Posts

Showing posts from June, 2023

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 14

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 14 अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्‌। विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम्‌॥ 14।। इस विषय में अर्थात कर्मों की सिद्धि में अधिष्ठान (जिसके आश्रय कर्म किए जाएँ, उसका नाम अधिष्ठान है) और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकार के करण (जिन-जिन इंद्रियादिकों और साधनों द्वारा कर्म किए जाते हैं, उनका नाम करण है) एवं नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव (पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों के संस्कारों का नाम दैव है) है। कर्म किये जाने के लिए जो पाँच कारण हैं उनमें सबसे पहला अधिष्ठान है। अधिष्ठान यानी जिसके आश्रय कर्म किया जा है और यह है शरीर। व्यक्ति के लिए शरीर से परे कोई कर्म नहीं होता है। कर्म होने के लिए पहली अनिवार्य  शर्त है कि देहधारी ही कर्म करता है।     लेकिन मात्र शरीर के होने भर से कर्म नहीं होता है इसके लिए कर्ता भाव का होना अनिवार्य है। कर्ता भाव के होने का अर्थ है कि इस शरीर से स्वयं की पहचान स्थापित करना यानी ईगो का होना।       तीसरी अनिवार्य शर्त है करण यानी उन माध्यम का होना जिनसे कर्म किया जाता है। य...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 13

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 13 पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे। साङ्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्‌॥ 13।। हे महाबाहो! सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के ये पाँच हेतु कर्मों का अंत करने के लिए उपाय बतलाने वाले सांख्य-शास्त्र में कहे गए हैं, उनको तू मुझसे भलीभाँति जान। कर्म करना देहधारी मनुष्यों के लिए अनिवार्य है किंतु उनके लिए यह भी आवश्यक है कि वे कर्मों के बंधन से मुक्त हों। सबसे महत्वपूर्ण सत्य यह है कि कर्म के बंधन से मुक्ति कर्म करके ही मिलना सम्भव है, कोई अन्य मार्ग नहीं है। कर्म के बन्धन से मुक्त होने के लिए कर्मफल से मुक्त होना होता है । और कर्मफल से अनासक्त होने के लिए यह आवश्यक है कि हम समझें कि दरअसल हम कर्म करते हीं क्यों हैं। ऐसा क्यों है कि देहधारी को कर्म करना ही पड़ता है। वस्तुतः कर्मों के होने के पाँच कारण बताए जाते हैं। कर्म होने के पाँच कारण सांख्य दर्शन में बताए जाते हैं और ये साँख्य दर्शन उपनिषदों की शिक्षाएँ हैं जिन्हें हम वेदांत भी कहते हैं। यँहा यह समझना अति महत्वपूर्ण है कि कर्म से मुक्ति का अर्थ कर्म नहीं करने से नहीं है बल्कि कर्मबन्धन से मुक...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 , (श्लोकरहित)

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक  1 से 12 तक सन्यास और त्याग क्या है? सन्यास/त्याग कितने प्रकार का होता है?त्याग और कर्म में क्या सम्बन्ध है? क्या कर्मों को छोड़ देना ही मोक्ष का मार्ग है? त्यागी/सन्यासी के लक्षण क्या हैं? (श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 1 से 12 के आधार पर) मैं ब्रह्म हूँ।  मैं सर्वोच्च वास्तविकता हूँ।  मैं अनंत हूँ।  मैं इस शरीर से बना हूँ जो पदार्थ है।  जब हम गहराई में जाते हैं तो हम पाते हैं कि हम पदार्थ के अतिरिक्त ज्ञान, बुद्धि, विचारों, , भावनाओं आदि से बने हैं।  लेकिन यह जागरूकता इस शरीर तक ही सीमित नहीं है।  यह हमारे शरीर से परे चला जाता है।  यह जागरूकता असीमित  है और सर्वव्यापी है जो सम्पूर्ण शरीर, मन, बुद्धि, भावनाओं को आच्छादित करती है।  इस असीमित जागरूकता या चेतना को ब्रह्म कहा जाता है।  इस प्रकार मैं ब्रह्म हूँ।     लेकिन यह समझना कि मैं ब्रह्म हूँ इतना आसान नहीं है।  इस वास्तविकता को समझने के लिए हमें अपने भीतर बहुत यात्रा करनी पड़ती है, स्वयं के साथ बहुत प्रयोग करने पड़ते हैं।  ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18, श्लोक 12

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18, श्लोक 12 अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्‌। भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित्‌॥ 12।। कर्मफल का त्याग न करने वाले मनुष्यों के कर्मों का तो अच्छा, बुरा और मिला हुआ- ऐसे तीन प्रकार का फल मरने के पश्चात अवश्य होता है, किन्तु कर्मफल का त्याग कर देने वाले मनुष्यों के कर्मों का फल किसी काल में भी नहीं होता । कर्म करना व्यक्ति के लिए शरीर रहते अनिवार्य है लेकिन कर्मफल से अनासक्ति सीखनी होती है, इसका अभ्यास करना होता है। अगर व्यक्ति अपने अभ्यास में सफल हो जाता है यानी कर्म को स्वभावतः करते हुए उसके परिणाम के बंधन से नहीं बन्धता है तो कर्मफल उसे प्रभावित भी नहीं कर पाते हैं। किंतु कर्मफल के प्रति आसक्ति रखकर कर्म करने से कर्मों के अनुसार व्यक्ति को कभी अच्छे फल, तो कभी बुरे फल और कभी दोनों  का मिला जुला फल मिलता है। इस स्थिति में। व्यक्ति अपनी आसक्ति की वजह से कर्मफल के अनुसार खुश होता है, दुखी होता है और कर्म बन्धन में बंधा रह जाता है। इसके विपरीत अनासक्त भाव से कर्म करते हुए व्यक्ति को उसके कर्म कामना, वासना से बांध नहीं पाते हैं और वह ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 11

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 11 न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः। यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते॥ 11।। क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्य द्वारा सम्पूर्णता से सब कर्मों का त्याग किया जाना शक्य नहीं है, इसलिए जो कर्मफल त्यागी है, वही त्यागी है- यह कहा जाता है।       प्रश्न है कि त्याग क्या है। तो यह बहुत ही स्पष्ट है कि शरीर धारण करने वाले के लिए यह सम्भव ही नहीं है वह शरीर सम्बंधित सभी कर्मों का त्याग कर दे। देहधारी जीवन ऐसा नहीं कर सकता है। इस स्थिति में सबसे उत्तम स्थिति यही है कि व्यक्ति कर्म तो करे लेकिन उसके फल के बंधन से मुक्त हो। यही स्थिति शरीरधारी के लिए त्याग की स्थिति है। यही स्थिति कर्म करते हुए भी कर्मों में लिप्त होने से बचाती भी है। सो त्यागी वह है जो करने योग्य कर्मों को करते हुए भी उन कर्मों के कर्मफल से आसक्त हुए बिना कर्म करता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18, श्लोक 10

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 10 न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते। त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः॥ 10।। जो मनुष्य अकुशल कर्म से तो द्वेष नहीं करता और कुशल कर्म में आसक्त नहीं होता- वह शुद्ध सत्त्वगुण से युक्त पुरुष संशयरहित, बुद्धिमान और सच्चा त्यागी है। वस्तुतः त्यागी उसे ही कहते हैं जो सात्विक त्याग करता है और ऐसा त्यागी जो कर्मफल की चिंता से पूर्णतः मुक्त होता है वह सत्य रूप में कर्मयोगी कहलाता है। ऐसा व्यक्ति पूर्ण रूप से सत्वगुणी होता है क्योंकि उसके अंदर से सभी प्रकार की अशुद्धियाँ जैसे मोह, माया, क्रोध, लोभ, घृणा, ईर्ष्या आदि का लोप हो चुका होता है। इस स्थिति में व्यक्ति बिना किसी कारण के ही पूरी तरह से प्रसन्नता का अनुभव करता है । उसके मन बुद्धि विविक  में से सारी चंचलता समाप्त हो जाती है और वह ज्ञान का अनुभव करता है। शांत मन से व्यक्ति अपने वास्तविक सेल्फ को देख पाता है। सेल्फ के ऊपर पड़े ईगो की परत का जो सभी अशुद्धियों का कारण होता है का विलोपन हो चुका होता है। इस स्थिति में व्यक्ति स्वयं को अपने वास्तविक स्वरूप में देख पाता है। ईगो स्वयं के असत्य स्वरू...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 9

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 9 कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेअर्जुन। सङ्‍गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः॥ 9।। हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है- इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है- वही सात्त्विक त्याग माना गया है। वस्तुतः मोक्ष यानी कर्मबन्धन से मुक्ति के लिए जिस त्याग और सन्यास के मार्ग की आवश्यकता होती है वह सात्विक त्याग है। तामस और राजस त्याग से व्यक्ति की कोई प्रगति नहीं होती है अपितु उसका भ्रम, मोह और भय ही बढ़ता है। इसके विपरीत सात्वित त्याग व्यक्ति को कर्म करते हुए भी कर्मबन्धन से मुक्ति दिलाता है। दरअसल जब हम अनिवार्य कर्म यानी यज्ञ, दान और तप कर्म करते हैं और कर्म करते हुए कर्मफल की चिंता अथवा लालसा से स्वयं को मुक्त रखते हैं तो वही सात्विक त्याग कहलाता है। सात्विक त्याग का अर्थ है कर्मफल की वासना अथवा लालसा का त्याग। ऐसी स्थिति में व्यक्ति सिर्फ कर्म(यज्ञ, तप, दान) पर केंद्रित रहता है, उसके परिणाम पर नहीं। इस स्थिति में वर्तमान का महत्व होता है और कर्म किसी फल की लालसा में नहीं किये जाते हैं, अपितु कर्म करने किछे कर्म यानी ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 7 एवं 8

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 7 एवं 8 नियतस्य तु सन्न्यासः कर्मणो नोपपद्यते। मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः॥ 7।। दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्‌। स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्‌॥ 8।। (निषिद्ध और काम्य कर्मों का तो स्वरूप से त्याग करना उचित ही है) परन्तु नियत कर्म का (इसी अध्याय के श्लोक 48 की टिप्पणी में इसका अर्थ देखना चाहिए।) स्वरूप से त्याग करना उचित नहीं है। इसलिए मोह के कारण उसका त्याग कर देना तामस त्याग कहा गया है। जो कुछ कर्म है वह सब दुःखरूप ही है- ऐसा समझकर यदि कोई शारीरिक क्लेश के भय से कर्तव्य-कर्मों का त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग करके त्याग के फल को किसी प्रकार भी नहीं पाता। सन्यास की प्राप्ति के लिए जितना कर्म करना आवश्यक है उतना ही त्याग भी जरूरी है लेकिन प्रश्न उठता है कि कौन सा त्याग किया जाए। कर्म भी अनिवार्य है और त्याग भी। यह स्थिति भ्रम उतपन्न करती है। सो इसे ठीक से समझना जरूरी है कि किस चीज का त्याग किया जाय कि कर्म भी हो और त्याग भी ताकि सन्यास का मार्ग प्राप्त हो और मन-बुद्धि प्रकाशित हो सके। सो क्या त्याज्य है इसे समझना जरूर...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 6

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 6 एतान्यपि तु कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा फलानि च। कर्तव्यानीति में पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्‌॥ 6।। इसलिए हे पार्थ! इन यज्ञ, दान और तपरूप कर्मों को तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मों को आसक्ति और फलों का त्याग करके अवश्य करना चाहिए, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है। इस विविरण से स्पष्ट है कि व्यक्ति को नियत कर्म तो करने हैं लेकिन कर्म फल से असंबद्धता होनी चाहिए। यज्ञ, दान, तप जैसे कर्तव्य कर्म तो करने हैं लेकिन कर्मफल के लिए ये कर्म नहीं करने होते हैं। कर्मफल के त्याग का तातपर्य है कि व्यक्ति को कर्तापन के भाव से मुक्त होकर सिर्फ कर्तव्य निर्वहन के लिए कर्म करने होते हैं। वस्तुतः यह फल त्याग का दृष्टिकोण ही है जो कर्म को यज्ञ, दान और तप में परिवर्तित कर देता है। इसके विपरीत जब व्यक्ति फल से आसक्त होकर कर्म करता है तो उसकी दृष्टि वर्तमान के कर्म पर न होकर भविष्य के फल पर होती है और नतीजा यह निकलता है कि न तो कर्म सही ढंग से हो पाते हैं और न ही फल ही फल की प्राप्ति ही मनोवांछित ढंग से हो पाती है। लेकिन कर्मफल के साथ आसक्ति के  त्याग से ध्यान वर्तमान के...

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 1

श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 1 सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्‌। त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन।। 1।। अर्जुन बोले- हे महाबाहो! हे अन्तर्यामिन्‌! हे वासुदेव! मैं संन्यास और त्याग के तत्व को पृथक्‌-पृथक्‌ जानना चाहता हूँ। श्रीमद्भगवद्गीता के अबतक के विवरण से यह तो स्पष्ट हो चुका है कि मानव जीवन का प्राथमिक उद्देश्य वह प्रकाश पाना है जिससे प्रकाशित होकर वह ब्रह्ममय हो जाता है। उसके समस्त अवगुण, दुर्गुण, पाप, असत्य, आदि समाप्त होकर उसके पास दैवी सम्पदा रह जाती है जो उसे पुण्यमयी बनाती है जिस स्थिति में उसमें और ब्रह्म यानी परमात्मा कि स्थिति में कोई फर्क नहीं रह जाता है। इस अवस्था को प्राप्त करने का अंतिम सोपान सन्यास और त्याग है सो यह प्रश्न स्वाभाविक है कि सन्यास और त्याग ठीक ठीक क्या है और इस अवस्था को प्राप्त कैसे किया जा सकता है।    इस प्रश्न का ठीक ठीक उत्तर उसी के पास है जो समस्त संसार को अपनी बाहों में आलिंगन में ले सकता है यानी प्रेममय हो, जिसे इन्द्रियों पर पूर्ण नियन्त्र हो और जो असत्य और अनाचार का नाशक हो। इसी लिए प्रश्नकर्ता अर्जुन ने यह प्रश्न कृष...