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Showing posts from June, 2021

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 6

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 6 बन्धुरात्मात्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः। अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत्‌॥ ।।6।। जिस जीवात्मा द्वारा मन और इन्द्रियों सहित शरीर जीता हुआ है, उस जीवात्मा का तो वह आप ही मित्र है और जिसके द्वारा मन तथा इन्द्रियों सहित शरीर नहीं जीता गया है, उसके लिए वह आप ही शत्रु के सदृश शत्रुता में बर्तता है। ।।6।। कर्मयोग के मार्ग पर चलते हुए व्यक्ति के लिए  यह आवश्यक है कि वह समझे कि व्यक्ति खुद ही अपना मित्र है और शत्रु भी। ये हम पर निर्भर करता है कि हम खुद के मित्र बने या शत्रु। खुद के मित्र होने का सामान्य अर्थ इतना भर है कि हमारी इन्द्रियाँ, मन , शरीर और विवेक एक दूसरे के साथ सामंजन में रहें और हमारी इन्द्रियाँ, मन और शरीर हमारे विवेक के अधीन रहे। विवेक के अधीन होने का तातपर्य ये नहीं है कि हम जबरन अपनी इंद्रियों और मन  और शरीर  को हाँके बल्कि इनका परस्पर सामंजन इस प्रकार से हो कि ये एक इकाई के रूप में हमारे निष्काम कर्म की यात्रा को सुगम बनाएँ। यदि विवेक, मन इन्द्रियाँ और शरीर सामंजन में नहीं होते हैं,  इन्द्रियाँ बार बार अपने ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 5

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 5 उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्‌। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ ।।5।। अपने द्वारा अपना संसार-समुद्र से उद्धार करे और अपने को अधोगति में न डाले क्योंकि यह मनुष्य आप ही तो अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है। ।।5।। ध्यान देने वाली बात है कि व्यक्ति विशेष का उत्थान और पतन उस व्यक्ति विशेष पर ही निर्भर करता है। किसी व्यक्ति का  उत्थान तभी सम्भव हो पाता है जब वह व्यक्ति खुद इसकी इक्षा करता है और इसके लिए प्रयास करता है। किसी व्यक्ति विशेष का उत्थान कोई अन्य नहीं कर सकता है। यह कुछ उसी तरह की बात है कि यदि भूख हमें लगी है तो यह भूख तभी मिटेगी जब हम खाएंगे। किसी अन्य के खाने से हमारी भूख नहीं मिटने वाली है।    अपने उत्थान के लिए हमें गुरु की शरण में तो जाना होता है जिनकी मदद से हमारा उत्थान होता है किंतु यदि हम खुद नहीं चाहें तो गुरु भी हमारा उत्थान नहीं कर सकते। यँहा पर श्रीकृष्ण ने व्यक्ति के खुद के प्रयास को महत्व दिया है और स्पष्ट कर दिया है कि हमारे बदले कोई और प्रयास कर हमें नहीं उठा सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम ही...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 4

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 4 यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते। सर्वसङ्‍कल्पसन्न्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते॥ ।।4।। जिस काल में न तो इन्द्रियों के भोगों में और न कर्मों में ही आसक्त होता है, उस काल में सर्वसंकल्पों का त्यागी पुरुष योगारूढ़ कहा जाता है। ।।4।। ध्यान की अवस्था प्राप्त करने के पूर्व हममें दो अनिवार्य योग्यताएँ होनी ही चाहिये, जिनके बिना हम योग/सन्यास/ध्यान में प्रवृत्त भी नहीं हो सकते हैं। ये दो अनिवार्य योग्यताएँ हैं 1.हमारे मन में इन्द्रियों के विषयों यानी "शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध" के प्रति कोई आकर्षण नहीं होना चाहिए अर्थात हमें मोह और लगाव से मुक्त होना चाहिए। 2. अपने कर्मों के प्रति और उन कर्मो के फल के प्रति कोई लगाव नहीं होना चाहिए। अर्थात हमें समस्त कामनाओं से मुक्त होना चाहिए क्योंकि कामनाओं की उपस्थिति में हम फिर से उनकी पूर्ति में भटकने लगते हैं।  ये दोनों अवस्थाएँ इसलिए जरूरी हैं क्योंकि इनके बिना हमारे मन में शांति नहीं होती और चंचल मन से हम खुद पर , अपनी आत्मा पर , अपने सेल्फ पर केंद्रित नहीं हो सकते हैं। इन दोनों योग्यताओं को पूरा कि...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 3

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 3 आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते॥ ।।3।। योग में आरूढ़ होने की इच्छा वाले मननशील पुरुष के लिए योग की प्राप्ति में निष्काम भाव से कर्म करना ही हेतु कहा जाता है और योगारूढ़ हो जाने पर उस योगारूढ़ पुरुष का जो सर्वसंकल्पों का अभाव है, वही कल्याण में हेतु कहा जाता है। ।।3।। योग में प्रवृत्त होने के लिए यानी ध्यान निष्ठ होने के लिए पूर्व शर्त क्या है? हम ध्यान/योग/सन्यास के मार्ग पर तभी चल सकते हैं जब हमने कर्मयोग के मार्ग से यात्रा की हो यानी योग/ध्यान/सन्यास की पूर्वशर्त है कार्योग के अनुसार कर्मों का सम्पादन। और एकमात्र साधना मन की शांति है। यह शांति कैसे आती है? मन की शांति  आती है कामनाओं के परित्याग से और कामनाओं का यही परित्याग वैराग्य है। सारे कर्मों को करते हुए भी मन से कर्मफल से /कामनाओं से मुक्ति पा लेना ही वैराग्य है जिसके कारण मन में कोई उथल पुथल नहीं रह जाता है, मन शांत होता है, साधना में लीन होता है और तब हम योग/ध्यान/सन्यास में डूबे हुए होते हैं। इस मन की शांति अवस्था में हम खुद की आत्मा को समझ पान...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 2

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 2 यं सन्न्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव। न ह्यसन्न्यस्तसङ्‍कल्पो योगी भवति कश्चन॥ ।।2।। हे अर्जुन! जिसको संन्यास (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) ऐसा कहते हैं, उसी को तू योग (गीता अध्याय 3 श्लोक 3 की टिप्पणी में इसका खुलासा अर्थ लिखा है।) जान क्योंकि संकल्पों का त्याग न करने वाला कोई भी पुरुष योगी नहीं होता। ।।2।। योग और सन्यास की अवस्था भिन्न नहीं होते हैं । जब हम कर्मयोग के अनुसार नियत कर्म यानी यज्ञ की क्रिया करते हैं जिसमें हम अपने स्वभाव से उतपन्न क्षमता यानी अपने गुणों से उतपन्न क्षमता के अनुसार बिना कर्मफल की चिंता के पूर्ण समर्पण के साथ उच्च आदर्शों के प्रति समर्पित होकर यानी सेवा भाव से कर्म करते हैं तो उस अवस्था में न तो हम बाहरी कामनाओं से प्रेरित होते हैं और न ही हमारी अंदुरुनी कामनाओं का बाहर कोई प्रभाव पड़ता है। यही संकल्पों का सर्वथा त्याग है। हम कर्म तो करते हैं लेकिन हम कर्म क्यों करते हैं? 1.हमारी इन्द्रियाँ यानी कर्मेन्द्रियाँ और ज्ञानेन्द्रियाँ अपनी स्वाभाविक क्रियाएँ करती रहती हैं उनको कोई अपेक...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 1 श्रीभगवानुवाच अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः। स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः॥ 1।। श्री भगवान बोले- जो पुरुष कर्मफल का आश्रय न लेकर करने योग्य कर्म करता है, वह संन्यासी तथा योगी है और केवल अग्नि का त्याग करने वाला संन्यासी नहीं है तथा केवल क्रियाओं का त्याग करने वाला योगी नहीं है। ।।1।। ध्यान (मैडिटेशन) का अर्थ है स्वयं पर ध्यान देना।  हम बहुत सी बातों पर ध्यान दे सकते हैं लेकिन सभी ध्यान नहीं हैं।  वे सबसे अच्छी एकाग्रता में हैं।  लेकिन जब हम स्वयं पर ध्यान देते हैं तो इसे मेडिटेशन कहते हैं।  कर्मयोग का पालन किए बिना हम ध्यान की स्थिति को प्राप्त नहीं कर सकते।  कर्मयोग का पालन करने वाला व्यक्ति योगी और सन्यासी दोनों होता है।  एक कर्मयोगी वह है जो परिणाम  की इच्छा के बिना अपने गुणों की स्थिति के अनुसार निश्चित कर्म (क्रियाएं) करना शुरू कर देता है।  कर्मयोग के मार्ग पर चलने से कर्मों में आसक्त न होकर हम योगी और सन्यासी दोनों हैं।  यह स्थिति इच्छाओं के त्याग की स्थिति है।  इच्छाओं का त्...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 की व्याख्या श्लोकरहित (श्लोक 1 से 47 )

श्रीमद्भागवद्गीता-एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 6 (श्लोक 1 से 47 )                   परिचय श्रीमद्भागवद्गीता के छठे अध्याय में ध्यान यानी मैडिटेशन की चर्चा है। लेकिन इस अवस्था तक पहुंचने के पूर्व हमें अपनी आध्यात्मिक  यात्रा के कई चरण पूरे करने होते हैं जिनका उल्लेख श्रीमद्भागवद्गीता के पहले अध्याय से पाँचवे अध्याय तक में क्रमानुसार किया गया है। जब मोह में बढ़ोतरी होती है तो भ्रम भी बढ़ता है और भ्रम के कारण अवसाद और दुख भी बढ़ता है क्योंकि तब विवेक अक्षम हो जाता है निर्णय लेने में। इस अवस्था में मानसिक क्लेश काफी होता है। तब इससे बाहर निकलने के लिए ज्ञान की आवश्यकता महसूस होती है और यह बेचैनी हमें उस ज्ञान की तरफ ले जाती है जँहा हम ये जान पाते हैं कि इस भ्रम और मोह और इनसे उपजे क्लेश से छुटकारा पाने का एक मात्र तरीका है कि हम खुद की खोज पूरी करें, हम जान सकें कि हम कौन हैं और यही खोज हमें हमारे सेल्फ यानी आत्मा तक ले जाता है। जब हम खुद को जान लेते हैं तो हम स्थितप्रज्ञ हो जाते हैं। किंतु यह ज्ञान मिलता कैसे है? तो इस ज्ञान को हम मात्र ...

श्रीमद्भागवद्गीता-एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 6(श्लोक 1 से 47)

श्रीमद्भागवद्गीता-एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 6 (श्लोक 1 से 47 )                   परिचय श्रीमद्भागवद्गीता के छठे अध्याय में ध्यान यानी मैडिटेशन की चर्चा है। लेकिन इस अवस्था तक पहुंचने के पूर्व हमें अपनी आध्यात्मिक  यात्रा के कई चरण पूरे करने होते हैं जिनका उल्लेख श्रीमद्भागवद्गीता के पहले अध्याय से पाँचवे अध्याय तक में क्रमानुसार किया गया है। जब मोह में बढ़ोतरी होती है तो भ्रम भी बढ़ता है और भ्रम के कारण अवसाद और दुख भी बढ़ता है क्योंकि तब विवेक अक्षम हो जाता है निर्णय लेने में। इस अवस्था में मानसिक क्लेश काफी होता है। तब इससे बाहर निकलने के लिए ज्ञान की आवश्यकता महसूस होती है और यह बेचैनी हमें उस ज्ञान की तरफ ले जाती है जँहा हम ये जान पाते हैं कि इस भ्रम और मोह और इनसे उपजे क्लेश से छुटकारा पाने का एक मात्र तरीका है कि हम खुद की खोज पूरी करें, हम जान सकें कि हम कौन हैं और यही खोज हमें हमारे सेल्फ यानी आत्मा तक ले जाता है। जब हम खुद को जान लेते हैं तो हम स्थितप्रज्ञ हो जाते हैं। किंतु यह ज्ञान मिलता कैसे है? तो इस ज्ञान को हम मात्र ...