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Showing posts from March, 2023

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 22

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 22 अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते। असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्‌॥ 22।। जो दान बिना सत्कार के अथवा तिरस्कारपूर्वक अयोग्य देश-काल में और कुपात्र के प्रति दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है। दान का तीसरा स्वरूप है तामसी दान। सात्विक दान कर्तव्य के रूप में किया जाता है बिना किसी अपेक्षा के। सात्विक दान के पीछे की भावना यह होती है कि हमें अपने किसी लाभ के लोभ से नहीं और न हीं किसी की हानि की लालसा से दान करना है बल्कि हमें दान करना ही है क्योंकि ऐसा करना ही कर्तव्य है।राजसी दान अपने लाभ के लोभ से किया जाता है । लेकिन जब व्यक्ति के मन में खुद के लाभ के लोभ से भी बड़ा लोभ किसी की हानि का लोभ होता है तब दान के नाम पर किया गया दान कर्म तामसी दान होता है जिसमें बिना स्थान, और समय का विचार किये ही ऐसे व्यक्ति को दान दिया जाता है जो दान की वस्तु को प्राप्त करने योग्य न हो अर्थात जो दान पाकर उस दान का उपयोग अनाचार, अत्याचार को फैलाने में करे तो यह दान तामसी दान कहा जाता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 21

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 21 यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः। दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम्‌॥ 21।। किन्तु जो दान क्लेशपूर्वक (जैसे प्रायः वर्तमान समय के चन्दे-चिट्ठे आदि में धन दिया जाता है।) तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अथवा फल को दृष्टि में (अर्थात्‌ मान बड़ाई, प्रतिष्ठा और स्वर्गादि की प्राप्ति के लिए अथवा रोगादि की निवृत्ति के लिए।) रखकर फिर दिया जाता है, वह दान राजस कहा गया है। बहुत बार दान के पीछे की मंशा लाभ या लोभ की होती है। ऐसे व्यक्ति दान इसलिए करते हैं कि उन्हें बदले में कुछ लाभ प्राप्त हो जैसे उनका परलोक सुधरे या उनको इसी संसार में यश और प्रतिष्ठा मिले, लोग उनको बड़ा आदमी समझें इत्यादि। इसी प्रकार कई बार लोभ की मंशा से भी लोग दान देते हैं जैसे चन्दा आदि देना।     इस प्रकार के दान में स्वार्थ की भावना होती है, बदले में कुछ पाने की इक्षा होती है सो इस प्रकार के दान से मन का शुद्धिकरण नहीं होता है क्योंकि मन हमेशा फल की प्राप्ति पर टिका हुआ होता है और बेचैन रहता है। इसे राजस दान कहा जाता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 20

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 20 दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्‌॥ 20।। दान देना ही कर्तव्य है- ऐसे भाव से जो दान देश तथा काल (जिस देश-काल में जिस वस्तु का अभाव हो, वही देश-काल, उस वस्तु द्वारा प्राणियों की सेवा करने के लिए योग्य समझा जाता है।) और पात्र के (भूखे, अनाथ, दुःखी, रोगी और असमर्थ तथा भिक्षुक आदि तो अन्न, वस्त्र और ओषधि एवं जिस वस्तु का जिसके पास अभाव हो, उस वस्तु द्वारा सेवा करने के लिए योग्य पात्र समझे जाते हैं और श्रेष्ठ आचरणों वाले विद्वान्‌ ब्राह्मणजन धनादि सब प्रकार के पदार्थों द्वारा सेवा करने के लिए योग्य पात्र समझे जाते हैं।) प्राप्त होने पर उपकार न करने वाले के प्रति दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है। अपने श्रम से अर्जित की गई सम्पत्ति का एक अंश व्यक्ति को निश्चित ही सुपात्र को दान में देना चाहिए। यह साधना का चौथा सोपान है। व्यक्ति का अर्जन मात्र उसी के श्रम का परिणाम नहीं होता है बल्कि उसमें उसके समाज और परिवेश का भी महत्वपूर्ण योगदान होता है। व्यक्ति समाज के प्रति अपने इस ऋण को दान के माध्यम से चुकाता...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 19

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 19 मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः। परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्‌॥ 19।। जो तप मूढ़तापूर्वक हठ से, मन, वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है- वह तप तामस कहा गया है। सात्विक तप में तपस्वी का लक्ष्य साधना द्वारा स्वयं का शुद्धिकरण करना होता है। सात्विक तप में कर्मफल के प्रति कोई आसक्ति नहीं होती है किंतु राजस तप में व्यक्ति साधना के द्वारा स्वयं का मान सम्मान, स्वयं की प्रसिद्धि और स्वयं का प्रभाव लोगों पर बढ़ाना चाहता है सो कर्मफल के प्रति उसकी गहरी आसक्ति होती है। इन सब के विपरीत तामसिक तप में व्यक्ति का उद्देश्य न तो स्वयं का शुद्धिकरण होता है और न ही स्वयं का महत्व बढाने की लालसा बल्कि तामसिक तपस में व्यकि मूर्खतावश स्वयं को कष्ट देता है , मन वचन और शरीर तीनों स्तर पर ताकि वह दूसरे को हानि पहुँचा सके। इस तामसिक तप में व्यक्ति अपने मन , वाणी और शरीर से ऐसे कर्म करता है जो भले श्रम साध्य हों लेकिन वे स्वयं को तो पीड़ा देते ही हैं उनका उद्देश्य दूसरे के साथ छल भाव से उनकी हानि करना होता है। ऐसे तप से किस...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 18

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 18 सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्‌। क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्‌॥ 18।। जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिए तथा अन्य किसी स्वार्थ के लिए भी स्वभाव से या पाखण्ड से किया जाता है, वह अनिश्चित ('अनिश्चित फलवाला' उसको कहते हैं कि जिसका फल होने न होने में शंका हो।) एवं क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है। कई बार व्यक्ति किसी लोभवश तप के लिए प्रवृत्त होता है। उसका सारा श्रम स्वयं के मान, सत्कार प्राप्त करने के लिए होता है और चाहता है कि अन्य लोग उसकी महत्ता को स्वीकार कर उसका सम्मान करें। कई बार किसी अन्य स्वार्थ सिद्धि उसका लक्ष्य होता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति सदा ही फल के लिए चिंतित बना रहता है। इस प्रकार के तप को राजस तप कहा जाता है जिसमें मन की शुद्धि का स्थान नहीं होता है, बल्कि इसके उलट मन में स्वार्थ और लोभ की अशुद्धि बनी रहती है सो इससे मिलने वाला फल भी क्षणिक प्रभाव और क्षणिक सुख देने वाला होता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 17

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 17 श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः। अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥ 17।। फल को न चाहने वाले योगी पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किए हुए उस पूर्वोक्त तीन प्रकार के तप को सात्त्विक कहते हैं। ये जो तीन तरह के तप हैं, शारीरिक, वाचिक और मानसिक ये अलग अलग नहीं किये जाते हैं बल्कि तीनों एक दूसरे के पूरक हैं और जब व्यक्ति तप के लिए स्वयं को प्रस्तुत करता है तो इसका अर्थ है कि वह तीनों तप एक साथ कर रहा है। यदि इनमें से कोई एक नहीं किया जाता है तो फिर वह तप होता ही नहीं है।         तप की इस प्रक्रिया में व्यक्ति को श्रद्धा और अटूट विश्वास का होना जरूरी है। यदि यह भरोसा नहीं है कि मन, वाणी और शरीर को नियत तरीके से तपाना है तब तप नहीं हो सकता है क्योंकि तब तप के लिए जो भी श्रम किया जाता है वह निरर्थक होता है।     और जब  व्यक्ति स्वभावतः और कर्तव्य के अधीन होकर बिना किसी फलाफल की इक्षा के तप में प्रवृत्त होता है यानी तप में प्रवृत्त व्यक्ति के मन में तप की क्रिया के प्रति कोई आसक्ति नहीं होती है बल्कि कर्...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 16

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 16 मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः। भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥ 16।। मन की प्रसन्नता, शान्तभाव, भगवच्चिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्तःकरण के भावों की भलीभाँति पवित्रता, इस प्रकार यह मन सम्बन्धी तप कहा जाता है। मन के शुद्धिकरण की प्रक्रिया को मानसिक तप कहते हैं। तप यानी तपाना अथवा तपना अर्थात ऊष्मा का संचरण करना। इस संचरण से मन का  शुद्धिकरण होता है। यह कैसे होता है?  मन सम्बन्धी तप का तातपर्य है कि मन में प्रसन्नता हो, साम्य स्थिति हो, गूढनेस का भाव हो, मन का निग्रह हो यानी मन पर इन्द्रियों का अधिपत्य न हो, दृष्टिकोण में कोई पतित भाव न हो।     मन शांत हो, प्रसन्न हो। यह कैसे होगा? यह सम्भव होता है स्वध्याय से, भले लोगों की संगति से, उनकी बातों के अनुसरण से, स्वचिन्तन से। प्रत्येक व्यक्ति अपने मन की अवस्था के लिए स्वयं उत्तरदायी होता है। यदि मन हर बाहरी कारकों से प्रभावित होता रहे तो फिर मन की चंचलता मन को शांत, सौम्य और प्रसन्न नहीं बनने दे सकती है। मन का बहुत ही महत्व है क्योंकि हमारा संसार हमारे मब से ही...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 15

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 15 अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्‌। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्‍मयं तप उच्यते॥ 15।। जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारक एवं यथार्थ भाषण है (मन और इन्द्रियों द्वारा जैसा अनुभव किया हो, ठीक वैसा ही कहने का नाम 'यथार्थ भाषण' है।) तथा जो वेद-शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम-जप का अभ्यास है- वही वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है। शरीर के पश्चात वाणी सम्बन्धी तप आता है जो शारीरिक तप से ज्यादा सूक्ष्म है। वाणी के द्वारा व्यक्ति स्वयं को अभिव्यक्त करता है और इस प्रकार वाणी व्यक्ति के मन, बुद्धि, विवेक की अभिव्यक्ति है। इसके साथ ही वाणी मन, बुद्धि और विवेक को प्रभावित भी करती है। जब भी व्यक्ति कुछ भी बोलने के लिए उद्द्यत होता है तो उसके पूर्व उसके मन में उसकी बुद्धि और विवेक के अनुरूप विचार जन्म लेते हैं और भावनाओं का प्रवाह होता है और वही सब व्यक्ति की वाणी से अभिव्यक्त होते हैं। जैसे यदि आप किसी को गाली देते हैं तो उसके पूर्व आपके अंदर उस व्यक्ति/स्थिति के विरुद्ध क्रोध और घृणा के भाव जन्म लेते हैं जो आपको विचलित करते हैं, उद्वेलित करते ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 14

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 14 देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्‌। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥ 14।। देवता, ब्राह्मण, गुरु (यहाँ 'गुरु' शब्द से माता, पिता, आचार्य और वृद्ध एवं अपने से जो किसी प्रकार भी बड़े हों, उन सबको समझना चाहिए।) और ज्ञानीजनों का पूजन, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा- यह शरीर- सम्बन्धी तप कहा जाता है। आहार और यज्ञ-कर्म के पश्चात तीसरा सोपान तप का होता है । तप का अर्थ है पूरी चेष्टा के साथ अपनी समस्त एकाग्रता को एक जगह लक्षित कर अपनी समस्त ऊर्जा को एक विशेष उद्देश्य की प्राप्ति के लिए लगाना। इसमें विचलन के लिए कोई स्थान नहीं होता है। यह तप तीन स्तरों पर किया जाता है , शरीर, वाणी और मन के स्तर पर जिन्हें क्रमशः शारीरिक, वाचिक और मानसिक तप कहा जाता है और ये तीन तप में से प्रत्येक तप सात्विक, राजसिक और तामसिक प्रवृत्ति वाले होते हैं।          शरीर सम्बंधित तप में शरीर को सम्पूर्ण एकाग्रता के साथ उसकी समस्त चेष्टाओं का केंद्र एक रखा जाता है और  शरीर को , उसके सभी अंगों को एक तारतम्य में रखते हुए यज्ञ कर्मों में लगाया ज...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 13

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 13 विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम्‌। श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥ 13।। शास्त्रविधि से हीन, अन्नदान से रहित, बिना मन्त्रों के, बिना दक्षिणा के और बिना श्रद्धा के किए जाने वाले यज्ञ को तामस यज्ञ कहते हैं। और जब व्यक्ति बिना किसी नियम कायदे के मनमानी ढंग से काम करे, बिना कृतज्ञता के, अर्थात बिना अपने परिवेश के अनुगृहीत हुए-(किसी कार्य को करने में कई लोगों का सहयोग होता है किंतु उनके प्रति बिना अनुगृहीत हुए कर्म करना), सारे उपलब्धियों का श्रेय स्वयं ले ले, बिना कर्म के मर्म के समझे, बिना कर्म में श्रद्धा/विश्वास के कर्मों को करे तो इस कर्म को तामसिक कर्म कहा जाता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 12

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 12 अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्‌। इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्‌॥ 12।। परन्तु हे अर्जुन! केवल दम्भाचरण के लिए अथवा फल को भी दृष्टि में रखकर जो यज्ञ किया जाता है, उस यज्ञ को तू राजस जान। राजसी प्रवृत्ति के व्यक्ति अपने कर्म और उसके फल से मोह रखते हैं। कर्म और कर्मफल से मोह के द्वारा बंधे होने के कारण उनके कर्मों में लोभ, ईर्ष्या, क्रोध, हिंसा आदि का वास होता है और वे जब भी कर्म करते हैं कर्मफल को लक्षित कर ही करते हैं। इसीलिए उनके कर्मों में पाखण्ड अथवा दम्भ दिखता है और यही क्रम राजसी यज्ञ कहे जाते हैं। वे लोक कल्याण का भी कोई कार्य करेंगे तो दिखावेंगे कि वे काम तो लोक कल्याण का कर रहें हैं किन्तु वास्तव में उस कर्म के पीछे उनकी मंशा होती है कि उनका यश बढ़े और इससे कुछ भौतिक लाभ भी होता रहे जो स्पष्टतः पाखण्ड है क्योंकि उनका लोक कल्याणकारी कार्य तो दिखावे के लिए है और असल उद्देश्य तो यश कमाना है। इसी प्रकार ऐसे लोग चूँकि अपनी स्वाभाविक वृत्ति के अनुसार कोई लोककल्याणकारी कार्य तो कर नहीं रहे हैं सो ये अहंकार पूर्वक प्रचार करते और करवाते...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 11

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 11 अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते। यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥ 11।। जो शास्त्र विधि से नियत, यज्ञ करना ही कर्तव्य है- इस प्रकार मन को समाधान करके, फल न चाहने वाले पुरुषों द्वारा किया जाता है, वह सात्त्विक है। व्यक्ति के द्वारा परम् अवस्था को प्राप्त करने के लिए जिन उपायों को करना चाहिए उसके अनुसार व्यक्ति को क्रमशः तामसिक से राजसी और राजसी से सात्विक प्रवृत्तियों की ओर बढ़ना चाहिए। इस व्यक्ति को स्वयं की वर्तमान अवस्था का आकलन  करना आवश्यक है और तदुपरांत उसे क्रमशः आगे बढ़ना चाहिए। क्रम में पहला सोपान आहार का है जिसे पहचान कर और उसमें आवश्यक सुधार कर व्यक्ति क्रमशः आगे बढ़ सकता है।      दूसरा सोपान यज्ञ का है। यज्ञ का अर्थ है कि हम श्रद्धा भाव से जो कर्म करते हैं। यज्ञ भी सात्विक, राजसी और तामसिक होते हैं।        जो व्यक्ति सात्विक प्रवृत्ति का होता है वह जब कर्म करता है तो उसमें कर्मयोग का भाव होता है यानी वह अपनी स्थिति के अनुसार , अपने स्वधर्म के अनुसार अपने कर्म करता है। वह किसी लोभ या किसी ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 10

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 10 यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्‌। उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्‌॥ 10।। जो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है, वह भोजन तामस पुरुष को प्रिय होता है। तामसी प्रवृत्ति के लोग ज्ञान रहित, अलसी और क्रोध, मोह, निराशा युक्त होते हैं। ऐसे व्यक्ति उन्हीं चीजों को ग्रहण करना चाहते हैं जो उनके इन तामसिक वृत्तियों को बढ़ाता हो। यह बात उनके लिए भोज्य पदार्थों के साथ साथ अन्य सभी ग्राह्य चीजों पर लागू होती है यथा, बोली, विचार, गंध आदि।      सो तामसी वृत्ति के व्यक्ति  वैसा भोजन पसन्द करते हैं जो अधपका, रसरहित, दुर्गन्धयुक्त, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो अपवित्र भी है। इस प्रकार का भोजन आलस, प्रमाद, रुग्णता, को जन्म देने वाला होता है।        आहार स्वभाव के अनुसार होता है, जैसी जिसकी प्रवृत्ति होती है उसी के अनुसार उसका आहार भी होता है। यँहा आहार में भोज्य/पेय पदार्थों के साथ साथ वे सभी चीजें जैसे आचार, व्यवहार, विचार, सोच, विवेक आदि से जुड़ी सभी चीजें सम्मिलित होती हैं जिनको...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 9

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 9 कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।  आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥ 9।। कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले आहार अर्थात्‌ भोजन करने के पदार्थ राजस पुरुष को प्रिय होते हैं। राजसी प्रवृत्ति के लोग अतिमहत्वाकांक्षी होते हैं और अपनी महत्वाकांक्षा से मोहवश बंधे होते हैं सो इन  महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए अत्यंत चलायमान होते हैं, हर अच्छा बुरा कर्म करने के लिए उद्द्यत होते हैं और क्रोध और लोभ युक्त होते हैं और इस हेतु हिंसा का भी मार्ग पकड़ने से नहीं हिचकते हैं। ऐसे लोग अपने स्वभाव के अनुरूप ऐसा आहार पसन्द करते हैं जो  कड़वे, खट्टे, लवणयुक्त, बहुत गरम, तीखे, रूखे, दाहकारक और दुःख, चिन्ता तथा रोगों को उत्पन्न करने वाले होते हैं। और मात्र भोज्य पदार्थों में ही उनकी ऐसी रुचि नहीं होती है बल्कि हर  चीज जो वे अपने शरीर और मन के लिए ग्रहण करते हैं इसी प्रकार से कामोत्तेजक और बेचैनी देने वाले होते हैं। 

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 8

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 8 आयुः सत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः। रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः॥ 8।। आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले, रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले (जिस भोजन का सार शरीर में बहुत काल तक रहता है, उसको स्थिर रहने वाला कहते हैं।) तथा स्वभाव से ही मन को प्रिय- ऐसे आहार अर्थात्‌ भोजन करने के पदार्थ सात्त्विक पुरुष को प्रिय होते हैं।  साधना से सात्विक गुणों की वृद्धि होती है और इस हेतु जिन चार सोपानों का जिक्र किया जाता है , उनमें पहला आहार है। आहार का तातपर्य है जो हम मुख से भोजन ग्रहण करते हैं। व्यापक सन्दर्भ में आहार के  अर्थ में  वो सब कुछ आ जाते हैं जो हम ग्रहण करते हैं, फिर चाहे वह भोजन हो, श्रवण हो, दृश्य हो, विचार हो या कुछ और।       जो व्यक्ति सात्विक प्रवृत्ति के होते हैं वे भोजन में वैसे खाद्य पदार्थ का सेवन करते हैं जो रसयुक्त, स्वादयुक्त होते हैं, जो स्वास्थवर्धक होते हैं, आयु औए बल दायक होते हैं और जिनको खा कर तृप्ति प्राप्त होती है।     इसी प्रकार सात्विक प्र...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 7

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 7 आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः। यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु॥ 7।। भोजन भी सबको अपनी-अपनी प्रकृति के अनुसार तीन प्रकार का प्रिय होता है। और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन-तीन प्रकार के होते हैं। उनके इस पृथक्‌-पृथक्‌ भेद को तू मुझ से सुन। साधना के क्रमशः चार सोपान होते हैं-     1.आहार     2.यज्ञ     3.तप     4.दान और ये चारों व्यक्ति के स्वभाव के अनुसार तीन तीन प्रकार के होते हैं यानी सात्विक, राजसी और तामसिक।       अर्थात व्यक्ति की तीन प्रकार की प्रवृत्तियों के अनुसार ये चारों सोपान होते हैं। इस प्रकार हम व्यक्ति के आहार, यज्ञ, तप और दान से समझ सकते हैं कि व्यक्ति किस प्रकार के साधना वाला है। इन चारों सोपानों को क्रमशः सात्विक प्रवृत्ति का कर हम साधना के चरम पर पहुँच सकते हैं।       दरअसल ये चार सोपान वे मार्ग हैं जिनके माध्यम से हम अपने अन्तःकरण की शुद्धि कर उत्तम से उत्तम हो सकते हैं। आहार, यज्ञ, तप और दान के मार्ग से चलकर व्यक्ति अपने परम लक्ष्य को हासिल कर ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 6

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 6 कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः। मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्‌यासुरनिश्चयान्‌॥ 6।। जो शरीर रूप से स्थित भूत समुदाय को और अन्तःकरण में स्थित मुझ परमात्मा को भी कृश करने वाले हैं उन अज्ञानियों को तू आसुर स्वभाव वाले जान। जब व्यक्ति के अंदर तामसी गुणों की प्रचुरता होती है तब उसका स्वभाव आसुरी प्रवृत्ति वाला होता है। ऐसा व्यक्ति हिंसा, असत्य, अत्याचार, अनाचार, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या आदि से युक्त स्वभाव वाला होता है और अपने इस स्वभाव से दूसरे लोगों को पीड़ा देता है।      लेकिन यँहा ध्यान देने वाली बात यह है कि इस प्रकार के स्वभाव वाला व्यक्ति भले दूसरों को नुकसान पहुँचाने की नीयत से कर्म करता है, लेकिन वह पहले अपना नुकसान करता है और तब दूसरों का नुकसान कर पाता है। बिना स्वयं को नुकसान दिए, बिना स्वयं को पीड़ा दिए कोई भी व्यक्ति दूसरों का नुकसान नहीं कर सकता है, दूसरों को पीड़ा नहीं दे सकता है। जब भी आसुरी स्वभाव वाला व्यक्ति किसी दुसरे की हानि करना चाहता है तो इसकी अनिवार्यता है कि वह पहले अपनी हानि कर ले।  मान लें कि एक व्यक्ति  कि...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 5

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 5 अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः। दम्भाहङ्‍कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥ 5।। जो मनुष्य शास्त्र विधि से रहित केवल मनःकल्पित घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त एवं कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त हैं।         व्यक्ति की श्रद्धा उसके कर्म से परिलक्षित होती है। जिसकी जैसी श्रद्धा होती है उसका कर्म भी वैसा ही होता है।        श्रद्धा के अनुरूप ही मन में विचारों का जन्म होता है और वे विचार जो मन में जन्म लेते हैं कर्मों में रूपांतरित होकर सामने आते हैं।        जिस व्यक्ति की श्रद्धा राजसी -तामसिक प्रवृत्ति वाली होती है उसके मन में दम्भ, अहंकार, इक्षाएँ और लगाव के भाव तीव्र होते हैं। इनके कारण उनमें घोर आसक्ति के भाव होते हैं और इनके प्रभाव में ऐसे व्यक्ति बिना सही गलत की चिंता किये , बिना नियम कायदों की फिक्र किये मात्र अपनी इक्षा की पूर्ति पर केंद्रित रहते हैं और इसके लिए ही अपनी पूरी एकाग्रता से कर्म करते हैं। ऐसे लोगों के मन में मात्र अपनी कामना पूर्ति ही प्रबल होती...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 3

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 3  सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत। श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥ 3।। हे भारत! सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। यह पुरुष श्रद्धामय है, इसलिए जो पुरुष जैसी श्रद्धावाला है, वह स्वयं भी वही है।       प्रतेक व्यक्ति की एक आस्था होती है यानी प्रतेक व्यक्ति का अपना कुछ विश्वास होता ही है जो उसके स्वभाव के अनुसार ही होता है। यँहा आस्था अथवा विश्वास का सम्बंध किसी धर्म, पन्थ या सम्प्रदाय से नहीं है बल्कि उसके दृष्टिकोण और उसकी मान्यताओं से इसका सम्बन्ध है। ऐसा नहीं है कि हर बात के लिए हर व्यक्ति प्रमाण ही खोजे। कई ऐसी चीजें होती हैं जो व्यक्ति  अपने स्वभावगत आस्था के कारण उसे सही या गलत मान लेता है। यह स्वभावगत आस्था उसकी मूल प्रवृत्ति के अनुरूप होती है जो स्वयं तीन गुणों के परस्पर अनुपात पर निर्भर करती है। श्रद्धा और स्वभाव  एक दूसरे पर निर्भर करते हैं और दोनों ही एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। और यही दोनों मिलकर व्यक्ति के व्यवहार को निरूपित भी करते हैं। फिर चाहे धर्म के मार्ग का अनुस...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 2

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 2 श्रीभगवानुवाच  त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा। सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु॥ 2।। श्री भगवान्‌ बोले- मनुष्यों की वह शास्त्रीय संस्कारों से रहित केवल स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा (अनन्त जन्मों में किए हुए कर्मों के सञ्चित संस्कार से उत्पन्न हुई श्रद्धा ''स्वभावजा'' श्रद्धा कही जाती है।) सात्त्विकी और राजसी तथा तामसी- ऐसे तीनों प्रकार की ही होती है। उसको तू मुझसे सुन।      व्यक्ति के कर्म दो कारकों से निर्धारित होते हैं, एक है उसका स्वभाव और दूसरा है उसका शास्त्रीय अध्ययनअर्थात उसके अपने प्रयास से सीखे समझे ज्ञान से।    जब व्यक्ति सिर्फ स्वभाव से संचालित होता है, अर्थात जब वह प्रयास कर शास्त्रों का अध्ययन कर ज्ञान नहीं अर्जित कर लेता है तब उसके कर्म उसकी स्वाभावगत आस्था (अर्थात श्रद्धा) से निर्धारित होते हैं। इसका तातपर्य है कि उसके स्वभाव के अनुसार जो उसके दृष्टिकोण को निर्धारित करता है वही उसके कर्मों को निर्धारित भी करता है।        अब प्रश्न उठता है कि यह स्वभावगत श्रद्धा या आस्था...