में व्यक्ति की समझदारी समाप्त हो जाती ह या कम हो जाती है, कर्म करने की प्रवृत्ति जाती रहती है , जिसके कारण व्यक्ति अनावश्यक की चेष्टाएँ करताha, और इन्द्रिय जनित भोगों में लिप्त होने की चेष्टा करता है। यह अवस्था निंद्रा और प्रमाद, बुद्धि के पतन और विवेक के खत्म होने और इन्द्रिय भोग में लिप्त रहने की अवस्था है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय14 श्लोक 12

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय14 श्लोक 12 लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा। रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ॥ ।।12।। हे अर्जुन! रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, स्वार्थबुद्धि से कर्मों का सकामभाव से आरम्भ, अशान्ति और विषय भोगों की लालसा- ये सब उत्पन्न होते हैं। और जब मन कामनाओं का उदय होता है तो काम के साथ जुड़ी अन्य भावनाएँ यथा, लोभ, ईर्ष्या, क्रोध, स्वार्थ आदि का भी उदय होता है और इन सब की पूर्ति हेतु मनुष्य क्रियाशील होता है। यह अवस्था रजोगुण के हावी होने का परिचायक है। इस समय व्यक्ति कामनाओं की पूर्ति हेतु कर्मफल की इक्षा से कर्म में प्रवृत्त होता है तो मनोकुल फलों  का उपभोग करने की इक्षा रखता है। रजोगुण के सबसे अधिक प्रभावी होने के कारण व्यक्ति सकाम भाव से यानी कर्मफल की इक्षा को रखते हुए कर्म करता है और सकाम कर्म जनित भावों जैसे लाभ, लोभ, ईर्ष्या, स्वार्थ, भय, बैर, स्वार्थ , लोगों की सहायता, सहयोग आदि मिश्रित भावों से प्रभावित रहता है। इस अवस्था में व्यक्ति सकाम कर्मों से चलायमान रहता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14. परिचय

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 परिचय श्रीमद्भागवद्गीता की रचना अर्जुन के संशय को दूर करने के क्रम में हुई है। युद्ध क्षेत्र में युद्ध के लिए खड़े अर्जुन के मन में  युद्ध को लेकर कई प्रश्न उठने लगे थे और उसे युद्ध की निरर्थकता का भान हो रहा था, किन्तु युद्ध की निरर्थकता के लिए उसके जो तर्क थे वे युद्ध से कम और खुद उसके अपने संशय की वजह से अधिक थे। अर्जुन धर्म के विरुद्ध किसी भी आचरण को गलत मानता था और उसे संशय था कि यह युद्ध अर्जुन के लिए अधर्म का मार्ग खोलता है। उसके इसी संशय को दूर करने के लिए अर्जुन और कृष्ण के बीच जो सम्वाद हुआ वही श्रीमद्भागवद्गीता का रूप लेकर सामने आया। वस्तुतः कर्मक्षेत्र में हम सभी कई तरह की भ्रांतियों के शिकार होते हैं। ये भाँतियाँ इस  लिए हावी हो पाती हैं क्योंकि हम स्वयं के अस्तित्व को और स्वयं के साथ संसार के सम्बन्धों की बारीकियों को नहीं समझ पाते हैं। हम कौन हैं और इस संसार में हमारी भूमिका क्या है और क्यों है अगर हम यह समझ लें तो कोई भ्रम न रहे। किन्तु हम समझें कैसे कि हम कौन हैं, क्यों हैं? इसके लिए श्रीमद्भागवद्गीता में जो मार्ग सुझाया गया वह है ध्...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 11

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 11 सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते। ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत॥ II 111II जिस समय इस देह में तथा अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतनता और विवेक शक्ति उत्पन्न होती है, उस समय ऐसा जानना चाहिए कि सत्त्वगुण बढ़ा है। एक प्राणी में तीनों गुणों का समावेश होता है और व्यक्ति की प्रवृत्ति इस बात पर निर्भर करती है कि किस काल में कौन से गुण की अधिकता परिलक्षित हो रही है। जब व्यक्ति में ज्ञान, विवेक, चेतना की अधिकता होती है तो व्यक्ति सात्विक प्रवृत्ति का व्यवहार करता है और इस काल में उसमें सत्य, अहिंसा, क्षमा, दया जैसे भाव होते हैं। एक व्यक्ति जब प्रकृति के नियमों के अधीन उनसे स्वाभाविक रूप से संचालित हो , चीजों को , घटनाओं को अपने विवेक से देखे तो वह सत्वगुणी होता है। सब कर्म करते हुए भी व्यक्ति बेचैन नहीं होता है बल्कि उसके मन में शांति होती है। यह शांति किसी बाहरी कारण से नहीं आती है। बल्कि उसका ज्ञान और विवेक उसे स्थिर करता है सो वह शांत रहता है। शांत, गुणि व्यक्ति निष्क्रिय नहीं होता है बल्कि सभी कर्मों को करता हुआ उनके परिणाम से अप्रभावि...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 9 एवं 10

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 9 एवं 10 सत्त्वं सुखे सञ्जयति रजः कर्मणि भारत। ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे सञ्जयत्युत॥ ।।9।। हे अर्जुन! सत्त्वगुण सुख में लगाता है और रजोगुण कर्म में तथा तमोगुण तो ज्ञान को ढँककर प्रमाद में भी लगाता है। श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक  10 रजस्तमश्चाभिभूय सत्त्वं भवति भारत। रजः सत्त्वं तमश्चैव तमः सत्त्वं रजस्तथा॥ ।।10।। हे अर्जुन! रजोगुण और तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण, वैसे ही सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण होता है अर्थात बढ़ता है। प्रत्येक मनुष्य में प्रकृति के तीनों गुण, सत्वगुण, रजोगुण सुर तमोगुण होते हैं जो व्यक्ति की प्रकृति को उसके चेतना यानी पुरुष से बांधते हैं। व्यक्ति की प्रवृति इन तीन गुणों की आनुपातिक बहुलता पर निर्भर करता है। जिस गुण की बहुलता होती है उसी के अनुसार व्यक्ति का आचरण होता है। किंतु कोई भी व्यक्ति एक ही गुण से नहीं बंधा होता है बल्कि उसमें होते तो तीनों गुण हैं लेकिन कोई एक बहुलता में होता है। साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य तथ्य है कि अलग अलग समय पर एक ही व्यक्ति के ये तीन गुण अलग अल...