श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 4 यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः। प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये जयन्ते तामसा जनाः॥ 4।। सात्त्विक पुरुष देवों को पूजते हैं, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों को तथा अन्य जो तामस मनुष्य हैं, वे प्रेत और भूतगणों को पूजते हैं। व्यक्तियों की श्रद्धा तीन प्रकार की होती है और उनके कर्म भी उन्हीं के अनुसार निर्धारित होते हैं। अपने आचरण, अपने व्यवहार से हम जान सकते हैं कि हम वस्तुतः किस श्रद्धा/आस्था के व्यक्ति हैं। जब व्यक्ति के अंदर दैवी गुण प्रबल होते हैं तो उस तरह का व्यक्ति दया, क्षमा, सत्य, अहिंसा आदि से सज्जित आचरण करता है। ऐसा व्यक्ति स्वयं में तो इन प्रकार के गुणों वाला तो होता ही है, साथ ही अपने व्यवहार में भी इन्हीं प्रकार के गुणों वाले व्यक्तियों को सम्मान भी देता है, महत्व भी देता है यानी उसका व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक व्यवहार इन्हीं दैवी गुणों से संचालित होते हैं। ऐसा व्यक्ति सात्विक श्रद्धा वाला होता है। ऐसा व्यक्ति यदि शास्त्रों का अध्ययन नहीं भी किया होता है तब भी वह उत्तम श्रेणी का होता है और वह सन्मार्ग पर चलते हुए सर्वोच...