अध्याय 4 की व्यख्या (श्लोकरहित श्लोक 1से 42तक)
अध्याय 4 की व्याख्या (श्लोकरहित) श्रीमद्भागवद्गीता चतुर्थ अध्याय पृष्ठभूमि हम कौन हैं, हमारा क्या लक्ष्य है, उस लक्ष्य को कैसे प्राप्त करना है, ये वो प्रश्न हैं जिनका सामाधान हम सभी खोजते हैं और इसी समाधान का सार्थक प्रयास है श्रीमद्भागवद्गीता के ज्ञान का प्रशिक्षण। प्रथम अध्याय में हमारे अविवेक को दिखलाया गया है। शैक्षणिक स्तर पर हम विद्वान होने के वावजूद इस बात की कोई गारन्टी नहीं होती है कि हम उन तीन मौलिक प्रश्नों का उत्तर जाने हीं, कि (1) हम कौन हैं? (2).हमारा लक्ष्य क्या है? और (3) इस लक्ष्य को पाना कैसे है? द्वितीय अध्याय में इन प्रश्नों का सारांशतः उत्तर बताया गया है जिसमें लोकप्रचलन, आत्मा, ज्ञान , कर्म और एनलाइटनमेंट यानी सिद्धि की जानकारी दी गई है। किंतु सत्य ये है कि मनुष्य होने के नाते हम किसी व्यक्ति के द्वारा बताई बातों पर सहजन्ता से भरोसा न कर उनका परीक्षण और प्रतिपरीक्षण करते हैं और परीक्षण और प्रतिपरीक्षण करने का माध्यम प्रश्न करना होता है। साथ ही हम हमेशा सबसे सहज रास्ता का चुनाव करना चाहते हैं लेकिन इस क्रम में भूल जाते हैं कि विकास क्रमिक प्रगति है न कि ...