श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 45
श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 45 स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः। स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु॥ 45।। अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवत्प्राप्ति रूप परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परमसिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन। जब व्यक्ति ऊँचे शिखर की यात्रा करना चाहता है, जब वह स्वयं के उद्धार के मार्ग पर चलना चाहता है तो उसके लिए सबसे जरूरी होता है कि वह अपने नैसर्गिक स्वभाव की पहचान करे ताकि उसे ज्ञात हो सके कि उसे यह यात्रा कँहा से प्रारम्भ करनी है। प्रत्येक व्यक्ति तीनों गुणों, सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से लैस होता है और इन तीनों गुणों के आपसी अनुपात के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के स्वभाव वाला होता है। 1. जब सत्वगुण प्रचुर मात्रा में हो और रजोगुण और तमोगुण अत्यल्प हों तो व्यक्तिग ब्राह्मण स्वभाव वाला होता है। 2.जब व्यक्ति में सत्वगुण प्रभावी हो किंतु साथ में रजोगुण भी पर्याप्त हो किंतु तमोगुण अत्यल्प हो तो व्यक्ति क्षत्रिय स्वभाव वाला होता है। 3.जब ...