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Showing posts from April, 2021

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 4 एवम 5

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 4 एवम 5 साङ्‍ख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम्‌॥ उपर्युक्त संन्यास और कर्मयोग को मूर्ख लोग पृथक्‌-पृथक् फल देने वाले कहते हैं न कि पण्डितजन, क्योंकि दोनों में से एक में भी सम्यक्‌ प्रकार से स्थित पुरुष दोनों के फलरूप परमात्मा को प्राप्त होता है। ।।4।। यत्साङ्‍ख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्यौगैरपि गम्यते। एकं साङ्‍ख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति॥ ज्ञान योगियों द्वारा जो परमधाम प्राप्त किया जाता है, कर्मयोगियों द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। इसलिए जो पुरुष ज्ञानयोग और कर्मयोग को फलरूप में एक देखता है, वही यथार्थ देखता है। ।।5।। ज्ञान और कर्म के फल अलग अलग नहीं होते हैं। वस्तुतः आप जिस स्थिति में हैं आप अपना प्रयास उसी के अनुरूप प्रारंभ करें। जिस व्यक्ति को ये दोनों मार्ग अलग अलग फल देने वाले लगते हैं उसे दोनों में से किसी की जानकारी नहीं होती है। पूर्व में कर्मयोग की विस्तृत शिक्षा देते हुए दो बातें स्पष्ट की जा चुकी हैं। 1.आप अपने स्वभाव के अनुसार, अर्थात स्वधर्म के अनुसार अर्थात अपने गुणों की स्थिति के अनुस...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 3

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 3 ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्‍क्षति। निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते॥ हे अर्जुन! जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा करता है, वह कर्मयोगी सदा संन्यासी ही समझने योग्य है क्योंकि राग-द्वेषादि द्वंद्वों से रहित पुरुष सुखपूर्वक संसार बंधन से मुक्त हो जाता है। ।।3।। श्रीकृष्ण ने कर्मयोग की महत्ता और खासियत को रेखांकित करते हुए स्पष्ट कर दिया है कर्म को छोड़कर भागने वाले के लिए उनकी शिक्षा में कोई स्थान नहीं है, बल्कि सन्यासी तो वो है जो कर्म के मार्ग पर चलायेमान है। वही व्यक्ति नित्य सन्यासी है जो (1) द्वेष  गसे मुक्त है  (2) जिसे किसी चीज की आकांक्षा नहीं है तथा (3) द्वंदात्मक युग्मों से जैसे जय-पराजय, सुख-दुख से मुक्त है।          ज्ञानी या सन्यासी होने के लिए, ज्ञानयोगी या सन्यासयोगी होने के लिए  किसी अन्य चीज की कोई आवश्यकता नहीं है । आप यदि कर्मयोगी हैं तो ज्ञानयोगी या सन्यासी भी स्वतः ही है। ऐसा व्यक्ति ही स्वतः कर्मबन्धनों से मुक्त हो जाता है बिना किसी प्रयास के ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 2

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 2 श्रीभगवानुवाच सन्न्यासः कर्मयोगश्च निःश्रेयसकरावुभौ। तयोस्तु कर्मसन्न्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते॥ श्री भगवान बोले- कर्म संन्यास और कर्मयोग- ये दोनों ही परम कल्याण के करने वाले हैं, परन्तु उन दोनों में भी कर्म संन्यास से कर्मयोग साधन में सुगम होने से श्रेष्ठ है। ।।2।। जब मन में प्रश्न उठता है कि कर्मयोग और कर्मसन्यास में कौन सा मार्ग आसानी से अनुसरण करने योग्य है जिससे उत्तम परिणाम प्राप्त होता हो तो हमें सदा याद रखनी चाहिए कि कर्मयोग और कर्म सन्यास भले ही दोनों। का एक ही परिणाम है लेकिन हमारी स्थिति के अनुसार हमें अपनी यात्रा कर्मयोग के मार्ग से शुरू करनी है। आखिर ऐसा क्यों है, इस प्रश्न का उत्तर हमें आगे मिलेगा, अभी तो हम इतना ही समझ लें कि कर्मसन्यास कर्मयोग के मार्ग की ही अगली मंजिल है और हम क्रमिक रूप से ही वँहा पहुंच सकते हैं, बीच के रास्ते को लाँघ कर आगे जाने का कोई उपाय नहीं है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 की व्याख्या श्लोकरहित (श्लोक 1 से 29 )

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 1 युद्धभूमि में खड़े अर्जुन के विषाद और भ्रम को दूर करने हेतु श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म का महत्व और कर्म के अंतिम लक्ष्य को समझा चुके हैं। इसके बावजूद अर्जुन को अभी भी भ्रम है। सच तो यही है कि अपने पूर्वाग्रहों के कारण हम सभी अपने कर्मक्षेत्र में कर्मों को करने से किसी न किसी तरह से भागते हैं और चाहते हैं कि सीधे अंतिम मनवांछित फल को प्राप्त कर लें लेकिन दिक्कत है कि लक्ष्य प्राप्त करने का शॉर्टकट रास्ता नहीं होता है। जो रास्ता है वो कर्मयोग का ही है भले उसके अंत में कर्म सन्यास की बात हो। लेकिन हम मनुष्य हमेशा सबसे आसान रास्ता ही ढूंढते है , उसे अपनाने के लिए तरह तरह के तर्क और कुतर्क भी करते हैं, खुद से भी और दूसरों से भी।    इसी भाव में पड़ा अर्जुन भी तीसरे अध्याय की तरह एक बार फिर श्रीकृष्ण से दुबारा कहता है कि सन्यास और कर्म दोनों ही मार्ग अगर अच्छे हैं तो उसके लिए कौन हितकारी है। अर्जुन में एक परिवर्तन अवश्य हुआ है। अब यँहा वो आसान मार्ग नहीं पूछ रहा है , वह श्रेष्कर यानी हितकारी मार्ग पूछ रहा है अर्थात वह जानना चाहता है कि उसकी परिस्थिति मे...

श्रीमद्भागवद्गीता-एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 5(श्लोक 1 से 29)

श्रीमद्भागवद्गीता-एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 5(श्लोक 1 से12) श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 1 अर्जुन उवाच सन्न्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि। यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्‌॥ अर्जुन बोले- हे कृष्ण! आप कर्मों के संन्यास की और फिर कर्मयोग की प्रशंसा करते हैं। इसलिए इन दोनों में से जो एक मेरे लिए भलीभाँति निश्चित कल्याणकारक साधन हो, उसको कहिए। ।।1।। युद्धभूमि में खड़े अर्जुन के विषाद और भ्रम को दूर करने हेतु श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्म का महत्व और कर्म के अंतिम लक्ष्य को समझा चुके हैं। इसके बावजूद अर्जुन को अभी भी भ्रम है। सच तो यही है कि अपने पूर्वाग्रहों के कारण हम सभी अपने कर्मक्षेत्र में कर्मों को करने से किसी न किसी तरह से भागते हैं और चाहते हैं कि सीधे अंतिम मनवांछित फल को प्राप्त कर लें लेकिन दिक्कत है कि लक्ष्य प्राप्त करने का शॉर्टकट रास्ता नहीं होता है। जो रास्ता है वो कर्मयोग का ही है भले उसके अंत में कर्म सन्यास की बात हो। लेकिन हम मनुष्य हमेशा सबसे आसान रास्ता ही ढूंढते है , उसे अपनाने के लिए तरह तरह के तर्क और कुतर्क भी करते हैं, खुद से भी और दूसरों से भी...