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Showing posts from July, 2021

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 24, 25

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 24, 25 सङ्‍कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः। मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः॥ शनैः शनैरुपरमेद्‍बुद्धया धृतिगृहीतया। आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत्‌॥ संकल्प से उत्पन्न होने वाली सम्पूर्ण कामनाओं को निःशेष रूप से त्यागकर और मन द्वारा इन्द्रियों के समुदाय को सभी ओर से भलीभाँति रोककर ।।24।। क्रम-क्रम से अभ्यास करता हुआ उपरति को प्राप्त हो तथा धैर्ययुक्त बुद्धि द्वारा मन को परमात्मा में स्थित करके परमात्मा के सिवा और कुछ भी चिन्तन न करे। ।।25।। ध्यान के द्वारा व्यक्ति अपने सेल्फ/आत्मा को प्राप्त कर पाता है। किंतु ध्यान की इस अवस्था को पाने के लिए ये आवश्यक है कि 1.व्यक्ति अपनी समस्त कामनाओं का त्याग करे 2.उसकी इन्द्रियाँ पूरी तरह से उसके वश में हों 3.मन को और शांत करे,  और ऐसा धैर्य से करे, बुद्धि और विवेक से करे, 4.ध्यान में सिर्फ अपनी आत्मा हो, अपना सेल्फ हो, और कुछ भी न हो।     यह प्रक्रिया धीरे धीरे होती है और बारम्बार अभ्यास से होती है। ध्यान की यह अवस्था उपासना से भिन्न होती है, पूर्णतः वर्तमान में टिकी होती है, क...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 23

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 23 तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसञ्ज्ञितम्। स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा॥ जो दुःखरूप संसार के संयोग से रहित है तथा जिसका नाम योग है, उसको जानना चाहिए। वह योग न उकताए हुए अर्थात धैर्य और उत्साहयुक्त चित्त से निश्चयपूर्वक करना कर्तव्य है। ।।23।। जब व्यक्ति  ऊपर वर्णित तरीके से ध्यान करता है तो वह अपने भ्रम से मुक्त होते जाता है। अभ्यास से व्यक्ति अपने सेल्फ यानी अपनी आत्मा के ऊपर चढ़े उस आवरण को हटा पाने में सक्षम हो पाता है जिस आवरण के कारण वह स्वयं से बाहर के सुख-दुख और कामनाओं के संसार को ही अपना वास्तविक संसार समझने की भूल करते रहता है और इन्द्रिय और इन्द्रिय जनित सुख और दुख, कामनाओं में लीन होता है, उसी में अपनी बुद्धि, अपना विवेक और अपने शरीर को लगाए रखता है। इस भ्रम से मुक्ति ही योग है और योग की इस अवस्था में व्यक्ति द्वारा अपना परिचय अपने सेल्फ में , अपनी आत्मा में मिलता है। प्रत्येक व्यक्ति का यह कर्तव्य है कि वह बिना अधीर हुए, बिना अकुताये, अभ्यास पूर्वक  अपने भ्रम को काट कर अपनी आत्मा को प्राप्त करे यानी योग को प्राप्त करे...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 22

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 22 यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः। यस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते॥ 22।। परमात्मा की प्राप्ति रूप जिस लाभ को प्राप्त होकर उसे अधिक दूसरा कुछ भी लाभ नहीं मानता और परमात्मा प्राप्ति रूप जिस अवस्था में स्थित योगी बड़े भारी दुःख से भी चलायमान नहीं होता। ।।22।। आत्मा में लीन, अपने सेल्फ को पहचानने वाले ध्यान योगी के लिए आत्मसाक्षात्कार से बड़ा कोई सत्य नहीं रह जाता क्योंकि यही व्यक्ति जिसे अपने सेल्फ का ज्ञान हो चुका है वही आत्मा और परमात्मा को समझ जान पाता है। ध्यान रहे हम किसी चीज को उतना ही समझ पाते हैं जितना हम अपने सेल्फ को समझ पाते हैं। तथ्य/वस्तु की समझ सिर्फ उस तथ्य या वस्तु पर निर्भर नहीं करती बल्कि इस पर भी निर्भर करती है कि अपने सेल्फ के सम्बंध में हमारा ज्ञान कितना है। अपने सेल्फ के सम्बंध में हमारी समझ के स्तर से ही निर्भर करता है कि हमारी दृष्टि में जो है, उसे हम कितना समझ पाते हैं। संसार में इक्षाओं की कमी नहीं होती है। हम एक इक्षा की पूर्ति करने में लगे होते हैं कि उसी रास्ते में और नई इक्षाएँ पाल लेते हैं। नतीजा होता है कि ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 21

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 21 सुखमात्यन्तिकं यत्तद्‍बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्‌। वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः॥ इन्द्रियों से अतीत, केवल शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ग्रहण करने योग्य जो अनन्त आनन्द है, उसको जिस अवस्था में अनुभव करता है, और जिस अवस्था में स्थित यह योगी परमात्मा के स्वरूप से विचलित होता ही नहीं। ।।21।। योगयुक्त ध्यान की अवस्था में व्यक्ति को अंतहीन सुख की प्राप्ति होती है। जब व्यक्ति ध्यान के लिए सभी आवश्यक अवस्थाओं को प्राप्त कर अपने आत्मा /अपने सेल्फ यानी स्व में केंद्रित होकर उसी में लीन हो जाता है तो उस समय व्यक्ति को जो सुख मिलता है वह सुख इंद्रियों पर निर्भर सुख नहीं होता है। जब हमारे सुख इंद्रियों पर निर्भर होते हैं तब हम इंद्रियों के माध्यम से बाहरी कारकों से सुख प्राप्त करते हैं। यह सुख हमेशा युग्म में होता है, हमेशा इसके साथ दुख भी लगा होता है। यह सुख हम पर नहीं हमारी कामना और कामना की पूर्ति करने वाले बाहरी कारक और उसकी अनुभूति देने वाली हमारी इंद्रियों पर आधारित होता है। लेकिन जब व्यक्ति इंद्रियों से मुक्त अपनी ही आत्मा में लीन ध्यान में र...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 20

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 20 यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया। यत्र चैवात्मनात्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति॥ योग के अभ्यास से निरुद्ध चित्त जिस अवस्था में उपराम हो जाता है और जिस अवस्था में परमात्मा के ध्यान से शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि द्वारा परमात्मा को साक्षात करता हुआ सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही सन्तुष्ट रहता है। ।।20।। ध्यान और योग की प्रक्रिया मात्र इनके सम्बन्ध में सैद्धान्तिक  ज्ञान प्राप्त कर लेने से पूरी नहीं होती। हम सभी जानते हैं कि कामनाओं के त्याग और इंद्रियों के वश में रहने से ही हमारा ध्यान अपनी आत्मा, अपने स्व पर टिक पाता है और यही परम् सुख की अवस्था दिला पाता है लेकिन इस जानकारी के बावजूद हम अंतिम सत्य यानी परम् सुख को छोड़कर खुद के बाहर अवस्थित वस्तुओं और कारणों कों ढूँढते रहते हैं और कभी सन्तुष्ट और खुश नहीं हो पाते हैं चिर काल तक के लिए। तो फिर उपाय क्या है। उपाय है इस सैद्धान्तिक ज्ञान के अनुरुप आचरण और इस आचरण का अनवरत लम्बे समय तक अभ्यास करना। ज्ञान के निरन्तर प्रायोगिक अभ्यास से ही यह ज्ञान आत्मसात हो पाता है और हम खुद को कामनाओं और अपनी इंद्रियों क...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 19

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 19 यथा दीपो निवातस्थो नेंगते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः॥ जिस प्रकार वायुरहित स्थान में स्थित दीपक चलायमान नहीं होता, वैसी ही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की कही गई है। ।।19।।              जब व्यक्ति ध्यानयोग की उस अवस्था को प्राप्त कर लेता है कि उसका सारा ध्यान अपनी आत्मा यानी अपने सेल्फ पर लगा होता है उस समय होता क्या है, इसे समझना आवश्यक है। आत्म में ध्यानरत योगी की समस्त बाहरी इक्षाएँ समाप्त हो चुकी होती हैं और उसकी इन्द्रियाँ सम्पूर्ण रूप से उनके वश में हुई निश्चेष्ट हुई होती हैं। ऐसी अवस्था में योगी मन की समस्त इक्षाओं से मुक्त हुआ रहता है, उसकी कोई कामना शेष नहीं होती है। मन हमेशा कामनाओं की पूर्ति के लिए ही भटकता है और जब जब उसकी कोई कामना पूरी होती है उसे प्रसन्नता का अनुभव होता है। लेकिन ध्यानरत योगी की तो कोई कामना शेष ही नहीं रह गई है तो उसका मन चिर प्रसन्न्ता में डूबा हुआ होता है। आत्मा -परमात्मा में लीन योगी को इंद्रियों से कोई सुख चाहिए ही नहीं, उसकी इक्...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 18

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 18 यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते। निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा॥ अत्यन्त वश में किया हुआ चित्त जिस काल में परमात्मा में ही भलीभाँति स्थित हो जाता है, उस काल में सम्पूर्ण भोगों से स्पृहारहित पुरुष योगयुक्त है, ऐसा कहा जाता है। ।।18।। (10)योग अवस्था ध्यान योग की विधि को अपना कर व्यक्ति योगयुक्त हो जाता है।  इस अवस्था में व्यक्ति का मन उसके पूर्ण नियंत्रण में होता है, इधर उधर भटकते नहीं रहता है। इन्द्रियाँ पूर्ण वश में होती हैं जिस कारण मन का भटकाव बंद हो जाता है और मन पूर्णतः अपनी ही आत्मा में लीन होता  है। कोई अन्य भाव में में नहीं रह जाता है। अन्य सभी जुड़ाव से मन मुक्त रहता है, कोई अन्य आकर्षण नहीं रह जाता है। व्यक्ति स्वयं की आत्मा में ही अवस्थित हो जाता है। यह वह अवस्था है जब व्यक्ति इंद्रियों की गतिविधियों से मुक्त, शांत मन से आत्मा/सेल्फ में ही विलीन हो चुका होता है। कोई अन्य इक्षा, भाव, कामना नहीं रह जाती, बस व्यक्ति खुद की सत्यता में विलीन हो जाता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 17

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 17 युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। दुःखों का नाश करने वाला योग तो यथायोग्य आहार-विहार करने वाले का, कर्मों में यथायोग्य चेष्टा करने वाले का और यथायोग्य सोने तथा जागने वाले का ही सिद्ध होता है। ।।17।। (9) आहार -विहार सफलता पूर्वक ध्यान योग में प्रवृत्त होने हेतु आवश्यक है कि व्यक्ति का शरीर और मन स्वस्थ और प्रफुल्लित रहे और इसके लिए आवश्यक है कि वह व्यक्ति युक्तायुक्त संयमित जीवन जिये, निम्न चीजें शामिल हों उसके जीवन में 1.संयमित और आवश्यक मात्रा में भोजन करे, 2.उसके जीवन में विहार यानी मनोरंजन का संयमित समावेश हो, 3.वह नियमित संयमित ढंग से कर्म करे, तथा 4.बहुत अधिक या बहुत कम न सोये।         ये क्रियाएँ व्यक्ति विशेष की शारीरिक और मानसिक क्षमता के अनुसार होनी चाहिए, सभी के लिए एक तरह की मात्रा का निर्धारण नहीं हो सकता है, लेकिन खान-पान, नींद, मनोरंजन और कर्मों में व्यक्ति की अपनी निजी क्षमता के अनुसार एक संयमित अनुशासन का होना अनिवार्य है, तभी व्यक्ति बाहरी विचलनों से मुक्त होकर ध्यान योग में प्रवृत्त हो सकता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 16

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 16 नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः। न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन॥ हे अर्जुन! यह योग न तो बहुत खाने वाले का, न बिलकुल न खाने वाले का, न बहुत शयन करने के स्वभाव वाले का और न सदा जागने वाले का ही सिद्ध होता है। ।।16।। (9) आहार विहार     ध्यान योग के लिए आवश्यक है कि योगी अपने शरीर और मन से मुक्त रहे , उसे अपने शरीर और मन के स्तर पर किसी विचलन का सामना नहीं करना पड़े। सो यह आवश्यक है कि व्यक्ति जो ध्यान योग में लगना चाहता है न तो ज्यादा खाये न कम ही, न ज्यादा सोये , न  कम ही क्योंकि ये दोनों अति की अवस्थाएँ व्यक्ति के स्वास्थ्य को प्रभावित कर उसकी एकाग्रता को भंग कर ध्यान से विचलित कर देती हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 15

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 15 युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः। शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति॥ वश में किए हुए मनवाला योगी इस प्रकार आत्मा को निरंतर मुझ परमेश्वर के स्वरूप में लगाता हुआ मुझमें रहने वाली परमानन्द की पराकाष्ठारूप शान्ति को प्राप्त होता है। ।।15।। (8)मोक्ष की प्राप्ति        जब व्यक्ति ध्यान (मैडिटेशन) की ऊपर वर्णित विधि को अपना कर ध्यान करता है तब वह जिस अवस्था में होता है उस अवस्था में वह अपने सेल्फ/आत्मा के सम्बंध में सोचता(थिंकिंग) नहीं है बल्कि उस आत्मा अथवा सेल्फ के प्रति उसका एकाग्र ध्यान(अटेंशन) लगा होता है। किसी चीज के सम्बन्ध में एकटक होकर सोचना और उस चीज पर एकटक होकर ध्यान लगाना दोनों दो भिन्न अवस्थाएँ होती हैं। सोचने की अवस्था में व्यक्ति की इन्द्रियाँ जागृत हो कर उसके मन को भटकाने लगती हैं भले व्यक्ति बाहर से शांत दिखता हो, किंतु एकाग्र ध्यान की अवस्था में व्यक्ति उस चीज से अलग किसी भी अन्य के प्रति जागरूक नहीं रह जाता है और उसका सम्पूर्ण अस्तित्व उसी एक में विलीन होने लगता है। किसी चीज के अस्तित्व के सम्बंध में सोचना और ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 14

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 14 प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। मनः संयम्य मच्चित्तो युक्त आसीत मत्परः॥ ब्रह्मचारी के व्रत में स्थित, भयरहित तथा भलीभाँति शांत अन्तःकरण वाला सावधान योगी मन को रोककर मुझमें चित्तवाला और मेरे परायण होकर स्थित होए। ।।14।। जब हम ध्यान करते हैं तो उस समय मन एकदम शांत अवस्था में हो। ये कैसे सम्भव है? इसके लिए हमें भूत, भविष्य और वर्तमान से अपने मन को अलग करना होता है। यह तभी सम्भव है जब हमें हमारी इंद्रियों पर पूरा नियंत्रण हो और हमारी इन्द्रियाँ हमारे निर्देशों को मानकर भूत की स्मृतियों , भविष्य की आकांक्षाओं और वर्तमान के उत्प्रेरकों से मुक्त हो। जब इस तरह मन भूत, भविष्य और वर्तमान से मुक्त हो जाता है तो  मन शांत होता है। यह शांति ध्यान की अनिवार्य शर्त होती है। कोई बाहरी संकल्प मन में प्रवेश नहीं करता, अंदर  कोई संकल्प नहीं उठता।      इस तरह से शांत मन भय रहित हो ,ये भी अनिवार्य है। भय हमारे ईगो का, हमारे छद्म पहचान का अविभाज्य अंग होता है। जब हम खुद को एक व्यक्ति के रूप में देखते हैं तो उसके साथ कई अपेक्षाएँ जुड़ जा...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 13

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 13 समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः। सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन्‌॥ 13।। काया, सिर और गले को समान एवं अचल धारण करके और स्थिर होकर, अपनी नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर, अन्य दिशाओं को न देखता हुआ, ।।13।। (6) शरीर की अवस्था आसन पर बैठे ध्यान का अभ्यास करते व्यक्ति का पूरा शरीर, गर्दन और सिर सीधा हो और उसकी दृष्टि नाक के अग्र भाग यानी दोनों नाकों के बीच जँहा से नाक की शुरुआत होती है वँहा टिकी हो।       जब शरीर स्थिर होता है और एक सीध में होता है , कोई गति नहीं होती तो मन शांत हो पाता है। इसी प्रकार जब आँखें भृकुटि पर टिकी हों इधर उधर नहीं भटकती हो तब मन भी स्थिर हो पाता है अन्यथा आँखें मन को बार बार चलायमान कर देती हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 12

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 12 तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः। उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये॥12।। उस आसन पर बैठकर चित्त और इन्द्रियों की क्रियाओं को वश में रखते हुए मन को एकाग्र करके अन्तःकरण की शुद्धि के लिए योग का अभ्यास करे। ।।12।। (4) मन, इन्द्रिय, चित्त की एकाग्रता    उचित आसन पर स्थिर होकर  बैठकरयोगी को योग्याभ्यास करना चाहिए। आसन पर स्थिर होने के उपरांत  *इंद्रियों की सारी संवेदनाओं और सूचनाओं के प्रवाह को रोक देना है ताकि इन्द्रियाँ बाहरी संसार की अनुभूतियों को अंदर न आने दें। *मन को निरुद्ध कर लेना है ताकि मन के अंदर से कोई प्रवाह न उठे। *चित्त स्थिर हो अर्थात न कोई स्मरण हवन ही कोई भविष्य की योजना हो। *इस प्रकार सभी वाह्य और अंदुरुनी संकल्पों से मन, बुद्धि, चित्त, और इंद्रियों को मुक्त कर मात्र श्वास की गति पर ध्यान केंद्रित करें। (5)अभ्यास इस अवस्था मेंआने के बाद व्यक्ति को चाहिए कि वह स्वयं की आत्मा यानी सेल्फ पर ध्यान केंद्रित करें। यँहा दो मानसिक क्रियाओं का अंतर समझना जरूरी है। जब जब हम किसी चीज के बारे में ध्यान केंद्रित क...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 11

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 11 शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः। नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम्‌॥ 11 ।। शुद्ध भूमि में, जिसके ऊपर क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न बहुत ऊँचा है और न बहुत नीचा, ऐसे अपने आसन को स्थिर स्थापन करके। ।।11।। (2)स्वक्ष एवं पवित्र स्थल जब हम ध्यान प्रारम्भ करते हैं तो हमें ध्यान के लिए ऐसे स्थान का चयन करना चाहिए जँहा का वातावरण साफ सुथरा हो, जँहा भूमि गन्दी न हो, और जँहा बैठने में मन को अच्छा लगे, कोई कोलाहल न हो, और बाहरी वातावरण से मन और शरीर का विचलन न होता हो। (3)आसन ध्यान के लिए स्थल चयन के उपरांत आसन का चयन भी एक महत्वपूर्ण अंग है। आसन की तीन निम्न विशेषताएँ होनी चाहिए     *आसन ऊष्मा का कुचालक हो ताकि शरीर से पृथ्वी की गर्मी या नमी न मिले जिससे ध्यान में व्यवधान पड़ सकता है।      * आसन न तो बहुत मुलायम हो और न ही बहुत कठोर।      *आसन की ऊँचाई इतनी ही हो कि बैठने में कष्ट या असुविधा न हो।         बैठने के तरीके को भी आसन कहते हैं। हमारे बैठने का आसन ऐसा होना चाहिए...

ध्यान की विधि: श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 10 से 26

ध्यान की विधि: श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 10 से 26 श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 10 योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥ 10।। मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकांत स्थान में स्थित होकर आत्मा को निरंतर परमात्मा में लगाए। ।।10।। योगयुक्त कौन है ये तो हमने अबतक समझा है। व्यक्ति और समाज के उत्थान का मार्ग कर्मयोग के अनुपालन से शुरू होता है। फिर ज्ञान की प्राप्ति होती है और तब व्यक्ति ध्यान की अवस्था में प्रवेश कर पाता है। जो व्यक्ति बिना इस क्रमिक यात्रा के ध्यान यानी मैडिटेशन करने का प्रयास करता है वह वास्तव में मैडिटेशन या ध्यान नहीं कर रहा होता है बल्कि वह एकाग्र होने का अभ्यास कर रहा हो सकता है या फिर उपासना कर रहा होता है।     ध्यान की विधि तो वही शुरू कर सकता है जो कर्मयोग और ज्ञान योग की यात्रा पूरी कर चुका होता है। अब देखिए कि ध्यान किया कैसे जाता है। इसे हम क्रमवार समझते हैं। (1) एकांत स्थल और शांत मन (I) योगयुक्त व्यक्ति को एकांत स्थल का चुनाव करना चाहिए। यह स्थल।ऐसा हो कि य...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 10

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 10 योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः। एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥ 10।। मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकांत स्थान में स्थित होकर आत्मा को निरंतर परमात्मा में लगाए। ।।10।। योगयुक्त कौन है ये तो हमने अबतक समझा है। व्यक्ति और समाज के उत्थान का मार्ग कर्मयोग के अनुपालन से शुरू होता है। फिर ज्ञान की प्राप्ति होती है और तब व्यक्ति ध्यान की अवस्था में प्रवेश कर पाता है। जो व्यक्ति बिना इस क्रमिक यात्रा के ध्यान यानी मैडिटेशन करने का प्रयास करता है वह वास्तव में मैडिटेशन या ध्यान नहीं कर रहा होता है बल्कि वह एकाग्र होने का अभ्यास कर रहा हो सकता है या फिर उपासना कर रहा होता है।     ध्यान की विधि तो वही शुरू कर सकता है जो कर्मयोग और ज्ञान योग की यात्रा पूरी कर चुका होता है। अब देखिए कि ध्यान किया कैसे जाता है। इसे हम क्रमवार समझते हैं। (1) एकांत स्थल और शांत मन (I) योगयुक्त व्यक्ति को एकांत स्थल का चुनाव करना चाहिए। यह स्थल।ऐसा हो कि योगी के ध्यान को भटकाने वाला कोई भी कारक मौजूद नहीं हो। यो...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 9

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 9 सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु। साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥ 9 ।। सुहृद् (स्वार्थ रहित सबका हित करने वाला), मित्र, वैरी, उदासीन (पक्षपातरहित), मध्यस्थ (दोनों ओर की भलाई चाहने वाला), द्वेष्य और बन्धुगणों में, धर्मात्माओं में और पापियों में भी समान भाव रखने वाला अत्यन्त श्रेष्ठ है। ।।9।। इस प्रकार हमने देखा है कि जो योगी है वह आत्मा अथवा सेल्फ की सभी में समानता जानकर समत्व में स्थित होता है। किंतु ये भी सत्य है कि संसार में एक व्यक्ति के बहुत तरह के सम्पर्क भी होते हैं , जिनमें से कोई मित्र, कोई शत्रु, कोई उदासीन, कोई बीच बचाव करने वाला,  कोई सम्बन्धी, कोई अनिष्ट चाहने वाला तो कोई भला चाहने वाला भी होता है। कोई दूसरा व्यक्ति अत्यंत उच्च कोटि का हो सकता है तो कोई दुष्ट और पापी भी। हमें इस संसार में इन सभी से मिलना जुलना और व्यवहार करना होता है। तो भिन्न व्यक्तियों के साथ हमारा व्यवहार कैसा होना चाहिए?        एक सामान्य व्यक्ति जिसे कर्मयोग का ज्ञान नहीं होता है, जिसे योग का अभ्यास नहीं होता है वह व्यक्ति इन ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 8

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 8 ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः। युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकांचनः॥ ।।8।। जिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञान से तृप्त है, जिसकी स्थिति विकाररहित है, जिसकी इन्द्रियाँ भलीभाँति जीती हुई हैं और जिसके लिए मिट्टी, पत्थर और सुवर्ण समान हैं, वह योगी युक्त अर्थात भगवत्प्राप्त है, ऐसे कहा जाता है। ।।8। । श्रीकृष्ण ने पूर्व में भी ज्ञान प्राप्त स्थित प्रज्ञ व्यक्ति की विशेषताओं को बता चुके हैं, विशेषकर द्वितीय अध्याय में। एक बार फिर हमारी नासमझी को दूर करने हेतु श्रीकृष्ण ने उसी बात को दूसरे ढंग से कहा है। योगयुक्त व्यक्ति कौन होता है, योगी कौन है, ये प्रश्न तो बार बार मन में आता ही है न।            तो हम देखते हैं कि योगारूढ़ व्यक्ति की निम्न विशेषताएँ होती हैं। 1. यह व्यक्ति ज्ञान और विज्ञान से परिपूर्ण उन्हीं में और उन्हीं से संतुष्ट हुआ रहता है। यँहा ज्ञान का अर्थ सांसारिक और भौतिक ज्ञान से नहीं है। संसार में रहने के लिए सांसारिक और भौतिक ज्ञान तो जरूरी है ही लेकिन इस जीवन को अर्थपूर्ण ढंग से जीने के लिए इंसांन को आ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 7

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 6 श्लोक 7 जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः। शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः॥ ।।7।। सरदी-गरमी और सुख-दुःखादि में तथा मान और अपमान में जिसके अन्तःकरण की वृत्तियाँ भलीभाँति शांत हैं, ऐसे स्वाधीन आत्मावाले पुरुष के ज्ञान में सच्चिदानन्दघन परमात्मा सम्यक्‌ प्रकार से स्थित है अर्थात उसके ज्ञान में परमात्मा के सिवा अन्य कुछ है ही नहीं है। ।।7।। जब व्यक्ति कर्मयोग का साधन अपनाए जीवन पथ पर चलता है तब उसके मन से कर्म और कर्मफल के प्रति अनुराग और लिप्सा समाप्त हो जाती है, । ऐसा तब ही हो सकता है जब हमारी वाह्य वृत्तियाँ पूर्णतः हमारे नियंत्रण में हों। ये वाह्य वृत्तियाँ क्या हैं? ये हमारी इंद्रियों की चेष्टाएँ हैं जो हमें बाहरी संसार की तरफ खींचती हैं, उनमें रमने के लिए उकसाती हैं। इस अवस्था में हमारे अंदर दैवी गुणों का अभाव होता है और आसुरी गुणों की बहुलता होती जाती है। हमारे कर्म इंद्रियों से निर्धारित होने लगते है क्योंकि इन्द्रियाँ हमें प्रेरित करती हैं कि हम ये समझें कि हमारे सुख इंद्रियों के सुख को भोगने में हैं। किंतु इस स्थिति में में मन इंद्रियों से नियंत्...