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Showing posts from November, 2021

विष्णुसहस्त्रनाम

ईश्वर कौन है?  इस प्रश्न का उत्तर समझने समझाने के लिए   विष्णुसहस्त्रनाम में विष्णु के वर्णित 1000 नामों का   सहयोग ले सकते हैं  ताकि हम सब ये समझ सकें कि ईश्वर वही है जो हम अपने समस्त सद्गुणों के साथ  हैं । यानी ईश्वर कोई पृथक सत्ता नहीं है बल्कि ईश्वर ईश्वरत्व का मूर्त नाम है, ऐसे गुणों का समग्र संग्रहण है जो हम सब में होते हीं होते हैं। जो अपने इन गुणों को जितना उभार पाता है वह उतनी मात्रा में ईश्वर को पहचान पाता है और जितना पहचान पाता है अपने सद्गुण आधारित कर्मों से उतना वह स्वयम ईश्वर होता है।    तो आइए हम  विष्णु के एक एक नाम के सहारे समझें कि ईश्वर कौन है। 1.विष्णुसहस्त्रनाम श्लोक 1 1.विश्वम           विष्णु ही संसार हैं। वे विश्व हैं, विश्व के रचयिता हैं और विश्व रचने के उपरांत उसी विश्व में समाहित हैं। इस प्रकार विश्व ही ब्रह्म स्वरूप है और ब्रह्म हीं विश्व स्वरूप भी है। इस प्रकार ईश्वर और विश्व दोनों ही एक हैं क्योंकि रचनाकार का वास अपनी रचना में है। सम्पूर्ण विश्व विष्णु की उपस्थिति का एक मूर्त स्वरूप ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 4, एवम 5

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 4 एवम 5 मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेषवस्थितः॥ 4।। मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत्‌ जल से बर्फ के सदृश परिपूर्ण है और सब भूत मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं, किंतु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ। ।।4।। न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्‌। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥ ।।5।। वे सब भूत मुझमें स्थित नहीं हैं, किंतु मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देख कि भूतों का धारण-पोषण करने वाला और भूतों को उत्पन्न करने वाला भी मेरा आत्मा वास्तव में भूतों में स्थित नहीं है। ।।5।। परमात्मा ही सब का कारण भी है और सब का परिणाम भी है। परमात्मा की व्यापकता को समझने के लिए हमें तीन बातें समझनी होंगी। 1. ईश्वर सर्वव्यापी है अर्थात ईश्वर इस संसार के हर कण में मौजूद है। 2. इस जगत का हर कण ईश्वर में विद्यमान है अर्थात वह अपने अस्तित्व के लिए परमात्मा पर निर्भर है। 3.ईश्वर सर्वव्यापी होकर भी अपनी उपस्थिति, अपने होने के लिए इस संसार के किसी भी सजीव या निर्जीव, व्यक्त या अव्यक्त पर निर्भर नहीं है।   4.वस्तुतः ईश्वर की वास्...

Shree Madbhagwad Geeta Chapter 9 A Practical Training

 Introduction                 Shrimad Bhagavad Gita is completed in 18 chapters. So we are in the middle of this lesson. Let us reiterate once again the reasons for studying the Shrimad Bhagavad Gita and being proficient in its teachings. The first goal has been to understand who we are. That is, what is the purpose of our existence? The second goal is to understand what the world is and the third goal is to understand God. When we understand what is our self, what is the world and what is God, we also understand the relationship between the three. Then we understand that what is the relation of our Self to the world, what is the relation of the world to God and what is our relation to the world and God. When we understand this we can understand how our Self can use this world to attain God.                      The Srimad Bhagavad-Gita begins with a description of Arjuna's state of ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 3

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 3 अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप। अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥3।। हे परंतप! इस उपयुक्त धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझको न प्राप्त होकर मृत्युरूप संसार चक्र में भ्रमण करते रहते हैं। ।।3।। किसी भी तरह का ज्ञान हम तभी प्राप्त करते हैं जब हमें ज्ञान और ज्ञान देने वाले दोनों पर श्रद्धा होती है। श्रद्धा का अर्थ है कि विश्वास भी हो और उस विश्वास के अनुरूप उस ज्ञान का जीवन में अनुसरण भी किया जाए। यदि श्रद्धा नहीं होगी तो ज्ञान की प्राप्ति की न तो उत्कण्ठा ही होगी और न ही उसे सुनने जानने के पश्चात उसका अनुसरण ही हम कर पाएंगे। गीता के ज्ञान के साथ भी यही बात है। यदि इसमें श्रद्धा है तब तो हम इस ज्ञान को समझ कर ईश्वर को प्राप्त कर पाते हैं और यदि श्रद्धा न हो तो फिर दुनियावी चक्कर में पड़े रह जाते हैं।

VSN Shlok 6, 7

47.APRAMEY  Lord Narayana cannot be known by any means, such as through the senses or by intellect or discretion.  God himself is the witness, then how can we know Him through any other evidence.  But God can definitely be experienced.  But we can experience God only when we can attain Godhood in ourselves. 48. Hrishikesh  All the senses are under Lord Narayana.  He is the controller and master of these senses.  God is the master of consciousness and that is why he is called Hrishikesh.  According to another interpretation, Lord Narayana is also called Hrishikesh because his beautiful hair is a symbol of energy, these hairstyles indicate the power of  rays of Sun and Moon. 49 Padmanabh  According to the legend of the Puranas, the lotus originates from the navel of Lord Vishnu on which Brahma is situated.  Actually, the meaning of the Padanabha form of God is that Lord Vishnu is the center of the birth of all creation, is the cause....

श्रीमद्भागवद्गीता नवम अध्याय एक व्यवहारिक प्रशिक्षण

श्रीमद्भागवद्गीता  अध्याय  9 परिचय         श्रीमद्भागवद्गीता 18 अध्यायों में पूरी होती है। इस प्रकार हम इस सबक के मध्य में हैं। श्रीमद्भागवद्गीता के अध्ययन के और उसकी शिक्षाओं में दक्ष होने के कारणों को एक बार फिर से दुहराते हैं।     पहला लक्ष्य रहा है कि हम समझें कि हम हैं कौन? यानी हमारे होने का क्या औचित्य है। दूसरा लक्ष्य है कि हम समझें कि संसार क्या है और तीसरा लक्ष्य है कि हम ईश्वर को समझ सकें।      जब हम समझते हैं कि हमारा सेल्फ क्या है, संसार क्या है और ईश्वर क्या है तो हम तीनों के बीच के सम्बंध को भी समझ पाते हैं। जब हम ये समझ पाते हैं कि हमारे सेल्फ का संसार से क्या सम्बन्ध है, संसार का ईश्वर से क्या सम्बन्ध है और हमारा संसार और ईश्वर से क्या सम्बन्ध है। जब हम ये समझ पाते हैं तो फिर हम समझ पाते हैं कि हमारा सेल्फ इस संसार का उपयोग ईश्वर को प्राप्त करने के लिए कैसे उपयोग कर सकता है।    श्रीमद्भागवद्गीता की शुरुआत अर्जुन के विषादग्रस्त मस्तिष्क की स्थिति के विवरण से शुरू होती है। जब भी हम समस्या में पड़ते हैं त...