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Showing posts from August, 2023

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 45

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 45 स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥ 45।। अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परमसिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन। जब व्यक्ति ऊँचे शिखर की यात्रा करना चाहता है, जब वह स्वयं के उद्धार के मार्ग पर चलना चाहता है तो उसके लिए सबसे जरूरी होता है कि वह अपने नैसर्गिक स्वभाव की पहचान करे ताकि उसे ज्ञात हो सके कि उसे यह यात्रा कँहा से प्रारम्भ करनी है। प्रत्येक व्यक्ति तीनों गुणों, सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से लैस होता है और इन तीनों गुणों के आपसी अनुपात के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के स्वभाव वाला होता है। 1. जब सत्वगुण प्रचुर मात्रा में हो और रजोगुण और तमोगुण अत्यल्प हों तो व्यक्तिग ब्राह्मण स्वभाव वाला होता है। 2.जब व्यक्ति में सत्वगुण प्रभावी हो किंतु साथ में रजोगुण भी पर्याप्त हो किंतु तमोगुण अत्यल्प हो तो व्यक्ति क्षत्रिय स्वभाव वाला होता है। 3.जब ...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 44

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 44 कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्‌। परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्‌॥ 44।। खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार (वस्तुओं के खरीदने और बेचने में तौल, नाप और गिनती आदि से कम देना अथवा अधिक लेना एवं वस्तु को बदलकर या एक वस्तु में दूसरी या खराब वस्तु मिलाकर दे देना अथवा अच्छी ले लेना तथा नफा, आढ़त और दलाली ठहराकर उससे अधिक दाम लेना या कम देना तथा झूठ, कपट, चोरी और जबरदस्ती से अथवा अन्य किसी प्रकार से दूसरों के हक को ग्रहण कर लेना इत्यादि दोषों से रहित जो सत्यतापूर्वक पवित्र वस्तुओं का व्यापार है उसका नाम 'सत्य व्यवहार' है।) ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं तथा सब वर्णों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है। रजोगुण की अधिकता और साथ में क्रमश तमोगुणी और सत्वगुणी व्यक्ति वैश्य कहलाता है जबकि तमोगुण की अधिकता वाले को शुद्र कहते हैं    बैश्य के स्वाभाविक गुण निम्नवत हैं। 1.वैश्य स्वभाव वाला व्यक्ति स्वभाव से ही उत्पादक होता है अर्थात वह  संसाधनों से उपभोग किये जा सकने वाले सम्पदा को पैदा करता है। 2. संसाधनों की सुरक्ष...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 43

श्रीमदमागवादगीता अद्याय 18 श्लोक 43 शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्‌। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌॥ 43।। शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और युद्ध में न भागना, दान देना और स्वामिभाव- ये सब-के-सब ही क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं। रजो गुण की अधिकता , और अल्प मात्रा में सत्वगुण और अत्यल्प मात्रा में तमोगुण धारी व्यक्ति स्वभाव से क्षत्रिय स्वभाव वाला  होता है। ऐसा व्यक्ति मुख्य रूप से क्षत्रिय होता है भले ही उसमे कुछ हद तक ब्राह्मण और बहुत कम तक बैश्य और शूद्र के भी लक्षण विद्यमान होते हैं। ऐसे क्षत्रिय स्वभाव वाले व्यक्ति के ज्ञान, बुद्धि और कर्म पूर्व पठित ज्ञान के अनुसार  निम्नवत कर्म होते हैं  1. क्षत्रिय स्वभाव वाला व्यक्ति अपने स्वभाव से शूरवीर होता है अर्थात अपने समक्ष उपस्थित चुनौतियों और बदलाव का सामना करने के लिए ततपर रहता है न कि उनसे भागता है।यह गुण उसमें नेतृत्व क्षमता को दर्शाता है। 2. ऐसा व्यक्ति अपने स्वभाव से ही ज्ञान की इक्षा रखने वाला होता है। ज्ञान और साहस मिलकर उसमें तेज प्रकट करते हैं जिसके कारण वह निडर होता है और चीजों के प्रति ह...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 42

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 42 शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्‌॥ 42।। अंतःकरण का निग्रह करना, इंद्रियों का दमन करना, धर्मपालन के लिए कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में देखना चाहिए) रहना, दूसरों के अपराधों को क्षमा करना, मन, इंद्रिय और शरीर को सरल रखना, वेद, शास्त्र, ईश्वर और परलोक आदि में श्रद्धा रखना, वेद-शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन करना और परमात्मा के तत्त्व का अनुभव करना- ये सब-के-सब ही ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं। वैसे तो किसी भी व्यक्ति में तीनों गुण यानी सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण होते हैं लेकिन जब सत्वगुण सर्वाधिक होता है और रजोगुण उससे कम और तमोगुण अत्यल्प होता है तो उसे ब्राह्मण कहा जाता है। यह व्यक्ति भी तमोगुण और रजोगुण के प्रभाव से उतपन्न स्वभाव प्रदर्शित करता है किंतु उसका स्वभाविक आचरण सबसे अधिक प्रभावी सत्वगुण के अनुसार ही होता है।            अब देखते समझते हैं कि ब्राह्मण  का कर्म सत्वविक वृत्ति के अनुसार कैसा होना चाहिए। 1.मन शांत और उद्वेगरहित...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 41

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 41 ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप। कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥ 41।। हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं। हरेक व्यक्ति में तीनो गुण -सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण होते हैं, किंतु कोई एक गुण सबसे अधिक होता है। एक गुण सबसे अधिक होता है, और उसपर अन्य दो गुणों का कितना प्रभाव पड़ता है इसके आधार पर व्यक्तियों की चार कोटियाँ मानी गई है, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र। यह विभाजन स्पष्टतः व्यक्तियों के स्वभाव जनित गुणों के अनुसार हैं ।

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 40

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 40 न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः। सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिःस्यात्त्रिभिर्गुणैः॥ 40।। पृथ्वी में या आकाश में अथवा देवताओं में तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है, जो प्रकृति से उत्पन्न इन तीनों गुणों से रहित हो। यह सम्पूर्ण सृष्टि, सभी दृश्य और अदृश्य जो भी इस प्रकृति में है सभी कुछ इन तीन गुणों-सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से बने हुए हुए हैं। एक ही गुण हो किसी में यह सम्भव नहीं है, हाँ यह अवश्य है कि कोई एक गुण किसी भी सर्वाधिक हो और अन्य दो कम हों लेकिन तीनों गुण होंगे हीं। 
 जिन पाँच कारकों की चर्चा की गई है अर्थात अधिष्ठान, कर्ता भाव, करण, प्राण और दैव, वे सभी कर्म होने के कारण हैं लेकिन कर्म किसकी प्रेरणा से होता है, यह समझना भी जरूरी है। कर्म के प्रेरणास्रोत हैं ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता।    अब आइए समझें कि ये तीन क्या हैं,  ज्ञाता -जानने वाले का नाम 'ज्ञाता' है,  ज्ञान- जिसके द्वारा जाना जाए, उसका नाम 'ज्ञान' है  ज्ञेय -जानने में आने वाली वस्तु का नाम 'ज्ञेय' है     इनकी समझ व्यक्ति को अपने दायित्वों के निर्वहन में सहायता देता है और व्यक्ति समझ पाता है कि उसे किस प्रकार अपने जीवन में साधना करनी चाहिए। एक ही परिस्थिति में एक ही पदार्थ से बने भिन्न भिन्न मनुष्य भिन्न भिन्न तरह से कर्म करते हैं, भिन्न भिन्न तरह के कर्म करते हैं। ऐसा क्यों होता है?    ज्ञाता आपका अह्महार है। स्वयं से , स्वयं के अवयवों से आपकी पहचान आपको ज्ञाता बनाती है। "मैं देखता हूँ"। यँहा "मैं" ज्ञाता है। मैं अपनी आंखों से अपनी पहचान का तादाम्य बैठाता है। इस प्रकार आपकी इंद्रियां, आपकी बुद्धि, आपका विवेक ज्ञाता की भूमिका में होते हैं। जो दे...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 39

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 39 यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मनः। निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥ 39।। जो सुख भोगकाल में तथा परिणाम में भी आत्मा को मोहित करने वाला है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहा गया है। अंग्रेजी में एक कहावत है ignorance is a bliss. जब व्यक्ति को ज्ञान, जानकारी, समझदारी और जागरूकता का अभाव होता है तो वह परम प्रसन्नता का अनुभव करता है। इस अज्ञानता की वजह से वह भरम में रहता है, उसे पता ही नहीं कि सही क्या है, गलत क्या है, उचित और अनुचित क्या है, कौन सा कर्म वांछित है और कौन अवांछित है। उसकी स्मृति भी भ्रमित होती है। उसका मन मोह की अवस्था में पड़ा रहता है।  यह अवस्था निंद्रा, आलस, प्रमाद की होती है जिसमें व्यक्ति स्वयं के प्रति, अपने कर्मों के प्रति, उनके परिणामों के प्रति किसी भी जागरूकता से रिक्त होता है। इस अवस्था में उसे जो सुख मिलता है वह तामसिक सुख कहलाता है। इस सुख का कारण अज्ञानता, जागरूकता का अभाव, मोह, भ्रम और भ्रांति होती है। इनके कारण व्यक्ति कर्म करते हुए भी और उनका परिणाम भोगते हुए भी मोह की अवस्था में पड़ा रहता है। ...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 38

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 38 विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्‌। परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्‌॥ 38।। जो सुख विषय और इंद्रियों के संयोग से होता है, वह पहले- भोगकाल में अमृत के तुल्य प्रतीत होने पर भी परिणाम में विष के तुल्य (बल, वीर्य, बुद्धि, धन, उत्साह और परलोक का नाश होने से विषय और इंद्रियों के संयोग से होने वाले सुख को 'परिणाम में विष के तुल्य' कहा है) है इसलिए वह सुख राजस कहा गया है। लेकिन व्यक्ति कई बार इन्द्रीयजनित सुखों को ही परम मान लेता है। जब व्यक्ति को लगता है कि उसकी इंद्रियों से जो सुख मिल रहा है वही एकमात्र सुख है तब वह ऐसी संवेदनाएं अधिक से अधिक चाहता है। उसका सुख इंद्रियों से मिलने वाली सम्वेदनाओं पर आधारित होता है सो वह स्वयं से बाहर की चीजों और व्यक्तियों से सूखी होना चाहता है। लेकिन ये बाहरी उत्प्रेरक हमेशा के लिए उसके साथ सम्बद्ध तो रह नहीं सकते सो उनका साथ छूटने पर उसे दुख ही मिलता है। साथ ही जिस उत्प्रेरक से उसे अपनी इंद्रियों के कारण सुख का अनुभव होता है वे समय के साथ पुरानी पड़ जाती है और उनसे उनकी सम्बद्धता पूर्व की भांति इन्द्रिय सु...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 36-37

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 36-37 सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रृणु मे भरतर्षभ। अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति॥ 36।। यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम्‌। तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम्‌॥ 37।। हे भरतश्रेष्ठ! अब तीन प्रकार के सुख को भी तू मुझसे सुन। जिस सुख में साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवादि के अभ्यास से रमण करता है और जिससे दुःखों के अंत को प्राप्त हो जाता है, जो ऐसा सुख है, वह आरंभकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत (जैसे खेल में आसक्ति वाले बालक को विद्या का अभ्यास मूढ़ता के कारण प्रथम विष के तुल्य भासता है वैसे ही विषयों में आसक्ति वाले पुरुष को भगवद्भजन, ध्यान, सेवा आदि साधनाओं का अभ्यास मर्म न जानने के कारण प्रथम 'विष के तुल्य प्रतीत होता' है) होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है, इसलिए वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है। संसार को व्यक्ति अपने मन के भाव यानी अपने विचारों के अनुसार समझता है। व्यक्ति के समस्त कर्मो  का उद्देश्य सुख और शांति की प्राप्ति है सो जैसे  मन के विचार होते हैं उसे उसी के अ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18-धृति के प्रकार(श्लोक 33 से 35 पर आधारित)

धृति के प्रकार (श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 33 से 35 के आधार पर) कर्म को सफलतापूर्वक करने के लिए कर्ता को बुद्धि और ज्ञान का होना ही पर्याप्त नहीं होता है बल्कि उसके अंदर कर्म सम्पादन का दृढ़ निश्चय और धीरज भी होना अनिवार्य है। आपको पता है, आपको एक जगह पहुँचना है, आपको यह भी पता है कि जाने का मार्ग क्या है लेकिन इतने भर से आप अपने गंतव्य पर पहुँचते तो नहीं हैं। बल्कि आपको गंतव्य तक पहुँचने के लिए  1.चलना होता है, 2.नियमित चलना होता है, 3.बिना दिग्भर्मित हुए चलना होता है, और 4.तब तक चलना होता है जब तक गंतव्य पर पंहुँच न जाएं।        यही धृति है, धीरज है, धैर्य है। जब व्यक्ति अपनी सात्विकी बुद्धि और ज्ञान से अपनी स्थिति को समझकर कर्म करता है तो उसके लिए आवश्यक है कि 1.वह कर्म में प्रवृत्त रहे, 2. निर्धारित कर्म को नियमित करे, 3.कर्म करने से उसका ध्यान भटके नहीं, कई तरह के लाभ, लोभ, लालच, भय, क्रोध, घृणा, आदि नकारात्मक भाव से बचे रहकर अपने अंतिम लक्ष्य के प्रति ध्यानमग्न हो कर कर्म करे, और 4.जो कर्म करे उसके परम् लक्ष्य को प्राप्त करने के पूर्व रुके नहीं। ...

बुद्धि के प्रकार(श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 29 से 32 पर आधारित)

बुद्धि के प्रकार (श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 29 से 32 पर आधारित) प्रत्येक व्यक्ति बाहरी उत्प्रेरकों के प्रति भावना व्यक्त करता है। इस भावना को समझ कर, उसकी जाँच पड़ताल कर उसपर अपनी समझ विकसित करता है  और इसप्रकार समझदारी प्राप्त करता है।      बाहरी उत्प्रेरकों से मन में जो भावनाएँ उतपन्न होती हैं उनके प्रति जो समझदारी विकसित करता है वही बुद्धि है और जो समझदारी विकसित होती है वह ज्ञान है। इसप्रकार बुद्धि के अनुरूप  ही ज्ञान होता है। मान लीजिए कि किसी ने आपको गाली दी। गाली एक बाहरी उत्प्रेरक है । अब उस गाली के प्रति हमारी भावना में प्रतिक्रिया स्वरूप हिंसक भाव आ सकता है अथवा क्षमा कर देने का भाव आ सकता है या फिर उसे नजरअंदाज करने का भी भाव आ सकता है। इन तीनों में हम कौन सा भाव अपनाते हैं यह हमारे बुद्धि और विवेक पर निर्भर करता है। और इस बुद्धि के अनुरूप हम जो निर्णय लेते हैं वही हमारे ज्ञान को प्रदर्शित करता है। इस प्रकार बुद्धि मन और ज्ञान के बीच की कड़ी है। बुद्धि के कारण ही व्यक्ति चीजों में भेद कर उनके प्रकार और व्यवहार को समझता है। बुद्धि ही समझदारी की ज...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 35

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 35 यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च। न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी॥ 35।। हे पार्थ! दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा निद्रा, भय, चिंता और दु:ख को तथा उन्मत्तता को भी नहीं छोड़ता अर्थात धारण किए रहता है- वह धारण शक्ति तामसी है। तामसी वृत्ति के व्यक्ति हमेशा काल्पनिक चीजों में उलझे रहते हैं और हमेशा सच्चाई से मुँह चुराते भागते रहते हैं। वे निरन्तर भय में जीते हैं, ऐसे भय में जिसका कोई कारण नहीं होता है, बल्कि जो उनकी कल्पना की उपज होता है। ये लोग धर्म कर्म भी न तो श्रद्धा से करते हैं और न लोभ से बल्कि वे यह भी भय से ग्रस्त होकर ही करते हैं। ये लोग बराबर दुख और विषाद में लगे रहते हैं, दुख और विषाद उनकी स्थाई प्रवृत्ति होती है। सो वे हमेशा इस भावना से ग्रस्त होते हैं कि उन्हींने कुछ खो दिया है और इसके दुख में ही लगे रहते हैं जिसके कारण अवसाद उनका स्थाई भाव बन जाता है। और ऐसे लोग अपने अहंकार में ही चूर रहते हैं और बारम्बार स्वयं को अवमानित महसूस करते हैं

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 34

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 34 यया तु धर्मकामार्थान्धत्या धारयतेऽर्जुन। प्रसङ्‍गेन फलाकाङ्क्षी धृतिः सा पार्थ राजसी॥ 34।। परंतु हे पृथापुत्र अर्जुन! फल की इच्छावाला मनुष्य जिस धारण शक्ति के द्वारा अत्यंत आसक्ति से धर्म, अर्थ और कामों को धारण करता है, वह धारण शक्ति राजसी है। कई व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनमें कर्मफल की प्राप्ति की इक्षा अति तीव्र होती है। ऐसे लोग वही कर्म करते हैं जिनसे उनको मनवांछित फल की प्राप्ति हो और इसलिए इक्षित फल की प्राप्ति के लिए ही उनकी धृति होती है। सो इस प्रकार के व्यक्ति फल और अर्थ( धन) में मन को लगाए कर्म करने वाले होते हैं और इक्षित फलों की प्राप्ति के लिए वे सांसारिक रूप से आवश्यक धर्म कर्म में प्रवृत्त होते हैं। ऐसी धृति या धैर्य धारण की वृत्ति को राजसी धृति कहा जाता है। लेकिन इस प्रकार की धृति सही और गलत पर आधारित न हो कर पसन्द और नापसन्द पर आधारित होती है और मात्र फल प्राप्ति की इक्षा से होती है जिसके कारण ऐसे व्यक्ति घोर कामी होते हैं और निरन्तर संसार के बंधन में बंधे होते हैं। ऐसे लोग बिना थके बराबर फल की प्राप्ति और धन कमाने में लगे रहते हैं। और ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 33

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 33 धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी॥ 33।। हे पार्थ! जिस अव्यभिचारिणी धारण शक्ति (भगवद्विषय के सिवाय अन्य सांसारिक विषयों को धारण करना ही व्यभिचार दोष है, उस दोष से जो रहित है वह 'अव्यभिचारिणी धारणा' है।) से मनुष्य ध्यान योग के द्वारा मन, प्राण और इंद्रियों की क्रियाओं ( मन, प्राण और इंद्रियों को भगवत्प्राप्ति के लिए भजन, ध्यान और निष्काम कर्मों में लगाने का नाम 'उनकी क्रियाओं को धारण करना' है।) को धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी। कर्म को सफलतापूर्वक करने के लिए कर्ता को बुद्धि और ज्ञान का होना ही पर्याप्त नहीं होता है बल्कि उसके अंदर कर्म सम्पादन का दृढ़ निश्चय और धीरज भी होना अनिवार्य है। आपको पता है, आपको एक जगह पहुँचना है, आपको यह भी पता है कि जाने का मार्ग क्या है लेकिन इतने भर से आप अपने गंतव्य पर पहुँचते तो नहीं हैं। बल्कि आपको गंतव्य तक पहुँचने के लिए  1.चलना होता है, 2.नियमित चलना होता है, 3.बिना दिग्भर्मित हुए चलना होता है, और 4.तब तक चलना होता है जब तक गंतव्य पर पंहुँच न ...