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Showing posts from October, 2021

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 12 एवं 13

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 12 एवं 13 सर्वद्वाराणि संयम्य मनो हृदि निरुध्य च। मूर्ध्न्याधायात्मनः प्राणमास्थितो योगधारणाम्‌॥ ।।12।। ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्‌। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्‌॥ ।।13।। सब इंद्रियों के द्वारों को रोककर तथा मन को हृद्देश में स्थिर करके, फिर उस जीते हुए मन द्वारा प्राण को मस्तक में स्थापित करके, परमात्म संबंधी योगधारणा में स्थित होकर जो पुरुष 'ॐ' इस एक अक्षर रूप ब्रह्म को उच्चारण करता हुआ और उसके अर्थस्वरूप मुझ निर्गुण ब्रह्म का चिंतन करता हुआ शरीर को त्यागकर जाता है, वह पुरुष परम गति को प्राप्त होता है। ।। 12 एवम 13।।   ब्रह्म यानी ईश्वरत्व के परम पद को प्राप्त करने के कर्मयोग और ज्ञानयोग-सन्यास योग मार्ग के अतिरिक्त भक्तियोग का भी मार्ग है। भक्ति वो भावना है जिसमें व्यक्ति अपने प्रेमी में विलीन हो जाने के लिए ततपर होता है। उसमें अपने प्रेमी , अपने आराध्य के लिए इतनी श्रद्धा होती है कि वह उससे विलग नहीं होना चाहता है। तो फिर इसे कैसे सम्भव किया जाता है?      इसके लिए निम्न प्रकार से उपाय करने होते हैं 1.सबस...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 11

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 11 यदक्षरं वेदविदो वदन्ति विशन्ति यद्यतयो वीतरागाः। यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदं संग्रहेण प्रवक्ष्ये॥ ।।11।। वेद के जानने वाले विद्वान जिस सच्चिदानन्दघनरूप परम पद को अविनाश कहते हैं, आसक्ति रहित यत्नशील संन्यासी महात्माजन, जिसमें प्रवेश करते हैं और जिस परम पद को चाहने वाले ब्रह्मचारी लोग ब्रह्मचर्य का आचरण करते हैं, उस परम पद को मैं तेरे लिए संक्षेप में कहूँगा। ।।11।। व्यक्ति के जीवन के लक्ष्य क्या होते हैं? क्या बहुत पैसा, बहुत बड़ा पद, बहुत अधिक सत्ता, बहुत ऊँचे स्तर की कोई अन्य उपलब्धि? क्या इतने भर से आपको वो चीज हासिल हो जाती है जिससे आपको अपने होने का शकुन मिलता हो? निश्चित ही नहीं क्योंकि इन सबों को  हासिल कर लेने के बाद भी व्यक्ति अपने अधूरेपन के साथ ही जीता है। दरअसल आपकी भौतिक उपलब्धि चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो जब तक आप खुद को नहीं खोज लेते आपके परिश्रम आपको शांति नहीं दे पाते हैं। इसी चीज को यानी अपनी ही आत्मा को, अपने ही सेल्फ को पाने को ईश्वर की प्राप्ति भी कहते हैं क्योंकि आप ही वास्तव में  ब्रह्म हैं जो आपको नहीं ज्ञा...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 10

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 10 प्रयाण काले मनसाचलेन भक्त्या युक्तो योगबलेन चैव। भ्रुवोर्मध्ये प्राणमावेश्य सम्यक्‌- स तं परं पुरुषमुपैति दिव्यम्‌। ।।10।। वह भक्ति युक्त पुरुष अन्तकाल में भी योगबल से भृकुटी के मध्य में प्राण को अच्छी प्रकार स्थापित करके, फिर निश्चल मन से स्मरण करता हुआ उस दिव्य रूप परम पुरुष परमात्मा को ही प्राप्त होता है। ।।10।। अर्जुन का प्रश्न है कि मृत्यु के समय हम परमात्मा को कैसे प्राप्त कर पाते हैं। दरअसल परमात्मा की प्राप्ति किसी बाहरी तत्व को प्राप्त करने की कोई क्रिया नहीं है जिसे हम प्राप्त करते हैं। परमात्मा की प्राप्ति का अर्थ है अपने स्व/सेल्फ/आत्मा को प्राप्त करना जिसे प्राप्त कर हम स्वयं के वास्तविकता को समझ सकते हैं। एक घड़ा है। उस धड़ा के अंदर कुछ स्थान है जिसे घड़े का बाहरी आवरण घेरे रहता है। घड़े के अंदर का स्थान सीमित होता है जो बाहरी स्पेस से घड़े के शरीर से विलग होकर अपना एक अलग अस्तित्व बनाता है। किंतु घड़ा जैसे ही फूटता है उसके अंदर का स्पेस बाहरी स्पेस से मिलकर एक हो जाता है।अपने सेल्फ पर  इसी बाहरी आवरण का हटना ही मृत्यु है और अपने सेल्फ को...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 9

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 9 कविं पुराणमनुशासितार-मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः। सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप-मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्‌॥ ।।9।। जो पुरुष सर्वज्ञ, अनादि, सबके नियंता (अंतर्यामी रूप से सब प्राणियों के शुभ और अशुभ कर्म के अनुसार शासन करने वाला) सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म, सबके धारण-पोषण करने वाले अचिन्त्य-स्वरूप, सूर्य के सदृश नित्य चेतन प्रकाश रूप और अविद्या से अति परे, शुद्ध सच्चिदानन्दघन परमेश्वर का स्मरण करता है। ।।9।। ईश्वर का निरन्तर चिंतन, मनन कर ईश्वर को प्राप्त तो किया जा सकता है किंतु प्रश्न उठता है कि हम ईश्वर को किस रूप में स्मरण करें, हम सभी कर्म करते हुए भी ईश्वर को किस तरह अपने स्मरण में बनाये रखें कि यह अनुभूति हमारे स्व का अविभाज्य अंश बन जाये।       इसके लिए आवश्यक है कि हम ईश्वर को उसकी निम्न विशेषताओं से स्मरण में रखें    1. ईश्वर अपने स्वरूप में सर्वज्ञ यानी सबकुछ जानने वाला है। 2. ईश्वर चिरन्तर, पुराना किंतु नया है यानी ईश्वर सब कुछ के पहले भी था और सब कुछ के बाद भी रहेगा। 3.ईश्वर सब कुछ का नियंत्रक, सब कुछ को नियंत्रण करने वाला, सभ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 8

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 8 अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना। परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्‌॥ ।।8।। हे पार्थ! यह नियम है कि परमेश्वर के ध्यान के अभ्यास रूप योग से युक्त, दूसरी ओर न जाने वाले चित्त से निरंतर चिंतन करता हुआ मनुष्य परम प्रकाश रूप दिव्य पुरुष को अर्थात परमेश्वर को ही प्राप्त होता है। ।।8।। जब हम ईश्वर को निरंतर अपने मन बुद्धि में रखकर कर्म करते हैं तो निश्चित ही हमें ईश्वर की प्राप्ति होती है यानी हम भी उस पद तक पहुँच पाते हैं। किंतु व्यवहारिक बात ये है कि सिर्फ इस बात का ज्ञान भर हो जाने से ऐसा होता नहीं है। ऐसा होने के लिए ये आवश्यक है कि हम निरन्तर इसका अभ्यास करें। निरंतर अभ्यास से ही हम इस सत्य को आत्मसात कर पाते हैं। इस अभ्यास से ईश्वर को हम उसी तरह चेतन और अचेतन दोनों स्थिति में अपना बना पाते हैं जैसे चेतन और अचेतन दोनों ही स्थिति में अपनी स्थिति यानी अपना नाम, अपना लिंग, अपने परिवार का ज्ञान बना रहता है। हमारे जेहन में ईश्वर की इसी प्रकार की उपस्थिति बारम्बार के अभ्यास से आती है। तब हमें ईश्वर का स्मरण करने की आवश्यकता नहीं होती है बल्कि वह तो ह...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लिक 7

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लिक 7 तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युद्ध च। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम्‌।। 7।। इसलिए हे अर्जुन! तू सब समय में निरंतर मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। इस प्रकार मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धि से युक्त होकर तू निःसंदेह मुझको ही प्राप्त होगा। ।।7।।          बिना कर्मयोग के आचरण के व्यक्ति का कल्याण होना सम्भव नहीं होता है। वही मार्ग है जिसपर चलकर व्यक्ति जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर पाता है। कर्मयोग के आचरण में व्यक्ति को कर्मफल से मोह त्याग कर एक उच्च आदर्श के प्रति अपने कर्मों को समर्पित कर अपनी प्रकृति के अनुरूप यानी अपनी क्षमता के अनुरूप कर्म करना होता है। अर्थात व्यक्ति के समस्त कर्म उस आदर्श यानी परम् पुरुष को समर्पित होते हैं। इस तथ्य को हम ऐसे भी समझ सकते हैं कि हम जब अपनी बुद्धि और विवेक को परम पुरुष के प्रति निरन्तर श्रद्धावान रखकर उसे स्मरण में रखकर ही अपने कर्म करें। ऐसी स्थिति में हम न तो कोई गलत कर्म कर सकते हैं क्योंकि हमारे स्मरण में निरन्तर परमात्मा का ध्यान होता है और हमारे कर्म भी उन्हीं परम् को समर्पित...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 6

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 6 यं यं वापि स्मरन्भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम्‌। तं तमेवैति कौन्तेय सदा तद्भावभावितः॥ ।।6।। हे कुन्ती पुत्र अर्जुन! यह मनुष्य अंतकाल में जिस-जिस भी भाव को स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करता है, उस-उसको ही प्राप्त होता है क्योंकि वह सदा उसी भाव से भावित रहा है। ।।6।।             ध्यान देने योग्य तथ्य ये है कि व्यक्ति अपने जीवन के अंत समय में जिसका स्मरण कर शरीर त्यागता है उसी भाव को प्राप्त करता है। यँहा यह ध्यान देना है कि क्या हम जीवन भर जिस चीज के आदि नहीं रहें हैं उसको जीवन के अंत समय में हठात स्मरण में ला सकते हैं अथवा क्या उस समय उसका अभ्यास कर सकते हैं। उत्तर है , नहीं। यह सम्भव नहीं है कि हम जीवन भर गलत रास्ते पर चले हों और अचानक मृत्यु के समय हम सही मार्ग पकड़ लें। वस्तुतः अंत में सही मार्ग तभी मिलता है जब प्रारम्भ से ही मार्ग सही हो। इस प्रकार शिक्षा ये है कि हमें जीवन के शेष दिनों में भी सही मार्ग पर चलना चाहिए ताकि जब जीवन का अंत समय आये तो भी हम मार्ग भटके नहीं और हमारी दिशा और दशा दोनों सही रहे। यही तथ्य जीवन के सभी आया...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 5

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 5 अंतकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्‌। यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः॥ ।।5।। जो पुरुष अंतकाल में भी मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीर को त्याग कर जाता है, वह मेरे साक्षात स्वरूप को प्राप्त होता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है। ।।5।। ईश्वर को समझने और समझ कर उसे प्राप्त करने के मार्ग को सुझाते हुए श्रीकृष्ण ने बतलाया है कि ईश्वर के छह रूपों को आत्मसात करें-एक ईश्वर ही ब्रह्म है, आत्मा है, आपकी सृजनात्मकता है, वही पँचमहाभूतो से निर्मित संसार है, परम् पुरुष है और वही आपका भी शरीर सहित रूप भी है। इस तथ्य को समझ कर जो व्यक्ति हमेशा इन छह स्वरूपों के ध्यान में ,उनके ही स्वरूप में ध्यानमग्न होकर अपनी मृत्यु तक बना रहता है वह ईश्वर को ही प्राप्त होता है। जो जीवनकाल में इन स्वरूपों के मनन चिंतन में लीन हो वही मृत्यु के समय भी उनमें रमा हो सकता है। ऐसा नहीं होता कि जीवन भर कुकर्म करते रहे और अंत समय में ईश्वर चिंतन में लग गए। ऐसा होना सम्भव नहीं होता है क्योंकि व्यक्ति अपने स्वभाव से बंधा हुआ होता है। अंत समय में ईश्वर प्राप्ति का एक ही विधान है कि आप जी...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 4

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 4 अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌। अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ ।।4।। उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष (जिसको शास्त्रों में सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भ, प्रजापति, ब्रह्मा इत्यादि नामों से कहा गया है) अधिदैव है और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! इस शरीर में मैं वासुदेव ही अन्तर्यामी रूप से अधियज्ञ। ।।4।।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 3 , 4

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 3 एवं 4 श्रीभगवानुवाच अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते। भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः॥ ।।3।। श्री भगवान ने कहा- परम अक्षर 'ब्रह्म' है, अपना स्वरूप अर्थात जीवात्मा 'अध्यात्म' नाम से कहा जाता है तथा भूतों के भाव को उत्पन्न करने वाला जो त्याग है, वह 'कर्म' नाम से कहा गया है। ।।3।। श्लोक 4 अधिभूतं क्षरो भावः पुरुषश्चाधिदैवतम्‌। अधियज्ञोऽहमेवात्र देहे देहभृतां वर॥ ।।4।। उत्पत्ति-विनाश धर्म वाले सब पदार्थ अधिभूत हैं, हिरण्यमय पुरुष (जिसको शास्त्रों में सूत्रात्मा, हिरण्यगर्भ, प्रजापति, ब्रह्मा इत्यादि नामों से कहा गया है) अधिदैव है और हे देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! इस शरीर में मैं वासुदेव ही अन्तर्यामी रूप से अधियज्ञ। ।।4।।      अर्जुन के माध्यम से हमारी शंकाओं को दूर करते हुए श्रीकृष्ण ने समझाया है कि ब्रह्म ---ब्रह्म वो है जो सबसे बड़ा है , जिसमें कभी भी न तो कोई परिवर्तन होता है, अथवा न कभी जिसका क्षय होता है। अर्थात परम् अविनाशी ही ब्रह्म है। यही वो परम् चैतन्य है जो सभी शरीर, मन और बुद्धि यानी सभी मैटर को उनकी चेत...

4.VISHNUSAHSTRANAM SHLOKA 4

4.VISHNUSAHSTRANAM SHLOKA 4 25.Sarvah      If we point to God in the name of  SARVAH ,  we are indicating that attribute of God, according to which God is the reason for all real and unreal and for their  disollution or extinction. He is a knower of all and knows forever. This means that there is nothing out of God, all is in his information, all is due to the same and everything is always in his knowledge. 26. Sharah            Every physical form also has a definite end.  God also annihilates that at that fixed time of destruction i.e. at the time of catastrophe.  That is, along with creation, God also has the right to destroy and annihilate the created material element. 27.Shiva  Sattvaguna, Rajoguna and Tamonguna, the combination of these three gunas  determines all the actions and everything is governed by the proportion of the presence of these three gunas.  In this way, due to these, imbalances a...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 1 & 2

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 8 श्लोक 1 & 2 अर्जुन उवाच किं तद्ब्रह्म किमध्यात्मं किं पुरुषोत्तम। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥ ।।1।। अधिभूतं च किं प्रोक्तमधिदैवं किमुच्यते॥ प्रयाणकाले च कथं ज्ञेयोऽसि नियतात्मभिः॥ ।।2।। अर्जुन ने कहा- हे पुरुषोत्तम! वह ब्रह्म क्या है? अध्यात्म क्या है? कर्म क्या है? अधिभूत नाम से क्या कहा गया है और अधिदैव किसको कहते हैं। ।।1।। हे मधुसूदन! यहाँ अधियज्ञ कौन है? और वह इस शरीर में कैसे है? तथा युक्त चित्त वाले पुरुषों द्वारा अंत समय में आप किस प्रकार जानने में आते हैं। ।।2।। श्रीकृष्ण ईश्वर को समझाते हुए कुछ शब्दों का प्रयोग करते हैं जिनके अर्थ अर्जुन को स्पष्ट नहीं होते हैं। सो अर्जुन इन शब्दों को समझाने का आग्रह श्री कृष्ण से अनुरोध करता है। ये शब्द हैं-ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म,अधिभूत, अधिदैव, एवं अधियज्ञ।     इसके अतिरिक्त अर्जुन ये भी समझना चाहता है कि जीवन के अंत समय में  ईश्वर को कैसे समझ पाता है अर्थात ये कैसे सम्भव है कि मृत्यु के समय तक भी ईश्वर को समझ लिया जा सकता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 28, 29, 30

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 28, 29, 30 येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्‌। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥ .।।28।। परन्तु निष्काम भाव से श्रेष्ठ कर्मों का आचरण करने वाले जिन पुरुषों का पाप नष्ट हो गया है, वे राग-द्वेषजनित द्वन्द्व रूप मोह से मुक्त दृढ़निश्चयी भक्त मुझको सब प्रकार से भजते हैं। ।।28।। जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये। ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम्‌॥ ।।29।। जो मेरे शरण होकर जरा और मरण से छूटने के लिए यत्न करते हैं, वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को, सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं। ।।29।। साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः। प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥ ।।30।। जो पुरुष अधिभूत और अधिदैव सहित तथा अधियज्ञ सहित (सबका आत्मरूप) मुझे अन्तकाल में भी जानते हैं, वे युक्तचित्तवाले पुरुष मुझे जानते हैं अर्थात प्राप्त हो जाते हैं। ।।30।। ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानविज्ञानयोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ।             ईश्वरीय अ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 27

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 27 इच्छाद्वेषसमुत्थेन द्वन्द्वमोहेन भारत। सर्वभूतानि सम्मोहं सर्गे यान्ति परन्तप॥ ।।27।। हे भरतवंशी अर्जुन! संसार में इच्छा और द्वेष से उत्पन्न सुख-दुःखादि द्वंद्वरूप मोह से सम्पूर्ण प्राणी अत्यन्त अज्ञता को प्राप्त हो रहे हैं। ।।27।। लोगों के साथ समस्या यह होती है कि वे इक्षा और द्वेष यानी राग -द्वेष, पसन्द-नापसन्द के द्वंद्व में जीवन भर फँसे रहते हैं। वे इक्षा, राग और पसन्द की पूर्ति करने में लगे रहते हैं और इसी क्रम में अनिक्षित से, अर्थात जिससे उनको दुराव होता है, जिसके प्रति उनकी इन्द्रियाँ नापसन्दगी रखती हैं उनसे द्वेष यानी घृणा करने अपना सारा जीवन व्यतीत कर देता है। राग-द्वेष के द्वंदात्मक युग्म से निकले लाभ-हानि, मोह-ईर्ष्या, प्रेम-घृणा, लोभ आदि को पूरा करते करते लोगों का जीवन व्यतीत हो जाता है । उनको इन सब में उलझे उलझे समय ही नहीं मिलता कि वे खुद के आत्मावलोकन और आत्मसाक्षात्कार की कोशिश भी करें। नतीजा ये होता है कि उनमें वह श्रद्धा और समर्पण जागृत ही नहीं हो पाता जिससे वे ईश्वरत्व का अनुभव करें।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 26

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 26 वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन। भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन॥ ।।26।। हे अर्जुन! पूर्व में व्यतीत हुए और वर्तमान में स्थित तथा आगे होने वाले सब भूतों को मैं जानता हूँ, परन्तु मुझको कोई भी श्रद्धा-भक्तिरहित पुरुष नहीं जानता। ।।26।।     ईश्वर तो सब कुछ जानता है, फिर चाहे वह अतीत हो, वर्तमान हो या भविष्य लेकिन बिना श्रद्धा और भक्ति के व्यक्ति ईश्वर को नहीं जान पाता है। जब तक बिना शर्त समर्पण न हो, जब तक बिना किसी कामना के समर्पण न हो, जब तक व्यक्ति के मन में अटूट भरोसा न हो तब तक उस व्यक्ति के लिए ईश्वर को जान समझ पाना सम्भव नहीं होता है। श्रद्धा है तभी ज्ञान है, बिना श्रद्धा के यदि हम आप कुछ जानते हैं तो फिर जो ज्ञान अल्पजीवी होता है, जल्द ही हम विस्मृत भी हो जाते हैं क्योंकि बिना श्रद्धा के हम ज्ञान के पथ का अनुसरण नहीं कर पाते और जब तक ईश्वरीय पथ का हम अनुसरण नहीं करते तब तक मात्र पढ़, सुनकर हम उस ज्ञान को नहीं पा सकते हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 25

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 25 नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः। मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम्‌॥ ।।25।। अपनी योगमाया से छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिए यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित अविनाशी परमेश्वर को नहीं जानता अर्थात मुझको जन्मने-मरने वाला समझता है। ।।25।। अब प्रश्न उठता है कि अधिकांश लोग ईश्वर की सत्यता को क्यों नहीं जान पाते हैं। दरअसल हमारे सत्य की समझ दृश्य तक ही सीमित होती है, जो दिखता है हमारी दृष्टि उतनी ही दूर तक देख पाती है। लेकिन जब ज्ञान के नेत्र खुलते हैं तो दृश्य के पार के सत्य भी दृष्टिगोचर होने लगते हैं। जब तक हम दृष्टि के पार नहीं देख पाते हैं हमारे लिए ईश्वरीय अनुभूति उनकी योगमाया से छुपी होती है। अधिकांश व्यक्तियों की नजर में पहचान की परिभाषा शरीर, मन, बुद्धि, दिख सकने वाले गुण, सामाजिक सम्बन्ध, सांसारिक उपलब्धियों आदि तक ही सीमित होते हैं और हम पहचान के इन्हीं कारकों में उलझे हुए होते हैं। तमोगुण और रजोगुण से युक्त हमारी दृष्टि में वह ईश्वर आता ही नहीं जो हमारी दृष्टि से ओझल हमारे आपके सबके अंदर विद्यमान होता है। हम उसे तृतीय पुरुष के...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 24

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 24 अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः। परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम्‌॥ ।।24।। बुद्धिहीन पुरुष मेरे अनुत्तम अविनाशी परम भाव को न जानते हुए मन-इन्द्रियों से परे मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मा को मनुष्य की भाँति जन्मकर व्यक्ति भाव को प्राप्त हुआ मानते हैं। ।।24।। जब मन इक्षाओं की पूर्ति और कामनाओं को साधने में ही व्यस्त रह जाता है तो दृष्टि का विस्तार नहीं हो पाता है । बुद्धि तो इन इक्षाओं और कामनाओं की पूर्ति और पूर्ति होने और नहीं होने के परिणामों में उलझी होती है, व्यक्ति उसके आगे नहीं देख पाता है। मजे की बात  है कि जब सब कुछ मनोकुल चलते रहता है तब तो वे देवता भी स्मरण में नहीं आते हैं जिनकी शरण में व्यक्ति अपने कष्ट के समय भागा हुआ जाता है। इस अत्यंत संकुचित दृष्टि वाले व्यक्ति से ईश्वरत्व की समझ रखने की अपेक्षा करना मूर्खता है।      ईश्वरत्व का वास तो हर व्यक्ति तक में है किंतु संकुचित कामनाओं में उलझा व्यक्ति अपने अंदर झाँक कँहा पाता है।  उसे फुर्सत भी नहीं मिलती कि वह कामनाओं के पार के जीवन को और उसके महत्व को समझ पाए...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 23

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 23 अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्‌। देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि॥ ।।23।। परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान है तथा वे देवताओं को पूजने वाले देवताओं को प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त चाहे जैसे ही भजें, अन्त में वे मुझको ही प्राप्त होते हैं। ।।23।। हर इक्षा की एक निश्चिय उम्र होती है। इक्षा पूर्ति हेतु हम उस इक्षा का प्रतिनिधित्व करने वाली शक्तियों की आराधना करते हैं , उनके प्रति समर्पित होते हैं यानी उस इक्षा के प्रतिनिधि देवी या देवता के प्रति श्रद्धा रखकर उस इक्षा की पूर्ति करते हैं। लेकिन इस प्रक्रिया के कुछ दोष भी हैं। पहला दोष तो यही है कि हर इक्षा पूर्ण होने के बाद समाप्त हो जाती है। दूसरा दोष है कि एक इक्षा  दूसरी इक्षा को जन्म देती है जिसके परिणाम स्वरूप हम इन इक्षाओं के जाल में फंस कर रह जाते हैं। सो ऐसे लोग अपनी श्रद्धा के बावजूद परम् लक्ष्य के प्रति समर्पित नहीं हो पाते हैं। लेकिन जो व्यक्ति इन छोटी छोटी इक्षाओं से ऊपर उठ कर अपने सेल्फ को ढूँढने और पाने की इक्षा करता है यानी खुद को परम के साथ युक्त कर लेने की इक...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 22

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 22 स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते। लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्‌॥ ।।22।। वह पुरुष उस श्रद्धा से युक्त होकर उस देवता का पूजन करता है और उस देवता से मेरे द्वारा ही विधान किए हुए उन इच्छित भोगों को निःसंदेह प्राप्त करता है। ।।22।। श्रद्धा ही वह बीज है जिससे कामनाओं के फल फलित होते हैं। जब हम श्रद्धा व्यक्त करते हैं, जब हम श्रद्धा रखते हैं तो श्रद्धा का परिणाम भी हमें मिलता है।     यदि हम कुछ करें और बेमन से करें तो होने वाले काम भी बिगड़ जाते हैं। यह मात्र इसलिए क्योंकि अपने काम और काम करने के प्रयास पर हमारी श्रद्धा या तो नहीं होती है या फिर स्थिर नहीं होती है। इसके विपरीत यदि हमें अपने लक्ष्य पर और इक्षित लक्ष्य के प्रति अपने प्रयास पर भरोसा हो, उनपर श्रद्धा हो तो फल मिलते हैं।      ऐसा होता क्यों है? दरअसल हमारी श्रद्धा ही फल के रूप में हमें वापस मिलती है। जब हम मनोयोग से , पूरी श्रद्धा और भरोसे से कुछ करते हैं तो हमें उस मार्ग को पता करने की ललक होती है जिसपर चलकर हम इक्षित फल पा सकें। इसके लिए हम तरह तरह से अ...