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श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 1 अर्जुन उवाच ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥ ।।। अर्जुन बोले- हे कृष्ण! जो मनुष्य शास्त्र विधि को त्यागकर श्रद्धा से युक्त हुए देवादिका पूजन करते हैं, उनकी स्थिति फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी या तामसी?          जब शास्त्रों के अध्ययन को धर्म मार्ग के अनुसरण का प्रमाण कहा जाता है तो फिर यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि बहुत सारे लोग तो ऐसे भी होते हैं जो या तो शास्त्रों का अध्ययन ही नहीं करते या करते भी हैं तो समझते नहीं। लेकिन इनमें से बहुतेरे मनुष्य ऐसे भी तो होते हैं जो भले शास्त्रों से या उनकी शिक्षाओं से अनभिज्ञ हों लेकिन मन में गहरी आस्था रखकर , भरोसा रखकर कर्म करते हैं। ये लोग परम्पराओं से मिली विरासत के अनुसार उन परम्पराओं पर विश्वास कर उनके अनुसार कर्म करते हैं। तो ऐसे व्यक्तियों को किस श्रेणीं में रखना चाहिए-सात्विक या राजसी या तामसिक। इसी प्रश्न को अर्जुन भी करते हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 (श्लोक रहित)

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 (श्लोकरहित) परिचय "मैं कौन हूँ?" यह प्रश्न बहुत ही जटिल है और इसी का उत्तर देती है श्रीमद्भागवद्गीता। सोलह पाठ खत्म होते होते श्रीमद्भागवद्गीता की मूल शिक्षाओं का प्रशिक्षण पूरा हो गया है। इन सोलह अध्यायों में हम सीखते हैं कि , "में कौन हूँ" और यह भी सीखते हैं कि "मैं" यानी स्वयं को पाने का मार्ग क्या है।    स्वयं को नहीं जान पाने से व्यक्ति को अपने जीवन में तो परेशानी का सामना करना ही पड़ता है, साथ ही समष्टि भी प्रभावित होती है और इस संसार का स्वरूप भी प्रभावित होता है। इस "मैं कौन हूँ" का उत्तर शास्त्रों में है। अर्थात उन महान मनीषियों के अध्ययन और उनके चिंतन में है। उनके द्वारा अनुभूत ज्ञान का संग्रह हैं शास्त्र। इन शास्त्रों के अध्ययन, श्रवण, चिंतन, मनन और उनके अभ्यास से हम जान पाते हैं कि हमारे वो मार्ग कौन से हैं जिनपर चलकर हम स्वयं को पा सकते हैं। सभी को इन शास्त्रों पर भरोसा होना चाहिए और उनपर श्रद्धा के साथ हमारा अध्ययन होना चाहिए।    स्वयं के सम्बंध में बोध के लिए अनिवार्य है कि हमारे मन का भ्रम दूर हो और मस्त...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17

परिचय "मैं कौन हूँ?" यह प्रश्न बहुत ही जटिल है और इसी का उत्तर देती है श्रीमद्भागवद्गीता। सोलह पाठ खत्म होते होते श्रीमद्भागवद्गीता की मूल शिक्षाओं का प्रशिक्षण पूरा हो गया है। इन सोलह अध्यायों में हम सीखते हैं कि , "में कौन हूँ" और यह भी सीखते हैं कि "मैं" यानी स्वयं को पाने का मार्ग क्या है।    स्वयं को नहीं जान पाने से व्यक्ति को अपने जीवन में तो परेशानी का सामना करना ही पड़ता है, साथ ही समष्टि भी प्रभावित होती है और इस संसार का स्वरूप भी प्रभावित होता है। इस "मैं कौन हूँ" का उत्तर शास्त्रों में है। अर्थात उन महान मनीषियों के अध्ययन और उनके चिंतन में है। उनके द्वारा अनुभूत ज्ञान का संग्रह हैं शास्त्र। इन शास्त्रों के अध्ययन, श्रवण, चिंतन, मनन और उनके अभ्यास से हम जान पाते हैं कि हमारे वो मार्ग कौन से हैं जिनपर चलकर हम स्वयं को पा सकते हैं। सभी को इन शास्त्रों पर भरोसा होना चाहिए और उनपर श्रद्धा के साथ हमारा अध्ययन होना चाहिए।    स्वयं के सम्बंध में बोध के लिए अनिवार्य है कि हमारे मन का भ्रम दूर हो और मस्तिष्क शांत और निर्लेप अवस्था में रहे। मन ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 परिचय

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 परिचय "मैं कौन हूँ?" यह प्रश्न बहुत ही जटिल है और इसी का उत्तर देती है श्रीमद्भागवद्गीता। सोलह पाठ खत्म होते होते श्रीमद्भागवद्गीता की मूल शिक्षाओं का प्रशिक्षण पूरा हो गया है। इन सोलह अध्यायों में हम सीखते हैं कि , "में कौन हूँ" और यह भी सीखते हैं कि "मैं" यानी स्वयं को पाने का मार्ग क्या है।    स्वयं को नहीं जान पाने से व्यक्ति को अपने जीवन में तो परेशानी का सामना करना ही पड़ता है, साथ ही समष्टि भी प्रभावित होती है और इस संसार का स्वरूप भी प्रभावित होता है। इस "मैं कौन हूँ" का उत्तर शास्त्रों में है। अर्थात उन महान मनीषियों के अध्ययन और उनके चिंतन में है।  उनके द्वारा अनुभूत ज्ञान का संग्रह हैं शास्त्र। इन शास्त्रों के अध्ययन, श्रवण, चिंतन, मनन और उनके अभ्यास से हम जान पाते हैं कि हमारे वो मार्ग कौन से हैं जिनपर चलकर हम स्वयं को पा सकते हैं। सभी को इन शास्त्रों पर भरोसा होना चाहिए और उनपर श्रद्धा के साथ हमारा अध्ययन होना चाहिए।    स्वयं के सम्बंध में बोध के लिए अनिवार्य है कि हमारे मन का भ्रम दूर हो और मस्तिष्क शांत औ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 24

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 24 तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि॥ ।।24।। इससे तेरे लिए इस कर्तव्य और अकर्तव्य की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण है। ऐसा जानकर तू शास्त्र विधि से नियत कर्म ही करने योग्य है। व्यक्ति के लिए कौन सा कर्म करने योग्य है और कौन सा नहीं इसका वर्णन श्रीकृष्ण के द्वारा अर्जुन के भ्रम को दूर करने हेतु दूसरे अध्याय में विस्तृत रूप से किया गया है। करने वाले कर्म ऐसे हैं जिनको करने से व्यक्ति स्वयं का तो भला करता हीं है साथ ही समाज का भी भला करता है। इन्हीं कर्मों को यँहा सोलहवें अध्याय में दैवी सम्पदा कहा गया है। इन कर्मों को करने से व्यक्ति भ्रम से दूर होता है और मोह, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या आदि के वशीभूत होकर अपने कर्तव्यों को नहीं करता है। इस मार्ग पर चलने से उसका मन स्वक्ष होता है, बुद्धि और विवेक भी बिना किसी बाहरी दबाव के सही निर्णय लेने की स्थिति में होते हैं। ऐसा करने से व्यक्ति जिस मार्ग पर अग्रसर होता है वही उसकी मुक्ति का मार्ग है अर्थात उसके वे गुण जिनसे उसकी अज्ञानता समाप्त होती है, उसे मोह...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 22 एवं 23

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16  श्लोक 22 एवं 23 एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः। आचरत्यात्मनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्‌॥ ।।22।। यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।  न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्‌॥ ।।23।। हे अर्जुन! इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है  इससे वह परमगति को जाता है अर्थात्‌ मुझको प्राप्त हो जाता है।     जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही।         श्रीमद्भागवद्गीता में व्यक्ति को यह समझाया गया है कि किस तरह की प्रवृत्ति होने और किस प्रकार का आचरण करने से व्यक्ति को परम् पद प्राप्त होता है अर्थात उसे मुक्ति मिलती है और किस प्रकार का आचरण करने और कौन सी प्रवृत्ति होने पर व्यक्ति का पतन होता है। पहले को दैवी सम्पद कहा गया है जो परम् पद और सुख देने वाला होता है जबकि दूसरे को आसुरी सम्पद कहा गया है जिसकी वजह से न तो सुख और शांति ही मिलती है और न ही उसका कल्याण ही होता है। यानी आसुरी स...