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Showing posts from August, 2021

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 45

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 45 प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः। अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो यात परां गतिम्‌॥ 45।। परन्तु प्रयत्नपूर्वक अभ्यास करने वाला योगी तो पिछले अनेक जन्मों के संस्कारबल से इसी जन्म में संसिद्ध होकर सम्पूर्ण पापों से रहित हो फिर तत्काल ही परमगति को प्राप्त हो जाता है। ।।45।। जो व्यक्ति निरंतर वैराग्य भाव से अभ्यासरत रहता है एक समय वह मोक्ष को प्राप्त हो ही जाता है। यह प्रक्रिया एक जन्म में भी पूरी हो सकती है अथवा एकाधिक जन्म भी लग सकते हैं क्योंकी अभ्यास और वैराग्य से संचित संस्कार जब तक व्यक्ति को मोक्ष नहीं दिला देते तब तक ठहरते नहीं है। योग का परिणाम निकलना ही होता है, व्यक्ति का दायित्व इतना भर है कि वह योगमार्ग पर दृढ़ता से चलता रहे क्योंकि योगमार्ग सत्य का मार्ग है और सत्य कभी समाप्त नहीं होता है।         मोक्ष की प्राप्ति जीते जी होतो है, न कि मृत्यु के पश्चात। मोक्ष प्राप्त व्यक्ति अपने जीवन काल में अपने सेल्फ यानी आत्मा को वास्तविक रूप से प्राप्त कर परम् आत्मा से मिल जाता है और तब उसके कर्म मात्र और मात्र  दूसरों के कल्याणार्थ...

3. विष्णुसहस्रनाम- 3-वष्टकारः

विष्णुसहस्रनाम 3 वष्टकारः 3.वष्टकारः - योगमार्ग में जो नियत कर्म किये जाते हैं वे यज्ञ में  क्रियाएं होती हैं जिनको हम ईश्वर को समर्पित कर करते हैं। जिनको समर्पित कर हम यज्ञ कर्म करते हैं वही तो विष्णु है, ईश्वर हैं। योगमार्ग में नियत कर्म यज्ञ हैं अर्थात वे कर्म हैं जिनको हम उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित हो कर किया करते हैं और उनमें सेवा का भाव होता है न कि उनको करने में अहंकार का कोई भाव आता है। यह समर्पण जिनके प्रति होता है वे विष्णु यानी ईश्वर हैं। जब हम योगमार्ग पर चलकर सेवा भाव से समर्पित होकर कर्म करते हैं तो जिनके प्रति हमारा निष्काम समर्पण है वही ईश्वर हैं, वही विष्णु हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 44

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 44 पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः। जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते॥ 44।। श्रीमानों के घर में जन्म लेने वाला योगभ्रष्ट पराधीन हुआ भी उस पहले के अभ्यास से ही निःसंदेह भगवान की ओर आकर्षित किया जाता है तथा समबुद्धि रूप योग का जिज्ञासु भी वेद में कहे हुए सकाम कर्मों के फल को उल्लंघन कर जाता है। ।।44।। जीवन का अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है जब जीव जन्म और मरण के चक्र से मुक्त होकर अनंत सम्पूर्णता में मिल जाता है। इस लक्ष्य की प्राप्ति योग के अंतिम परिणाम के रूप में आती है। किंतु जब योग के मार्ग पर चलता हुआ व्यक्ति अभ्यास करता हुआ बिना वैराग्य प्राप्त किये मृत्यु को प्राप्त हो गया होता है तो वह पुनः एक सम्पन्न परिवार में जन्म लेता है। इस जन्म में उसके पूर्व के संचित अभ्यास के फल उसे शीघ्र ही वैराग्य के मार्ग पर ले चलते हैं। उसके अंदर ज्ञान की जिज्ञासा उतपन्न हो उठती है और इस जिज्ञासा को शांत करने हेतु अभ्यास रत वह व्यक्ति वैराग्य के मार्ग पर अग्रसर हो कर मोक्ष की दिशा में बढ़ता है। उसकी अधूरी कामनाओं के परिणाम में उसे ऐश्वर्य भी मिलता है लेक...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 1

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myspiritsay श्रीमद्भागवद्गीता- एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 1 December 27, 2020   श्रीमद्भागवद्गीता- एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 1 श्रीमद्भागवद्गीता- एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 1-- गीता-अध्याय 1-श्लोक 1  ---------------------------------- धृतराष्ट्र उवाच धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।  मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय॥ धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?  ॥1॥          प्रथम श्लोक में युद्ध को लेकर धृतराष्ट्र की उत्सुकता झलकी है । उसे पता होता है कि उसने और उसके पुत्रों ने पांडवो के साथ ढेरों छल किये हैं। इसलिए उसके अंदर एक छटपटाहट भी है। वो बेचैन है, सो सवाल करता है। जब आप गलती किये होते हैं और पीड़ित आपके सामने सीना तानकर आपसे दो दो हाथ करने आ जाता है तो आप नैतिक रूप से कमजोर हो जाते हैं । उस वक़्त आपके अंदर ये जानने की बेचैनी स्वाभाविक रूप से होती है कि जो पीड़ित है वो किस तरह से प्रतिकार करता है। हर चोर की दाढ़ी में तिनका तो होता ही है, वो ब...