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Showing posts from January, 2022

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 26

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 26 पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥ ।।26।। जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्धबुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र-पुष्पादि मैं सगुणरूप से प्रकट होकर प्रीतिसहित खाता हूँ। ।।26।। ईश्वर के प्रति भक्ति का स्वरूप क्या है, इसे समझना आवश्यक है।  श्रद्धा और प्रेम पूर्वक समर्पण ही भक्ति है। हम सब अपने जीवन में कई तरह के क्रिया कलाप करते रहते हैं जो मुख्यतः  हमारी कामनाओं की पूर्ति के लिए होते हैं। हम अपनी कामनाओं की पूर्ति हेतु लगे होते हैं क्योंकि इससे हमारा अहम यानी हमारा ईगो सन्तुष्ट होता है। ऐसी अवस्था में हमारे कर्म हमी को समर्पित होकर रह जाते हैं। किंतु जब हम अपनी कामनाओं के दायरे से बाहर निकलते हैं तो हमारा ईगो समाप्त हो जाता है। ऐसी स्थिति में हम जो कुछ करते हैं वह हम अपने लिए करते ही नहीं हैं। हम जो कुछ करते हैं वह इस भाव और इस समझ के साथ करते हैं कि सब कुछ परम् पिता परमेश्वर का ही है। उसी की इक्षा और उसी की आज्ञा से हम उनका...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 25

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 25 यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः। भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोऽपि माम्‌॥ ।।25।। देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं, पितरों को पूजने वाले पितरों को प्राप्त होते हैं, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझको ही प्राप्त होते हैं। इसीलिए मेरे भक्तों का पुनर्जन्म नहीं होता (गीता अध्याय 8 श्लोक 16 में देखना चाहिए)। ।।25।। प्रत्येक कर्म का अपना फल होता है जो व्यक्ति के कर्मों के अनुसार उनको प्राप्त होते हैं। जैसी आपकी श्रद्धा होती है वैसे ही आपको फल भी प्राप्त होते हैं। इसी के अनुरूप हमारे उपासना के भी परिणाम प्राप्त होते हैं। जब हमारे कर्म सकाम होते हैं हम किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति की कामना करते हैं। यदि हमारी श्रद्धा और कर्म उस उद्देश्य की पूर्ति परम्  अनुरूप होते हों तो हमें उनकी प्राप्ति होती है, किन्तु जब व्यक्ति निष्काम भाव से कर्म करते हैं हमारी श्रद्धा उस परमात्मा के प्रति होती है जो सबका नियन्ता और प्रभु है और तदनुरूप हमें उस परमात्मा की प्राप्ति होती है। जब कोई इ...