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Showing posts from September, 2021

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 21

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 21 यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति। तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्‌॥ ।।21।। जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धा से पूजना चाहता है, उस-उस भक्त की श्रद्धा को मैं उसी देवता के प्रति स्थिर करता हूँ। ।।21।। समर्पण श्रद्धा पर निर्भर करता है। जब कामनाओं की पूर्ति हेतु वयक्ति किसी देवता विशेष के प्रति समर्पित होता है तो इसकी सफलता के लिए आवश्यक होता है कि उसके प्रति उसे श्रद्धा हो। श्रद्धा विहीन समर्पण निष्फल होता है। लेकिन यदि उस समर्पण में श्रद्धा हो यानी उस पर भरोसा हो, भरोसे के साथ समर्पण हो तो व्यक्ति अपनी इक्षित कामनाओं की पूर्ति में सक्षम होता है। उसकी श्रद्धा उसे बल देती है, हिम्मत देती है , भरोसा देती है और इसके कारण उसकी पूजा उसे ही समर्थवान बनाती है। यंही से उसकी यात्रा आगे बढ़ती है । 

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 20

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 20 कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया॥ ।।20।। उन-उन भोगों की कामना द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, वे लोग अपने स्वभाव से प्रेरित होकर उस-उस नियम को धारण करके अन्य देवताओं को भजते हैं अर्थात पूजते हैं। ।।20।। प्रत्येक व्यक्ति ज्ञान और समर्पण के उच्चतम सीमा पर तो नहीं पहुँचा होता है, बल्कि सामान्य इंसान के रूप में अपना जीवन व्यतीत करता है और उसके मन में जीवन के लिए कई कामनाएं भी होती हैं जो   मुख्यतः शरीर से सम्बंधित, सम्पन्नता और ऐशवर्य से सम्बंधित, ऐशो आराम से समन्धित होती हैं और इनकी पूर्ति हेतु अपनी आस्था के अनुसार उन कामनाओं से जुड़े विभिन्न देवी-देवताओं के प्रति श्रद्धा भी व्यक्त करता है और उनकी पूजा भी करता है। इस अवस्था में व्यक्ति अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के प्रति समर्पित होता है। 

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 19

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 19 बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥ ।।19।। बहुत जन्मों के अंत के जन्म में तत्व ज्ञान को प्राप्त पुरुष, सब कुछ वासुदेव ही हैं- इस प्रकार मुझको भजता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है। ।।19।। जब ईश्वर का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, जब यह मन, वचन कर्म से, इन्द्रिय और बुद्धि से इस तथ्य को व्यक्ति आत्मसात कर लेता है कि उसके स्वरूप और ईश्वर में कोई भिन्नता नहीं है बल्कि वह भी आत्मिक स्तर पर, अन्य सभी भी अपने आत्मिक स्तर पर सर्वव्यापी ईश्वर के ही स्वरूप भर हैं उनका अपना निजी ईगो नहीं है तब भी उस व्यक्ति को रुकना नहीं होता है बल्कि उसे निरन्तर उसी ज्ञान का अनुभव करते हुए ईश वंदन में लीन होना होता है। यह अवस्था समर्पण की चरम अवस्था है। इस तरह का व्यक्ति निरन्तर यह समझता है कि सब में देव का वास है, अर्थात सब वासुदेव ही हैं। ऐसा व्यक्ति मन से, शरीर से, बुद्धि से निरन्तर सभी की सेवा, सभी के कल्याण में लगा होता है क्योंकि उसकी नजर में तो ये संसार ही भगवान हैं , भगवान से इतर कुछ है ही नही तो फिर कैसी हिंसा, कैसा असत्य, कैस...

3. Vishnu Sahasranama Shlok 3

3. Vishnu Sahasranama Shlok 3   18.YOGAH          The first of the seven names of Vishnu mentioned in the third verse of Vishnu Sahasranama is Yogah.  what is yoga.  Actually the soul is a part of God, the manifestation of God is the soul and it is the same in all.  But this truth is not known until the soul does not move on the path of Yoga.  When you rise above all the senses and of mind, the soul merges with the Supreme Soul.  This is yoga.        In this way, yoga is a means as well as an end.  Yoga is the only means by which the soul and the Supreme Soul can merge with oneness and this merger is yoga.  That is, Ishwar i.e. Vishnu is the path as well as the destination.  The soul attains God only by following the divine path. 19.Yogvidam Netah  The Supreme Soul is not only the knower of the science of yoga , but he is also the head of those who know the science of yoga , that is, he is als...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 18

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 18 उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्‌। आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम्‌॥ ।।18।। ये सभी उदार हैं, परन्तु ज्ञानी तो साक्षात्‌ मेरा स्वरूप ही है- ऐसा मेरा मत है क्योंकि वह मद्गत मन-बुद्धिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम गतिस्वरूप मुझमें ही अच्छी प्रकार स्थित है। ।।18।। जो चार तरह के लोग ईश्वर की भक्ति करते हैं उनमें कुछ सांसारिक सुख की प्राप्ति हेतु, कुछ अपने दुखों को दूर करने हेतु, और कुछ ईश्वर के प्रति अपनी जिज्ञासा के कारण इशभक्ति करते हैं किंतु कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो सिर्फ और सिर्फ इसलिए इशभक्ति में लीन होते हैं क्योंकि वे अपनी आत्मा के स्तर पर स्वयम को ईश्वर का ही अंश मानते हैं। यह मानना हठात नहीं हो पाता है बल्कि कर्मयोग के मार्ग पर चलकर विभिन्न सोपानों से गुजरते हुए व्यक्ति  अनुभूति को प्राप्त करता है। यही व्यक्ति स्थितप्रज्ञ कहलाता , इसे हो योगारूढ़ भी कहते हैं और यही ज्ञानी भी है और यही ज्ञानी ईश्वर के सबसे समीप है। अन्य भक्त अभी यात्रा के विभिन्न चरणों में हैं और उन्हें भी चाहिए कि अपनी यात्रा को कार्योग के मार्ग पर आगे बढा...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 17

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 17 तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते। प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः॥ ।।17।। उनमें नित्य मुझमें एकीभाव से स्थित अनन्य प्रेमभक्ति वाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है क्योंकि मुझको तत्व से जानने वाले ज्ञानी को मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है। ।।17।। जो चार प्रकार के लोग ईश्वर की आराधना करते हैं उनमें से कुछ कामनाओं की पूर्ति के लिए, कुछ दुख दर्द के खात्मे के लिए  तो कुछ ईश्वर को समझने के लिए आराधना करते हैं जो अस्थाई होता है क्योंकि वह कारण वश की गई आराधना है, स्वार्थवश की गई आराधना है जो कारण की समाप्ति के साथ ही समाप्त हो जाती है। लेकिन जो ईश्वर को स्वयम के सेल्फ के विस्तार के रूप में देखता है वह बिना किसी कारण के ही ईश्वर से लगाव रखता है। सो ईश्वर सभी की मदद करते हैं किंतु जिसे खुद में ईश्वर का ही विस्तार दिखता है, जिसके लिए इशभक्ति किसी कारण से प्रेरित नहीं है वह ईश्वर को विशेष प्रिय होता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 16

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 16 चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥ ।।16।। हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करने वाले अर्थार्थी (सांसारिक पदार्थों के लिए भजने वाला), आर्त (संकटनिवारण के लिए भजने वाला) जिज्ञासु (मेरे को यथार्थ रूप से जानने की इच्छा से भजने वाला) और ज्ञानी- ऐसे चार प्रकार के भक्तजन मुझको भजते हैं। ।।16।। ईश्वर की आराधना  वही करता है जो स्वयम योगकर्म करता है। जिसकी ईश्वर में कोई आस्था ही नहीं , जो योगमार्ग से कर्म ही नहीं करता वह भला ईश्वर की आराधना क्या कर सकता है। ईश्वर की आराधना ऐसे लोग चार कारणों से करते हैं।  1.कुछ लोग ईश्वर की आराधना सांसारिक सुखों की प्राप्ति के लिए करते हैं। 2. तो कुछ लोग अपने जीवन के कष्टों को दूर करने के लिए ईश्वर को भजते हैं। 3.  कुछ लोगों के मन में ईश्वर को जानने की जिज्ञासा होती है, सो ईश्वर की आराधना करते हैं। 4.जो योगकर्म करते हुए ज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं वे ईश्वर को साक्षात प्राप्त करने हेतु ईश्वर की आराधना किया करते हैं      इस प्रकार हर वो व्...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 15

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 15 न मां दुष्कृतिनो मूढाः प्रपद्यन्ते नराधमाः। माययापहृतज्ञाना आसुरं भावमाश्रिताः॥ ।।15।। माया द्वारा जिनका ज्ञान हरा जा चुका है, ऐसे आसुर-स्वभाव को धारण किए हुए, मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूढ़ लोग मुझको नहीं भजते हैं। ।।15।।            ईश्वरीय अनुभूति से कौन लोग वंचित रह जाते हैं? ऐसे कौन लोग होते हैं जो ईश्वर के प्रति समर्पण नहीं रखते हैं? इस प्रश्न का उत्तर सीधा सा है। आपको कितना ज्ञान है, आप कितने पहुँचे हुए हैं यह मायने नही रखता है। प्रत्येक व्यक्ति  की बुद्धि पर प्रकृति यानी माया का प्रभाव पड़ता है लेकिन जो व्यक्ति मात्र और मात्र केवल इसी माया के वश में होकर अपनी चेतना को भूल जाता है उसकी  बुद्धि आसुरी सम्पदाओं से प्रभावित हो जाती है। ऐसे लोग आसुरी गुणों से जैसे, मोह, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ, अहंकार, हिंसा, असत्य आदि से अधिक प्रभावित होते हैं और इन्हीं आसुरी गुणों के प्रभाव से अपने कर्म भी करते हैं। ऐसे लोग तमाम ज्ञान के बावजूद मूढ़ ही होते हैं क्योंकि इन आसुरी गुणों के अधीन कर्म करने वाले अपने सहित कि...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 14

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 14 दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥ ।।14।। क्योंकि यह अलौकिक अर्थात अति अद्भुत त्रिगुणमयी मेरी माया बड़ी दुस्तर है, परन्तु जो पुरुष केवल मुझको ही निरंतर भजते हैं, वे इस माया को उल्लंघन कर जाते हैं अर्थात्‌ संसार से तर जाते हैं। ।। 14।। ईश्वर को जानना और खुद के वास्तविक स्वरूप को जानना दोनों एक ही है। जो साक्षात है वह प्रकृति है, जिसके तीन गुण हैं, तमो, रजो और सत्व गुण। यह साक्षात प्रकृति इन्हीं तीन गुणों का प्रदर्शन है। और यही माया भी कहलाती है। इस प्रकृति अथवा माया के साक्षात स्वरूप से परे जो दिखता नहीं है वह चेतना है। जब प्रकृति चेतना से मिलती है तो अनुभव की जा सकती है। और ये दोनों, प्रकृति और चेतना, माया और पुरुष एक ही स्रोत से आते हैं जो इन दोनों से परे है, जिसे हम ईश्वर कहते हैं। सो ईश्वर को जानने के लिए इस पकृति और इसकी चेतना से आगे जाना होता है। जो इस प्रकृति में ही उलझा रह जायेगा वो भला कैसे उद्गम तक पहुंच पायेगा। ये बहुत ही सामान्य समझ की बात है कि यात्रा के छोटे छोटे पड़ाव पर रुककर ही यदि हम अपना सम...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 13

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 13 त्रिभिर्गुणमयैर्भावैरेभिः सर्वमिदं जगत्‌। मोहितं नाभिजानाति मामेभ्यः परमव्ययम्‌॥ ।।13।। गुणों के कार्य रूप सात्त्विक, राजस और तामस- इन तीनों प्रकार के भावों से यह सारा संसार- प्राणिसमुदाय मोहित हो रहा है, इसीलिए इन तीनों गुणों से परे मुझ अविनाशी को नहीं जानता है। ।।13।। हम दर्पण में अपना चेहरा देखते हैं। दर्पण जितना साफ रहता है चेहरा भी उतना ही साफ दिखता है। यदि दर्पण पर धूल आदि जमा हो तो फिर प्रतिबिम्ब धुँधला हो जाता है जबकि चेहरा तो वही रहता है, यानी गंदे दर्पण में बढ़िया बिम्ब की  भी खराब आकृति आती है। इसी प्रकार यदि दर्पण के शीशे में कोई दोष हो तो दर्पण साफ रहने के बावजूद एक बढ़िया, सुडौल चेहरे की आकृति विकृत नजर आती है। दोष शीशे में होता है, बिम्ब में नहीं। ठीक यही हालत ईश्वर की समझ के बारे में हमारी होती है। तमोगुण, रजोगुण और सत्वगुणों से निर्मित प्रकृति में यदि कोई विकृति आती है तो फिर ईश्वर को समझना लगभग असंभव हो जाता है क्योंकि इन तीन गुणों से निर्मित हमारी बुद्धि ईश्वर कोंसमझ ही नहीं पाती है। ये विकृतियाँ तरह तरह की हो सकती हैं जैसे मोह, ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 12

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 12 ये चैव सात्त्विका भावा राजसास्तामसाश्चये। मत्त एवेति तान्विद्धि न त्वहं तेषु ते मयि॥ ।।12।। और भी जो सत्त्व गुण से उत्पन्न होने वाले भाव हैं और जो रजो गुण से होने वाले भाव हैं, उन सबको तू 'मुझसे ही होने वाले हैं' ऐसा जान, परन्तु वास्तव में उनमें मैं और वे मुझमें नहीं हैं। ।।12।। हमने देखा जाना है कि प्रकृति के तीन गुण होते हैं, सत्वगुण(पवित्रता, विवेक), रजोगुण (गति) और तमोगुण(जड़त्व) और ये तीनों गुण प्रकृति के सभी दृश्य और अदृश्य रूपों में व्यक्त हैं। किंतु इन गुणों का उद्गम ईश्वर है जिनसे ये तीनों गुण प्रवाहित होते हैं। लेकिन ईश्वर इन गुणों से मुक्त है। अर्थात गुणों का अस्तित्व भले ही ईश्वर पर निर्भर है किंतु ईश्वर के उपस्थिति के लिए ये तीनों गुण महत्वहीन हैं अर्थात ईश्वर तीनों गुणों का उद्गम होने के बावजूद इन तीनों गुणों से मुक्त होता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 11

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 11 बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्‌। धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ॥ ।।11।। हे भरतश्रेष्ठ! मैं बलवानों का आसक्ति और कामनाओं से रहित बल अर्थात सामर्थ्य हूँ और सब भूतों में धर्म के अनुकूल अर्थात शास्त्र के अनुकूल काम हूँ। ।।11। । ईश्वर का वास हर रूप में , प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूपों में होता है , जरूरत होती है इसे समझने की। तभी तो श्रीकृष्ण समझाते हुए कहते हैं कि व्यक्तियों में कामना और मोह मुक्त जो बल होता है वह बल भी ईश्वर ही हैं। यँहा बल का अर्थ मात्र शारीरिक बल से नहीं है, बल्कि मन, बुद्धि, चरित्र, सोच, आदि हर स्तर पर जो बल होता है वह सभी इस बल में सम्मिलित हैं। बल अर्थात मामर्थ्य ईश्वर का ही रूप है लेकिन  यह सामर्थ्य ईश्वर तब है जब इसमें कामना और मोह का अभाव होता है क्योंकि काम और मोह युक्त बल हमें गलत मार्ग पर ले जाने में सक्षम होते हैं।       लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सभी इक्षाएँ वर्जित ही हों। कुछ इक्षाएँ ऐसी भी होती हैं जो धर्म सम्मत होती हैं, जिनमें ईश्वर की कामना होती है, उनसे लगाव होता है और जिनका उद्देश्य खुद को चु...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 9

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 9 पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ। जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥ ।।9।। मैं पृथ्वी में पवित्र गंध और अग्नि में तेज हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ। ।।9।।      ईश्वर की अनुभूति को समझने के लिए श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि धरती में जो पवित्र गंध होता है वह भी ईश्वरीय स्वरूप ही है। इसकी वास्तविक अनुभूति तब होती है जब हम पृथ्वी को उसके सबसे पवित्र रूप में पाते हैं अर्थात जब उसे हम किसी भी तरह से प्रदूषित नहीं किये होते हैं। अग्नि में उस अग्नि का तेज ईश्वरत्व की अभिव्यक्ति  है जिसके कारण हम अग्नि को उसके ताप के साथ अनुभव कर पाते हैं।         सभी प्राणियों में ईश्वरत्व उन प्राणियों  का जीवन है जिसकी उपस्थिति मात्र से जीव चैतन्य होता है । इसी प्रकार जब व्यक्ति एक बड़े लक्ष्य के प्रति समर्पित भाव से जब प्रयत्नशील होता है अर्थात जब व्यक्ति तपस्वी होता है तो उसका वह प्रयास अर्थात तप ईश्वरत्व की अभिव्यक्ति है।      उक्त उद्धरणों से ये स्पष्ट होता है क...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 8

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 8 रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥ ।।8।। हे अर्जुन! मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ। ।।8।। अब श्रीकृष्ण अर्जुन को सांसारिक उदाहरणों से ईश्वर की अनुभूति का मार्ग बताते हैं। हम सभी ईश्वरत्व को समझ सकते हैं बशर्ते हम उनकी अनुभूति को समझने के योग्य हों। यह योग्यता व्यक्तियों को उस समझदारी से आती है जो उनको मौलिकता से परिचित कराती है।  इसी मौलिकता से हमें परिचित कराने हेतु श्रीकृष्ण ने उन वस्तुओं का सहारा लिया है जिन्हें हम देख, सुन,सकते हैं, जिन्हें हम महसूस कर सकते हैं। अर्थात ईश्वरत्व कुछ ऐसा नहीं है जो हमारी समझ से परे हो।             अब हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण ने किन किन माध्यमों से ईश्वरत्व से हमें परिचित कराया है।  1.जल के  स्वाद में ईश्वरत्व है। जल का स्वाद न मीठा है, न तीता, न नमकीन ही। यह तो निरपेक्ष है। ईश्वर इसी निरपेक्षता में है जिसे हमारी  इन्द्रिय म...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 10

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 10 बीजं मां सर्वभूतानां विद्धि पार्थ सनातनम्‌। बुद्धिर्बुद्धिमतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्‌॥ ।।10।। हे अर्जुन! तू सम्पूर्ण भूतों का सनातन बीज मुझको ही जान। मैं बुद्धिमानों की बुद्धि और तेजस्वियों का तेज हूँ। ।।10।। सभी जीवों की चेतना का कारण ईश्वर ही हैं सो सभी जीवों की उतपत्ति भी उन्हीं के कारण है। ईश्वर विहीन जीवन जड़ है। जड़ जब चेतन से संयोग करता है तो जीवन का निर्माण होता है। इस प्रकार सभी जीवन का मूल ईश्वर है। ईश्वरीय चेतना के बिना जो जीवन्त है वह जड़ के समान ही है।       जीवन का उद्देश्य  बुद्धि की परिपूर्णता से पूरी होता है। बुद्धि तीन प्रकार की होती है। शुद्ध, तीक्ष्ण और सूक्ष्म बुद्धि। शुद्ध बुद्धि  पवित्र मूल्यों की बुद्धि है जिसमें सत्य, अहिंसा, धर्म, दया आदि गुणों का महत्व होता है। तीक्ष्ण बुद्धि कुशाग्रता का परिचायक है और सूक्ष्म बुद्धि आध्यत्म की बुद्धि है। जब शुद्ध बुद्धि का प्रदर्शन किसी दबाव में होता है तो वह निरर्थक और समाज के लिए हानिकारक है। तीक्ष्ण बुद्धि को यदि शुद्ध बुद्धि का साथ नहीं मिला तो तीक्ष्ण बुद्धि अति ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 9

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 9 पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजश्चास्मि विभावसौ। जीवनं सर्वभूतेषु तपश्चास्मि तपस्विषु॥ ।।9।। मैं पृथ्वी में पवित्र गंध और अग्नि में तेज हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों में उनका जीवन हूँ और तपस्वियों में तप हूँ। ।।9।।       ईश्वर की अनुभूति को समझने के लिए श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि धरती में जो पवित्र गंध होता है वह भी ईश्वरीय स्वरूप ही है। इसकी वास्तविक अनुभूति तब होती है जब हम पृथ्वी को उसके सबसे पवित्र रूप में पाते हैं अर्थात जब उसे हम किसी भी तरह से प्रदूषित नहीं किये होते हैं। अग्नि में उस अग्नि का तेज ईश्वरत्व की अभिव्यक्ति  है जिसके कारण हम अग्नि को उसके ताप के साथ अनुभव कर पाते हैं।         सभी प्राणियों में ईश्वरत्व उन प्राणियों  का जीवन है जिसकी उपस्थिति मात्र से जीव चैतन्य होता है । इसी प्रकार जब व्यक्ति एक बड़े लक्ष्य के प्रति समर्पित भाव से जब प्रयत्नशील होता है अर्थात जब व्यक्ति तपस्वी होता है तो उसका वह प्रयास अर्थात तप ईश्वरत्व की अभिव्यक्ति है।      उक्त उद्धरणों से ये स्पष्ट होता है ...

व्यवहारिक प्रशिक्षण-श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7

व्यवहारिक प्रशिक्षण-श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 परिचय अब तक श्रीकृष्ण ने अर्जुन के माध्यम से हम सभी को समझाया है कि कैसे हम अपने को पहचान पाते हैं, कैसे हम समझ पाते हैं कि हम मात्र शरीर, मन और बुद्धि नही हैं, बल्कि उनसे भी आगे हम वास्तविक रुप से आत्म स्वरुप आत्मा हैं जो सभी में एकमान है और जो सम्पूर्ण विस्तार का ही एक रूप है। इस तरह श्री कृष्ण ने हमें समझाया है कि अपने वास्तविक रूप में हम सब एक हैं और हम सब परम आत्मा के ही स्वरूप हैं। हम कोई अलग इकाई नहीं बल्कि सम्पूर्णता के ही एक प्रतिरूप हैं। अपने स्व यानी सेल्फ को , अपनी आत्मा को हम कैसे पहचाने, तो इसके लिए श्रीकृष्ण ने योग का मार्ग समझाया है जिसमें व्यक्ति अपने गुणों के स्तर में उत्तरोत्तर वृद्धि करता हुआ गुणातीत होकर ईश्वरत्व को प्राप्त कर लेता है और इसके लिए कर्मयोग, ज्ञानयोग और ध्यानयोग के मार्ग बताएं हैं। लेकिन इतना सब कर लेने के बाद भी ये कतई आवश्यक नहीं है कि हम खुद के अंदर के ईश्वरत्व को पहचान सकें । ईश्वरत्व की ये विभूतियाँ ही वो सम्पदा हैं जो हमें अहसास दिलाती हैं कि हम मूल रूप से ईश्वर से अलग हैं ही नहीं। लेकिन इसे हम समझे...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 8

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 8 रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः। प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु॥ ।।8।। हे अर्जुन! मैं जल में रस हूँ, चन्द्रमा और सूर्य में प्रकाश हूँ, सम्पूर्ण वेदों में ओंकार हूँ, आकाश में शब्द और पुरुषों में पुरुषत्व हूँ। ।।8।। अब श्रीकृष्ण अर्जुन को सांसारिक उदाहरणों से ईश्वर की अनुभूति का मार्ग बताते हैं। हम सभी ईश्वरत्व को समझ सकते हैं बशर्ते हम उनकी अनुभूति को समझने के योग्य हों। यह योग्यता व्यक्तियों को उस समझदारी से आती है जो उनको मौलिकता से परिचित कराती है।  इसी मौलिकता से हमें परिचित कराने हेतु श्रीकृष्ण ने उन वस्तुओं का सहारा लिया है जिन्हें हम देख, सुन,सकते हैं, जिन्हें हम महसूस कर सकते हैं। अर्थात ईश्वरत्व कुछ ऐसा नहीं है जो हमारी समझ से परे हो।             अब हम देखते हैं कि श्रीकृष्ण ने किन किन माध्यमों से ईश्वरत्व से हमें परिचित कराया है।  1.जल के  स्वाद में ईश्वरत्व है। जल का स्वाद न मीठा है, न तीता, न नमकीन ही। यह तो निरपेक्ष है। ईश्वर इसी निरपेक्षता में है जिसे हमारी  इन्द्रिय म...

2.VISHNUSAHASTRANAM SHLOKA 2

2.VISHNUSAHASTRANAM SHLOKA 2 10.Putatma  Vishnu is the pure soul, beyond all qualities.  God is pure and pure consciousness beyond the  tamogun , rajoguna and sattvaguna .  God is free from these three gunas and from the imbalances and impurities created by them.     Divinity resides in every person.  God is present in the form of consciousness of every person, in the form of his soul i.e. self.  When a person tries to get rid of his qualities( gunas)  then his realization with God begins.  Its path is the path of yoga.  Recognizing the state of his gunas , when a person attains liberation from his qualities by following Karmayoga, Jnanayoga, Dhyana yoga, Bhaktiyoga, then despite being a body, he attains his self-realization beyond the body.  This is the state of divinity of  a person, the state of his divine manifestation, when his soul, his nirguna consciousness, becomes God's manifestation. 11. Parmatma   ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 7

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 7 मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय। मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव॥ ।।7।। हे धनंजय! मुझसे भिन्न दूसरा कोई भी परम कारण नहीं है। यह सम्पूर्ण जगत सूत्र में सूत्र के मणियों के सदृश मुझमें गुँथा हुआ है। ।।7।। हमने देखा समझा है कि सब कुछ जड़ और चेतन, परा और अपरा, प्रकृति और पुरुष के विभिन्न संयोग से ही है। और ये दोनों प्रकृति ईश्वर की अभिव्यक्ति मात्र हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि इस सम्पूर्ण दृश्य-अदृश्य जगत में जो कुछ है वह सब ईश्वर की अभिव्यक्ति मात्र है, सभी उसी के कारण है। ये एक ऐसा सत्य है जिसे समझ लेने के पश्चात व्यक्ति सम्पूर्ण जगत के प्रति भक्तिभाव, प्रेम भाव रखने लगता है, वह समस्त भेदों से परे हो जाता है क्योंकि जो कुछ है वह सब ईश्वर का स्वरूप मात्र है और उसी परम् ईश्वर के कारण है।

WHO IS GOD: YES YOU ARE GOD

WHO IS GOD: YES YOU ARE GOD Who is god?  To understand the answer to this question, we can take the help of 1000 names of Lord  Vishnu mentioned in the  # Vishnu Sahasranama so that we all can understand that God is the one who we are with all our virtues.  That is, God is not a separate entity, but God is the embodied name, a total collection of such qualities which are present in all of us.  One who is able to elevate these qualities,  is able to recognize God   So let us understand who is God with the help of each name of  Lord Vishnu. Here we first take up first nine names. 1.Vishvam  Vishnu is the world.  He is the world, the creator of the world, and after creating the world, he is absorbed in that world.  Thus the world is the form of Brahma and Brahma is also the form of the universe.  Thus both God and the universe are one because the creator resides in his creation.  The whole world is an embodiment of the ...

8.विष्णुसहस्रनाम-9-भूतभावनः

8.विष्णुसहस्रनाम-9-भूतभावनः ईश्वर ही सभी को रचते भी हैं और वही सभी के विकसित होने और उनकी वृद्धि के कारण भी होते हैं।           सम्पूर्ण संसार, दृश्य और अदृश्य, चर और अचर ईश्वर की रचना भर हैं। हम सभी उन्हीं विष्णु यानी ईश्वर के स्वरूप मात्र हैं, जड़ में भी और चेतन में भी। जब हम ईश्वर की ही रचना हैं, उन्हीं के जड़ और चेतन प्रकृति के संयोग मात्र हैं तो हम अपने जड़ और चेतन दोनों रूपों में ईश्वर ही हैं। अब यह हमारे संस्कारों की जो स्थिति है तय होता है कि हम कितने हद तक खुद के ईश्वरीय होने की समझ को समझ पाते हैं। 

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 6

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 6 एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय। अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा॥ ।।6।। हे अर्जुन! तू ऐसा समझ कि सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से ही उत्पन्न होने वाले हैं और मैं सम्पूर्ण जगत का प्रभव तथा प्रलय हूँ अर्थात्‌ सम्पूर्ण जगत का मूल कारण हूँ। ।।6।। ये संसार, ये सम्पूर्ण कॉसमॉस क्या है? ये क्यों हैं? ये सभी जड़ और चेतन के संयोग मात्र हैं। सम्पूर्ण जीवन और सम्पूर्ण विनाश इन्ही जड़ और चेतन के संयोग के विभिन्न रूप हैं। और ये जड़ और चेतन क्यों हैं, कँहा से आते हैं? ये दोनों ईश्वर के प्रकृति हैं।  इस प्रकार सम्पूर्ण जगत ही ईश्वर का स्वरूप मात्र है। सम्पूर्ण जगत ईश्वर की प्रकृति का स्वरूप मात्र हैं। वह जन्म भी लेता है ईश्वर से और फिर ईश्वर में ही विलीन हो जाता है। इस प्रकार हम , आप, अन्य, चर, अचर, दृश्य, अदृश्य कुछ भी ईश्वर से भिन्न नहीं है। और यही सगुण और निर्गुण है, अब ये आप पर निर्भर करता है कि आप ईश्वर के किंस स्वरूप को समझ पाते हैं लेकिन ईश्वर को समझने का और इस माध्यम से अपने अस्तित्व के महत्व को समझने का सबसे सरल तरीका यही है कि आप सभी को ईश्वर ...

8. विष्णुसहस्रनाम-8-भूतात्मा

8. विष्णुसहस्रनाम-8-भूतात्मा ईश्वर सभी प्राणियों के अंदर बसने वाला उनकी आत्मा है। यह उनकी चेतना है। श्रीमद्भागवद्गीता में जड़ और चेतन के स्वरूप को समझाते हुए वर्णित है कि जब जड़ का यानी प्रकृति का संयोग चेतना से होता है तो जीव का आविर्भाव होता है। यानी बिना आत्मा के , बिना चेतना के तत्व मात्र जड़ हैं। बिना ईश्वरीय उपस्थिति के हम सभी मात्र निर्जीव यंत्र मात्र होते हैं।      यह सत्य हम सभी पर , हम सभी जीव धारियों पर समान रूप से लागू होता है। हम सभी स्वयम के अंदर ईश्वर को धारण करते हैं। अब हमें इसकी अनुभूति कितनी होती है यह हमारे अपने संस्कारों पर निर्भर करता है किंतु ईश्वरत्व तो समान भाव से सभी में विद्यमान है ही।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 4 ,5

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 4 एवं 5 भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहङ्‍कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥ ।।4।। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और अहंकार भी- इस प्रकार ये आठ प्रकार से विभाजित मेरी प्रकृति है। यह आठ प्रकार के भेदों वाली तो अपरा अर्थात मेरी जड़ प्रकृति है। ।।4।। अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्‌। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्‌॥ ।।5।। हे महाबाहो! इससे दूसरी को, जिससे यह सम्पूर्ण जगत धारण किया जाता है, मेरी जीवरूपा परा अर्थात चेतन प्रकृति जान। ।।5।।  श्रीकृष्ण उस परम ब्रह्म यानी परमात्मा का स्वरूप बताते हैं जिससे से सम्पूर्ण ब्रह्मांड है। समस्त ब्रह्मांड का कारण ईश्वर है और ईश्वर को समझने के लिए उसके सूक्ष्म और अदृश्य रूप जो चेतन है को समझने के साथ साथ उसके स्थूल स्वरूप  जो जड़ है को भी समझना अनिवार्य है।      समस्त चर, अचर, दृश्य और अदृश्य प्रकृति यानी जड़ यानी अपरा प्रकृति और पुरुष यानी चेतन के युग्म के परिणाम हैं और यह पुरुष(चेतन) और प्रकृति(जड़) ईश्वर के स्वरूप हैं ,उनकी अभिव्यक्ति हैं। प्रकृति के रूप में ईश...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 3

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 3 मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्वतः॥ ।।3।। हजारों मनुष्यों में कोई एक मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करता है और उन यत्न करने वाले योगियों में भी कोई एक मेरे परायण होकर मुझको तत्व से अर्थात यथार्थ रूप से जानता है। ।।3।। हम सभी आत्मान्वेषण के महत्व को सुनते और जानते तो हैं, पढ़ते और  चर्चा भी करते हैं किंतु इस मार्ग पर चलने का प्रयास करने वाले लोगों की संख्या अत्यल्प होती है। मूर्ति के समक्ष स्तुति पढ़ना, धूप अगरबत्ती दीया दिखाना अपने आत्मा का साक्षात्कार करना नहीं होता है। बल्कि वह तो कतिपय इक्षाओं की पूर्ति का प्रयास मात्र है। हममे से अधिकांश व्यक्ति मात्र अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करते हैं, जी रहें हैं इसी से खुश हो लेते हैं तो कुछ लोग इससे आगे बढ़कर सांसारिक सुखों को भोगने के लिए जीवन जीते हैं। कुछेक का उद्देश्य इससे आगे के सुख सुविधाओं को पाना होता है सो कुछ दान पुण्य करते हैं। किंतु बहुत कम लोग ही आत्मसाक्षात्कार के पथ पर चलते हैं जो योगमार्ग पर चलकर अपने सत्य को पहचानना चाहते हैं और खुद को वृहत्तर सत्...

7. विष्णुसहस्रनाम-7-भावः

7. विष्णुसहस्रनाम-7-भावः विष्णु ब्रह्मांड स्वरूप स्थित होते हैं। वे नित्य रूप होते हुए भी स्वतः ही अस्तित्व में होते हैं। ईश्वर का अस्तित्व किसी बाहरी कारक पर निर्भर नहीं करता है, बल्कि ईश्वर तो स्वतः ही हैं।         यदि व्यक्ति खुद के सेल्फ को , अपनी आत्मा को समझ पाता है, उससे एकाकार हो पाता है तो वह समझ पाता है कि उसका अस्तिव सम्पूर्ण विस्तार का एक प्रतिरूप है , वह उस वृहत अस्तित्व से भिन्न नहीं है जो ईश्वर के रूप में हर जगह विद्यमान है।

6.विष्णुसहस्रनाम-6-भूतभृत

6.विष्णुसहस्रनाम-6-भूतभृत विष्णु ही सभी के पालनहार हैं, वही सभी का ख्याल भी रकहते हैं, सभी का पोषण भी करते हैं, सभी को पालते भी हैं और वे ये सब सत्वगुण में अवस्थित होकर करते हैं।          हम इस ईश्वरीय विभूति का प्रतिपल प्रत्यक्ष दर्शन भी करते हैं और इस विभूति को प्रत्येक व्यक्ति के अंदर पाते भी हैं।  जब व्यक्ति योग की परम अवस्था प्राप्त करता है तो वह सभी चर अचर के अस्तित्व की रक्षा करने लगता है, उसे किसी से वैर नहीं होता है। बिना वैर भाव के योगी व्यक्ति सभी का समान भाव से ख्याल करता हुआ उनकी रक्षा करता है। उसके अंदर किसी भी तरह का शत्रु भाव किसी के प्रति नहीं होता है। वह व्यक्ति भी विष्णु की इस विभूति से अलंकृत हुआ होता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 2

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 2 ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः। यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥ ।।2।। मैं तेरे लिए इस विज्ञान सहित तत्व ज्ञान को सम्पूर्णतया कहूँगा, जिसको जानकर संसार में फिर और कुछ भी जानने योग्य शेष नहीं रह जाता है। ।।2।। जब हम ईश्वर से असीम श्रद्धा के साथ और अतिशय प्रेम के साथ जुड़ जाते हैं तो हमें न केवल ईश्वरोय विभूतियों का ज्ञान मिलता है बल्कि उन विभूतियों को प्राप्त करने का प्रत्यक्ष मार्ग भी मिलता है जिसके अनुसार हमें उनकी प्रत्यक्ष अनुभूति भी होती है। हम सिर्फ ये नहीं जानते हैं कि ईश्वर क्या है , कौन है बल्कि हम उस ईश्वर को खुद के अंदर अनुभव भी करने लगते हैं। ईश्वरत्व की समझ प्राप्त करना जँहा ज्ञान है  वंही उसकी अनुभूति कर लेना विशेष ज्ञान यानी विज्ञान है। जब हम ईश्वरत्व को समझ कर उसकी अनुभूति खुद के अंदर कर लेते हैं तो फिर जानने के लिए कुछ और शेष नहीं रह जाता है। 

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 1 मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु॥ ।।1।। श्री भगवान बोले- हे पार्थ! अनन्य प्रेम से मुझमें आसक्त चित तथा अनन्य भाव से मेरे परायण होकर योग में लगा हुआ तू जिस प्रकार से सम्पूर्ण विभूति, बल, ऐश्वर्यादि गुणों से युक्त, सबके आत्मरूप मुझको संशयरहित जानेगा, उसको सुन। ।।1।। ईश्वरीय विभूतियों की अनुभूतियों की समझ को पाकर ही व्यक्ति उन ऐश्वर्यपूर्ण विभूतियों को अपने जीवन में उतारने का अभ्यास कर ईश्वरत्व की प्राप्ति कर पाता है सो श्रीकृष्ण अर्जुन को उन विभूतियों से अवगत कराने की शुरुआत करने जा रहें हैं। किंतु इस जानकारी को हम आप मात्र पढ़ सुन कर नहीं समझ सकते। इसके लिए जरूरी है कि हम श्रीकृष्ण में अनन्य प्रेम रखें, उनसे अनन्य लगाव रखें, उनमें एकाग्र होकर रहें, उनमें ध्यान पूर्वक रहें। अर्थात जब हम ज्ञान लेने की शुरुआत कर रहें हैं तो फिर दाता के प्रति कोई संशय न रखें, उनमें पूरी श्रद्धा रखें और उनपर पूरा भरोसा रखें, यानी उनसे जुड़कर उनमें एकाकार होकर समझें।       व्यस्तुतः सत्य का अन्वेषण का तरीका भी...