Posts

Showing posts from September, 2022

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 (श्लोकरहित)

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 परिचय श्रीमद्भागवद्गीता की रचना अर्जुन के संशय को दूर करने के क्रम में हुई है। युद्ध क्षेत्र में युद्ध के लिए खड़े अर्जुन के मन में  युद्ध को लेकर कई प्रश्न उठने लगे थे और उसे युद्ध की निरर्थकता का भान हो रहा था, किन्तु युद्ध की निरर्थकता के लिए उसके जो तर्क थे वे युद्ध से कम और खुद उसके अपने संशय की वजह से अधिक थे। अर्जुन धर्म के विरुद्ध किसी भी आचरण को गलत मानता था और उसे संशय था कि यह युद्ध अर्जुन के लिए अधर्म का मार्ग खोलता है। उसके इसी संशय को दूर करने के लिए अर्जुन और कृष्ण के बीच जो सम्वाद हुआ वही श्रीमद्भागवद्गीता का रूप लेकर सामने आया। वस्तुतः कर्मक्षेत्र में हम सभी कई तरह की भ्रांतियों के शिकार होते हैं। ये भाँतियाँ इस  लिए हावी हो पाती हैं क्योंकि हम स्वयं के अस्तित्व को और स्वयं के साथ संसार के सम्बन्धों की बारीकियों को नहीं समझ पाते हैं। हम कौन हैं और इस संसार में हमारी भूमिका क्या है और क्यों है अगर हम यह समझ लें तो कोई भ्रम न रहे। किन्तु हम समझें कैसे कि हम कौन हैं, क्यों हैं? इसके लिए श्रीमद्भागवद्गीता में जो मार्ग सुझाया गया वह है ध्...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 1 एवं 2

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 1 श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 श्लोक 1 श्रीभगवानुवाच परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानं मानमुत्तमम्‌। यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः॥ ।।1।। श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14, श्लोक 2 इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः।  सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च॥ ।।2।। श्री भगवान बोले- ज्ञानों में भी अतिउत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गए हैं। इस ज्ञान को आश्रय करके अर्थात धारण करके मेरे स्वरूप को प्राप्त हुए पुरुष सृष्टि के आदि में पुनः उत्पन्न नहीं होते और प्रलयकाल में भी व्याकुल नहीं होते। मनुष्य के जीवन में परम् सिद्धि है उसका अपनी परम् चेतना को प्राप्त करना। परम् चेतना यानी अपनी आत्मा, अपने स्व को प्राप्त करना जो परमात्मा का ही स्वरूप है। मनुष्य की परम् चेतना यानी उसकी वह चेतना जो उसे अवगत कराती है कि वह परुष रूप में(पुरुष का अर्थ लिंग रूप में नहीं है बल्कि लिंग स्तर पर मर्द और औरत दोनों के लिए इस व्याख्या में पुरुष का ही उपयोग किया गया है) प्रकृति से कैसे भिन्न और ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14

                                                       श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 14 परिचय श्रीमद्भागवद्गीता की रचना अर्जुन के संशय को दूर करने के क्रम में हुई है। युद्ध क्षेत्र में युद्ध के लिए खड़े अर्जुन के मन में  युद्ध को लेकर कई प्रश्न उठने लगे थे और उसे युद्ध की निरर्थकता का भान हो रहा था, किन्तु युद्ध की निरर्थकता के लिए उसके जो तर्क थे वे युद्ध से कम और खुद उसके अपने संशय की वजह से अधिक थे। अर्जुन धर्म के विरुद्ध किसी भी आचरण को गलत मानता था और उसे संशय था कि यह युद्ध अर्जुन के लिए अधर्म का मार्ग खोलता है। उसके इसी संशय को दूर करने के लिए अर्जुन और कृष्ण के बीच जो सम्वाद हुआ वही श्रीमद्भागवद्गीता का रूप लेकर सामने आया। वस्तुतः कर्मक्षेत्र में हम सभी कई तरह की भ्रांतियों के शिकार होते हैं। ये भाँतियाँ इस  लिए हावी हो पाती हैं क्योंकि हम स्वयं के अस्तित्व को और स्वयं के साथ संसार के सम्बन्धों की बारीकियों को नहीं समझ पाते हैं। हम कौन ह...

श्रीमद्भागवद्गीता सध्याय 13 श्लोक 31 एवं 32, 33 एवं 34

श्रीमद्भागवद्गीता सध्याय 13 श्लोक 31 एवं 32, 33 एवं 34 अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः। शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥ ।।31।। यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते । सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते॥ ।।32।। यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः । क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥ ।।33।। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा । भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्‌॥ ।।34।। हे अर्जुन! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है। जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होने के कारण देह के गुणों से लिप्त नहीं होता। हे अर्जुन! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है। इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को (क्षेत्र को जड़, विकारी, क्षणिक और नाशवान तथा क्षेत्रज्ञ को नित्य, चेतन, अविकारी और अविनाशी जा...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 30

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 30 यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति। तत एव च विस्तारं ब्रह्म सम्पद्यते तदा॥ ।।30।। जिस क्षण यह पुरुष भूतों के पृथक-पृथक भाव को एक परमात्मा में ही स्थित तथा उस परमात्मा से ही सम्पूर्ण भूतों का विस्तार देखता है, उसी क्षण वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को प्राप्त हो जाता है। प्रकृति-पुरुष /क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के अर्थ और उनके बीच के सम्बंध को जब व्यक्ति अपने व्यवहारिक जीवन में समझ पाता है और इस सम्बंध को जी पाता है, वह इस सत्य के प्रति जागरूक रहता है तो वह समझ पाता है कि एक ही पुरुष जो।परमात्मा है, जो परम् चेतना है वही सभी प्राणियों में स्थित है अर्थात वह यह जानता है कि भिन्न रूपों वाले प्राणियों के बीच की भिन्नता मात्र सतही है और वास्तव में सभी एक ही परमात्मा की अभिव्यक्ति हैं। इस सत्य के साक्षात्कार से व्यक्ति स्वयं में परमात्मा का वास पाता है और वह स्वयं को परमात्मा का रूप समझ पाता है और दूसरों को भी स्वयं का ही रूप और स्वयं को उन अन्य प्राणियों का रूप समझ पाता है। यह सत्य व्यक्ति को परमात्मा के साथ एकाकार कर देता है।  

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 29

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 29 प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः। यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति॥ ।।29।। और जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति द्वारा ही किए जाते हुए देखता है और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है। व्यक्ति पदार्थ और चेतना का, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का, प्रकृति और पुरुष का मेल है। पदार्थ, जिसे क्षेत्र और प्रकृति भी कहा गया है उसी में गुण होता है और गुणों के कारण यह परिवर्तनीय होता है और परिवर्तनीय होने के कारण वही सब कुछ करता है। दूसरी तरफ चेतना जिसे क्षेत्रज्ञ या पुरुष कहा गया है वह अपनिवर्तनिय है, सभी में एक ही है और वह परमपुरुष अथवा परमचेतना की ही अभिव्यक्ति है। चूँकि यह अपरिवर्तनीय है सो अकर्ता है यानी कुछ  दिन करता है , साथ में उपस्थित होकर द्रष्टा बना रहता है अर्थात जिसकी उपस्थिति में प्रकृति क्रियाशील रहकर कर्ता बनी रहती है। यदि पुरुष या चेतना भोक्ता भी बन जाये तब भी सबकुछ भोगते हुए द्रष्टा ही रहती है, कर्ता नहीं होती।     जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है वही समझ पाता है कि वह व्यक्ति स्वयं कुछ भी नहीं क...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 28

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 28 समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्‌। न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्‌॥ 28।। क्योंकि जो पुरुष सबमें समभाव से स्थित परमेश्वर को समान देखता हुआ अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है। इस संसार में सब कुछ क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ से मिलकर ही बनता है। क्षेत्र पदार्थ है तो क्षेत्रज्ञ चेतना है। जब क्षेत्रज्ञ क्षेत्र से जुड़ता है तो क्षेत्रज्ञ द्रष्टा भाव से यानी साक्षी बनके क्षेत्र को देखता है। किंतु जब चेतना यानी क्षेत्रज्ञ क्षेत्र से आसक्त हो तब वही क्षेत्रज्ञ द्रष्टा से भोक्ता बन जाता है और क्षेत्र और उसके गुणों में होने वाले परिवर्तनों से प्रभावित भी होने लगता है। क्षेत्रज्ञ यानी पुरुष बिना क्षेत्र यानी प्रकृति के अपने मूल स्वरूप में ब्रह्म है किन्तु क्षेत्र से सम्बद्ध क्षेत्रज्ञ क्षेत्र के भावों का भोक्ता बम जाने पर उसके सुख दुख, लाभ हानि, जय पराजय आदि भाव से लिप्त होने लगता है।।प्राणी का कर्तव्य बनता है कि यह पुरुष यानी क्षेत्र यानी चेतना को पहचान कर उसको उसी मूल रूप में प्राप्त करे यानी कि उसकी चेतना उसके प्...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 27

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 27 समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्‌। विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥ ।।27।। जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतों में परमेश्वर को नाशरहित और समभाव से स्थित देखता है वही यथार्थ देखता है। क्षेत्र अथवा प्रकृति को समझने के लिए आवश्यक है कि हम यह समझ सके कि दरअसल क्षेत्र या प्रकृति भले ही नाशवान हो लेकिन सभी क्षेत्रों में अवस्थित परमात्मा एक ही है जो न जन्म लेता है, न मरता है और न ही उसका क्षरण ही होता है बल्कि वही चेतना स्वरूप क्षेत्र को ,प्रकृति को देखता है और उसी की उपस्थिति से क्षेत्र अथवा प्रकृति का भान हो पाता है। 

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 26

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 26 यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्‍गमम्‌। क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ॥ ।।26।। हे अर्जुन! यावन्मात्र जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न जान। क्षेत्र प्रकृति है , शरीर है जो अपने गुणों के साथ है और निरन्तर परिवर्तनीय है। जबकि चेतना गुणों से मुक्त अपरिवर्तनीय है। क्षेत्र का स्वरूप भिन्न भिन्न होता है और प्राणियों का भिन्न भिन्न स्वरूप प्रकृति यानी क्षेत्र की भिन्नता के कारण है। किंतु बिना पुरुष के संयोग के बिना चेतना की उपस्थिति के, बिना क्षेत्रज्ञ से जुड़े यह प्रकृति, यह शरीर अर्थात क्षेत्र  अजन्मा ही रह जाता है यानी व्यक्त नहीं हो पाता है। चेतना अपने आप में प्रकृति से भिन्न और स्वतंत्र है और सभी में समान है। चेतना प्रकृति की तरह भिन्न भिन्न नहीं है और न ही परिवर्तनीय है। प्राणी की उतपत्ति तभी होती है जब प्रकृति चेतना से युक्त होती है, क्षेत्र क्षेत्रज्ञ से युक्त होता है। इस प्रकार प्रत्येक प्राणी में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ अर्थात प्रकृति और पुरुष दोनों होते हैं। ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 24 एवं 25

  श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 24 एवं 25 ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना। अन्ये साङ्‍ख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे॥ ।।24।। अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते। तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥ ।।25।। उस परमात्मा को कितने ही मनुष्य तो शुद्ध हुई सूक्ष्म बुद्धि से ध्यान  द्वारा हृदय में देखते हैं, अन्य कितने ही ज्ञानयोग द्वारा और दूसरे कितने ही कर्मयोग  द्वारा देखते हैं अर्थात प्राप्त करते हैं।                   परन्तु इनसे दूसरे अर्थात जो मंदबुद्धिवाले पुरुष हैं, वे इस प्रकार न जानते हुए दूसरों से अर्थात तत्व के जानने वाले पुरुषों से सुनकर ही तदनुसार उपासना करते हैं और वे श्रवणपरायण पुरुष भी मृत्युरूप संसार-सागर को निःसंदेह तर जाते हैं। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ, प्रकृति और पुरुष को समझने के पश्चात अब मन में प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है कि पुरुष यानी क्षेत्रज्ञ जो ईश्वर ही है की प्राप्ति कैसे हो सकती है। इस हेतु चार मार्ग सुझाये गए हैं। और ये मार्ग हैं ध्यान का मार्ग ज्ञान का मार्ग कर्म का मार्ग श्रव...

श्रीमद्भागवद्गीता सध्याय 13 श्लोक 23

श्रीमद्भागवद्गीता सध्याय 13 श्लोक 23 य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह। सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते॥ ।।23।। इस प्रकार पुरुष को और गुणों के सहित प्रकृति को जो मनुष्य तत्व से जानता है (दृश्यमात्र सम्पूर्ण जगत माया का कार्य होने से क्षणभंगुर, नाशवान, जड़ और अनित्य है तथा जीवात्मा नित्य, चेतन, निर्विकार और अविनाशी एवं शुद्ध, बोधस्वरूप, सच्चिदानन्दघन परमात्मा का ही सनातन अंश है, इस प्रकार समझकर सम्पूर्ण मायिक पदार्थों के संग का सर्वथा त्याग करके परम पुरुष परमात्मा में ही एकीभाव से नित्य स्थित रहने का नाम उनको 'तत्व से जानना' है) वह सब प्रकार से कर्तव्य कर्म करता हुआ भी फिर नहीं जन्मता।       इस संसार को प्रकृति और पुरुष  के द्वारा समझा गया है। प्रकृति यानी क्षेत्र और पुरुष यानी क्षेत्रज्ञ। प्रकृति यानी पदार्थ और पुरुष यानी चेतना। सो पुरुष की उपस्थिति में ही प्रकृति की समझ बनती है। और यह पुरुष तभी समझ में आता है जब पुरुष प्रकृति से जुड़ता है। इस प्रकार प्रकृति से पुरुष अलग होता है किंतु उसको समझने के लिए प्रकृति का साथ चाहिए होता है। लेकिन प्रकृति नित्यप्रिवर्...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 22

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 22 उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः। परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः॥ ।।22।। इस देह में स्थित यह आत्मा वास्तव में परमात्मा ही है। वह साक्षी होने से उपद्रष्टा और यथार्थ सम्मति देने वाला होने से अनुमन्ता, सबका धारण-पोषण करने वाला होने से भर्ता, जीवरूप से भोक्ता, ब्रह्मा आदि का भी स्वामी होने से महेश्वर और शुद्ध सच्चिदानन्दघन होने से परमात्मा- ऐसा कहा गया है। यह संसार तब अस्तित्व में आता है जब क्षेत्रज्ञ यानी पुरुष यानी चेतना इस क्षेत्र यानी प्रकृति यानी इस शरीर में रहते हुए इससे युक्त हो जाता है और इस प्रकार इस संसार से मुक्ति का मार्ग है इस पुरुष को उंसके स्वतंत्र अस्तित्व में पहचान कर लेना। अब इस पुरुष को हम अपने शरीर में प्राप्त कैसे करें, तो इसके लिए आवश्यक है कि हम इस पुरुष को उंसके समग्रता में समझ सकें।        क्षेत्र यानी प्रकृति में अवस्थित पुरुष प्रकृति में घट रही हर घटना का , उस प्रकृति की हर गतिविधि का द्रष्टा मात्र है। वह प्रकृति में वास करते हुए उसका साक्षी बना रहता है सो यह उपद्रष्टा है।     ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 19

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 19 प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्‌यनादी उभावपि। विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्‌॥ ।।19।। प्रकृति और पुरुष- इन दोनों को ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारों को तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न जान। इस संसार को समझने के लिए हमें समझना चाहिए कि पुरुष और प्रकृति के बीच का सम्बंध क्या है। वस्तुतः क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ ही क्रमशः प्रकृति और पुरुष हैं।       प्रकृति क्षेत्र है और इसकी समझ हमें वही होनी चाहिए जो क्षेत्र की समझ को हमने समझा है यानी  ""क्षेत्र यानी शरीर को उंसके अवयवों के साथ समझना आवश्यक है। शरीर मूल रूप से पाँच तत्व यानी आकाश, जल, अग्नि, पृथ्वी और वायु , इन पाँच तत्वों के पाँच इंद्रियों, दस कर्मेन्द्रियों, मन और बुद्धि  चित्त और अहंकार से बनता है। अहंकार का अर्थ मैं की चेतना से है जो शरीर के ईगो से प्रकट होता है। इनके अतिरिक्त क्षेत्र यानी शरीर में कई अन्य विकार भी सम्मिलित होते हैं जैसे, ईक्षा, सुख और दुख की भावना, द्वेष की भावना, , धृति(यानी सहने की क्षमता यानी forbearance)।"" ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 20, 21

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 20, 21 कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते। पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥ ।।20।। पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्‍क्ते प्रकृतिजान्गुणान्‌। कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥ ।।21।। कार्य और करण  को उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख-दुःखों के भोक्तपन में अर्थात भोगने में हेतु कहा जाता है। प्रकृति में  स्थित ही पुरुष प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता है और इन गुणों का संग ही इस जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है।  प्रकृति और पुरुष के बीच के सम्बंध से संसार के सत्य से परिचित कराता है। प्रकृति और पुरुष एक दूसरे की उपस्थिति में ही समझे जा सकते हैं, और इन दोनों के योग से ही संसार परिलक्षित होता है।   प्रकृति कार्य और करण से व्यक्त होती है। यँहा कार्य और करण को समझना जरूरी है। प्रकृति जिन पाँच महाभूतों से बनती है उसे ही कार्य कहते हैं। आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध -इनका नाम 'कार्य' है। और बुद्धि, अहंकार और मन तथा श्रोत्र, त्वचा...