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Showing posts from December, 2021

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 24

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 24 अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥ ।।24।। क्योंकि संपूर्ण यज्ञों का भोक्ता और स्वामी भी मैं ही हूँ, परंतु वे मुझ परमेश्वर को तत्त्व से नहीं जानते, इसी से गिरते हैं अर्थात्‌ पुनर्जन्म को प्राप्त होते हैं। ।।24।। भिन्न भिन्न देवी-देवताओं को अलग अलग समझकर उनकी पूजा करने वाले ये नहीं समझ पाते हैं कि समस्त पूजा तो एक ही ईश्वर के लिए होती है क्योंकि हर पूजा का स्वामी भी वही एक ईश्वर है और वही उसका प्राप्तिकर्ता भी है, कोई अन्य है ही नहीं । ईश्वर के इस एकात्मक मूल को समझे बगैर यदि व्यक्ति किसी देवी देवता भगवान में आस्था रखता है , भिन्न भिन्न आस्थाओं में ईश्वर के अपने अनुसार कल्पित  प्रकार में भेद भाव करता है तो वह अन्य देवी देवता भगवान के प्रति दुराव का भाव रखने लगता है, जिसके दुष्परिणाम में बहुत कुछ गलत कार्य करता है। ऐसे लोग ईश्वर को अपनी कल्पना में सीमित बना लेते हैं और इसी वजह से उनका बार बार पतन भी होता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 23

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 23 येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्‌॥ ।।23।। हे अर्जुन! यद्यपि श्रद्धा से युक्त जो सकाम भक्त दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मुझको ही पूजते हैं, किंतु उनका वह पूजन अविधिपूर्वक अर्थात्‌ अज्ञानपूर्वक है। ।।23।। जब व्यक्ति के अंदर इक्षाएँ बलवती होती हैं तो वह उनकी पूर्ति के लिये तरह तरह के उपाय भी करता है । एक आस्थावान व्यक्ति अपनी इक्षाओं की पूर्ति हेतु बिना योग को पूरी तरह समझे लेकिन योग के आचरण का प्रयास करता हुआ प्रयत्नशील होता है तो वह अपनी इक्षाओं की पूर्ति हेतु भिन्न भिन्न देवी देवताओं की शरण में जाता है। वह परम पिता परमेश्वर में निष्काम भाव से लीन न होकर सकाम भाव से कर्मकांडों को करता हुआ विभिन्न देवी देवताओं की पूजा करता है। यह समर्पण उस व्यक्ति को उस परम पिता परमेश्वर से तो नहीं मिला पाता किन्तु उसके सकाम कर्म उसे फल अवश्य देते हैं।       यह सही है कि भिन्न भिन्न देवी देवता परम् ईश्वर के ही भिन्न भिन्न ऐश्वर्य के प्रतिनिधि हैं किंतु वे सम्पूर्ण परमात्मा तो हैं  नहीं। जैसे आँ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 22

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 22 अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्‌॥ ।।22।। जो अनन्यप्रेमी भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरंतर चिंतन करते हुए निष्कामभाव से भजते हैं, उन नित्य-निरंतर मेरा चिंतन करने वाले पुरुषों का योगक्षेम (भगवत्‌स्वरूप की प्राप्ति का नाम 'योग' है और भगवत्‌प्राप्ति के निमित्त किए हुए साधन की रक्षा का नाम 'क्षेम' है) मैं स्वयं प्राप्त कर देता हूँ। ।।22।। सकाम कर्म करने वाले व्यक्ति के विपरीत जो व्यक्ति पूर्ण निष्काम भाव से कर्म करता है, जिसके कर्म में यज्ञ की उद्दात्त भावना रहती है और जो हर फल को ईश्वर को समर्पित किये होता है तथा जिसके लक्ष्य में मात्र और मात्र प्रभु होते हैं उस व्यक्ति की सभी भावों से रक्षा और हित स्वयम प्रभु ही देखते हैं। जब फल से योग भाव के साथ विमुक्त हो ही गए तो फिर फलों का असर कैसा। एक ईश्वर ही आपके सभी कर्मों के फल में होते हैं तो वही आपका सर्वांगीण हित भी बचाते हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 20, 21

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 20, 21 त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापायज्ञैरिष्ट्‍वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते। ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्‌॥ ।।20।। तीनों वेदों में विधान किए हुए सकाम कर्मों को करने वाले, सोम रस को पीने वाले, पापरहित पुरुष (यहाँ स्वर्ग प्राप्ति के प्रतिबंधक देव ऋणरूप पाप से पवित्र होना समझना चाहिए) मुझको यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हैं, वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप स्वर्गलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं। ।।20।। ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालंक्षीणे पुण्य मर्त्यलोकं विशन्ति। एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना गतागतं कामकामा लभन्ते॥ ।।21।। वे उस विशाल स्वर्गलोक को भोगकर पुण्य क्षीण होने पर मृत्यु लोक को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार स्वर्ग के साधनरूप तीनों वेदों में कहे हुए सकामकर्म का आश्रय लेने वाले और भोगों की कामना वाले पुरुष बार-बार आवागमन को प्राप्त होते हैं, अर्थात्‌ पुण्य के प्रभाव से स्वर्ग में जाते हैं और पुण्य क्षीण होने पर मृत्युलोक में आते हैं। ।।21।। कर्मयोग, भक्तियोग(उपासना)  और ज...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 19

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 19 तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्‌णाम्युत्सृजामि च। अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥ ।।19।। मैं ही सूर्यरूप से तपता हूँ, वर्षा का आकर्षण करता हूँ और उसे बरसाता हूँ। हे अर्जुन! मैं ही अमृत और मृत्यु हूँ और सत्‌-असत्‌ भी मैं ही हूँ। ।।19।। श्रीकृष्ण इस बात पर बार बार बल देते हैं कि इस संसार में जो कुछ है, वह सब ईश्वर का ही रूप है और इसी बात को समझाने के क्रम में परमात्मा को ग्राह्य करने हेतु वे उन उदाहरणों को देते हैं जिनको हम अपने इन्द्रियों से अनुभव कर पाते हैं। इसी क्रम में हम ये तथ्य उदाहरण के द्वारा समझते हैं कि सूर्य का प्रकाश और ऊष्मा, वर्षा, यँहा तक कि जीवन और मृत्यु, सत और असत, प्रत्यक्ष और परोक्ष सभी कुछ ईश्वर ही हैं। कोई दूसरा नहीं होता है जिसके कारण में ईश्वर न हो। ये समझ हमें सभी चीजों और भावों में समान भाव से बनाये रखती है क्योंकि हम जँहा भी हैं, यंहा तक कि देहावसान में भी ईश्वर के ही साथ हैं।       इस प्रकार हमें ये शिक्षा मिलती है कि इस संसार में भेद करने लायक कुछ भी नहीं है क्योंकि सभी कुछ ईश्वरमय ही तो है, हम सभी उसी के प्रतिरू...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 18

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 18 गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत्‌। प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्‌॥ ।।18।। प्राप्त होने योग्य परम धाम, भरण-पोषण करने वाला, सबका स्वामी, शुभाशुभ का देखने वाला, सबका वासस्थान, शरण लेने योग्य, प्रत्युपकार न चाहकर हित करने वाला, सबकी उत्पत्ति-प्रलय का हेतु, स्थिति का आधार, निधान (प्रलयकाल में संपूर्ण भूत सूक्ष्म रूप से जिसमें लय होते हैं उसका नाम 'निधान' है) और अविनाशी कारण भी मैं ही हूँ। ।।18।। ईश्वर की प्रकृति के ज्ञान को और समझाते हुए श्रीकृष्ण बताते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का अंतिम लक्ष्य जिसे उसे पाना है वह ईश्वर है जिससे मिलकर व्यक्ति पूर्णता को प्राप्त कर लेता है। अंतिम लक्ष्य तक कि इस पूरी यात्रा में यात्री को पूरी यात्रा के दौरान देख भाल , उसका भरण पोषण भी करने वाला ईश्वर ही है। ईश्वर ही सभी के स्वामी भी हैं, सब उनके अधीन हैं, वे प्रभु हैं।  ईश्वर संसार के हर गतिविधि के साक्षी भी हैं। सभी चर-अचर ईश्वर में ही निवास करते हैं और ईश्वर ही सभी के सहारा भी हैं और सभी के मित्र  भी यानी सभी का ख्याल करने वाले हैं। ईश्...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 17

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 17 पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः। वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥ ।।17।। इस संपूर्ण जगत्‌ का धाता अर्थात्‌ धारण करने वाला एवं कर्मों के फल को देने वाला, पिता, माता, पितामह, जानने योग्य, (गीता अध्याय 13 श्लोक 12 से 17 तक में देखना चाहिए) पवित्र ओंकार तथा ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद भी मैं ही हूँ। ।।17।। ईश्वर की प्रकृति को समझें कि ईश्वर का कोई कारण नहीं  है लेकिन ईश्वर इस जगत के कारण हैं। ईश्वर ही पुरुष और प्रकृति दोनों है। इस सम्पूर्ण संसार के होने के पीछे समस्त पिता और समस्त माता एक ईश्वर ही है, जिसका कोई माता या पिता नहीं होते। सो संसार के पितामह भी एक ईश्वर ही हैं। इस प्रकार ईश्वर ही सब कुछ के कारण हैं।      ईश्वर ही धाता भी हैं अर्थात ईश्वर इस संसार के होने के कारण मात्र ही नहीं होते हैं बल्कि इसके भरण पोषण के भी उत्तरदायी हैं और कर्मों के फलदाता भी हैं। प्रत्येक की आवश्यकता और प्रत्येक के कर्मों के फलदाता भी हैं।      इस संसार में जो जानने योग्य है अर्थात जो वेद है  वह भी परम ईश्वर हीं हैं और उन वेदों...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 16

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 16 अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्‌। मंत्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्‌॥  ।। 16।। क्रतु मैं हूँ, यज्ञ मैं हूँ, स्वधा मैं हूँ, औषधि मैं हूँ, मंत्र मैं हूँ, घृत मैं हूँ, अग्नि मैं हूँ और हवनरूप क्रिया भी मैं ही हूँ। ।।16।। ईश्वर की प्रकृति को समझें। हम जो भी करते हैं, जैसे कि हम पूजा उपासना करते हैं उनमें भी ईश्वर ही हैं । पूजा, यज्ञ, यज्ञ सामग्री, हवन सामग्री, यज्ञ के मंत्र , घी, अग्नि और यज्ञ की सम्पूर्ण क्रिया और कुछ नहीं ईश्वर की ही अभिव्यक्ति हैं। यह समझ हमें प्रेरित करती है कि हम जब भी और जो भी करें उसमें शुचिता को बनाये रखें, हमारी सोच, हमारे व्यवहार, हमारे कर्मों में ईश्वर ही बसते हैं सो उनकी शुचिता को बनाये रखने का उत्तरदायित्व भी हमारा ही है।  

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 15

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 15 ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ते यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्।। ।।15।। दूसरे ज्ञानयोगी मुझ निर्गुण-निराकार ब्रह्म का ज्ञानयज्ञ द्वारा अभिन्नभाव से पूजन करते हुए भी मेरी उपासना करते हैं और दूसरे मनुष्य बहुत प्रकार से स्थित मुझ विराट स्वरूप परमेश्वर की पृथक भाव से उपासना करते हैं।।15।। ईश्वर की उपासना के कई तरीके होते हैं । सर्वश्रेष्ठ तरीका है ईश्वर को जानना यानी ईश्वर की अनुभूति अपनी समझ , अपनी बुद्धि, अपनी भावना से करना। इस तरीके से व्यक्ति अपनी मूर्खता का, अपनी अज्ञानता का हवन कर ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को समझता है। यही ज्ञान यज्ञ है।        कई अन्य व्यक्ति भी होते हैं जो ईश्वर को विभिन्न स्वरूप के देवी-देवताओं के रूप में उपासते हैं लेकिन उनके अंदर भी यह समझ होती है कि सभी स्वरूप ईश्वर के ही प्रतिरूप हैं, कोई भेद नहीं है।       कुछ अन्य ऐसे भी होते हैं जो सम्पूर्ण जगत में सबकुछ में ईश्वर को ही पाते हैं। उनकी समझ इस स्तर की होती है कि वे सभी को ईश्वर का ही प्रतिरूप मान कर किसी से  भी कोई भेद नह...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 14

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 14 सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढ़व्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥ ।।14।। वे दृढ़ निश्चय वाले भक्तजन निरंतर मेरे नाम और गुणों का कीर्तन करते हुए तथा मेरी प्राप्ति के लिए यत्न करते हुए और मुझको बार-बार प्रणाम करते हुए सदा मेरे ध्यान में युक्त होकर अनन्य प्रेम से मेरी उपासना करते हैं। ।।14।। दैवी सम्पत्ति से परिपूर्ण व्यक्ति बारम्बार ईश्वर को नमन करता हुआ, बारंबार उनके समक्ष, उनकी महानता के समक्ष अपने अहम को त्यागता हुआ उनपर ही स्वयम को अर्पित करता है। उसे हर चीज में ईश्वर की प्रभुता का भान होता है। इसप्रकार ईश्वर की महानता के आगे वह उनकी उपासना में अपना अहम त्याग कर उनमें लीन हो जाता है। उसके लिए हर जगह, हर व्यक्ति में ईश्वर ही विद्यमान दिखते हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 13

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 13 महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्यम्‌॥ ।।13।। परंतु हे कुन्तीपुत्र! दैवी प्रकृति के (इसका विस्तारपूर्वक वर्णन गीता अध्याय 16 श्लोक 1 से 3 तक में देखना चाहिए) आश्रित महात्माजन मुझको सब भूतों का सनातन कारण और नाशरहित अक्षरस्वरूप जानकर अनन्य मन से युक्त होकर निरंतर भजते हैं। ।।13।। सन्सार में दो तरह के लोग होते हैं। पहले तरह के व्यक्ति आसुरी गुणों पर निर्भर होकर  गलत प्रवृत्ति को व्यक्त करते हैं और पूरे जीवन भर कर्मबन्धन में पड़े होते हैं। दूसरी तरफ वे व्यक्ति होते हैं जिनमें दैवी गुण ज्यादा बलवती होते हैं। ऐसे लोग निरन्तर ईश भजन में लगे होते हैं। वे सभी जीव में अपनी ही आत्मा का प्रसार देखते हैं और ईश्वर को सभी प्राणियों के परम चेतना स्वरूप जानकर ये मानते हैं कि एक  ईश्वर ही सभी का रचयिता है, वही सभो में समान रूप से व्याप्त है। ऐसे लोगों के हृदय हमेशा ईश्वर को स्मरण और नमन करने में लगे होते हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 12

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 12 मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥ ।।12।। वे व्यर्थ आशा, व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञान वाले विक्षिप्तचित्त अज्ञानीजन राक्षसी, आसुरी और मोहिनी प्रकृति को (जिसको आसुरी संपदा के नाम से विस्तारपूर्वक भगवान ने गीता अध्याय 16 श्लोक 4 तथा श्लोक 7 से 21 तक में कहा है) ही धारण किए रहते हैं। ।।12।। जिन लोगों को ईश्वर के वास्तविक चेतना का और इस प्रकार स्वयम के परम चेतना का ज्ञान नहीं होता है वे लोग व्यर्थ के प्रयासों में जीवन व्यतीत कर देते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के समक्ष दो विकल्प होते हैं , पहला आसुरी गुणों को अपनाने का और दूसरा दैवी गुणों को अपनाने का। ईश्वरीय चेतना से रहित व्यक्ति आसुरी गुणों की शरण में जाता है। इस स्थिति में वह अत्याचारी, अहंकारी, असत्यभाषन करने वाला होता है और भ्रम और मोह के जाल में उलझा हुआ होता है। ऐसे लोग जो भी ज्ञान अर्जित करते हैं वे सब निरर्थक हो जाते हैं क्योंकि उनका ज्ञान किसी की अच्छाई के लिए नहीं होता है। उनके सारे कर्म भी इसी दिशा में संचालित होकर व्यर्थ होते हैं। और ऐसे व्यक्ति जो उम...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 11

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 11 अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्‌। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्‌॥ ।।11।। मेरे परमभाव को  जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य का शरीर धारण करने वाले मुझ संपूर्ण भूतों के महान्‌ ईश्वर को तुच्छ समझते हैं अर्थात्‌ अपनी योग माया से संसार के उद्धार के लिए मनुष्य रूप में विचरते हुए मुझ परमेश्वर को साधारण मनुष्य मानते हैं। ।।11।। ईश्वर संसार के जन्मदाता, पालनकर्ता और संहारकर्ता हैं और संसार उनकी परा और अपरा प्रकृति यानी भौतिक प्रकृति और सर्वश्रेष्ठ चेतना से संचालित होती है। किंतु संसार में ऐसे बहुतेरे लोग हैं जिनको इस सत्य का ज्ञान नहीं हो पाता है। ऐसे लोग भौतिक प्रकृती को ही अंतिम सत्य मान कर जीते हैं सो हमेशा तुक्ष लाभों, लोभों , क्षुधा, ईर्ष्या, आदि की पूर्ति को ही अपने जीवन का लक्ष्य मान कर चलते हैं और सो हमेशा परम् चेतना की अनुभूति से दूर ही रह जाते हैं। वस्तुतः प्रतेक व्यक्ति के अंदर वह चेतना सुप्त अवस्था में अज्ञानता के आवरण से ढँकी हुई होती है। जो लोग इस आवरण को हटा पाने में सक्षम नहीं हो पाते वे लोग स्वयम के ईश्वरत्व से वंचित होकर जीवन पर्यंत अ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 10

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 10 मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरं। हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥ ।।10।। हे अर्जुन! मुझ अधिष्ठाता के सकाश से प्रकृति चराचर सहित सर्वजगत को रचती है और इस हेतु से ही यह संसारचक्र घूम रहा है। ।।10।। प्रकृति तीन गुणों से मिलकर बनती है, तमोंगुण, रजोगुण और सत्वगुण। तमोगुण आवरण का प्रतीक है तो रजोगुण भ्रम का। सत्वगुण इन आवरण और भ्रम को हटाकर सत्य का ज्ञान देता है। ईश्वर की प्रकृति में इन तीनों गुणों का समावेश होता है, जिनसे इस संसार के समस्त चर और अचर की उतपत्ति होती है, उनका पोषण होता है और फिर विनाश। और फिर से ये चक्र चलता रहता है। ईश्वर स्वयम कुछ भी नहीं करता हस बल्कि उसकी परा प्रकृति ये सब करती है और ईश्वर मात्र द्रष्टा बनकर, साक्षी बनकर इन परिवर्तनों को होते देखता है। किंतु उसकी उपस्थिति इनके होते रहने के लिए अनिवार्य है। इसे आप सरल तरह से कंप्यूटर के उदाहरण से समझ सकते हैं। कंप्यूटर अपने हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर के द्वारा अपने कार्यों को करता है। लेकिन ये सभी तभी तक कार्य करते हैं जब तक विद्युत की उपस्थिति बनी रहती है। विद्युत आपूर्ति बंद होते ये स...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 9

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 9 न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय। उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥ ।।9।। हे अर्जुन! उन कर्मों में आसक्तिरहित और उदासीन के सदृश (जिसके संपूर्ण कार्य कर्तृत्व भाव के बिना अपने आप सत्ता मात्र ही होते हैं उसका नाम 'उदासीन के सदृश' है।) स्थित मुझ परमात्मा को वे कर्म नहीं बाँधते हैं। ।।9।। सूर्य की रौशनी से सभी प्रकाशित होते हैं। सूर्य के उदय के साथ जो भी सूर्य की परिधि में आता है प्रकाशित होता ही है। इस प्रकार हम देखते हैं कि सूर्य द्वारा दूसरों को प्रकाशित किया जाना, सूर्य का प्रयास सहित किया गया कर्म नहीं है बल्कि यह सूर्य की स्वाभाविक प्रकृति है। इस एक उदाहरण से हम समझ सकते हैं कि संसार का नियमित संचालन, जन्म, पालन और मृत्यु के चक्र को चलाते रहना , ये ईश्वर के द्वारा  किसी उद्देश्यपूर्वक , किसी स्वार्थ वश किये जाने वाले कर्म नहीं हैं बल्कि यह ईश्वर की प्रकृति का ही हिस्सा हैं। और इसी कारण इन कर्मों को करने के बावजूद ईश्वर को न तो कर्म बाँध पाते हैं और न ही कर्मफल। यही कर्मयोग की शिक्षा भी हमें समझाती है कि जब आप कर्म करें तो कर्मफल से बन्धे...

श्रीमद्भागवद्गीता नवम अध्याय श्लोक 7 एवम 8

श्रीमद्भागवद्गीता नवम अध्याय श्लोक 7 एवम 8 सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्‌। कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्‌॥ ।।7।। हे अर्जुन! कल्पों के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात्‌ प्रकृति में लीन होते हैं और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ। ।।7।। प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः। भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्‌॥ ।।8।। अपनी प्रकृति को अंगीकार करके स्वभाव के बल से परतंत्र हुए इस संपूर्ण भूतसमुदाय को बार-बार उनके कर्मों के अनुसार रचता हूँ। ।।8।। इस तरह से स्पष्ट है कि सृष्टि के आरम्भ में ईश्वर में सभी की उत्पत्ति और सृष्टि के अंत में उनके सभी के अंत का कारण है। सभी उसी से निकलते हैं और पुनः अंत में उसी परम् ईश्वर में विलीन हो जाते हैं। यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रहती है।       ईश्वर बारम्बार इस जगत की रचना करते हैं। बारम्बार जीव  उत्पन्न होते हैं। ब्रह्म की अपरा प्रकृति यानी माया से जगत की बारम्बारता बनी रहती है। प्रकृति जड़ है, ब्रह्म चेतना उसे गति प्रदान करती है, सो ईश्वर इस प्रकृति के अधीन जीव की बारम्बार रच...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 6

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 9 श्लोक 6 यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्‌।  तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥ ।।6।। जैसे आकाश से उत्पन्न सर्वत्र विचरने वाला महान्‌ वायु सदा आकाश में ही स्थित है, वैसे ही मेरे संकल्प द्वारा उत्पन्न होने से संपूर्ण भूत मुझमें स्थित हैं, ऐसा जान। ।।6।। ईश्वर और जीव में वैसा ही सम्बन्ध है जैसा स्पेस(आकाश) और वायु में होता है। स्पेस इन्द्रियों से अनुभूति में नहीं आता है किंतु  हर चीज स्पेस में ही होता है। इसी का उदाहरण लेकर हम समझ सकते हैं कि इस संसार में जो कुछ है वह इसी निराकार स्पेस में उत्पन्न होता है। ईश्वर ही चेतन स्पेस है जो अनुभूति में नहीं आने के बावजूद सभी चीजों को उत्पन्न करता हुआ भी उन समस्त से विलग होता है।