Posts

Showing posts from April, 2022

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 20

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 20 द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः। दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदंलोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्‌॥ ।।20।। हे महात्मन्‌! यह स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का सम्पूर्ण आकाश तथा सब दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं तथा आपके इस अलौकिक और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक अतिव्यथा को प्राप्त हो रहे हैं। ।।20।। सम्पूर्ण संसार ही नहीं बल्कि सभी समस्त ब्रह्मांड ईश्वर का अंश मात्र हैं, यह तथ्य ईश्वर के भौतिक विराट रूप को देख कर समझ में आ जाती है। इस समझ से यह ज्ञान प्राप्त होता है, इस सत्य की साक्षात अनुभूति होती है कि सभी लोक, सभी लोकों के दरम्यान व्याप्त अंतरिक्ष और सभी दिशाएँ उसी एक परमेश्वर की उपस्थिति का मात्र साक्षी भर हैं यानी कुछ भी ईश्वर से इतर नहीं है बल्कि सबकुछ उन्हीं की अभिव्यक्ति भर है।          परन्तु ईश्वर का यह विराट स्वरूप जँहा एक तरफ अद्भुत अलौकि ज्ञान की अनुभूति देता है वंही दूसरी तरफ मनुष्य और समस्त जगत की क्षमता से यह स्वरुप इतना बड़ा है कि यह रुप भय भी उतपन्न करता है।  जो चीज हमारी क्षमता से बहुत बड़ी ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 19

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 19 अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यमनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्‌। पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रंस्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्‌॥ ।।19।। आपको आदि, अंत और मध्य से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त, अनन्त भुजावाले, चन्द्र-सूर्य रूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्निरूप मुखवाले और अपने तेज से इस जगत को संतृप्त करते हुए देखता हूँ। ।।19।।  परमात्मा के विश्वरूप का दर्शन पाकर अर्जुन अपनी समृद्ध भाषा से उस रूप का वर्णन करना तो चाहता है किंतु कुछ चीजें अनुभूति में ही रह जाती हैं , भाषा उनकी अभिव्यक्ति नहीं कर पाती। इसी वजह से अर्जुन परमेश्वर के विराट स्वरूप का प्रारम्भ, मध्य और अंत नहीं पाता है। जिसका न आदि हो , न अंत हो , न मध्य हो, जो काल से परे हो उसको अपनी दृष्टि से देख कर समझ पाना सम्भव नहीं है बल्कि उसकी अनुभूति ही उसका ज्ञान दे सकती है। इसी लिए अर्जुन परमेश्वर के विश्व रूप को देखकर कहता है कि आपको आदि, अंत और मध्य से रहित, अनन्त सामर्थ्य से युक्त, अनन्त भुजावाले, चन्द्र-सूर्य रूप नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्निरूप मुखवाले और अपने तेज से इस जगत को संतृप्त करते हुए देखता ह...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 18

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 18 त्वमक्षरं परमं वेदितव्यंत्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌। त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे॥ ।।18।। आप ही जानने योग्य परम अक्षर अर्थात परब्रह्म परमात्मा हैं। आप ही इस जगत के परम आश्रय हैं, आप ही अनादि धर्म के रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं। ऐसा मेरा मत है। ।।18।। विराट स्वरूप को देखकर अर्जुन को विश्वास हो जाता है कि जिनसे वह बात कर रहा है वह और कोई और नहीं बल्कि वे ही अविनाशी परमात्मा हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह उस विराट स्वरूप को क्षरण रहित पाता है और उसी स्वरूप में समस्त भूत, वर्तमान और भविष्य का वास है,समस्त लोक उसी में निहित हैं, और समस्त धर्म की रक्षा करने वाले हैं। इसी कारण उस विराट स्वरूप को अर्जुन परम् ब्रह्म मानता है जो एकमात्र प्राप्त करने योग्य है और जिसकी प्राप्ति साधना से ही सम्भव है। यही ब्रह्म निरन्तर सनातन है जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता है बल्कि जो समस्त परिवर्तनों को कारक है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 17

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 17 किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम्‌। पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम्‌॥ ।।17।। आपको मैं मुकुटयुक्त, गदायुक्त और चक्रयुक्त तथा सब ओर से प्रकाशमान तेज के पुंज, प्रज्वलित अग्नि और सूर्य के सदृश ज्योतियुक्त, कठिनता से देखे जाने योग्य और सब ओर से अप्रमेयस्वरूप देखता हूँ। ।।17।। हम अपने भाव और अपनी भाषा की समझ के अनुसार ही किसी चीज का वर्णन शब्दों में कर पाते हैं, सो एक ही दृश्य का एक ही समय भिन्न भिन्न लोगों के द्वारा भिन्न भिन्न तरीके से वर्णन मिलता है। अर्जुन के समक्ष भगवान विराट विश्वरूप में हैं और अर्जुन भगवान के उस स्वरूप से विस्मित है। उसकी समझ और उसकी भाषा में ईश्वर के इस स्वरूप का वर्णन करने की क्षमता ही नहीं है, किन्तु ईश्वर के प्रति प्रगाढ़ श्रद्धा वश वह जो जो देख रहा है उसका वर्णन करने की कोशिश अवश्य  कर रहा है। उसे प्रभु मुकुट, गदा, चक्र के साथ दिखते हैं। यह स्वरूप राजा का है । प्रभु तो प्रभु हैं सो समस्त राजाओं के भी राजा हैं। तो उनको राजा स्वरूप में देखना भी अति स्वाभाविक ही है। ईश्वर क...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 16

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 16 अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रंपश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम्‌। नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिंपश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप॥ ।।16।। हे सम्पूर्ण विश्व के स्वामिन्! आपको अनेक भुजा, पेट, मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपों वाला देखता हूँ। हे विश्वरूप! मैं आपके न अन्त को देखता हूँ, न मध्य को और न आदि को ही। ।।16।। ईश्वर में ही समस्त प्राणी निहित हैं सो अर्जुन को ईश्वर के भौतिक स्वरूप में नहीं गिने जाने की संख्या में हाथ, पैर, मुख, पेट, आदि दिखते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि सभी प्राणियों का उद्गम , समस्त ब्रह्मांडों का उद्गम एक ईश्वर है।     ईश्वर के इस विराट स्वरूप की विराटता इतनी भव्य है कि समस्त ब्रह्मांडों का सकल योग भी उनकी उपस्थिति का एक छोटा अंश मात्र है जिससे व्यक्ति को ईश्वर का प्रारम्भ, मध्य और अंत नहीं मिलता है यानी व्यक्ति अपने सीमित विवेक के कारण ईश्वर के अस्तित्व को समझने में अक्षम होता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 15

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 15 अर्जुन उवाच पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्‍घान्‌। ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थमृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान्‌॥ ।।15।। अर्जुन बोले- हे देव! मैं आपके शरीर में सम्पूर्ण देवों को तथा अनेक भूतों के समुदायों को, कमल के आसन पर विराजित ब्रह्मा को, महादेव को और सम्पूर्ण ऋषियों को तथा दिव्य सर्पों को देखता हूँ। ।।15।। सब कुछ ईश्वर में ही निहित है। इस सत्य को अर्जुन अपनी आँखों से देख पा रहा है। दरअसल ईश्वर के विराट विश्वरूप को देखने समझने के लिए जो दृष्टि चाहिए वो सामान्य समझ से नहीं मिलती है। इस दृष्टि को प्राप्त करने के लिए ज्ञान और दृढ़प्रतिज्ञ के अतिरिक्त ईश्वर के प्रति कर्मयोग के रास्ते प्राप्त ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा होनी चाहिए अन्यथा मात्र अध्ययन या श्रवण से इस विराट रूप का दर्शन असम्भव होता है। लेकिन इस प्रकार की श्रद्धा होने पर ईश्वर की भी विशेष अनुकम्पा उस व्यक्ति पर होती है और तब व्यक्ति ईश्वर के उस रूप को समझ पाता है जिससे उसे प्रत्यक्ष अनुभव होता है कि समस्त जीव, देवी-देवता, महान विभूति यानी ऋषि, ब्रह्मा, विष्णु और महेश सभी एक ह...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 14

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 14 ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः। प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत॥ ।।14।। उसके अनंतर आश्चर्य से चकित और पुलकित शरीर अर्जुन प्रकाशमय विश्वरूप परमात्मा को श्रद्धा-भक्ति सहित सिर से प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोले। ।।14।।        परमपिता परमेश्वर के इस दिव्य विश्वरुप के दर्शन से यानी उनके ज्ञान से व्यक्ति आश्चर्यमिश्रित  सुख से भर जाता है। जब हमें ईश्वर के इस विराट स्वरूप का अपने दिव्य चक्षुओं से दर्शन होता है यानी जब हमें ईश्वर की इस असीम महानता और सीमा विहीन विशालता का अनुभव होता है तब हमारी भावनाएँ, हमारे इन्द्रीयों की समस्त चेतना हमारे रोम रोम में आश्चर्य और प्रसन्नता का संचार कर देती हैं। तब ईश्वर की इस दिव्य महानता के प्रति श्रद्धा जागृत हो जाती है और तब हम बिना किसी प्रयास के ही उनके इस महानता, उनके इस विशालता, उनके इस दिव्यता के समक्ष श्रद्धा भाव से झुक जाते हैं और प्रणाम कर अपनी श्रद्धा, अपना समर्पण व्यक्त करते हैं।         यही हाल अर्जुन का भी हुआ जब श्रीकृष्ण ने उसे ईश्वर के इस दिव्य विराट स...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 13

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 13 तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा। अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा॥ ।।13।। पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्थात पृथक-पृथक सम्पूर्ण जगत को देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा। ।।13।। संजय बता रहे हैं कि अर्जुन ने वभवयुक परमात्मा के शरीर में क्या देखा। संजय के वर्णन के अनुसार पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त अर्थात पृथक-पृथक सम्पूर्ण जगत को देवों के देव श्रीकृष्ण भगवान के उस शरीर में एक जगह स्थित देखा।         इसका क्या तातपर्य है?  उस विश्वरूप में अर्जुन जो देख रहा था क्या वह कोई चमत्कार था? नहीं, अर्जुन तो दिव्यता का दर्शन कर रहा था। दरअसल कण कण में दिव्यता व्याप्त है। इस संसार(संसार का अर्थ यह धरती मात्र नहीं बल्कि समस्त ब्रह्मांड यानी कॉस्मॉस है) में हर दृश्य और अदृश्य , चाहे वह जिस रूप, रंग, आकार का है अपने आप में पूर्ण दिव्यता को धारण किये हुए है। कण कण में ईश्वर व्याप्त हैं न कि ईश्वर कण कण हो कर भागों में विभक्त होकर अलग अलग व्याप्त हैं। हर रचना अ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 12

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 12 दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता। यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥ ।।12।। आकाश में हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश हो, वह भी उस विश्व रूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित्‌ ही हो। ।।12।।       जब हम किसी वैभव का वर्णन करते हैं तो हमारी भाषा हमारे इर्द गिर्द से उदाहरण उठाती है। भाषा की अपनी सीमाएँ होती हैं जो दृश्य उदाहरणों से अदृश्य और भावनात्मक तथ्यों का वर्णन करती है। संजय की भी यही सीमाएँ हैं। सो परमात्मा के विश्वरूप का वर्णन करते हुए उन दृश्य उदाहरणों को लेता है जो उसके अनुसार बहुत भव्य हैं। परमात्मा के वैभव का प्रकाश अतुलनीय है, सो संजय के अनुसार सहस्त्रों सूर्यों का प्रकाश भी एकसाथ मिलकर ईश्वरीय वैभव की बराबरी नहीं कर सकता। संजय ने इसी वजह से ईश्वरीय विभूति के वर्णन हेतु सूर्य की उपमा का उपयोग किया है और कहा है कि आकाश में हजार सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश हो, वह भी उस विश्व रूप परमात्मा के प्रकाश के सदृश कदाचित्‌ ही हो। 

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 10 एवं 11

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 10 एवं 11 अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम्‌। अनेकदिव्याभरणं  दिव्यानेकोद्यतायुधम्‌॥ दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्‌। सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्‌॥ 10-11 अनेक मुख और नेत्रों से युक्त, अनेक अद्भुत दर्शनों वाले, बहुत से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत से दिव्य शस्त्रों को धारण किए हुए और दिव्य गंध का सारे शरीर में लेप किए हुए, सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, सीमारहित और सब ओर मुख किए हुए विराट्स्वरूप परमदेव परमेश्वर को अर्जुन ने देखा। ।। 10-11।। ईश्वर के विराट रूप का वर्णन सम्भव नहीं है फिर भी मानव स्वभाव ही ऐसा है कि यह भव्यता के वर्णन का प्रयास करता ही है।  हम जो देखते हैं उसका वर्णन कभी भी हु ब हु नहीं कर पाते हैं बल्कि अपनी बुद्धि के अनुसार उसका वर्णन करते हैं। इसी कारण संजय जो देख रहा है उसे गीताकार की समझ के अनुसार व्यक्त करने का प्रयास करता है। इस विवरण के अनुसार संजय जो देखता है और देखकर जो समझता है उसके अनुसार परमेश्वर का विराट स्वरूप अनेक मुख और नेत्रों से युक्त, अनेक अद्भुत दर्शनों वाले, बहुत से दिव्य भूषणों से युक्त...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 9

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 9 संजय उवाच  एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः। दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्‌॥ ।।9।। संजय बोले- हे राजन्‌! महायोगेश्वर और सब पापों के नाश करने वाले भगवान ने इस प्रकार कहकर उसके पश्चात अर्जुन को परम ऐश्वर्ययुक्त दिव्यस्वरूप दिखलाया। ।।9।। अब संजय भगवान के उस विराट रूप का वर्णन राजा धृतराष्ट्र को करते हैं जो भगवान ने अर्जुन को दिखलाया।  यह विराट रूप ईश्वर का है जो योगेश्वर हैं यानी समस्त योगों के ईश्वर हैं। समस्त योगों के स्वामी योगेश्वर यानी जिनमें संसार समस्त रूप में समाहित हो जाता है। ये भगवान ही हरि स्वरूप हैं यानी भ्रम का हरण करने वाले हैं। यानी ईश्वर ने वो दिव्य और अलौकिक रूप का दर्शन दिया जिसमें सम्पूर्ण संसार समाहित है और जिसे जानकर समस्त भ्रम का नाश हो जाता है। यह स्वरूप परम् ऐश्वर्य रूप है यानी इस विराट रूप में ईश्वर की विभूतोयों का संगम है। यह रूप देख जानकर व्यक्ति के समस्त पापों यानी उसके समस्त भ्रम का नाश हो जाता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 8

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 8 न तु मां शक्यसे द्रष्टमनेनैव स्वचक्षुषा। दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्‌॥ ।।8।। परन्तु मुझको तू इन अपने प्राकृत नेत्रों द्वारा देखने में निःसंदेह समर्थ नहीं है, इसी से मैं तुझे दिव्य अर्थात अलौकिक चक्षु देता हूँ, इससे तू मेरी ईश्वरीय योग शक्ति को देख। ।।8।। ईश्वर के विश्वरूप को देखने के लिए विशेष दिव्य दृष्टि की जरूरत होती है। हम जो कुछ भी देखते हैं और समझते हैं वह इसपर निर्भर करता है कि हम कैसे किसी चीज को देखते हैं। हम सभी के पास एक ही तरह की आँखें होती हैं लेकिन हमारे देखने की विशेषता अलग अलग होती है। तो क्या हमारे देखने की क्षमता हमारे ज्ञान पर निर्भर करता है ? कुछ हद तक तो ये सत्य है लेकिन ये भी सत्य पूर्ण नहीं है। अपने ज्ञान और भक्ति के बल पर हम जो देखने की क्षमता को पाते हैं तो वह भी सीमित ही होती है। इसे आप ऐसे समझ सकते हैं। समुंदर की हर लहर समुंदर का ही अंश है।  उसी प्रकार व्यक्ति भी ईश्वर का ही अंश है सो ईश्वर का ही रूप है। इस ज्ञान से व्यक्ति ये तो समझता है कि "अहम ब्रह्मास्मि" किन्तु इस समझ से वह ब्रह्म को देख ही लेत...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 6 एवं 7

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 6 एवं 7 पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा। बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत॥ ।।6।। हे भरतवंशी अर्जुन! तू मुझमें आदित्यों को अर्थात अदिति के द्वादश पुत्रों को, आठ वसुओं को, एकादश रुद्रों को, दोनों अश्विनीकुमारों को और उनचास मरुद्गणों को देख तथा और भी बहुत से पहले न देखे हुए आश्चर्यमय रूपों को देख। ।।6।। इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्‌। मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टमिच्छसि॥ ।।7।। हे अर्जुन! अब इस मेरे शरीर में एक जगह स्थित चराचर सहित सम्पूर्ण जगत को देख तथा और भी जो कुछ देखना चाहता हो सो देख। ।।7।।           प्राप्त आत्मिक ज्ञान के साक्षात स्वरूप का दर्शन अर्जुन को हो सके इस आग्रह पर सहमति मिल जाने के बाद अर्जुन को श्रीकृष्ण ये भी समझाते हैं कि वह इस ज्ञान से क्या क्या देख सकते हैं। कुछेक को बताने के बाद श्रीकृष्ण अर्जुन को ये भी समझाते हैं कि जब व्यक्ति को  स्वयम की समझ इस ज्ञान के द्वारा होती है तो फिर वह सम्पूर्ण संसार के गूढ़तम रहस्य को देख सकता है। यह सब ज्ञान की प्राप्ति और उसमें श्रद्धा से सम्...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 5

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 5 श्रीभगवानुवाच पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः। नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च॥ ।।5।। श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अब तू मेरे सैकड़ों-हजारों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा नाना आकृतिवाले अलौकिक रूपों को देख। ।।5।। अर्जुन के आग्रह को परमात्मा के द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है। अर्जुन को जब आत्म ज्ञान प्राप्त होता है तो उसे परमात्मा से सामीप्य का बोध होता है। ऐसी स्थिति में उसे परमात्मा के सर्वविभूति सम्पन्न स्वरूप को देखने की लालसा होती है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। जब व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति होती है तो स्वाविक रूप से वह उस  ज्ञान  के व्यापक  स्वरूप को साकार देखना भी चाहता है। किंतु इस साक्षात दर्शन के लिए ज्ञान का होना ही एकमात्र शर्त नहीं है बल्कि ज्ञान और ज्ञानदाता के प्रति अटूट और निःशंक श्रद्धा का होना भी अनिवार्य है। अर्जुन में ये विशेषताएँ थीं और इसी कारण से श्रीकृष्ण ने उसके आग्रह को स्वीकार भी किया। ईश्वर का यह स्वरूप जिससे सांसारिक जीव उनकी विभूतियों का प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हों विराट है, इस स्वरूप में कई स्वरूप...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 3 एवम 4

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 3 एवम 4 एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर। द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम॥ ।।3।। हे परमेश्वर! आप अपने को जैसा कहते हैं, यह ठीक ऐसा ही है, परन्तु हे पुरुषोत्तम! आपके ज्ञान, ऐश्वर्य, शक्ति, बल, वीर्य और तेज से युक्त ऐश्वर्य-रूप को मैं प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ। ।।3।। मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो। योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम्‌॥ ।।4।। हे प्रभो! यदि मेरे द्वारा आपका वह रूप देखा जाना शक्य है- ऐसा आप मानते हैं, तो हे योगेश्वर! उस अविनाशी स्वरूप का मुझे दर्शन कराइए। ।।4।। परमात्मा की विभूतोयों को समझकर कसी के अंदर भी उस परम शक्तिमान प्रभु के दर्शन की इक्षा हो सकती है ताकि वह उसे देख तो सके जिसके सम्बन्ध में उसे इतना वैभवशाली जानने समझने को मिला है। किंतू जिसे प्राप्त ज्ञान पर श्रद्धा होती है उसे खुद पर अहम भी नहीं होता है और ज्ञान और गुरु के प्रति समर्पण भी होता है। इसी कारण इक्षा होने पर भी व्यक्ति प्रार्थना भाव ही रखता है और यही भाव अर्जुन को भी था सो वह विनयपूर्वक कहता है कि यदि सम्भव लगे तो यानी यदि उसकी पात्रता हो तो...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 (श्लोकरहित)

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 (श्लोकरहित) परिचय          अब तक हमने जो कुछ सुना और जाना वह हमारी दृष्टि को आध्यात्मिक विस्तार प्रदान करता है। व्यक्ति अपनी आँखोँ से चीजों को तो देखता ही है किंतु उसकी दृष्टि में दृष्टिकोण भी उसे देखने समझने में मदद करता है । इसीलिए भिन्न भिन्न व्यक्ति एक ही वस्तु को अपनी अपनी आँखों से देखते हुए भी उस वस्तु को भिन्न भिन्न रूप से समझते हैं। यह दृष्टिकोण में फर्क के कारण होता है।       व्यक्तियों का दृष्टिकोण उनके विवेक और ज्ञान पर निर्भर करता है। जिसकी जैसी समझ होती है, जैसा विवेक होता है उसी के अनुरूप वह चीजों को देख समझ पाता है। परमात्मा के स्वरूप को हमने अभी जाना है किंतु उसकी समझ के लिए यह आवश्यक है कि  हमारी दृष्टि संकुचित न हो। बल्कि दृष्टि के साथ ही वह दृष्टिकोण भी हो जिससे हम परमात्मा से सम्बंधित इस ज्ञान को आत्मसात कर सकें। इसके लिए जो दृष्टि चाहिए उसे दिव्य दृष्टि कहते हैं , एक ऐसी ज्ञानमयी दृष्टि जो हमें सक्षम बनाती है कि हम जो देखते हैं उसे मात्र ऊपरी तौर पर ही नहीं समझें बल्कि उसके भीतर के रहस्यों...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 परिचय          अब तक हमने जो कुछ सुना और जाना वह हमारी दृष्टि को आध्यात्मिक विस्तार प्रदान करता है। व्यक्ति अपनी आँखोँ से चीजों को तो देखता ही है किंतु उसकी दृष्टि में दृष्टिकोण भी उसे देखने समझने में मदद करता है । इसीलिए भिन्न भिन्न व्यक्ति एक ही वस्तु को अपनी अपनी आँखों से देखते हुए भी उस वस्तु को भिन्न भिन्न रूप से समझते हैं। यह दृष्टिकोण में फर्क के कारण होता है।       व्यक्तियों का दृष्टिकोण उनके विवेक और ज्ञान पर निर्भर करता है। जिसकी जैसी समझ होती है, जैसा विवेक होता है उसी के अनुरूप वह चीजों को देख समझ पाता है। परमात्मा के स्वरूप को हमने अभी जाना है किंतु उसकी समझ के लिए यह आवश्यक है कि  हमारी दृष्टि संकुचित न हो। बल्कि दृष्टि के साथ ही वह दृष्टिकोण भी हो जिससे हम परमात्मा से सम्बंधित इस ज्ञान को आत्मसात कर सकें। इसके लिए जो दृष्टि चाहिए उसे दिव्य दृष्टि कहते हैं , एक ऐसी ज्ञानमयी दृष्टि जो हमें सक्षम बनाती है कि हम जो देखते हैं उसे मात्र ऊपरी तौर पर ही नहीं समझें बल्कि उसके भीतर के रहस्यों को भी देख स...