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Showing posts from March, 2022

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11परिचय

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 परिचय          अब तक हमने जो कुछ सुना और जाना वह हमारी दृष्टि को आध्यात्मिक विस्तार प्रदान करता है। व्यक्ति अपनी आँखोँ से चीजों को तो देखता ही है किंतु उसकी दृष्टि में दृष्टिकोण भी उसे देखने समझने में मदद करता है । इसीलिए भिन्न भिन्न व्यक्ति एक ही वस्तु को अपनी अपनी आँखों से देखते हुए भी उस वस्तु को भिन्न भिन्न रूप से समझते हैं। यह दृष्टिकोण में फर्क के कारण होता है।       व्यक्तियों का दृष्टिकोण उनके विवेक और ज्ञान पर निर्भर करता है। जिसकी जैसी समझ होती है, जैसा विवेक होता है उसी के अनुरूप वह चीजों को देख समझ पाता है। परमात्मा के स्वरूप को हमने अभी जाना है किंतु उसकी समझ के लिए यह आवश्यक है कि  हमारी दृष्टि संकुचित न हो। बल्कि दृष्टि के साथ ही वह दृष्टिकोण भी हो जिससे हम परमात्मा से सम्बंधित इस ज्ञान को आत्मसात कर सकें। इसके लिए जो दृष्टि चाहिए उसे दिव्य दृष्टि कहते हैं , एक ऐसी ज्ञानमयी दृष्टि जो हमें सक्षम बनाती है कि हम जो देखते हैं उसे मात्र ऊपरी तौर पर ही नहीं समझें बल्कि उसके भीतर के रहस्यों को भी देख स...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 40, 41 एवं 42

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 40, 41 एवं 42 नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप। एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया॥ ।।40।। हे परंतप! मेरी दिव्य विभूतियों का अंत नहीं है, मैंने अपनी विभूतियों का यह विस्तार तो तेरे लिए एकदेश से अर्थात्‌ संक्षेप से कहा है। ।।40।। यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा। तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्‌॥ ।।41।। जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात्‌ ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उस को तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान। ।।41।। अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन। विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्‌॥ ।।42।। अथवा हे अर्जुन! इस बहुत जानने से तेरा क्या प्रायोजन है। मैं इस संपूर्ण जगत्‌ को अपनी योगशक्ति के एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ। ।।42।। वस्तुतः परमात्मा की विभूतियों का कोई अंत नहीं है। सो हम पूरी तरह से सभी विभूतियों को नहीं जान सकते, किन्तु इतना जरूर समझ सकते हैं कि हमारे दृश्य और अदृश्य संसार में जो कुछ भी ऐश्वर्ययुक्त, कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है वह ईश्वरीय विभूति की ही देन है। इनको कंठस्थ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 39

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 39 यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन। न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम्‌॥ ।।39।। और हे अर्जुन! जो सब भूतों की उत्पत्ति का कारण है, वह भी मैं ही हूँ, क्योंकि ऐसा चर और अचर कोई भी भूत नहीं है, जो मुझसे रहित हो। ।।39।। 78.जीवन की उत्पत्ति का स्रोत यानी बीज ईश्वर ही हैं । उनसे ही समस्त जीवन उत्पन्न होते हैं। इस स्रोत का कभी नाश नहीं होता है। सो जीवन का स्वरुप भले बदलता रहे जीवन तो हमेशा ही रहता है। 79.इस संसार में चर और अचर जो कुछ भी है वह सब ईश्वर के कारण है, उसकी विभूति है और उन सब में ईश्वर का वास है यानी ईश्वर हर जगह , हर स्वरूप में विद्यमान हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 38

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 38 दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्‌। मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्‌॥ ।।38।। मैं दमन करने वालों का दंड अर्थात्‌ दमन करने की शक्ति हूँ, जीतने की इच्छावालों की नीति हूँ, गुप्त रखने योग्य भावों का रक्षक मौन हूँ और ज्ञानवानों का तत्त्वज्ञान मैं ही हूँ। ।।38।। 74.समाज में व्यवस्था बनाये रखने और अनुशासन के लिए, अपराधों के नियंत्रण और व्यक्तियों के उनके गलत कर्मों के लिए दिया जाने वाला दण्ड समाज और व्यक्ति को संयमित और व्यवस्थित करता है, सो दण्ड भी ईश्वरीय विभूति का प्रतीक है। 75.विजय विवेकशील और बहुत सोच समझ कर लिए गए निर्णयों की श्रृंखला पर निर्भर करता है और इसे श्रृंखला को ही नीति कहते हैं जिसे ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति समझा जाता है। 76.जब किसी तथ्य को गुप्त रखना होता है तो उसके बारे में बात नहीं करनी चाहिए, सो गुप्त रखने के धारण मौन भी ईश्वरीय विभूति है। 77.ज्ञानी व्यक्ति का ईश्वरीय ज्ञान तत्व ज्ञान है जो भी ईश्वरीय विभूति है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 37

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 37 वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः। मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः॥ ।।37।। वृष्णिवंशियों में (यादवों के अंतर्गत एक वृष्णि वंश भी था) वासुदेव अर्थात्‌ मैं स्वयं तेरा सखा, पाण्डवों में धनञ्जय अर्थात्‌ तू, मुनियों में वेदव्यास और कवियों में शुक्राचार्य कवि भी मैं ही हूँ। ।।37।। 70.विभिन्न महानुभावों जिनके जीवन चरित्र को हम सब भली भाँति जानते हैं उनका उदाहरण देकर भी समझाया गया है कि हममें कौन सी विभूतियों हो तो हम भी ईश्वरत्व की प्राप्ति के अधिकारी होंगे। दरअसल ये व्यक्तित्व प्रेरणास्रोत हैं। इनका वर्णन करते हुए सबसे पहले श्रीकृष्ण का उदाहरण दिया गया है कि यदि हम भी श्रीकृष्ण के गुणों वाले हों तो हम में भी ईश्वरत्व का वास होगा। 71.उसी प्रकार  यदि हमारे व्यक्तित्व में अर्जुन सदृश्य गुण हों तो वो भी ईश्वरीय विभूति की ही अभिव्यक्ति है। 72.जब आप मुनि होते हैं यानी मननशील होते हैं , चिंतन और मनन की पराकाष्ठा चाहते हैं तो फिर वेद व्यास का उदाहरण लें, वो भी ईश्वय रूप ही हैं। 73.शुक्राचार्य दैत्यों के गुरु होते हुए भी महान द्रष्टा हैं , कवि हैं...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 36

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 36 द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌। जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्‌॥ ।।36।। मैं छल करने वालों में जूआ और प्रभावशाली पुरुषों का प्रभाव हूँ। मैं जीतने वालों का विजय हूँ, निश्चय करने वालों का निश्चय और सात्त्विक पुरुषों का सात्त्विक भाव हूँ। ।।36।। 65.ईश्वर की अनुभूति हर बड़े प्रभावकारी चीज से होती है। अच्छा और बुरा दोनों ही ईश्वर की अभिव्यक्ति हैं और समझाते हैं कि किस प्रक्रार बुरे के साथ बर्ताव करना चाहिए। इसी वजह से ईश्वरीय विभुतियों के संक्षिप्त वर्णन में जुए को भी जोड़ा गया है। जो चीजें इंसान को छलती हैं उनमें जुआ प्रमुख है सो उससे भी ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति होती है। इससे ये ज्ञात होता है कि जब विवेक पर पर्दा पड़ जाता है तो फिर आप सबकुछ हारने लगते हैं। 66.व्यक्ति का प्रभाव उसके व्यक्तित्व को प्रसार देता है और यह प्रभाव उसके गुणों, उसकी बुद्धि और विवेक के मेल से बनता है सो व्यक्ति का  प्रभाव भी व्यक्ति में ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति है। 67.जब व्यक्ति अपने सद्गुणों को सप्रयास बढाता है तो उसे बुरे गुणों पर विजय हासिल होती है।...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 35

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 35 बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्‌। मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥ ।।35।। तथा गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम और छंदों में गायत्री छंद हूँ तथा महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसंत मैं हूँ। ।।35।। 61.ईश्वर की अभिव्यक्ति सर्वक्षेष्ठ दृश्य और अनुभूति योग्य चीजों और भावों से होती है जिनसे हमें प्रेरणा प्राप्त होती है। इसीलिए श्रीकृष्ण समझाते हैं कि यद्द्पि सभी वेद ईश्वर की ही देन हैं और सामवेद ईश्वर की स्तुति ही है परंतु सामवेद की बृहत्साम स्तुति से ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति होती है। 62. मन्त्रों की रचना काव्य के रूप में है और विभिन्न काव्यों का  गठन भिन्न भिन्न छंदों में हैं। इन छंदों में गायत्री छंद से ईश्वरीय विभूति परिलक्षित होता है। 63.पूरा वर्ष भिन्न भिन्न मासों में बंटा हुआ होता है और उन मासों में मार्गशीर्ष मास से ईश्वरीय अनुभूति मिलती है। 64.पूरे साल के भिन्न भिन्न मास में  भिन्न भिन्न ऋतुएँ आती हैं यथा जाड़ा, वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा ऋतु। इन ऋतुओं में बसन्त की ऋतु में न तो जाड़ा अधिक पड़ता है न ही ग्रीष्...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 34

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 34 मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्‌। कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥ ।।34।। मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ तथा स्त्रियों में कीर्ति , श्री, वाक्‌, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ। ।।34।। 51. ईश्वर ही जीवन भी हैं और मृत्यु भी। मृत्यु शरीर का संसार से सभी सम्बन्धों का अंत है और यह ईश्वर प्रदत्त विभूति है जिसे हर किसी को प्राप्त होना है। 52.जीवन की उतपत्ति और जीवन में जो कुछ होता वह सब ईश्वर के कारण ही होता है, व्यक्ति निमित्त भर होता है हालांकि होने का निमित्त होना भी ईश्वरीय विभूति ही है। 53.ईश्वर का कोई लिंग नहीं होता है, वह तो हर रूप में हैं । सो ईश्वर नारी सुलभ विभूतियों के भी स्वामी हैं यथा  कीर्ति , श्री, वाक्‌, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा। कीर्ति व्यक्ति के वो कर्म हैं जो उसे महान बनाते हैं । यह कीर्ति महान व्यक्ति की ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति है। 55.श्री, व्यक्ति की सम्पन्नता है जो धन का पर्यावाची नहीं है। वस्तुतः श्री तो व्यक्ति की वो सम्पदा है जिससे उसे कांति प्राप्त...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 33

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 33 अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च। अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥ ।।33।। मैं अक्षरों में अकार हूँ और समासों में द्वंद्व नामक समास हूँ। अक्षयकाल अर्थात्‌ काल का भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला, विराट्स्वरूप, सबका धारण-पोषण करने वाला भी मैं ही हूँ। ।।33।। 47.ईश्वर सभी अक्षरों में मौजूद अकार हैं अर्थात हमारी भाषा का हर अक्षर ईश्वर की विभूति से ओतप्रोत है। 48.इसी प्रकार भाषा के व्याकरण में जो द्वंद्व समास है वह भी ईश्वरीय विभूति का प्रतीक है।       इन दो उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि हम जो बोलते लिखते पढ़ते हैं वह भी ईश्वरीय विभूति की ही देन है। 49.ईश्वर काल का भी काल यानी महाकाल हैं जिनका कभी नाश नहीं होता है, बल्कि इस संसार की समस्त क्रियाएँ इस काल के ही परिपेक्ष्य में घटित होती रहती हैं परंतु काल यथावत बना रहता है। 50. ईश्वर ही सभी  का कर्मफल दाता है। वह सब ओर मुख वाला है यानी समस्त दिशाएँ उसके सम्मुख ही हैं और वह भी का भरण पोषण करता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 32

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 32 सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन। अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम्‌॥ ।।32।। हे अर्जुन! सृष्टियों का आदि और अंत तथा मध्य भी मैं ही हूँ। मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या अर्थात्‌ ब्रह्मविद्या और परस्पर विवाद करने वालों का तत्व-निर्णय के लिए किया जाने वाला वाद हूँ। ।।32।। 44. ईश्वर इस सृष्टि के पहले भी थे, इस सृष्टि के दौरान भी हैं और इस सृष्टि के अंत के उपरांत भी हैं। ईश्वर समय और काल, स्थान और स्वरूप से परे हैं। इसीलिए ईश्वर ही इस सृष्टि के प्रारम्भ, मध्य और अंत के कारण हैं। 45. मनुष्य ने महान ज्ञान का अर्जन किया है और उसके ज्ञान अर्जन की कोई सीमा भी नहीं है। किंतु सभी ज्ञानों में श्रेष्ठ ज्ञान स्वयं का आत्म ज्ञान है जिससे व्यक्ति यह जानने में सक्षम हो पाता है कि दरअसल वह स्वयं कौन है। इसी आत्म ज्ञान को अध्यात्म कहते हैं जो ईश्वरीय विभूति है क्योंकि उसी ज्ञान से व्यक्ति आत्म से परमात्म की यात्रा पूरी करता है। 46. व्यक्तियों के मध्य विचारों का विनिमय सम्वाद के माध्यम से होता है। किसी भी व्यक्ति को अपने ज्ञान से मोह नहीं होना चाहिये, बल्कि ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 31

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 31 पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम्‌। झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी॥ ।।31।। मैं पवित्र करने वालों में वायु और शस्त्रधारियों में श्रीराम हूँ तथा मछलियों में मगर हूँ और नदियों में श्री भागीरथी गंगाजी हूँ। ।।31।। 40.  वायु सर्वश्रेष्ठ पवित्रकारी है। साथ ही वायु जीवन दायी भी है। बिना रंग, गंध, शोर शराबे के वायु निरन्तर सभी को जीवन भी देता और साथ साथ हर अपवित्र , दुर्गन्धित माहौल को पवित्रता और शुद्धता भी प्रदान करता है। इस कारण वायु ईश्वरीय विभूति है। 41.शस्त्र उसी के लिए होता है जो शस्त्र के उपयोग में विवेक और धर्म के अनुसार निर्णय ले पाता है अन्यथा शस्त्र विनाश के कारण हो जाते हैं। इसी वजह से शस्त्र धारण करने वाले श्रीराम ही शस्त्रों के सही अधिकारी हैं जो धर्म के लिए और मानव कल्याण के लिए शस्त्र का उपयोग करते हैं। सो श्रीराम ईश्वरीय विभूति हैं। 42.ईश्वरीय विभूति भव्यता लिए हुए होती हैं और इसीलिए सभी जलचरों में मकर जिसे सबसे भव्य जलचर माना गया है वह ईश्वरीय विभूति की अभिव्यक्ति है। 43.गंगा जीवन दायिनी है। उसके किनारे पर कई महान सभ्यताओं ने...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 30

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 30 प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम्‌। मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्‌॥ ।।30।। मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों का समय (क्षण, घड़ी, दिन, पक्ष, मास आदि में जो समय है वह मैं हूँ) हूँ तथा पशुओं में मृगराज सिंह और पक्षियों में गरुड़ हूँ। ।।30।। 36.ईश्वर तो दैत्यों में भी विराजमान होते हैं ।अगर दैत्य के अंदर ईश्वरत्व के गुण हो तो दैत्य भी ईश्वर की ही वी विभूति होते हैं। इसी वजह से ईश्वर की अभिव्यक्ति दैत्यराज प्रह्लाद के माध्यम से होता है। 37. ईश्वर उन चीजों से भी व्यक्त होते हैं जो टैंजीबल नहीं होते हैं परंतु जो स्वयम में नियंत्रण की भूमिका निभाते हैं। और इसी वजह से समय जो सब कुछ का साक्षी है उससे ईश्वर की अभिव्यक्ति प्राप्त होती है। 38.इसी प्रकार ईश्वर पशुओं में भी अभिव्यक्त होते हैं। पशुओं का राजा , सिंह होता है जिसकी उपस्थिति मात्र से अन्य पशुओं की उपस्थिति प्रभावित होती है और जो शक्ति का प्रतीक होता है, सो ईश्वर पशुओं के राजा सिंह से व्यक्त होते हैं। 39.पशुओं की भाँति ईश्वर अन्य जीवों जैसे पक्षियों से व्यक्त होते हैं और ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 29

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 29 अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम्‌। पितॄणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम्‌॥ ।।29।। मैं नागों में  शेषनाग और जलचरों का अधिपति वरुण देवता हूँ और पितरों में अर्यमा नामक पितर तथा शासन करने वालों में यमराज मैं हूँ। ।।29।। 32. ईश्वर की अभिव्यक्ति शेषनाग में भी मिलती है। सनातन परंपरा में माना जाता है कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड शेषनाग के फन पर स्थिर है और शेषनाग के शरीर पर भगवान विष्णु, जो संसार के पालक हैं निश्चिन्त भाव से सोये हुए हैं। इस प्रकार शेषनाग न सिर्फ ब्रह्मांड को स्थिर रखे हुए हैं बल्कि उस ब्रह्मांड के पालक श्रीविष्णु और उनकी धर्मपत्नी, धन और सम्पदा की स्वामिनी लक्ष्मी को भी निश्चिंत भाव से आराम की मुद्रा दिए हुए हैं। विशेष यह है कि शेषनाग के फन अंदर की तरफ मुड़े हुए हैं जिससे उनकी दृष्टि भगवान पर स्थिर है। इससे हमें यह समझ मिलती है कि जब मन शांत भाव से ईश्वर  में तल्लीन होजाता है तो फिर  वह मन संसार के सारे भार को निश्चिन्त भाव से वहन कर लेता है और ऐसे मन वाले के जीवन में धन संपदा भी प्रचुर होती है। मन ईश्वर में लगा हुआ हो , वही मन शेष...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 28

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 28 आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक्‌। प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः॥ ।।28।। मैं शस्त्रों में वज्र और गौओं में कामधेनु हूँ। शास्त्रोक्त रीति से सन्तान की उत्पत्ति का हेतु कामदेव हूँ और सर्पों में सर्पराज वासुकि हूँ। ।।28।। 28.वज्र को देवताओं का सबसे मजबूत शस्त्र माना जाता है। वज्र दधीचि नामक तपस्वी के अस्थियों से बनाया गया माना जाता है। तप में लक्ष्य के प्रति एकाग्रता, समर्पण और उपासना निहित है और इनके मेल से बने शस्त्र हर आसुरी वृत्ति का नाश करने में सक्षम होते हैं। सो ईश्वर को शस्त्रों  में वज्र माना गया है। 29.सभी कामनाओं की पूर्ति ईश्वर ही करते हैं , उन्हीं की अनुकम्पा से मनुष्य की कामनाओं की क्षुधा की तृप्ति होती है सो ईश्वर को गौओं में कामधेनु कहा गया है। 30.प्राणियों की जातियों की निरंतरता के प्रजनन अनिवार्य शर्त है और प्रजनन हेतु काम की भावना का उतपन्न होना आवश्यक है। इसीलिए ईश्वर ही काम की इक्षा को  उतपन्न करने वाले कामदेव भी हैं। 31.सर्पों के राजा वासुकि हैं जिन्होंने सर्प होते हुए भी प्राणियों के कल्याणार्थ उनकी मदद...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 27

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 27 उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्धवम्‌। एरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम्‌॥ ।।27।। घोड़ों में अमृत के साथ उत्पन्न होने वाला उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा, श्रेष्ठ हाथियों में ऐरावत नामक हाथी और मनुष्यों में राजा मुझको जान। ।।27।। 25. ईश्वर पशु, पक्षी, सजीव, निर्जीव सब में हैं और सर्व श्रेष्ठ उदाहरणों से हम इस तथ्य को समझते हैं। सो अश्वों में ईश्वर उच्चैःश्रवा अश्व ईश्वरीय गुणों की अभिव्यक्ति हैं। 26. और इसी प्रकार हाथियों में ऐरावत हाथी ईश्वरीय अभिव्यक्ति है। 27. मनुष्यों में जो व्यक्ति ईश्वरीय गुणों से परिपूर्ण, अन्य सभी प्राणियों का पोषण करने वाला और उनकी रक्षा करने वाला होता है अर्थात जो राजा होता है वही ईश्वरत्व से परिपूर्ण होता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 26

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 26 अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः। गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः॥ ।।26।। मैं सब वृक्षों में पीपल का वृक्ष, देवर्षियों में नारद मुनि, गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्धों में कपिल मुनि हूँ। ।।26।। 21.ईश्वर तो हर जगह हैं और हर चीज में ईश्वर हैं। ईश्वरीय अभिव्यक्ति ही ईश्वर की विभूति है, सो इसे समझाने के लिए सर्वश्रेष्ठ का उदाहरण ही उपयुक्त है। इसीलिए ईश्वर वृक्षों में भी हैं और पीपल का वृक्ष अपने गुणों के माध्यम से ईश्वरीय विभूति को दर्शाता है। 22.इसीप्रकार दैवी गुणों के ऋषि नारद हैं जो ईश्वरीय विभूति के प्रतीक हैं। 23.सभी गंधर्वों में चित्ररथ सर्वश्रेष्ठ हैं और वे ईश्वर को अभिव्यक्त करता हैं। 24.सभी सिद्ध पुरुषों में यानी जिन्होंने ईश्वर को साक्षात अनुभव किया है अर्थात जिनमें ईश्वरीय गुण पूर्णता के साथ हैं उनमें  ऋषि कपिल के रूप में ईश्वर अभिव्यक्त होते हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 25

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 25 महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्‌। यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥ मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात्‌‌ ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूँ। ।।25। । 17. ईश्वर की उपस्थिति तो हर जगह है, फिर चाहे वो दैवी , मानवीय हो या आसुरी।  और हर कोटि के सर्वोत्तम उदाहरण से ईश्वरत्व को समझा जा सकता है। सो महान ऋषियों की परंपरा में भृगु ऋषि के माध्यम से, उनके जीवन चरित्र को समझकर हम ईश्वरत्व को समझ पाते हैं। 18.भावनाओं का उद्गार शब्दों से होता है। और सनातन परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण अक्षर ॐ है जिससे ईश्वर की समझ बनती है यानी ॐ में ईश्वरीय वास है। 19.निष्काम कर्म को सम्पादित करने का मार्ग है कि व्यक्ति गया विधि से कर्म करे। कई तरह के यज्ञों में ईश्वर के नाम का स्मरण सबसे अच्छा यज्ञ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि बारम्बार ईश्वरीय नाम को मन भाव से लेने से व्यक्ति स्वतः धीरे धीरे गलत कर्मों से दूर होता जाता। सो जपयज्ञ में ईश्वर ही बसते हैं 20 बहुत ऊँचा होकर भी हिमालय स्थिर है, वह अपने ही भार स...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 24

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 24 पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्‌। सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥ ।।24।। पुरोहितों में मुखिया बृहस्पति मुझको जान। हे पार्थ! मैं सेनापतियों में स्कंद और जलाशयों में समुद्र हूँ। ।।24।। 14. जो व्यक्ति दूसरों के हित हेतु उसके बदले कर्मकांड और पूजा इत्यादि करता है वह पुरोहित कहलाता है। यँहा हित महत्वपूर्ण है। दैवी गुणों के स्वामी देवताओं का हित चाहने वाले और उसके अनुरूप  कर्मकांडों को सम्पादित करने वाले गुरु वृहस्पति होते हैं। वे वृहस्पति  दूसरों के हितार्थ कर्मों में प्रवृत्त होते हैं सो वही ईश्वर रूप को व्यक्त करते हैं। 15.ईश्वर ही सभी सद्गुणों के स्वामी भी हैं और उनके रक्षक भी। सो वे देवताओं के सेनापति यानी दैवी गुणों के स्वामियों के स्वामी और उन दैवी सम्पदाओं के रक्षक यानी स्कंद अर्थात कार्तिकेय भी हैं। 16. जीवन का अवलम्ब जल है।  जल का सबसे बड़ा भंडार समुद्र है जो ईश्वर का स्वरूप है यानी ईश्वर ही जीवन का अवलम्ब है।साथ ही सागर अनंत सम्पदा धरोहर भी है सो वह ईश्वर को ही अभिव्यक्त करता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 23

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 23 रुद्राणां शङ्‍करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम्‌। वसूनां पावकश्चास्मि मेरुः शिखरिणामहम्‌॥ ।।23।। मैं एकादश रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धन का स्वामी कुबेर हूँ। मैं आठ वसुओं में अग्नि हूँ और शिखरवाले पर्वतों में सुमेरु पर्वत हूँ। ।।23।। 10. सनातन परंपरा में 11 रुद्र माने जाते हैं जिनका स्वरूप बड़ा भयंकर होता है। इन 11 रुद्रों में एक शंकर ईश्वर रूप हैं। शंकर विनाश के कारक होते हैं। विनाश जीवन की निरंतरता को बनाये रखने के लिए एक अनिवार्य तत्व है । विनाश से ही नए का जन्म सम्भव होता है, नई रचनात्मकता आती है। और जीवन और उसके विभिन्न आयाम और पल्लवित होते हैं। 11. ईश्वर तो सब में हैं , राक्षस और यक्ष में भी ईश्वर हैं। उनमें भी कई अच्छी चीजें हैं। राक्षसों और यक्षों के भरण पोषण की जिम्मेदारी कुबेर पर है क्योंकि धन के रक्षक तो वही हैं । ईश्वर ही कुबेर हैं क्योंकि उनके ही स्रोत से उनका और सबका पोषण होता है। 12.वसु ऋतुओं के राजा होते हैं और आठ वसुओं में प्रधान अग्नि हैं। ईश्वर स्वयं को अग्नि के माध्यम से भी व्यक्त करते हैं क्योंकि अग्नि को सारे क...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 22

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 22 वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासवः। इंद्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना॥ ।।22।। मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में इंद्र हूँ, इंद्रियों में मन हूँ और भूत प्राणियों की चेतना अर्थात्‌ जीवन-शक्ति हूँ। ।।22।। 6.परमात्मा ही परमात्मा की संगीतमय स्तुति हैं, सो सामवेद भी वही हैं। सामवेद सनातन परंपरा में ईश्वर की स्तुति पद्य कला में है सो श्रीकृष्ण ने ईश्वरीय विभूति को पहचानने के लिए सामवेद का उल्लेख किया है।। 7. सभी दैवी गुणों को नियंत्रित करने वाला प्रधान दैवी गुण इंद्र कहलाता है। ईश्वर इंद्र हैं यानी समस्त दैवी गुणों के प्रधान भी हैं। 8. पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियों में मन तो शामिल नहीं है लेकिन सभी इन्द्रियाँ नियंत्रित मन से ही होती हैं क्योंकि सभी भाव सर्वप्रथम मन में ही उठते हैं सो ईश्वर सभी इंद्रियों को नियंत्रित करने वाला मन भी है। 9.पदार्थ बीना चेतना के निर्जीव होता है। चेतना उसमें जीवन का संचार करती है। यह चेतना जो जीवन का संचार करती है वह भी ईश्वर हीं है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 21

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 21 आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान्‌। मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी॥ ।।21।। मैं अदिति के बारह पुत्रों में विष्णु और ज्योतियों में किरणों वाला सूर्य हूँ तथा मैं उनचास वायुदेवताओं का तेज और नक्षत्रों का अधिपति चंद्रमा हूँ। ।।21।। ईश्वर की विभूतियों का वर्णन आगे बढाते हुए उन उद्धरणों को लिया गया है जिन्हें हम देखते और अनुभव करते हैं। इससे हमें खुद को ईश्वर के साथ खुद को जोड़ने में सहायता मिलता है। तो आइए, हम क्रम से इन विभूतियों को समझें। 3. विष्णु को सनातन परंपरा के अनुसार अदिति का पुत्र माना जाता है। विष्णु सर्व्यापी हैं, वे ईश्वर हैं। विष्णु यानी ईश्वर हर जगह हैं। समय, काल, स्थान से परे ईश्वर सर्वव्यापी और सर्वकालिक हैं। 4. ईश्वर सूर्य भी हैं । सूर्य यानी प्रकाश का असीमित भंडार। ईश्वर की अनुभूति से व्यक्ति के जीवन का अंधकार समाप्त हो जाता है, उसे असत से सत की तरफ चलने का मार्ग दिखता है।  4.चन्द्रमा के रूप में ईश्वर शीतलता की अनुभूति देते हैं। ईश्वर की अनुभूति व्यक्ति के अंदर से क्रोध और ईर्ष्या की अग्नि को शांत कर देता है। 5. प्रधान ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 20

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 20 अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः। अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥ ।।20।। हे अर्जुन! मैं सब भूतों के हृदय में स्थित सबका आत्मा हूँ तथा संपूर्ण भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ। ।।20।। अर्जुन के आग्रह पर ईश्वर की विभूतियों को समझाते हुए श्रीकृष्ण ने जिन विभूतियों की चर्चा की है वे निम्ननवत हैं। 1.ईश्वर सभी जीवों की आत्मा हैं। हमने जाना है कि व्यक्ति का वास्तविक अस्तित्व उसकी चेतना से बनता है। उसकी चेतना यानी कॉन्सियसनेस उसके वास्तविक अस्तित्व का परिचायक है। बाकी जो है वह उसका अहंकार है। उस अहंकार को हटाने के बाद ही व्यक्ति अपनी चेतना से परिचित हो पाता है। और यह सभी में एक समान ही है। यही उसकी आत्मा है। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने ईश्वर की विभूतियों को स्पष्ट करते हुए जिस विभूति का सर्वप्रथम उल्लेख किया है वह है कि ईश्वर सभी में उसकी चेतना यानी उसके कॉन्सियनेस के रूप में मौजूद है। ईश्वर कँही और नहीं वह तो आपकी अपनी चेतना है जो आपके अंदर है। जिस समय आप अपने अहंकार को समाप्त कर लेते हैं उसी समय आप अपने ईश्वरत्व को पा लेते हैं। आप ही ईश्वर हैं। अहम ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 19

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 19 श्रीभगवानुवाच हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः। प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे॥ ।।19।। श्री भगवान बोले- हे कुरुश्रेष्ठ! अब मैं जो मेरी दिव्य विभूतियाँ हैं, उनको तेरे लिए प्रधानता से कहूँगा; क्योंकि मेरे विस्तार का अंत नहीं है। ।।19।। ईश्वर को समझने के लिए अनंत रास्ते हैं क्योंकि ईश्वर के लक्षणों , उनकी विभूतियों को शब्दों में बाँधना सम्भव नहीं है। किंतु ईश्वर को समझने के लिए कुछ लक्षणों को जो प्रमुख हैं उनको समझा जा सकता है। इन प्रधान विभूतियों के माध्यम से हम ईश्वरीय मार्ग पर बढ़ते हुए हम उनकी अनंत विभूतियों का अनुभव अवश्य ही कर सकते हैं।  सो हम आगे देखते हैं कि ईश्वर को समझने के लिए उनके किन प्रधान विभूतोयों पर केन्द्रित होना चाहिए।