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Showing posts from July, 2023

कर्ता और उसके प्रकार

कर्ता और उसके प्रकार (श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 26 से 28 के आधार पर) ज्ञान और कर्म का प्रकार समझने के उपरांत व्यक्ति अपने ज्ञान और अपने कर्मों के अनुसार स्वयं का आकलन कर सकता है कि वह स्वयं किस प्रकार का कर्ता यानी व्यक्ति है। ज्ञान और कर्म के तीन तीन प्रकारों के अनुसार व्यक्ति कर्ता यानी कर्म करने वाले के रूप में भी तीन प्रकार का होता है।      पहले हम सात्विक कर्ता के लक्षणों को समझें। सात्विक कर्ता के निम्न प्रकार के लक्षण होते हैं- (1) सात्विक दृष्टि वाला व्यक्ति सात्विक भाव से ही कर्म करता है। वह कर्म करते हुए भी उस कर्म से बन्धता नहीं है, उससे आसक्त नहीं होता है। वह इसलिए कर्म नहीं करता है कि फलाना कर्म करने से उसे लाभ होगा या हानि बल्कि वह कर्म इसलिए करता है क्योकि उसे अपनी दृष्टि में लगता है कि वह कर्म उसकी स्वाभाविक क्रिया है और क्योंकि वही कर्म सही है। कर्म करने की उसकी प्रेरणा उसे कर्म के सही और गलत होने से मिलती है। वह अपनी पसंद और नापसन्द से आसक्त होकर कर्म नहीं करता है। (2) कर्म से अनासक्त व्यक्ति जब कर्म करता है तो उसे बस सही और गलत से मतलब रहता है, ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 32

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 32 अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता। सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥ 32।। हे अर्जुन! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी 'यह धर्म है' ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य संपूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है। लेकिन ऐसे व्यक्ति भी होते हैं जिनकी बुद्धि न तो समझने की स्थिति में होती है और न ही समझ के भ्रम से सही और गलत में स्पष्ट अंतर कर पाती है बल्कि उनकी बुद्धि मान्यताओं पर आधारित होती है जिसके कारण वे सही को भी गलत ही मानते रहते हैं और इसके विपरीत गलत को सही मानते हैं। उनमें तर्कशीलता नहीं होती है, बस उनकी मान्यता होती है। जैसे किसी हत्यारे को हत्या करनी है तो वह उस हत्या के पीछे किसी तर्क को नहीं देखता बल्कि उसको यही लगता है कि हत्या कर देना ही उचित है तो वह हत्या कर देता है। तर्कशीलता के अभाव में इस प्रकार की बुद्धि रूढ़ होती है। जैसे उसकी मान्यता हो कि सिर्फ उसी के देवता पूजनीय हैं तो वह अन्य सभी के आस्थाओं का सिर्फ विरोध ही करेगा।       इस प्रकार के तर्कशून्य, सिर्फ मान्यता पर आधारित बुद्ध...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 31

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 31 यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च। अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥ 31।। हे पार्थ! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।  राजसिक  बुद्धि को जुनून की विशेषता है, जिससे भ्रम और त्रुटि हो सकती है। जब बुद्धि राजसिक है, तो  सही और गलत, धर्म और अधर्म के बीच ठीक से अंतर करने में असमर्थ होती है।  ऐसे में व्यक्ति ऐसा निर्णय ले सकता है जो स्वयं या दूसरों के लिए हानिकारक हैं। उदाहरण के लिए, राजसिक बुद्धि वाले व्यक्ति को आगे बढ़ने के लिए धोखा देने या चोरी करने का प्रलोभन दिया जा सकता है। उनके हिंसा या अन्य विनाशकारी व्यवहारों में संलग्न होने की अधिक संभावना हो सकती है।  राजसिक बुद्धि से सम्मोहन या भ्रम पैदा हो सकता है। जब बुद्धि भ्रमित होती है, तो यह स्पष्ट निर्णय लेने में असमर्थ होती है। इससे व्यक्ति गलतियाँ कर सकता है कि  बाद में पछतावा हो सकता है। सात्विक बुद्धि  का महत्व यह कहता है कि सात्विक बुद्धि सबसे अच्छी बुद्धि है। सात्विक बुद्धि स्...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 30

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 30 प्रवत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये। बन्धं मोक्षं च या वेति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥ 30।। हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग (गृहस्थ में रहते हुए फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदर्पण बुद्धि से केवल लोकशिक्षा के लिए  बरतने का नाम 'प्रवृत्तिमार्ग' है।) और निवृत्ति मार्ग को (देहाभिमान को त्यागकर केवल सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव स्थित हुए संसार से उपराम होकर विचरने का नाम 'निवृत्तिमार्ग' है।), कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को यथार्थ जानती है- वह बुद्धि सात्त्विकी है। सात्विक ज्ञान की समझ सात्विक बुद्धि ही कराती है जिसके कारण व्यक्ति सात्विक कर्म में प्रवृत्त होता है और सात्विक कर्ता कहलाता है। सात्विक बुद्धि के कुछ लक्षण निम्नवत हैं- सन्सार में दो तरह के लोग होते हैं। एक जो सांसारिक कर्मो में लगे रहते हैं। ऐसे लोग सांसारिक जीवन में प्रवृत्त कहे जाते हैं। दूसरी तरफ वे लोग हैं जो रहते तो संसार में ही हैं लेकिन वे सांसारिकता से बन्धते नहीं हैं। ऐसे लोग संसार से निवृत्त कहे जाते हैं।         संस...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 29

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 29 बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु। प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय॥ 29।। हे धनंजय ! अब तू बुद्धि का और धृति का भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णता से विभागपूर्वक कहा जाने वाला सुन। प्रत्येक व्यक्ति बाहरी उत्प्रेरकों के प्रति भावना व्यक्त करता है। इस भावना को समझ कर, उसकी जाँच पड़ताल कर उसपर अपनी समझ विकसित करता है  और इसप्रकार समझदारी प्राप्त करता है।      बाहरी उत्प्रेरकों से मन में जो भावनाएँ उतपन्न होती हैं उनके प्रति जो समझदारी विकसित करता है वही बुद्धि है और जो समझदारी विकसित होती है वह ज्ञान है। इसप्रकार बुद्धि के अनुरूप  ही ज्ञान होता है। मान लीजिए कि किसी ने आपको गाली दी। गाली एक बाहरी उत्प्रेरक है । अब उस गाली के प्रति हमारी भावना में प्रतिक्रिया स्वरूप हिंसक भाव आ सकता है अथवा क्षमा कर देने का भाव आ सकता है या फिर उसे नजरअंदाज करने का भी भाव आ सकता है। इन तीनों में हम कौन सा भाव अपनाते हैं यह हमारे बुद्धि और विवेक पर निर्भर करता है। और इस बुद्धि के अनुरूप हम जो निर्णय लेते हैं वही...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 28

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 28 आयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः। विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥ 28।। जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित घमंडी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करने वाला तथा शोक करने वाला, आलसी और दीर्घसूत्री (दीर्घसूत्री उसको कहा जाता है कि जो थोड़े काल में होने लायक साधारण कार्य को भी फिर कर लेंगे, ऐसी आशा से बहुत काल तक नहीं पूरा करता। ) है वह तामस कहा जाता है कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके मन , बुद्धि, विवेक, भावना और शरीर की क्रियाओं में कोई तालमेल ही नहीं होता है। ऐसे व्यक्ति तामस कर्ता कहे जाते हैं। चूँकि इस तरह के व्यकि की भावना और विवेक में कोई तालमेल नहीं होता है सो ऐसे व्यक्ति के अंदर न तो अपनी भावना को लेकर समझदारी होती है और न ही अपनी बुद्धि और विवेक के प्रति। इस समझदारी के अभाव में उस व्यक्ति क्रियाएँ भी बुद्धि रहित होती हैं। इस अयुक्त व्यक्तित्व के कारण व्यक्ति समझ नहीं पाता है कि किस परिस्थिति में उसे किस तरह के कर्म करने चाहिए। सो ऐसा व्यक्ति हठी और अहंकारी होता है, समय , काल परिस्थिति के अनुसार स्वयं में अपेक्षित बदलाव भी नहीं ला ...
  श्रीमद्भागवद्गीता-  अध्याय 1          प्रथम श्लोक में युद्ध को लेकर धृतराष्ट्र की उत्सुकता झलकी है । उसे पता होता है कि उसने और उसके पुत्रों ने पांडवो के साथ ढेरों छल किये हैं। इसलिए उसके अंदर एक छटपटाहट भी है। वो बेचैन है, सो सवाल करता है। जब आप गलती किये होते हैं और पीड़ित आपके सामने सीना तानकर आपसे दो दो हाथ करने आ जाता है तो आप नैतिक रूप से कमजोर हो जाते हैं । उस वक़्त आपके अंदर ये जानने की बेचैनी स्वाभाविक रूप से होती है कि जो पीड़ित है वो किस तरह से प्रतिकार करता है। हर चोर की दाढ़ी में तिनका तो होता ही है, वो बात बात पर चिहुँकता जरूर है। यही हाल धृतराष्ट्र का है।        धृतराष्ट्र जन्मान्ध है। आँखें देखने के काम आती हैं। लेकिन जिसके आँखों पर पर्दा हो वो खुद क्या देखेगा। यही हाल धृतराष्ट्र का भी है। उसे पुत्रमोह है। उस मोह में उसे भला बुरा कुछ नहीं दिखता, वो तो बस मोह में फँसा अपराध ही करते आया है। सच यही है। जिसके आँख पर मोह की पट्टी हो वो सही गलत नहीं समझ पाता है। लेकिन जब उसे लगता है कि उसके अपराधों का फैसला होने वाला है उस व...
  श्रीमद्भागवद्गीता  -अध्याय 2  पृष्ठभूमि                        ------------ श्रीमद्भागवद्गीता में अर्जुन के संशय के बहाने स्वयम के संशय को देखने का अभ्यास शंखनाद के पश्चात वास्तविक युद्ध के पूर्व अर्जुन युद्ध हेतु अपना आकलन करने हेतु दोनों पक्षों की सेनाओं का स्वयम निरीक्षण कर लेना चाहता है। दरअसल कोई भी समझदार व्यक्ति जब किसी समस्या का हल करना चाहेगा, अथवा जब भी किसी परिस्थिति से मुकाबला करना चाहेगा तो सबसे पहले क्या करेगा? सबसे पहले वह समस्या के हर पहलू को परखेगा, हर पहलू के ताकत और कमजोरी का आकलन कर लेना चाहेगा। उसी के बाद अपनी रणनीति तय करेगा। बिना समस्या को समझे सीधे जाकर सिर भिड़ा देना निरी मूर्खता के अतिरिक्त कुछ और नहीं होता। बड़ी से बड़ी समस्या, बड़े से बड़े ताकतवर का कोई कमजोर पक्ष भी होता है, जिससे निपट कर इंसान उस बड़ी से बड़ी समस्या या बड़े से बड़े ताकतवर आदमी को हरा सकता है, हरा भी देता है। अर्जुन युद्ध के लिए तटपर है, लेकिन वो इस पक्ष का जिससे उसे लड़ना है उसकी समग्र ताकत को तौल लेना चाहता है ताकि उसे युद्...