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Showing posts from December, 2022

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 10

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 10 उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्‌। विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥ ।।10।। शरीर को छोड़कर जाते हुए को अथवा शरीर में स्थित हुए को अथवा विषयों को भोगते हुए को इस प्रकार तीनों गुणों से युक्त हुए को भी अज्ञानीजन नहीं जानते, केवल ज्ञानरूप नेत्रों वाले विवेकशील ज्ञानी ही तत्त्व से जानते हैं। विवेक और ज्ञान ही व्यक्ति का उद्धारक होता है क्योंकि इन्हीं के माध्यम से व्यक्ति स्वयम को जान पाता है। स्वयं को पाने के लिए कोई नियत समय या उम्र नहीं है बल्कि ज्ञान और विवेक के माध्यम से व्यक्ति जीवन के किसी भी पड़ाव पर स्वयं के सत्य को प्राप्त कर सकता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 9

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 9 श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च। अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥ ।।9।। यह जीवात्मा श्रोत्र, चक्षु और त्वचा को तथा रसना, घ्राण और मन को आश्रय करके -अर्थात इन सबके सहारे से ही विषयों का सेवन करता है। मन और इन्द्रियों का प्राणियों के जीवन में बहुत ही महत्व है क्योंकि यह मन एयर इंद्रियाँ ही हैं जिनके माध्यम से प्राणी संसार की अनुभूति करता है और इन्हीं से विवेक को विकसित करता है और ज्ञान को आत्मसात करता है और विवेक और ज्ञान के सहारे कर्म करता हुआ इन्द्रियों के प्रभाव से स्वयम को मुक्त भी करता है।।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 8

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 8 शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः। गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्‌॥ ।।8।। वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादिका स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इन मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है- उसमें जाता है। जीव की यात्रा एक शरीर तक सीमित नहीं होता है। व्यक्ति के  सञ्चित और अर्जित संस्कार देह त्याग से खत्म नहीं होते हैं बल्कि जीव के देह त्याग के पश्चात ये एक शरीर से दूसरे शरीर तक की यात्रा कर नए देह में , नए जीवन में प्रवेश करता है। इसका तातपर्य क्या है? इसका तातपर्य है कि जीवन एक शरीर तक सीमित नहीं होता है। मृत्यु जीवन का अंत नहीं बल्कि एक शरीर  का अवसान मात्र है। लेकिन एक जीवन में हम जो भी करते हैं उनसे जो संस्कार प्राप्त होते हैं वे समाप्त नहीं होते हैं। यह तथ्य जीव के जीवन का आधार आत्मा के होने का परिचायक है। 

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 7

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 7 ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः। मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥ ।।7।। इस देह में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है और वही इन प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है। प्राणी ईश्वर का ही रूप है, ईश्वर का ही एक प्रतिरूप है। यह शिक्षा सभी प्राणियों को एक सूत्र में पिरोती है। इस संसार में जीवों में कोई भेद नहीं होता है। सभी समान रूप से समान हैं और यह शिक्षा भेदों को मिटाती है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 6

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 6 न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः। न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः। जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही, वही मेरा परम धाम है। इस प्रकार वैराग्य और समर्पण के मार्ग पर चलता हुआ व्यक्ति जिस स्थिति को प्राप्त करता है वही ईश्वरत्व है। यानी माया, मोह, इक्षा, द्वंद्व, को त्याग कर प्रेम और अध्यात्म के मार्ग चलने वाला व्यक्ति संसार के कर्म बन्धन से मुक्त होकर ईश्वरत्व यानी परम् पद को प्राप्त करता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि ईश्वर की प्राप्ति कँही बाहरी दुनिया में नहीं है और अति सरल भाषा में कहें तो यही की जिसने स्वयं के सत्य को पा लिया वही ईश्वर को पा लिया। यँहा सूर्य और चंद्रमा की स्थिति भी गौण है यानी इस स्थिति को किसी अन्य बाहरी तरीके से नहीं देखा जाना जा सकता है। एक ही मार्ग है जिसे कहा गया है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 5

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 5 निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः। द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञैर्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्‌॥ ।।5।। जिनका मान और मोह नष्ट हो गया है, जिन्होंने आसक्ति रूप दोष को जीत लिया है, जिनकी परमात्मा के स्वरूप में नित्य स्थिति है और जिनकी कामनाएँ पूर्ण रूप से नष्ट हो गई हैं- वे सुख-दुःख नामक द्वन्द्वों से विमुक्त ज्ञानीजन उस अविनाशी परम पद को प्राप्त होते हैं। श्रीमद्भागवद्गीता के दूसरे अध्याय से लगातार बार बार व्यक्ति के स्थायी मुक्ति का मार्ग सुझाया गया है । यह शिक्षा बार बार अलग अलग शब्दावली में अलग अलग अलग रूपकों के माध्यम से दी गई है। कँही पण्डित, तो कँही स्थितप्रज्ञ कहा गया है। कभी कर्मयोग, कभी ज्ञानयोग, कभी भक्तियोग तो कभी गुणों के द्वारा भी यही एक बात समझाई गई है कि कैसे व्यक्ति स्थाई रूप से दुखों से मुक्त हो कर आत्म अवस्थित हो सकता है। आत्मा में अवस्थित होना ही परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग बतलाया गया है। यानी यदि व्यक्ति स्वयं को पहचान लेता है तो परमात्मा को पा लेता है। इस पन्द्रहवें अध्याय में भी यही समझाया गया है और पुनः व...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 4

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 4 ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः। तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥ ।।4।। उसके पश्चात उस परम-पदरूप परमेश्वर को भलीभाँति खोजना चाहिए, जिसमें गए हुए पुरुष फिर लौटकर संसार में नहीं आते और जिस परमेश्वर से इस पुरातन संसार वृक्ष की प्रवृत्ति विस्तार को प्राप्त हुई है, उसी आदिपुरुष नारायण के मैं शरण हूँ- इस प्रकार दृढ़ निश्चय करके उस परमेश्वर का मनन और निदिध्यासन करना चाहिए। संसार को वृक्ष के रूप में हमने समझा। और ततपश्चात यह भी समझा है कि इस वृक्ष से कैसे पार पाना है। कामनाओं से उपजे कर्म हमें वृक्ष की जड़ों की तरह संसार से बाँध कर रखती है। सो जैसे जैसे कामनाओं पर हमारा नियंत्रण होते जाता है हमारे कर्म भी नियंत्रित होते जाते हैं और यही वैराग्य की तरफ बढ़ना होता है। जब कामनाओं से मुक्ति मिल जाती है तो वैराग्यव की अवस्था आ जाती है।        वैराग्य प्राप्ति के बाद क्या? वैराग्य प्राप्ति के बाद हमें स्वयं की  आत्मा की तरफ लौटना होता है। यही हमें उस परम पिता के पास ले जाता है जो इस संसार का निय...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 3

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 3 न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा। अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल मसङ्‍गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा॥ ।।3।। इस संसार वृक्ष का स्वरूप जैसा कहा है वैसा यहाँ विचार काल में नहीं पाया जाता (इस संसार का जैसा स्वरूप शास्त्रों में वर्णन किया गया है और जैसा देखा-सुना जाता है, वैसा तत्त्व ज्ञान होने के पश्चात नहीं पाया जाता, जिस प्रकार आँख खुलने के पश्चात स्वप्न का संसार नहीं पाया जाता) क्योंकि न तो इसका आदि है (इसका आदि नहीं है, यह कहने का प्रयोजन यह है कि इसकी परम्परा कब से चली आ रही है, इसका कोई पता नहीं है) और न अन्त है (इसका अन्त नहीं है, यह कहने का प्रयोजन यह है कि इसकी परम्परा कब तक चलती रहेगी, इसका कोई पता नहीं है) तथा न इसकी अच्छी प्रकार से स्थिति ही है (इसकी अच्छी प्रकार स्थिति भी नहीं है, यह कहने का प्रयोजन यह है कि वास्तव में यह क्षणभंगुर और नाशवान है) इसलिए इस अहंता, ममता और वासनारूप अति दृढ़ मूलों वाले संसार रूप पीपल के वृक्ष को दृढ़ वैराग्य रूप (ब्रह्मलोक तक के भोग क्षणिक और नाशवान हैं, ऐसा समझकर, इस संसार के समस्त विषयभोगों में सत्ता, स...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 2

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 2 अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः। अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके॥ ।।2।। उस संसार वृक्ष की तीनों गुणोंरूप जल के द्वारा बढ़ी हुई एवं विषय-भोग रूप कोंपलोंवाली ( शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध -ये पाँचों स्थूलदेह और इन्द्रियों की अपेक्षा सूक्ष्म होने के कारण उन शाखाओं की 'कोंपलों' के रूप में कहे गए हैं।) देव, मनुष्य और तिर्यक्‌ आदि योनिरूप शाखाएँ (मुख्य शाखा रूप ब्रह्मा से सम्पूर्ण लोकों सहित देव, मनुष्य और तिर्यक्‌ आदि योनियों की उत्पत्ति और विस्तार हुआ है, इसलिए उनका यहाँ 'शाखाओं' के रूप में वर्णन किया है) नीचे और ऊपर सर्वत्र फैली हुई हैं तथा मनुष्य लोक में ( अहंता, ममता और वासनारूप मूलों को केवल मनुष्य योनि में कर्मों के अनुसार बाँधने वाली कहने का कारण यह है कि अन्य सब योनियों में तो केवल पूर्वकृत कर्मों के फल को भोगने का ही अधिकार है और मनुष्य योनि में नवीन कर्मों के करने का भी अधिकार है) कर्मों के अनुसार बाँधने वाली अहंता-ममता और वासना रूप जड़ें भी नीचे और ऊपर सभी लोकों में व्याप्त हो रही है...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 1 ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌॥ ।।1।। श्री भगवान बोले- आदिपुरुष परमेश्वर रूप मूल वाले और ब्रह्मारूप मुख्य शाखा वाले  जिस संसार रूप पीपल वृक्ष को अविनाशी ।इस वृक्ष का मूल कारण परमात्मा अविनाशी है तथा अनादिकाल से इसकी परम्परा चली आती है, इसलिए इस संसार वृक्ष को 'अविनाशी' कहते हैं कहते हैं, तथा वेद जिसके पत्ते कहे गए हैं, उस संसार रूप वृक्ष को जो पुरुष मूलसहित सत्त्व से जानता है, वह वेद के तात्पर्य को जानने वाला है। । संसार को और संसार के साथ व्यक्ति के सम्बंध को समझाने के लिए वृक्ष की उपमा ली गई है। संसार की तुलना पीपल के बृक्ष से करते हुए जो समझाया गया है उसके अनुसार यह संसार नित्य होते हुए भी नित्य परिवर्तनशील है। इसका मूल परमात्मा की तरफ जाता है और इसके पत्तों को वेद की संज्ञा दी गई है। ध्यान देने योग्य बात है कि पत्तों से बृक्ष का पोषण होता है और यही काम संसार में वेद यानी ज्ञान का भी है। इस प्रकार ज्ञान इस संसार का ही वह ज्ञान है जो इसे पोषण भी देता है और ईश्वर से इसके सम्बन्धों को परिभा...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15

                                                     श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 परिचय        सम्पूर्ण श्रीमद्भागवद्गीता में श्रीकृष्ण की शिक्षा आत्मा को पहचानने की प्रक्रिया को ही समझाती है, वह भी अलग अलग रूपको के माध्यम से तो कभी सीधे सीधे। एक व्यक्ति की सांसारिक पहचान उसके शरीर, मन और विवेक से निर्धारित होती है किंतु उस एक व्यक्ति के लिए उसकी वास्तविक पहचान उसके आत्मस्वरूप यानी उसके सेल्फ में निहित होती है जिसे उसे समझना है और जिसे समझे बिना वह स्वयं की स्थिति को समझ ही नहीं सकता है। श्रीमद्भागवद्गीता इसी ज्ञान को व्यक्ति को देने की शिक्षा है।          अब पुनः एक ज्ञात से अज्ञात को समझाया गया है। और इस बार इसे वृक्ष का उदाहरण दे कर समझाया गया है।  श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 1 ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्‌। छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्‌॥ ।।1।। श्री भगवान बोले- आदिपुरुष परमे...

गुणातीत का लक्षण और गुणातीत होने का मार्ग

गुणातीत का लक्षण और गुणातीत होने का मार्ग जब यह स्पष्ट है कि गुणों से आगे जाकर यानी गुणों से ऊपर उठकर अर्थात गुणों से मुक्त होकर ही व्यक्ति आत्मा को यानी अपनी चेतना से मिल पाता है, पुरुष प्रकृति से भिन्न स्वयम को पुनः स्थापित कर पाता है तो जो बहुत स्वाभाविक प्रश्न तो उठते हीं हैं मन में कि 1.जो व्यक्ति प्रकृति से भिन्न मात्र पुरुष की स्थिति वाला होता है यानी उसमें गुण नहीं रह जाते हैं मात्र उसकी चेतना यानी आत्मा ही होता है वैसे व्यक्ति को पहचानने के क्या लक्षण होते हैं? 2.ऐसे व्यक्ति का आचरण यानी व्यवहार कैसा होता है? 3.और वो कौन सी विधि है जिससे यह अवस्था प्राप्त की जा सकती है?         इन प्रश्नों का उत्तर पाकर ही व्यक्ति गुणों से मुक्त होने के मार्ग पर बढ़ सकता है। ध्यान रहे कि इसी तरह का प्रश्न अध्याय 2 में स्थितप्रज्ञ व्यक्ति के सम्बन्ध में भी पूछा गया है और वँहा भी इसपर चर्चा हुई है। गुणातीत व्यक्ति उस  व्यक्ति को कहते हैं जो सभी गुणों की उपस्थिति या अनुपस्थिति से अप्रभावित होता है। ऐसा व्यक्ति  सत्त्वगुण के कार्यरूप प्रकाश यानी अन्तःकरण और इन्द्रियादि ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 27

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 27 ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च॥ ।।27।। क्योंकि उस अविनाशी परब्रह्म का और अमृत का तथा नित्य धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का आश्रय मैं हूँ। व्यक्ति के जीवन में गुणों की भूमिका को जानने के बाद और यह जानने के बाद कि इन गुणों से आगे बढ़कर चलने से व्यक्ति ब्रह्मलीन की अवस्था को प्राप्त करता है यह जानना भी आवश्यक है कि आखिर व्यक्ति को इस प्रयास की आवश्यकता क्या है। दरअसल व्यक्ति को अपने गुणों पर और उनके प्रभावों पर जीत हासिल करने पर जो पद प्राप्त होता है वह ईश्वरीय पद हीं है। और इसका महत्व इस वजह से क्योंकि इसी अवस्था में नित्य धर्म, उस स्थिति का जिसमें अजरता होती है, जिसमें समस्त ज्ञान भी होता और जिस अवस्था में प्राप्त आनंद बिना किसी कारण के अखण्ड होता है वह प्राप्त होता है। जब व्यक्ति अपने सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से आगे निकल जाता है तो उसका नाश शरीर की मृत्यु के बाद भी नहीं होता है, उसके समस्त कर्म और आचरण धर्म अनुरूप होते हैं और उसके आननद का कोई बाहरी कारण नहीं होता अपितु वह इस अवस्था में सिर्फ आनंदित ही...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 26

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 26 मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।  स गुणान्समतीत्येतान्ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ ।।26।। और जो पुरुष अव्यभिचारी भक्ति योग (केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर वासुदेव भगवान को ही अपना स्वामी मानता हुआ, स्वार्थ और अभिमान को त्याग कर श्रद्धा और भाव सहित परम प्रेम से निरन्तर चिन्तन करने को 'अव्यभिचारी भक्तियोग' कहते हैं) द्वारा मुझको निरन्तर भजता है, वह भी इन तीनों गुणों को भलीभाँति लाँघकर सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त होने के लिए योग्य बन जाता है। गुणों से और उनके प्रभावों से पार पाने का एक मार्ग भक्ति भी है। ऐसी भक्ति जिसमें अपने आराध्य पर अटल भरोसा होता है,  जिसके प्रति श्रद्धा सर्वोपरि होता है और जिससे अटूट प्रेम होता है। भक्त के अंदर न तो कोई अभिमान होता है , न ही उसे आराध्य से कोई स्वार्थ ही होता है। जब व्यक्ति परम् समर्पण की स्थिति में आ जाता है तो फिर उसके सारे स्वार्थ, उसका समस्त अभिमान समाप्त हो जाता है और वह तब बिना किसी कारण के ही आराध्य पर अटूट विश्वास और उनके प्रति अगाध श्रद्धा और प्रेम रखने लगता है। तब न तो उसके अंदर गुणों का कोई असर र...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 25

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 25 मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः। सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः सा उच्यते॥ ।।25।। जो मान और अपमान में सम है, मित्र और वैरी के पक्ष में भी सम है एवं सम्पूर्ण आरम्भों में कर्तापन के अभिमान से रहित है, वह पुरुष गुणातीत कहा जाता है। जब व्यक्ति यह समझता है कि उसके कर्म और उसकी क्रिया-प्रतिक्रिया मात्र गुणों की अभिव्यक्ति भर है और उसकी चेतना को इससे कोई लेना देना नहीं है तो ऐसी स्थिति में व्यक्ति यह समझता है कि उससे जो भी कार्य हो रहें हैं वे मात्र उसके गुणों की अवस्था के द्योतक भर हैं तब वह व्यक्ति इस दर्प से मुक्त रहता है कि वह कर्ता है। उसे पता होता है कि इन्द्रियाँ स्वाभाविक रूप से गुणों की अवस्था को अभिव्यक्त कर रहीं हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को किसी भी कार्य में न तो सम्मान का अनुभव होता है और न हीं अपमान का। साथ ही उसके लिए न तो कोई प्रिय है न अप्रिय, बल्कि सबों के लिए वह सम्भाव में ही रहता है।