श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 24
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 24 अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥ ।।24।। क्योंकि संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ, परंतु वे मुझ परमेश्वर को तत्त्व से नहीं जानते, इसी से गिरते हैं अर्थात् पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं। ।।24।। भिन्न भिन्न देवी-देवताओं को अलग अलग समझकर उनकी पूजा करने वाले ये नहीं समझ पाते हैं कि समस्त पूजा तो एक ही ईश्वर के लिए होती है क्योंकि हर पूजा का स्वामी भी वही एक ईश्वर है और वही उसका प्राप्तिकर्ता भी है, कोई अन्य है ही नहीं । ईश्वर के इस एकात्मक मूल को समझे बगैर यदि व्यक्ति किसी देवी देवता भगवान में आस्था रखता है , भिन्न भिन्न आस्थाओं में ईश्वर के अपने अनुसार कल्पित प्रकार में भेद भाव करता है तो वह अन्य देवी देवता भगवान के प्रति दुराव का भाव रखने लगता है, जिसके दुष्परिणाम में बहुत कुछ गलत कार्य करता है। ऐसे लोग ईश्वर को अपनी कल्पना में सीमित बना लेते हैं और इसी वजह से उनका बार बार पतन भी होता है।