Posts

Showing posts from August, 2022

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 15, 16, 17 एवं 18

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 15, 16,17 एवं 18 बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च। सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञयं दूरस्थं चान्तिके च तत्‌॥ ।।15।। अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्‌। भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥ ।।16।। ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते। ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्‌॥ ।।17।। इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं चोक्तं समासतः। मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते॥ ।।18।। वह चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है। और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय (जैसे सूर्य की किरणों में स्थित हुआ जल सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है, वैसे ही सर्वव्यापी परमात्मा भी सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है) है तथा अति समीप में (वह परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण और सबका आत्मा होने से अत्यन्त समीप है) और दूर में (श्रद्धारहित, अज्ञानी पुरुषों के लिए न जानने के कारण बहुत दूर है) भी स्थित वही है। वह परमात्मा विभागरहित एक रूप से आकाश के सदृश परिपूर्ण होने पर भी चराचर सम्पूर्ण भूतों में विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 12, 13, 14

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 12, 13, 14 ज्ञेयं यत्तत्वप्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते। अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥ ।।12।। सर्वतः पाणिपादं तत्सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्‌। सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठति॥ ।।13।। सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्‌। असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥ ।।14।। जो जानने योग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है, उसको भलीभाँति कहूँगा। वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत्‌ ही कहा जाता है, न असत्‌ ही।         वह सब ओर हाथ-पैर वाला, सब ओर नेत्र, सिर और मुख वाला तथा सब ओर कान वाला है, क्योंकि वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। (आकाश जिस प्रकार वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी का कारण रूप होने से उनको व्याप्त करके स्थित है, वैसे ही परमात्मा भी सबका कारण रूप होने से सम्पूर्ण चराचर जगत को व्याप्त करके स्थित है) ।           वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण ह...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 11 का द्वितीय भाग (ज्ञान अथवा दैवी सम्पदा)

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 11 का द्वितीय भाग (ज्ञान अथवा दैवी सम्पदा) एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥ ।।11।। नित्य स्थिति और तत्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को ही देखना- यह सब ज्ञान (इस अध्याय के श्लोक 7 से लेकर यहाँ तक जो साधन कहे हैं, वे सब तत्वज्ञान की प्राप्ति में हेतु होने से 'ज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान (ऊपर कहे हुए ज्ञान के साधनों से विपरीत तो मान, दम्भ, हिंसा आदि हैं, वे अज्ञान की वृद्धि में हेतु होने से 'अज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है- ऐसा कहा है।            जब व्यक्ति आत्म अन्वेषण पर निकलता है तो उसे कुछ नियमों का पालन करना होता है। यही नियम वे गुण हैं जिनको अभ्यास से अपना कर व्यक्ति आत्मान्वेषण कर पाता है। इन्हीं नियमों और गुणों को ज्ञान भी कहा गया है और इन्हें ही दैवी सम्पद भी कहा गया है। इनमें जो महत्वपूर्ण हैं उनको निम्न तरह से व्यक्त किया गया है 1.श्रेष्ठता के अभिमान का अभाव 2.दम्भ का अभाव 3. किसी भी प्राणी को किसी भी तरह नही सताना 4. शान्त भाव का होना 5.मन-वाणी की सरलता  6.श्रद्धा भक्ति सहित ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 11

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 श्लोक 11 अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्‌। एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥ ।।11।। अध्यात्म ज्ञान में (जिस ज्ञान द्वारा आत्मवस्तु और अनात्मवस्तु जानी जाए, उस ज्ञान का नाम 'अध्यात्म ज्ञान' है) नित्य स्थिति और तत्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को ही देखना- यह सब ज्ञान (इस अध्याय के श्लोक 7 से लेकर यहाँ तक जो साधन कहे हैं, वे सब तत्वज्ञान की प्राप्ति में हेतु होने से 'ज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान (ऊपर कहे हुए ज्ञान के साधनों से विपरीत तो मान, दम्भ, हिंसा आदि हैं, वे अज्ञान की वृद्धि में हेतु होने से 'अज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है- ऐसा कहा है।   19.अध्यात्म ज्ञान           संसार में ज्ञान दो प्रकार का है, एक है सांसारिक ज्ञान और दूसरा है आत्मज्ञान। आत्मज्ञान को अध्यात्म कहा जाता है जिसमें व्यक्ति अपने स्व यानी अपनी आत्मा के सम्बंध में विचार करता है और इसके माध्यम से वह ईश्वर से तादाम्य जोड़ता है। सांसारिक ज्ञान संसार में रहकर जीवकोपार्जन करने के लिए तथा प्रकृति के रहस्यों को।समझने के लिए ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 (श्लोकरहित)

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 (श्लोकरहित) हम कौन हैं और हमारा क्या औचित्य है? क्या हम वही हैं जिसे दुनिया देखती , सुनती और जानती है? हमारा खुद का खुद से क्या परिचय है? क्या हम खुद को खुद से अपने नाम, अपने रूप रंग, अपने भौतिक उपलब्धियों से ही जानते हैं या कुछ अन्य भी है? तो फिर हमारे होने का औचित्य क्या है?    इन प्रश्नों का उत्तर हमें श्रीमद्भागवादगीता में तीन चरणों में मिलता है:- प्रथम चरण में हम यह समझते हैं कि हम वो शरीर नहीं हैं जिसे देखा और भोगा जाता है, बल्कि इस स्थूल स्वरूप से भिन्न हम आत्मा हैं, यानी चेतना हैं। द्वितीय चरण में हम ये जानते हैं कि परम सत्ता ईश्वर की है जिसे हम परमात्मा कहते हैं । और तीसरे चरण में हम समझते हैं कि चेतना के रूप में हम उस परम चेतना के ही प्रतिरूप हैं जिससे सम्पूर्ण संसार नियंत्रित और चालित है।        परमात्मा यानी परम् चेतना उस निराकार स्पेस की तरह है जिसे हम न तो देख सकते हैं , न ही हम उसे माप सकते हैं और न ही उसे कोई भौतिक रूप ही दे सकते हैं। हाँ हमें यह तो जरूर लगता है कि यह फलाना वस्तु है जिसका यह रूप रंग आकार है। इस स्...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 13 परिचय हम कौन हैं और हमारा क्या औचित्य है? क्या हम वही हैं जिसे दुनिया देखती , सुनती और जानती है? हमारा खुद का खुद से क्या परिचय है? क्या हम खुद को खुद से अपने नाम, अपने रूप रंग, अपने भौतिक उपलब्धियों से ही जानते हैं या कुछ अन्य भी है? तो फिर हमारे होने का औचित्य क्या है?    इन प्रश्नों का उत्तर हमें श्रीमद्भागवादगीता में तीन चरणों में मिलता है:- प्रथम चरण में हम यह समझते हैं कि हम वो शरीर नहीं हैं जिसे देखा और भोगा जाता है, बल्कि इस स्थूल स्वरूप से भिन्न हम आत्मा हैं, यानी चेतना हैं। द्वितीय चरण में हम ये जानते हैं कि परम सत्ता ईश्वर की है जिसे हम परमात्मा कहते हैं । और तीसरे चरण में हम समझते हैं कि चेतना के रूप में हम उस परम चेतना के ही प्रतिरूप हैं जिससे सम्पूर्ण संसार नियंत्रित और चालित है।        परमात्मा यानी परम् चेतना उस निराकार स्पेस की तरह है जिसे हम न तो देख सकते हैं , न ही हम उसे माप सकते हैं और न ही उसे कोई भौतिक रूप ही दे सकते हैं। हाँ हमें यह तो जरूर लगता है कि यह फलाना वस्तु है जिसका यह रूप रंग आकार है। इस स्वरूप म...