श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 22
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 22 अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते। असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥ 22।। जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश-काल में और कुपात्र के प्रति दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है। दान का तीसरा स्वरूप है तामसी दान। सात्विक दान कर्तव्य के रूप में किया जाता है बिना किसी अपेक्षा के। सात्विक दान के पीछे की भावना यह होती है कि हमें अपने किसी लाभ के लोभ से नहीं और न हीं किसी की हानि की लालसा से दान करना है बल्कि हमें दान करना ही है क्योंकि ऐसा करना ही कर्तव्य है।राजसी दान अपने लाभ के लोभ से किया जाता है । लेकिन जब व्यक्ति के मन में खुद के लाभ के लोभ से भी बड़ा लोभ किसी की हानि का लोभ होता है तब दान के नाम पर किया गया दान कर्म तामसी दान होता है जिसमें बिना स्थान, और समय का विचार किये ही ऐसे व्यक्ति को दान दिया जाता है जो दान की वस्तु को प्राप्त करने योग्य न हो अर्थात जो दान पाकर उस दान का उपयोग अनाचार, अत्याचार को फैलाने में करे तो यह दान तामसी दान कहा जाता है।