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Showing posts from July, 2022

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 7

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 7  अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्‌। आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः॥ ।।7।। श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव, दम्भाचरण का अभाव, किसी भी प्राणी को किसी प्रकार भी न सताना, क्षमाभाव, मन-वाणी आदि की सरलता, श्रद्धा-भक्ति सहित गुरु की सेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि (सत्यतापूर्वक शुद्ध व्यवहार से द्रव्य की और उसके अन्न से आहार की तथा यथायोग्य बर्ताव से आचरणों की और जल-मृत्तिकादि से शरीर की शुद्धि को बाहर की शुद्धि कहते हैं तथा राग, द्वेष और कपट आदि विकारों का नाश होकर अन्तःकरण का स्वच्छ हो जाना भीतर की शुद्धि कही जाती है।) अन्तःकरण की स्थिरता और मन-इन्द्रियों सहित शरीर का निग्रह। क्षेत्र यानी शरीर को समझने वाले को क्षेत्रज्ञ कहा गया है। क्षेत्र यानी शरीर को कैसे जाना समझा जाता है। इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति में ऐसे गुण हों जिनकी सहायता से हम क्षेत्र को समझते हैं। इन गुणों को हम मूल्य भी कह सकते हैं और इन्हें ही दैवी गुण भी कहते हैं। इन्हीं गुणों को धारण कर व्यक्ति स्थितप्रज्ञ भी कहलाता है।       एक एक कर इन गुणों को देखते और ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 5 एवं 6

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 5 एवं 6 महाभूतान्यहङ्‍कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च। इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥ ।।5।। इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्‍घातश्चेतना धृतिः। एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम्‌॥ ।।6।। पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच इन्द्रियों के विषय अर्थात शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध। तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देहका पिण्ड, चेतना (शरीर और अन्तःकरण की एक प्रकार की चेतन-शक्ति।) और धृति। इस प्रकार विकारों  तो क्षेत्र का स्वरूप समझना चाहिए और इस श्लोक में कहे हुए इच्छादि क्षेत्र के विकार समझने चाहिए,  के सहित यह क्षेत्र संक्षेप में कहा गया।  क्षेत्र यानी शरीर को उंसके अवयवों के साथ समझना आवश्यक है। शरीर मूल रूप से पाँच तत्व यानी आकाश, जल, अग्नि, पृथ्वी और वायु , इन पाँच तत्वों के पाँच इंद्रियों, दस कर्मेन्द्रियों, मन और बुद्धि  चित्त और अहंकार से बनता है। अहंकार का अर्थ मैं की चेतना से है जो शरीर के ईगो से प्रकट होता है। इनके अतिरिक्त क्षेत्र यानी शरीर में कई अन्य विकार भी सम्मिलित होते हैं ...

3. धर्म के आचरण को कैसे पाएँ

3. धर्म के आचरण को कैसे पाएँ अब प्रश्न उठता है कि ध्यान से क्या हो जाएगा, उससे कौन सा सुख मिल जाएगा? हम सभी दुखों से छुटकारा चाहते हैं। दुखों का अंत ही सुखों की परकाष्ठा है। लेकिन दुख हमको है तो उस दुख को दूर भी हम हीं को करना है, कोई अन्य नहीं करने आ रहा है।        दुखों का कारण क्या है? उनका स्रोत क्या है? दुख की अनुभूति भीतर हो कि बाहर हो उनका स्रोत हमेशा हमारे भीतर ही होता है। दुख तब तक नहीं आते जब तक मन में विकार नही  जन्मते। मन के विकार एक ही चीज देते हैं-मन को बेचैन करते हैं। गुस्सा, चिड़चिड़ापन, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ, हिंसा आदि जो कोई भी विकार हैं वे हमारे मन के हैं। ये विकार हमें उद्वेलित और बेचैन करते हैं। और ये बेचैनी हमें दुख देती है।         ध्यान से दुख दूर होते हैं। लेकिन कैसे? जब ध्यान खुद पर केंद्रित हो(अपनी साँस पर) और मन मात्र और मात्र वर्तमान पर टिका हो तो मन न बीते साँस(समय) को देखती है, न ही आने वाली साँस ( समय) को। वर्तमान में जो अनुभूति मिल रही है, वही सत्य है, बाकी न बिती हुआ और न ही आने वाली सांस कोई अनुभूति देने में सक्...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 3 एवम 4

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 3 एवम 4 तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्‌। स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु॥ ।।3।। ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्‌। ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥ ।।4।। वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है और जिस कारण से जो हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो और जिस प्रभाववाला है- वह सब संक्षेप में मुझसे सुन। यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्व ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है और विविध वेदमन्त्रों द्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भलीभाँति निश्चय किए हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी कहा गया है। शरीर और शरीर को जानने वाले का परिचय तो हुआ लेकिन अब उनके बारे में बिस्तर से समझना भी तो जरूरी है। शरीर यानी क्षेत्र मात्र पदार्थ नहीं है बल्कि इसमें मन, बुद्धि, इन्द्रिय भी शामिल हैं और इसे जानने वाले को चेतना कहते हैं। शरीर की सारी गतिविधियां भिन्न भिन्न अंगों के अतिरिक्त उंसके मन, बुद्धि, विवेक और इंद्रियों से संचालित होती हैं। इसकी व्यख्या श्रीकृष्ण के पूर्व से होती आ रही है। ऋषियों ने, वेद मंत्रों ने और ब्...

धर्म

                    धर्म 1.धर्म क्या है? अक्सर कहा जाता है कि धर्म का पालन करें, धार्मिक बने। तो ये धर्म जिसके अनुसरण की बात कही जाती है वह है क्या?      अक्सर धर्म का अर्थ किसी आस्था विशेष से लगाया जाता है। किंतु इसके विपरीत धर्म आचरण से जुड़ा हुआ विषय है और सभी तरह की आस्था वालों में समान रूप से लागू होता है। मन, वचन और कर्म के सम्मिलित रूप में आचरण कहा जाता है और जब इस तरह के आचरण में सद्गुणों का प्रवाह होता है तो उसे धर्म कहते हैं और जब दुर्गुण हावी होते हैं तो उसे ही अधार्मिक या विधर्मी कहते हैं।     ये सद्गुण सभी में, बिना भेद भाव के एक समान होते हैं। सच बोलना, झूठ से परहेज करना, हिंसा नहीं करना, अत्याचार और अनाचार नहीं करना, किसी का अपमान नहीं करना, दया और क्षमा भाव रखना आदि ऐसे गुण हैं जो सद्गुण की श्रेणी में आते हैं और इनको आत्मसात करने के मार्ग में आस्था बाधा नहीं बनती है।   ये आचरण स्थित गुण किसी भी जाति, सम्प्रदाय, नस्ल में आते हैं तो उनकी आस्था इन गुणों का स्वागत ही करती है। सो धर्म आस्था से ऊपर ...

2.धर्म का आचरण

2.धर्म का आचरण जन्म से धर्म प्राप्त नहीं होता है, जन्म से प्रचलित सम्प्रदाय की प्राप्ति होती है। धर्म तो तब प्राप्त होता है जब धर्म की विशेषताएँ, उंसके लक्षण हमारे आचरण में ढल जाते हैं। जब तक हम धारण नहीं करते तब तक धर्म हमारा नहीं होता है।         धर्माचरण के सम्बंध में जानते तो सभी हैं। सभी जानते हैं कि सत्य बोलना, अहिंसा करना, चोरी नहीं करना, नशा(पदार्थ, धन, सत्ता, स्त्री आदि सभी का) नहीं करना है, व्यभिचार नहीं करना है, सभी शास्त्रीय पुस्तकों में तो यही बताया और समझाया जाता रहा है किंतु जानने मात्र से वह धर्माचरण हमारे आचरण में ढलता नहीं है। सो धर्म जन्म से नहीं अभ्यास से प्राप्त होता है, आचरण से प्राप्त होता है।       अब प्रश्न उठता है कि जब धर्माचरण के बारे में सभी जानते हीं हैं तो फिर सभी उनको अपनाते क्यों नहीं हैं। इसका सीधा सरल उत्तर है कि जान लेने के बाद भी हमारा मन इतना चंचल होता है कि वह इस ज्ञात सत्य को अपना नहीं पाता है। बुद्धि कहती है झूठ मत बोलो, विवेक समझाता है कि झूठ मत बोलो, हमारी आस्था की उक्तियाँ, उंसके प्रवचन, उसकी शास्त्रीय पुस्तक...

1.धर्म

1.धर्म क्या है? अक्सर कहा जाता है कि धर्म का पालन करें, धार्मिक बने। तो ये धर्म जिसके अनुसरण की बात कही जाती है वह है क्या?      अक्सर धर्म का अर्थ किसी आस्था विशेष से लगाया जाता है। किंतु इसके विपरीत धर्म आचरण से जुड़ा हुआ विषय है और सभी तरह की आस्था वालों में समान रूप से लागू होता है। मन, वचन और कर्म के सम्मिलित रूप में आचरण कहा जाता है और जब इस तरह के आचरण में सद्गुणों का प्रवाह होता है तो उसे धर्म कहते हैं और जब दुर्गुण हावी होते हैं तो उसे ही अधार्मिक या विधर्मी कहते हैं।     ये सद्गुण सभी में, बिना भेद भाव के एक समान होते हैं। सच बोलना, झूठ से परहेज करना, हिंसा नहीं करना, अत्याचार और अनाचार नहीं करना, किसी का अपमान नहीं करना, दया और क्षमा भाव रखना आदि ऐसे गुण हैं जो सद्गुण की श्रेणी में आते हैं और इनको आत्मसात करने के मार्ग में आस्था बाधा नहीं बनती है।   ये आचरण स्थित गुण किसी भी जाति, सम्प्रदाय, नस्ल में आते हैं तो उनकी आस्था इन गुणों का स्वागत ही करती है। सो धर्म आस्था से ऊपर की अवस्था है जिसके केंद्र में जीव मात्र का कल्याण और सभी जीवधारी और स्थूल व...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 2

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 2 क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत। क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥ ।।2।। हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ अर्थात जीवात्मा भी मुझे ही जान  और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ को अर्थात विकार सहित प्रकृति और पुरुष का जो तत्व से जानना है वह ज्ञान है- ऐसा मेरा मत है। अब श्रीकृष्ण समझाते हैं कि शरीर की चेतना रखने वाला चैतन्य है कौन। इस शरीर यानी क्षेत्र का अस्तित्व तभी तक है जब तक कि हमें  इसके प्रति चेतना हो यानी इस क्षेत्र अर्थात शरीर को जानने वाला हो। यह अनुभूति बुद्धि, विवेक या मन से नहीं होती है बल्कि इसकी अनुभूति उस चेतना से होती है जो इस शरीर के प्रति शरीरधारी को चेतन करता है। वही चेतना क्षेत्रज्ञ है यानी क्षेत्र अर्थात शरीर को जानने वाला है।      तो क्या इसका अर्थ ये हुआ कि जितने शरीर हैं , उतने क्षेत्रज्ञ भी होते हैं? नहीं। बल्कि सभी शरीरों में यह चेतना समान रूप से एक ही होती है और वह चेतना ही आत्मा या परमात्मा कहलाती है। यानी भिन्न भिन्न शरीरों को धारण करने के बावजूद भी सभी जीवों में एक ही चेतना ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 1 श्रीभगवानुवाच इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते। एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥ ।।1।। श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! यह शरीर 'क्षेत्र' (जैसे खेत में बोए हुए बीजों का उनके अनुरूप फल समय पर प्रकट होता है, वैसे ही इसमें बोए हुए कर्मों के संस्कार रूप बीजों का फल समय पर प्रकट होता है, इसलिए इसका नाम 'क्षेत्र' ऐसा कहा है) इस नाम से कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसको 'क्षेत्रज्ञ' इस नाम से उनके तत्व को जानने वाले ज्ञानीजन कहते हैं।         जीव के शरीर की तुलना क्षेत्र से की गई है और जो इस क्षेत्र को जानता है उसे क्षेत्रज्ञ कहा गया है। शरीर को क्षेत्र यानी field कहने के पीछे कारण यह है कि इस शरीर से हमारे कर्म निष्पादित होते हैं। और उन कर्मों के परिणाम भी इसी शरीर को प्राप्त होते हैं। यही शरीर सद्कर्मों को करते हुए धर्मक्षेत्र भी है और दुष्कर्मों को करते हुए कुरुक्षेत्र भी है। और जो शरीर के इस रहस्य को जानता समझता है वही क्षेत्रज्ञ है।      शरीर में शरीर के भौतिक पदार्थों के साथ साथ मन , बुद्धि, विवेक, ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13परिचय

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 परिचय हम कौन हैं और हमारा क्या औचित्य है? क्या हम वही हैं जिसे दुनिया देखती , सुनती और जानती है? हमारा खुद का खुद से क्या परिचय है? क्या हम खुद को खुद से अपने नाम, अपने रूप रंग, अपने भौतिक उपलब्धियों से ही जानते हैं या कुछ अन्य भी है? तो फिर हमारे होने का औचित्य क्या है?    इन प्रश्नों का उत्तर हमें श्रीमद्भागवादगीता में तीन चरणों में मिलता है:- प्रथम चरण में हम यह समझते हैं कि हम वो शरीर नहीं हैं जिसे देखा और भोगा जाता है, बल्कि इस स्थूल स्वरूप से भिन्न हम आत्मा हैं, यानी चेतना हैं। द्वितीय चरण में हम ये जानते हैं कि परम सत्ता ईश्वर की है जिसे हम परमात्मा कहते हैं । और तीसरे चरण में हम समझते हैं कि चेतना के रूप में हम उस परम चेतना के ही प्रतिरूप हैं जिससे सम्पूर्ण संसार नियंत्रित और चालित है।        परमात्मा यानी परम् चेतना उस निराकार स्पेस की तरह है जिसे हम न तो देख सकते हैं , न ही हम उसे माप सकते हैं और न ही उसे कोई भौतिक रूप ही दे सकते हैं। हाँ हमें यह तो जरूर लगता है कि यह फलाना वस्तु है जिसका यह रूप रंग आकार है। इस स्वरूप म...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 19

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 19 तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येन केनचित्‌। अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः॥ ।।19।। जो निंदा-स्तुति को समान समझने वाला, मननशील और जिस किसी प्रकार से भी शरीर का निर्वाह होने में सदा ही संतुष्ट है और रहने के स्थान में ममता और आसक्ति से रहित है- वह स्थिरबुद्धि भक्तिमान पुरुष मुझको प्रिय है। ईश्वर की भक्ति में लीन व्यक्ति के कुछ और लक्षणों की भी चर्चा की गई है। यथा 23.यह व्यक्ति अपनी बुराई और बड़ाई होने पर भी विचलित नही। होता है। सामान्य लोग सभी की बड़ाई और बुराई करते रहते हैं और जिसकी बड़ाई और बुराई की चर्चा होती है वह इस चर्चा से प्रभावित होकर विचलित भी होता है। किंतु ईश्वरीय विभूतियों में लीन व्यक्ति को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई उसकी प्रसंसा कर रहा है या निंदा। यह व्यक्ति तो हर स्थिति में यम टिप्पणियों से मुक्त होकर ईश्वर की भक्ति में उनके शरण में होता है। 24. ऐसा व्यक्ति अपने जीवन पालन के लिए ऐसे प्रयास नहीं करता है जिससे उसके जीवन में बाहरी कारकों से ऐशो आराम मिल सके। यह व्यक्ति शारीरिक सुख और दुख को बिना महत्व दिए हर स्थिति में प...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 18

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 18 समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः। शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्‍गविवर्जितः॥ ।।18।। जो शत्रु-मित्र में और मान-अपमान में सम है तथा सर्दी, गर्मी और सुख-दुःखादि द्वंद्वों में सम है और आसक्ति से रहित है। 20 जो ईश्वर की भक्ति में लीन होता है उसकी नजर जीवों के स्वरूप पर नहीं बल्कि उनके दैवी अस्तित्व पर होता है और वह खूब समझता है कि जीव का रूप और स्वभाव जो भी हो सभी एक ही परमात्मा की अभिव्यक्ति होते हैं। ऐसी समझ से परिपूर्ण व्यक्ति के लिए ये मायने नहीं रखता है कि किसी का उंसके प्रति व्यवहार मित्रवत है या शत्रुवत। वह तो सभी के प्रति समान भाव ही रखता है, सब में दैवी उपस्थिति(divinity) समान रूप से देखता है। 21.ऐसे सम्भाव(equaniminity) में अवस्थित व्यक्ति के लिए मान और अपमान का कोई महत्व नहीं होता है। किसी के प्रति हमारा सम्मान या अपमान व्यक्त करना इसपर निर्भर करता है कि हम उस व्यक्ति का अपनी बुद्धि और विवेक से क्या आकलन करते हैं। लेकिन जो ईश्वरीय भक्ति में सम्भाव में है उंसके लिए हमारा बौद्धिक आकलन कोई महत्व नहीं रखता है और उसका मान करें कि अपमान वह तो हममें ई...

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 17

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 17 यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्‍क्षति। शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥ ।।17।। जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है- वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है। 18. माया और मोह से मुक्त भक्त कामनाओं से परे होता है। कामना रहित मन को न तो किसी विषय में हर्ष होता है, न ही विषाद , न ही उसे किसी से राग होता है न ही द्वेष, न ही उसे शोक होता है ।  19. कामनाओं से मुक्त व्यक्ति कर्म तो करता है किंतु कर्मफल में उसे कोई आसक्ति नहीं होती है। उंसके लिए हर तरह के कर्म फल चाहे वे अच्छे हों या बुरे वे सभी ईश्वर के प्रसाद हीं हैं सो कर्मफल के प्रभाव से मुक्त व्यक्ति हर्ष विषाद, सुख दुख, राग द्वेष आदि से मुक्त मात्र ईश्वर में लगा होता है और वही ईश्वर का प्रिय भी होता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 16

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 16 अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः। सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ ।।16।। जो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखना चाहिए) चतुर, पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है- वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है। एक ईश्वर के भक्त के अन्य लक्षणों को बताते हुए आगे कहा गया है कि 13.जो ईश्वरीय भक्ति में लीन है वह व्यक्ति मोह से मुक्त होता है और मोह से मुक्ति के कारण उस व्यक्ति को  कोई आकांक्षा नहीं होती। आकांक्षा से मुक्त  व्यक्ति किसी के लिए न तो सुखी होता है और न ही दुखी होता है। इस तरह से व्यक्ति सभी मोहपाश से मुक्त होता है। 14.यह व्यक्ति अंदर और बाहर से पवित्र होता है। इस स्थिति में व्यक्ति दैवी गुणों से परिपूर्ण होता है और उन्हीं दैवी गुणों के अनुरूप आचरण करने का अभ्यस्त भी होता है। 15.ईश्वरीय भक्ति में लीन व्यक्ति दक्ष होता है यानी वह वर्तमान में रहते हुए हर परिस्थिति पर उनके अनुरूप अपनी प्रतिक्रिया देता है। उंसके मन में किसी के प्रति कोई पूर्वाग्रह का भाव...

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 15

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 15 यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः। हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः॥ ।।15।। जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता तथा जो हर्ष, अमर्ष (दूसरे की उन्नति को देखकर संताप होने का नाम 'अमर्ष' है), भय और उद्वेगादि से रहित है वह भक्त मुझको प्रिय है। ईश्वरीय पथ पर अग्रसर व्यक्ति जो ईश्वर को अत्यंत प्रिय होता है उसके लक्षणों का वर्णन करते हुए आगे बताया गया है कि 11.जो व्यक्ति ईश्वर की भक्ति में लीन होता है वह किसी भी अन्य व्यक्ति को तो उद्वेगीत करता है और न ही किसी अन्य की वजह से स्वयं ही उद्वेगीत होता है। इस प्रकार इस व्यक्ति को अपने इंद्रियों और उनसे मिलने वाली सम्वेदनाओं पर अपना पूर्ण नियन्त्र होता है।  12.समान भाव में बने रहने वाले इस व्यक्ति को न तो किसी बात से हर्ष होता है न ही विषाद और न ही वह व्यक्ति किसी अन्य की उन्नति से ईर्ष्या करने वाला होता है। 13.चूँकि इस तरह के व्यक्ति का अपना कोई ईगो नहीं होता है और यह व्यक्ति ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पित होता है सो इस तरह...

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 13 एवं 14

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 13 एवं 14 अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च। निर्ममो निरहङ्‍कारः समदुःखसुखः क्षमी॥ ।।13।। संतुष्टः सततं योगी यतात्मा दृढ़निश्चयः। मय्यर्पितमनोबुद्धिर्यो मद्भक्तः स मे प्रियः॥ ।।14।। जो पुरुष सब भूतों में द्वेष भाव से रहित, स्वार्थ रहित सबका प्रेमी और हेतु रहित दयालु है तथा ममता से रहित, अहंकार से रहित, सुख-दुःखों की प्राप्ति में सम और क्षमावान है अर्थात अपराध करने वाले को भी अभय देने वाला है तथा जो योगी निरन्तर संतुष्ट है, मन-इन्द्रियों सहित शरीर को वश में किए हुए है और मुझमें दृढ़ निश्चय वाला है- वह मुझमें अर्पण किए हुए मन-बुद्धिवाला मेरा भक्त मुझको प्रिय है। व्यक्ति ईश्वर की आराधना के मार्ग पर चलकर ईश्वर को प्राप्त करता है। इस प्रकार के ईश्वरीय भक्त के कुछ लक्षण होते हैं जो इस मार्ग पर चलकर प्राप्त होते हैं। ये लक्षण निम्न हैं-- 1.उस व्यक्ति को किसी के प्रति द्वेष नहीं होता है। उसे किसी से राग और द्वेष नहीं होता है। उसे तो सभी के प्रति समदर्शी भाव होता है। इस गुण को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को मैं और मेरा जैसे ईगो के भाव से मुक्त होना आवश्यक ...

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 12

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 12 श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्धयानं विशिष्यते। ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्‌ ।।12।। मर्म को न जानकर किए हुए अभ्यास से ज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से मुझ परमेश्वर के स्वरूप का ध्यान श्रेष्ठ है और ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग  श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परम शान्ति होती है।  ईश्वर को प्राप्त करने के विभिन्न मार्गों को समझने के पश्चात यह आवश्यक है कि हम समझें कि इनमें से कौन सा मार्ग का क्या महत्व है। इस क्रम में हमें समझना चाहिए कि 1.अभ्यास का मार्ग उत्तम अवश्य है किंतु बिना ईश्वरीय आराधना को समझें अभ्यास करना कोई महत्व नहीं रखता क्योंकि यह अभ्यास हमें कँही नहीं ले जाता है। ऐसे अभ्यास से अंधविश्वास और निरर्थक कर्मकांडों का जन्म होता है। बिना समझ के किया गया अभ्यास हमें रूढ़िवादी बनाता है। 2.ऐसे अभ्यास से ज्ञान का महत्व अधिक है। ज्ञान से हम समझ पाते हैं  कि हमारा लक्ष्य क्या है, हमारा स्व और हमारा ईगो क्या है। इस ज्ञान को प्राप्त करना बिना समझ के किये गए प्रयास से बेहतर है क्योंकि इसके बिना हम ईश्वरीय पथ पर आगे...

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 10, 11

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 10, 11 अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव। मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि॥ ।।10।। अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः। सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्‌॥ ।।11।। यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के ही परायणहो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा। यदि मेरी प्राप्ति रूप योग के आश्रित होकर उपर्युक्त साधन को करने में भी तू असमर्थ है, तो मन-बुद्धि आदि पर विजय प्राप्त करने वाला होकर सब कर्मों के फल का त्याग कर। यह सम्भव है कि कोई व्यक्ति पूर्व में बताए गए अभ्यास को भी नहीं कर पाए तो प्रश्न उठता है कि उसे ईश्वर की प्राप्ति कैसे हो पाएगी। यदि कोई व्यक्ति अभ्यास कर के भी ईश्वर के प्रति अपने कर्मों को समर्पित कर के अपने कर्मों को नहीं कर पाता है तो वैसे व्यक्ति के पास अन्य मार्ग है कि वह अपने कर्मों के समस्त परिणामों को ईश्वर को समर्पित कर दे।      इसका तात्पर्य क्या हुआ? दरअसल हम जो भी कर्म करते हैं उनका कोई न कोई परिणाम अवश्य होता है। ये प...

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 9, 10

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 9, 10 अथ चित्तं समाधातुं न शक्रोषि मयि स्थिरम्‌। अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय॥ ।।9।। अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव। मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन्सिद्धिमवाप्स्यसि॥ ।।10।। यदि तू मन को मुझमें अचल स्थापन करने के लिए समर्थ नहीं है, तो हे अर्जुन! अभ्यासरूप  योग द्वारा मुझको प्राप्त होने के लिए इच्छा कर। यदि तू उपर्युक्त अभ्यास में भी असमर्थ है, तो केवल मेरे लिए कर्म करने के ही परायण हो जा। इस प्रकार मेरे निमित्त कर्मों को करता हुआ भी मेरी प्राप्ति रूप सिद्धि को ही प्राप्त होगा। कई बार व्यकि को पूर्व में बताए तरीके से ईश्वर में ध्यानमग्न होने में कठिनाई होती है । हम सभी व्यक्ति अपने सेल्फ यानी स्व के ऊपर अपने ईगो का आवरण ओढ़े हुए होते हैं जिसकी वजह से ईश्वर के प्रति समर्पित होकर कर्मों को करने में बाधा आती है। इस ईगो रूपी बाधा से पार पाने के लिए आवश्यक है कि हम बारम्बार अभ्यास करें कि हम किस तरह से ईश्वर के प्रति समर्पित होकर अपने कर्म कर सकते हैं।  शास्त्रों में जो तरीका अभ्यास के लिए बताए गये हैं उनमें भगवान के नाम और गुणों का श्रवण, ...