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Showing posts from February, 2022

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 17 एवं 18

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 17 एवं 18 कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन्‌। केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया॥ ।।17।। हे योगेश्वर! मैं किस प्रकार निरंतर चिंतन करता हुआ आपको जानूँ और हे भगवन्‌! आप किन-किन भावों में मेरे द्वारा चिंतन करने योग्य हैं? ।।17।। विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन। भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्‌॥ ।।18।। हे जनार्दन! अपनी योगशक्ति को और विभूति को फिर भी विस्तारपूर्वक कहिए, क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं होती अर्थात्‌ सुनने की उत्कंठा बनी ही रहती है। ।।18।।           श्रीकृष्ण की शिक्षा को सुनकर ये तो भरोसा हो ही जाता है कि वे सभी योगों के स्वामी हैं यानी योगेश्वर हैं अर्थात योगियों के भी ऊपर हैं। उन्होंने मनुष्य के जीवन को जीने और उस जीवन के जो लक्ष्य बताए है उनको जान-सुनकर व्यक्ति के अंदर अपने लक्ष्य यानी ईश प्राप्ति की उत्कंठा बढ़नी स्वाभाविक है जो अर्जुन के साथ हो रहा है। जब हम ईश्वर की तरफ बढ़ते हैं , उनकी प्राप्ति का मार्ग पकड़ते हैं तो ये जानना भी जरूरी ही हो जाता है कि ईश्व...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 16

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 16 वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः। याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि॥ ।।16।। इसलिए आप ही उन अपनी दिव्य विभूतियों को संपूर्णता से कहने में समर्थ हैं, जिन विभूतियों द्वारा आप इन सब लोकों को व्याप्त करके स्थित हैं। ।।16।। ईश्वर को समझने के लिए ईश्वरीय गुणों से स्वयम को लैस करना अनिवार्य है तो फिर ईश्वर की महानता को समझना जरूरी हो जाता है। किसी भी चीज को जानने के लिए उसकी मुख्य विशेषताओं को जानना जरूरी है जिसके द्वारा उसकी विशेषता समझ  में आती है। ऐसी स्थिति में जब ईश्वर को जानने के लिए ईश्वरीय गुणों से लैस, ईश्वरत्व को प्राप्त व्यक्ति से ही जानना उचित भी है। जैसे यदि आप संविधान की विशेषताओं को समझना चाहते हैं तो फिर आपको राजनीतिक शास्त्री के पास जाना होता है, यदि चिकित्सा विज्ञान को अपनाना चाहते हैं तो उसके जानकार से समझते हैं वैसे ही जब ईश्वर को समग्रता से जानने की अभिलाषा होती है तो फिर ईश्वर की ही शरण में जाना अनिवार्य है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 15

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 15 स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम। भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते॥ ।।15।। हे भूतों को उत्पन्न करने वाले! हे भूतों के ईश्वर! हे देवों के देव! हे जगत्‌ के स्वामी! हे पुरुषोत्तम! आप स्वयं ही अपने से अपने को जानते हैं। ।।15।। ईश्वर ही ईश्वर को जानते हैं। ये स्वीकारोक्ति ही हमें ईश्वर की तरफ खींच कर ले जाती है। यदि किसी को जानना है तो फिर आपको उसके समीप जाना होता है, उसके सानिध्य में रहना होता है, उसके साथ अपना जीवन व्यतीत करना होता है। फिर भी आप उसको पूरी तरह से नहीं जान पाते हैं। हाँ जब आप सामीप्य की सीमा के पार वही बन जाते हैं तो आप उसको जानने लगते हैं। इसके लिए उस दूसरे को जानने का जुनून , उसके प्रति प्रेम, श्रद्धा और विश्वास होना अनिवार्य है। यही बात आपके ईश्वर को जानने के प्रयास के साथ भी लागू होती है। जब तक आप ईश्वर नहीं हो जाते तब तक आप ईश्वर को पूरी तरह जान नहीं पाते। सामीप्य से धीरे धीरे आप कुछ जानते हैं, सब नहीं। सो आप ईश्वर बनिये।      ये कैसे होगा भला? इसके लिए सबसे पहले अपने बाहरी आवरण को हटाइये, अपने ईगो को खत्म कीजिये,...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 14

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 14 सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव। न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः॥ ।।14।। हे केशव! जो कुछ भी मेरे प्रति आप कहते हैं, इस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्‌! आपके लीलामय (गीता अध्याय 4 श्लोक 6 में इसका विस्तार देखना चाहिए) स्वरूप को न तो दानव जानते हैं और न देवता ही। ।।14।।         गीता में जो शिक्षा दी गई है उसके अनुसरण का निदेश भी दिया गया है। शिक्षा का एक भाग श्रवण होता है यानी सुनना, जानना, और दूसरा भाग होता है उस शिक्षा का अनुसरण करना यानी जो सीखे उसपर चलें। यदि ये दोनों नहीं होते हैं तो फिर शिक्षा आधी अधूरी रह जाती है।         व्यक्ति किसी शिक्षा का अनुसरण कब करता है? जब उसे प्राप्त शिक्षा पर भरोसा हो और उसमें भक्ति हो। ये दोनों मिलकर श्रद्धा का निर्माण करते हैं। हम अनुसरण तब करते हैं जब हमें प्राप्त शिक्षा पर श्रद्धा हो।           श्रद्धा पूर्वक शिक्षा का अनुसरण ही ज्ञान देता है। यदि श्रद्धा नहीं होगी तो फिर शिक्षा पर विश्वास नहीं होगा । और यदि मात्र श्रद्धा ही रह ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 12 & 13

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 12 & 13 अर्जुन उवाच परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्‌। पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्‌॥ आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा। असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे॥ अर्जुन बोले- आप परम ब्रह्म, परम धाम और परम पवित्र हैं, क्योंकि आपको सब ऋषिगण सनातन, दिव्य पुरुष एवं देवों का भी आदिदेव, अजन्मा और सर्वव्यापी कहते हैं। वैसे ही देवर्षि नारद तथा असित और देवल ऋषि तथा महर्षि व्यास भी कहते हैं और आप भी मेरे प्रति कहते हैं। ।।12 & 13।। स्वयं की आत्मा के रास्ते ईश्वर की प्राप्ति और परम् सुख का मार्ग जानने के पश्चात गुरु के प्रति भक्ति उद्दात्त हो जाती है। श्रद्धा पूर्वक विश्वास के कारण मार्ग बताने वाले के प्रति अनुराग आ जाता है। तब गुरु की महत्ता समझ में आती है और उनके सम्बन्ध में और विस्तार से जानने की उत्कंठा भी जन्म लेती है।      श्रीकृष्ण द्वारा जो मार्ग बतलाया गया है अर्जुन को उसपर गहरी श्रद्धा हो जाती है। उसे समझ में आ जाता है कि ईश्वर की प्राप्ति ही परम्  उद्देश्य है, उसी की प्राप्ति जीवन का लक्ष्य है। उसे यह भी स...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 11

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 11 तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥ ।।11।। हे अर्जुन! उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए उनके अंतःकरण में स्थित हुआ मैं स्वयं ही उनके अज्ञानजनित अंधकार को प्रकाशमय तत्त्वज्ञानरूप दीपक के द्वारा नष्ट कर देता हूँ। 11।। निरन्तर ईश्वर में समर्पित हुए व्यक्ति का मन , वचन और कर्म तीनों ईश्वरीय अनुकम्पा में ही लीन होता है। ऐसा व्यक्ति अलग से पूजा पाठ आदि करता हो और उसका कल्याण होता हो, ऐसा नहीं है बल्कि वह तो निरन्तर अपने आर कर्म, हर गतिविधि में  ईश्वर को ही रचाये बसाये होता है।       जब व्यक्ति का आचरण इस प्रकार से हो जाता है तो उसके अज्ञान रूपी अहंकार का अंत हो जाता है। उसे यह ज्ञान मिलता है कि उसका वास्तविक रूप वो नहीं है जिसे उसका अहम और ईगो अभिव्यक्त करते हैं, जिसमें उसके लोभ, लालच, अटैचमेंट जैसी चीजें प्रदर्शित होती हैं। बल्कि इस अवस्था में व्यक्ति अपने इस झूठे अहम से बाहर आ जाता है। उसे ज्ञान हो पाता है कि वह ईश्वर से भिन्न न था, न होगा, जब तक उसके अंदर ईश्वर के प्रति भक्तिभाव सहित समर्पण बना ह...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 10

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 10 तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्‌। ददामि बद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते॥ ।।10।। उन निरंतर मेरे ध्यान आदि में लगे हुए और प्रेमपूर्वक भजने वाले भक्तों को मैं वह तत्त्वज्ञानरूप योग देता हूँ, जिससे वे मुझको ही प्राप्त होते हैं। ।।10।।     तो  व्यक्ति ईश्वर को पाता कैसे है? श्रीकृष्ण इस मार्ग को कई बार बता चुके हैं। फिर बताते हैं। जो व्यक्ति तन, मन, बुद्धि, विवेक और अपने संसाधनों का उपयोग कर्मयोग के अनुसार करता है, अपने अंदर किसी प्रकार का अहंकार /ईगो नहीं पालता है और निरन्तर स्वयम के समस्त क्रियाओं को ईश्वर को समर्पित कर करता है वैसा व्यक्ति  ही निरन्तर ईश्वर में लीन होता है। ऐसे  व्यक्ति के चिंतन और ध्यान में हमेशा ईश्वर ही होते हैं। वह  अपने समस्त कर्म ईश्वर पर न्योछावर होकर करता है। वह खुद के लिए नहीं बल्कि दूसरों के कल्याणार्थ अपने कर्म करता है। उसके अंदर कोई कामना नहीं होती है। जब कोई इक्षा न हो तो फिर ईश्वर के प्रति समर्पण मात्र ईश्वर के लिए ही होकर रह जाता है। यही व्यक्ति दरअसल ईश्वर की भक्ति करता है, क्योंकि ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 9

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 9 मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम्‌। कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च॥ ।।9।। निरंतर मुझमें मन लगाने वाले और मुझमें ही प्राणों को अर्पण करने वाले (मुझ वासुदेव के लिए ही जिन्होंने अपना जीवन अर्पण कर दिया है उनका नाम मद्गतप्राणाः है।) भक्तजन मेरी भक्ति की चर्चा के द्वारा आपस में मेरे प्रभाव को जानते हुए तथा गुण और प्रभाव सहित मेरा कथन करते हुए ही निरंतर संतुष्ट होते हैं और मुझ वासुदेव में ही निरंतर रमण करते हैं। ।।9।।        ईश्वर की प्राप्ति का मार्ग क्या है? ईश्वर की प्राप्ति किसी बाहरी तत्व की प्राप्ति नहीं है, बल्कि स्वयं के मूल स्वरूप को पाना ही ईश्वर की प्राप्ति है। निरन्तर इस अन्वेषण में लगे रहना ही वह मार्ग है जिससे हम स्वयं के माध्यम से ईश्वर को पाते हैं।  जब व्यक्ति के कर्म में ईश्वर का ध्यान लगा हो, उसके भावों और मन भी ईश्वर में लगा हो, ज्ञान के स्तर पर वह ईश्वर को समझने में लगा हो और मन, कर्म, ज्ञान से होते हुए वह ईश्वर में रम जाए तो उसे ईश्वर की समझ होती है।     ईश्वर में  मन लगाना आ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 8

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 8 अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः॥ ।।8।। मैं वासुदेव ही संपूर्ण जगत्‌ की उत्पत्ति का कारण हूँ और मुझसे ही सब जगत्‌ चेष्टा करता है, इस प्रकार समझकर श्रद्धा और भक्ति से युक्त बुद्धिमान्‌ भक्तजन मुझ परमेश्वर को ही निरंतर भजते हैं। ।।8।।       अभी तक श्रीकृष्ण द्वारा दी गई शिक्षा से हमें स्पष्ट होता है कि ईश्वर ही अनादि है, वही सब में है, हम सब में है। जरूरत है इस बात कि व्यक्ति इस सत्य को आत्मसात कर श्रद्धा और भक्ति के साथ ईश्वर के प्रति समर्पित हों। भक्ति में आराध्य के प्रति न सिर्फ श्रद्धा होती है बल्कि आराध्य के प्रति अटूट भरोसा भी होता है, खुद का अपने आराध्य पर समर्पण भी होता है और आराध्य के प्रति कोई संशय नहीं होता है, बल्कि व्यक्ति जो कुछ भी करता है वह अपने आराध्य के प्रति उस कर्म को समर्पित कर करता है। ईश्वर के प्रति व्यक्ति की ऐसी श्रद्धा और भक्ति जिसमें व्यक्ति का हर कर्म ईश्वर के प्रति ही समर्पित होता है उसे ईश्वर के साथ एकाकार के देती है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 7

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 7 एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः। सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः॥ ।।7।। जो पुरुष मेरी इस परमैश्वर्यरूप विभूति को और योगशक्ति को तत्त्व से जानता है (जो कुछ दृश्यमात्र संसार है वह सब भगवान की माया है और एक वासुदेव भगवान ही सर्वत्र परिपूर्ण है, यह जानना ही तत्व से जानना है), वह निश्चल भक्तियोग से युक्त हो जाता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है। ।।7।।      ईश्वर की प्राप्ति के लिए यह आवश्यक है कि हम ईश्वर की इस महानता को समझे कि ईश्वर से सभी कुछ उतपन्न होता है। जब हम ईश्वर की विभूतियों और योग क्षमता को समझ पाते हैं तो उनके प्रति मन में श्रद्धा और भक्ति का भाव जन्म लेता है जो हमें दृढ़ता के साथ ईश्वर में ही स्थिर कर देता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 6

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 6 महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा। मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः॥ ।।6।। सात महर्षिजन, चार उनसे भी पूर्व में होने वाले सनकादि तथा स्वायम्भुव आदि चौदह मनु- ये मुझमें भाव वाले सब-के-सब मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं, जिनकी संसार में यह संपूर्ण प्रजा है।              यह सम्पूर्ण संसार ईश्वर की इक्षा का परिणाम है। हमने पहले ही देखा है कि ईश्वर का कोई कारण नहीं होता है, बल्कि ईश्वर सब का कारण है, सो इस संसार में जो कुछ है वह ईश्वरीय कारणों से है। ईश्वर की इक्षा से ही पंचतत्व यानी आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी की रचना हुई और साथ ही बुद्धि और अहंकार जन्म लिए। इन सातों को हम निरन्तर बने  रहने वाले तत्वों के रूप में जानते हैं। यही सात हमारे अंदर मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार के रूप में विराजमान हैं। इनकी वजह से कई भाव उतपन्न होते हैं जो पुनः अन्य विभिन्न भावों का जन्म होता है। इस प्रकार सभी कुछ की उतपत्ति ईश्वर की इक्षा से हुआ है।  बिना बहुत कुछ समझे इतना समझना भी काफी है कि इस सम्पूर्ण संसार का स्रोत...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 4 एवं 5

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 4 एवं 5 बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः। सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च॥ ।।4।। अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः। भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः॥ ।।5।। निश्चय करने की शक्ति, यथार्थ ज्ञान, असम्मूढ़ता, क्षमा, सत्य, इंद्रियों का वश में करना, मन का निग्रह तथा सुख-दुःख, उत्पत्ति-प्रलय और भय-अभय तथा अहिंसा, समता, संतोष तप (स्वधर्म के आचरण से इंद्रियादि को तपाकर शुद्ध करने का नाम तप है), दान, कीर्ति और अपकीर्ति, - ऐसे ये प्राणियों के नाना प्रकार के भाव मुझसे ही होते हैं। ।।4 एवम 5।।            अब प्रश्न है कि आप ईश्वर तक पहुँचेंगे कैसे। व्यक्ति का निर्माण मात्र हाड़ माँस से नहीं होता है बल्कि एक व्यक्ति विशेष की पहचान उसकी बुद्धि और सोचने समझने की क्षमता से बनती है। सोच ही व्यक्ति को परिभाषित करती है और सोच की बदौलत ही व्यक्ति अपने को अभिव्यक्त करता है।          बुद्धि का तात्पर्य विश्लेषण करनी की क्षमता है। आप किसी भी चीज को किस तरह से देखते हैं, किस प्रकार उसका विश्लेषण करते हैं , ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 3

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 3 यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्‌। असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते॥ ।।3।। जो मुझको अजन्मा अर्थात्‌ वास्तव में जन्मरहित, अनादि (अनादि उसको कहते हैं जो आदि रहित हो एवं सबका कारण हो) और लोकों का महान्‌ ईश्वर तत्त्व से जानता है, वह मनुष्यों में ज्ञानवान्‌ पुरुष संपूर्ण पापों से मुक्त हो जाता है। ।।3।।     श्रीकृष्ण अपनी पूर्व की बात को आगे बढाते हुए कहते हैं कि ईश्वर की समझ उसी को हो पाती है जो इस सत्य को समझ पाता है कि ईश्वर का न कोई प्रारम्भ है और न ही अंत और ईश्वर ही इस संसार की हर चीज का कारण है । इससे स्पष्ट है कि ईश्वर तो सब का कारण है किंतु उसका कोई कारण नहीं होता है। यह सत्य हमें प्रेरित करता है कि हम यह समझें कि वस्तुतः इस संसार में जीव निर्जीव जो कुछ भी है उसका कारण ईश्वर ही है यानी उनमें ईश्वर ही है। ऊपरी या बाहरी भेद जो हो लेकिन बाहर के भिन्न भिन्न  आवरण के अंदर सबका मूल एक ही है। इस सत्य को समझने के बाद इस संसार में घृणा करने लायक कुछ नहीं बचता है और असत्य, हिंसा, लोभ, लाभ के लिए भी कुछ नहीं रह जाता है। जब व्यक्ति ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 2

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 2 न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः। अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः॥ ।।2।। मेरी उत्पत्ति को अर्थात्‌ लीला से प्रकट होने को न देवता लोग जानते हैं और न महर्षिजन ही जानते हैं, क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं का और महर्षियों का भी आदिकारण हूँ। ।।2।। श्रीकृष्ण ईश्वर के प्रभुत्व को स्पष्ट करते हुए समझाते हैं कि चूँकि ईश्वर ही आदि हैं सो उनकी उतपत्ति को देवता(गुण) और ऋषि(ज्ञान) भी नहीं समझ पाते हैं।     ईश्वर सभी के कारण हैं , कोई उनका कारण नहीं होता है, सो गुणों और ज्ञान की भी अपनी सीमा होती है ईश्वर को समझने की। यह सत्य ईश्वर की प्रभुता, उनकी अजरता और उनके अजन्मा होने के तथ्य को रेखांकित करता है।  व्यक्ति को चाहिए कि वह इस आदिपुरुष की समझ को विकसित करे अपने अंदर ताकि उसे अपने मूल स्रोत का अनुभव हो सके। एक तरह से श्रीकृष्ण मनुष्यों को प्रेरित कर रहें हैं कि वह आदिपुरुष में स्वयं के अस्तित्व को खोजे। यह खोज ऐसी है जिसके परिणाम में व्यक्ति अपने ईगो को गँवा कर अपनी आत्मा को पाता है, लेकिन इसके लिए गुणों और ज्ञान का विकास ही पर्याप्त...

श्रीमद्भागवद्गीता एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 10 (श्लोकरहित)

श्रीमद्भागवद्गीता एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 10 श्लोक 28 तक (श्लोकरहित)        एक व्यक्ति का खुद के प्रति, संसार के प्रति और ईश्वर के प्रति दृष्टिकोण होता है, एक समझ होती है ।किन्तु ये तीनों ही दृष्टिकोण आपस में एक सिलसिलेवार तरीके से सम्बद्ध होते हैं। ईश्वर ही परम् सत्ता है जो संसार में खुद को अभिव्यक्त करता है और वही ईश्वर व्यक्ति में भी खुद को अभिव्यक्त करता है। सो जब व्यक्ति को खुद को समझना होता है तो उसे खुद के संसार के प्रति और ईश्वर के प्रति अपने सम्बन्धों को समझना आवश्यक हो जाता है। इस प्रकार व्यक्ति अपना ही विस्तार इस संसार में पाता है और संसार को ईश्वर के रूप में पाता है।     सो यह जरूरी है कि जब तक हम ईश्वर को नहीं समझते तब तक हम न तो संसार को समझते हैं , न ही खुद को।  श्रीकृष्ण अबतक विभीन्न तरीके से इस सम्बंध को समझाते आये हैं । पुनः एक बार फिर दसवें अध्याय में श्रीकृष्ण इस सत्य को बताते हैं। इस बार वे इस सत्य को कुछ ऐसे उदाहरणों से समझाने का प्रयास करते हैं जिनके समीप हम खुद को पाते हैं।        श्रीकृष्ण अर्जुन को ईश...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 1 श्रीभगवानुवाच भूय एव महाबाहो श्रृणु मे परमं वचः। यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया॥ ।।1।। श्री भगवान्‌ बोले- हे महाबाहो! फिर भी मेरे परम रहस्य और प्रभावयुक्त वचन को सुन, जिसे मैं तुझे अतिशय प्रेम रखने वाले के लिए हित की इच्छा से कहूँगा। ।।1।। श्रीकृष्ण अर्जुन को ईश्वर की महिमा एक बार फिर से समझाने जा रहें हैं। ऐसा क्यों कि वे बार बार इस सत्य पर जोर दे रहें हैं? दरअसल हम स्वयं को तभी समझ सकते हैं जब हम ये समझें कि हम भी उसी परमपिता के अंश हैं और यह संसार भी, जो ईश्वर की योगमाया की अभिव्यक्ति है। यह संसार और खुद हमारी प्रकृति भी ईश्वरीय माया के तीन गुणों , सतगुण, रजोगुण, और तमोगुण से मिलकर बनती है। जब हम इन तीन गुणों के प्रभाव से अतीत हो जाते हैं तो ईश्वर के माया रहित रूप को समझ पाते हैं, देख पाते हैं और तब हम समझ पाते हैं कि हम वास्तव में स्वयं इस शरीर से परे सनातन आत्मा हैं जो उसी ईश्वर का एक अंश है और तब ही हम ईश्वर के सामीप्य को पा सकते हैं। इस मार्ग को संसार में चलकर ही पाया जा सकता है।       और ईश्वर इस सत्य को उसी को समझाते ...

श्रीमद्भागवद्गीता एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 10 परिचय

श्रीमद्भागवद्गीता एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 10 परिचय परिचय        एक व्यक्ति का खुद के प्रति, संसार के प्रति और ईश्वर के प्रति दृष्टिकोण होता है, एक समझ होती है ।किन्तु ये तीनों ही दृष्टिकोण आपस में एक सिलसिलेवार तरीके से सम्बद्ध होते हैं। ईश्वर ही परम् सत्ता है जो संसार में खुद को अभिव्यक्त करता है और वही ईश्वर व्यक्ति में भी खुद को अभिव्यक्त करता है। सो जब व्यक्ति को खुद को समझना होता है तो उसे खुद के संसार के प्रति और ईश्वर के प्रति अपने सम्बन्धों को समझना आवश्यक हो जाता है। इस प्रकार व्यक्ति अपना ही विस्तार इस संसार में पाता है और संसार को ईश्वर के रूप में पाता है।     सो यह जरूरी है कि जब तक हम ईश्वर को नहीं समझते तब तक हम न तो संसार को समझते हैं , न ही खुद को।  श्रीकृष्ण अबतक विभीन्न तरीके से इस सम्बंध को समझाते आये हैं । पुनः एक बार फिर दसवें अध्याय में श्रीकृष्ण इस सत्य को बताते हैं। इस बार वे इस सत्य को कुछ ऐसे उदाहरणों से समझाने का प्रयास करते हैं जिनके समीप हम खुद को पाते हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 10

श्रीमद्भागवद्गीता एक व्यवहारिक प्रशिक्षण अध्याय 10 परिचय        एक व्यक्ति का खुद के प्रति, संसार के प्रति और ईश्वर के प्रति दृष्टिकोण होता है, एक समझ होती है ।किन्तु ये तीनों ही दृष्टिकोण आपस में एक सिलसिलेवार तरीके से सम्बद्ध होते हैं। ईश्वर ही परम् सत्ता है जो संसार में खुद को अभिव्यक्त करता है और वही ईश्वर व्यक्ति में भी खुद को अभिव्यक्त करता है। सो जब व्यक्ति को खुद को समझना होता है तो उसे खुद के संसार के प्रति और ईश्वर के प्रति अपने सम्बन्धों को समझना आवश्यक हो जाता है। इस प्रकार व्यक्ति अपना ही विस्तार इस संसार में पाता है और संसार को ईश्वर के रूप में पाता है।     सो यह जरूरी है कि जब तक हम ईश्वर को नहीं समझते तब तक हम न तो संसार को समझते हैं , न ही खुद को।  श्रीकृष्ण अबतक विभीन्न तरीके से इस सम्बंध को समझाते आये हैं । पुनः एक बार फिर दसवें अध्याय में श्रीकृष्ण इस सत्य को बताते हैं। इस बार वे इस सत्य को कुछ ऐसे उदाहरणों से समझाने का प्रयास करते हैं जिनके समीप हम खुद को पाते हैं। श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 10 श्लोक 1 श्रीभगवानुवाच भूय एव महाबाहो श्...