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Showing posts from September, 2023

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 72 से 74

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 72 कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा। कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय॥ 72।। हे पार्थ! क्या इस (गीताशास्त्र) को तूने एकाग्रचित्त से श्रवण किया? और हे धनञ्जय! क्या तेरा अज्ञानजनित मोह नष्ट हो गया? श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 73 अर्जुन उवाच नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वप्रसादान्मयाच्युत। स्थितोऽस्मि गतसंदेहः करिष्ये वचनं तव॥ 73।। अर्जुन बोले- हे अच्युत! आपकी कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने स्मृति प्राप्त कर ली है, अब मैं संशयरहित होकर स्थिर हूँ, अतः आपकी आज्ञा का पालन करूँगा। श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 74 संजय उवाच इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः। संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्‌॥ 74।। संजय बोले- इस प्रकार मैंने श्री वासुदेव के और महात्मा अर्जुन के इस अद्‍भुत रहस्ययुक्त, रोमांचकारक संवाद को सुना। मोह को भंग कर व्यक्ति को चेतन अवस्था में लाने वाले इस ज्ञान को समझाने के उपरांत श्रीकृष्ण एक समर्थ गुरु की भाँति अर्जुन से  पूछते हैं कि क्या उसने एकाग्रचित्त होकर इस ज्ञान को ग्रहण किया और क्या इससे उसका मोह भंग हुआ? श्...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 68 से 71

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 68 से 71 य इमं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति। भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः॥ 68।। न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः। भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि॥ 69।। अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः। ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः॥ 70।। श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः। सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्‌॥ 71।। जो पुरुष मुझमें परम प्रेम करके इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको ही प्राप्त होगा- इसमें कोई संदेह नहीं है। उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई भी नहीं है तथा पृथ्वीभर में उससे बढ़कर मेरा प्रिय दूसरा कोई भविष्य में होगा भी नहीं। जो पुरुष इस धर्ममय हम दोनों के संवाद रूप गीताशास्त्र को पढ़ेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञ  से पूजित होऊँगा- ऐसा मेरा मत है। जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर इस गीताशास्त्र का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा। गीता ज्ञान की वह शिक्षा ...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 67

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 67 इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥ 67।। तुझे यह गीत रूप रहस्यमय उपदेश किसी भी काल में न तो तपरहित मनुष्य से कहना चाहिए, न भक्ति-(वेद, शास्त्र और परमेश्वर तथा महात्मा और गुरुजनों में श्रद्धा, प्रेम और पूज्य भाव का नाम 'भक्ति' है।)-रहित से और न बिना सुनने की इच्छा वाले से ही कहना चाहिए तथा जो मुझमें दोषदृष्टि रखता है, उससे तो कभी भी नहीं कहना चाहिए।    गीता की शिक्षा पूरी हो चुकी है किंतु प्रश्न उठता है कि वे कौन से लोग हैं जिनके लिए यह शिक्षा उपयोगी है और जिनको इस शिक्षा का लाभ दिया जाना चाहिए।     तो यह समझें कि गीता की शिक्षा उन्हीं के लिए है जो अपने मन , भाव और शारीरिक चेष्टाओं से एकाग्र हैं और जो इस शिक्षा को प्राप्त करने के लिए अपनी ऊर्जा को एकत्रित और एकाग्र रखने के लिए ततपर हैं। साथ ही इक्षुक व्यक्ति के अंदर इस शिक्षा और ईश्वर के प्रति अनुराग और विश्वास भी होना अनिवार्य है। अगर हम शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं लेकिन उस  शिक्षा, शिक्षक के प्रति कोई विश्वास न हो तो फिर उसे शिक्षा को ...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 66

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 66 सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ 66।। संपूर्ण धर्मों को अर्थात संपूर्ण कर्तव्य कर्मों को मुझमें त्यागकर तू केवल एक मुझ सर्वशक्तिमान, सर्वाधार परमेश्वर की ही शरण (इसी अध्याय के श्लोक 62 की टिप्पणी में शरण का भाव देखना चाहिए।) में आ जा। मैं तुझे संपूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, तू शोक मत कर।

श्रीमदमागवादगीता अध्ययय 18 श्लोक 65

श्रीमदमागवादगीता अध्ययय 18 श्लोक 65 मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ 65।। हे अर्जुन! तू मुझमें मनवाला हो, मेरा भक्त बन, मेरा पूजन करने वाला हो और मुझको प्रणाम कर। ऐसा करने से तू मुझे ही प्राप्त होगा, यह मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ क्योंकि तू मेरा अत्यंत प्रिय है। जब व्यक्ति कर्मयोग, भक्तियोग, ज्ञानयोग और ध्यानयोग को एक साथ अनुसरण करता हुआ कर्मों में प्रवृत्त जीवन व्यतीत करता है तो उस परिणामतः वह कर्मों को करता हुआ भी कर्म और उनके फल को ईश्वर का अनुग्रह ही समझता है और उन्हीं पर आश्रित हुआ कर्मों को करता  है। इसका व्यवहारिक प्रदर्शन होता है कि 1.व्यक्ति ईश्वर में ही अपने चित्त को लगाए अपने सभी कर्मों को करे। प्रत्येक कर्म और उसके परिणाम को मात्र ईश्वर का अनुग्रह ही माने। 2. व्यक्ति की सारी चेष्टाएँ ईश्वर के प्रति श्रद्धा, विश्वास और प्रेम को व्यक्त करती रहें। 3. वह ईश्वर को ही साक्षी समझ कर अपने कर्म करे। 4. वह अपने हर कर्म के साथ ही ईश्वर के प्रति अपने अनुग्रह को व्यक्त करते रहे।      ऐसा करने वाला ही ईश्वर के...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 64

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 64 सर्वगुह्यतमं भूतः श्रृणु मे परमं वचः। इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्‌॥ 64।। संपूर्ण गोपनीयों से अति गोपनीय मेरे परम रहस्ययुक्त वचन को तू फिर भी सुन। तू मेरा अतिशय प्रिय है, इससे यह परम हितकारक वचन मैं तुझसे कहूँगा मोह क्यों होता है, मोह उतपन्न होने पर व्यक्ति के अंदर किस प्रकार की भावनाएँ आती हैं, उससे व्यक्ति की निर्णय क्षमता कैसे प्रभावित होती है और उसका निराकरण कैसे किया जाता है और जीवन का परम लक्ष्य क्या है इसे पूरी तरह समझा चुकने के बाद अब बारी आती है उन अति महत्वपूर्ण मर्म बातों को समझने की जिससे हमारा भला होता है। सारी बातों का निचोड़ क्या है अगर हम इस पर ध्याय केंद्रित कर पाएं तो हमारी समझ पूरी होती है। इन्हीं मर्म को समझने के लिए अति संक्षेप में हम निचोड़ को समझते हैं अब।

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 63

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 63 इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्‍गुह्यतरं मया। विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥ 63।। इस प्रकार यह गोपनीय से भी अति गोपनीय ज्ञान मैंने तुमसे कह दिया। अब तू इस रहस्ययुक्त ज्ञान को पूर्णतया भलीभाँति विचार कर, जैसे चाहता है वैसे ही कर। सँसार में जीवन जीने की कला ही श्रीमदमागवादगीता की शिक्षा है।  और इस शिक्षा का व्यवहार में अनुसरण कर हम जीवन में उस परम सुख और शांति को प्राप्त करते हैं जिसके लिए हम सब लालियत रहा करते हैं।     यह ज्ञान अति गुप्त कहा गया है। दरअसल महाभारत की कहानी में श्रीकृष्ण अर्जुन को यह ज्ञान दे रहें हैं उसका मोह छिन्न भिन्न करने के लिए। यह गान लगता है कि अर्जुन से बाहर  खड़े श्रीकृष्ण दे रहें हैं लेकिन सत्य तो यह है कि यह ज्ञान अर्जुन के भीतर, हम सब के भीतर पूर्व से मौजूद है। लेकिन अपने हठ, अपने अहंकार में हम उसे देख समझ नहीं पाते हैं। लेकिन जब हम यह ज्ञान सुनते हैं, जमते हैं तो हमें ध्यान आता है कि यह हमारे भीतर पहले से मौजूद है।        जब गीता की समझदारी देना श्रीकृष्ण शुरू करते हैं उसके पूर्व अर्...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 61

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 61 ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽजुर्न तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारुढानि मायया॥ 61।। हे अर्जुन! शरीर रूप यंत्र में आरूढ़ हुए संपूर्ण प्राणियों को अन्तर्यामी परमेश्वर अपनी माया से उनके कर्मों के अनुसार भ्रमण कराता हुआ सब प्राणियों के हृदय में स्थित है।

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 62

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 62 तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्‌॥ 62।। हे भारत! तू सब प्रकार से उस परमेश्वर की ही शरण में (लज्जा, भय, मान, बड़ाई और आसक्ति को त्यागकर एवं शरीर और संसार में अहंता, ममता से रहित होकर एक परमात्मा को ही परम आश्रय, परम गति और सर्वस्व समझना तथा अनन्य भाव से अतिशय श्रद्धा, भक्ति और प्रेमपूर्वक निरंतर भगवान के नाम, गुण, प्रभाव और स्वरूप का चिंतन करते रहना एवं भगवान का भजन, स्मरण करते हुए ही उनके आज्ञा अनुसार कर्तव्य कर्मों का निःस्वार्थ भाव से केवल परमेश्वर के लिए आचरण करना यह 'सब प्रकार से परमात्मा के ही शरण' होना है) जा। उस परमात्मा की कृपा से ही तू परम शांति को तथा सनातन परमधाम को प्राप्त होगा।

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 58

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 58 मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।  अथ चेत्वमहाङ्‍कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥ 58।। उपर्युक्त प्रकार से मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा अर्थात परमार्थ से भ्रष्ट हो जाएगा। संसार में रहकर कर्म करना अनिवार्य है। और जीवन पर्यन्त व्यक्ति को कर्म करना ही होता है। व्यक्ति सांसारिक जीवन के लिए चाहे जो भी कर्म करता हो उसके करने का रास्ता यही वो मार्ग है जिसे हमने अब तक के विवेचना में समझा है। यदि इस मार्ग पर हम चलते हैं तो हमारे जीवन में आ सकने वाली सारी कठिनाइयाँ दूर होती जाती हैं।       लेकिन यदि अहंकार वश हम इस सुझाव को नहीं मानते हैं और संसार के मोह बन्धन में बंधकर कर्म करते हैं तो फिर तय है कि हम चाहे जो सांसारिक उपलब्धि हासिल करते हों हम विफल हो कर रह जाते हैं।

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 59

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 59 यदहङ्‍कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे। मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥ 59।। जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्ध में लगा देगा। इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को बता रहे हैं कि अगर वह अहंकार के कारण युद्ध से बचने का प्रयास करेगा, तो भी उसका स्वभाव उसे युद्ध में खींच लेगा। क्योंकि अर्जुन एक क्षत्रिय हैं, और उनका स्वभाव युद्ध करना है। अर्जुन को युद्ध से बचने के लिए जो कारण लग रहे हैं, वे सभी झूठे हैं। युद्ध करना उसका कर्तव्य है, और उससे बचने से उसे कोई लाभ नहीं होगा। बल्कि, इससे वह पाप का भागी बनेगा। इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि हमें अपने स्वभाव के अनुसार ही कर्म करना चाहिए। अगर हम अपने स्वभाव के विरुद्ध कर्म करने का प्रयास करेंगे, तो हमें सफलता नहीं मिलेगी। इस श्लोक का आध्यात्मिक अर्थ  है। हमारे मन में जो भी विचार आते हैं, वे हमारे स्वभाव के अनुसार ही आते हैं। अगर हमारे मन में अहंकार है, तो हम केवल अपने बारे में ही ...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 60

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 60 स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा। कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्‌॥ 60।। हे कुन्तीपुत्र! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ परवश होकर करेगा। व्यक्ति अपने स्वभाव से बन्धा होता है, उसी के अधीन होता है। सो व्यक्ति को चाहिये कि वह गूढ़ता से अपने स्वभाव को समझे और उसका विरोध नहीं करे बल्कि उसी को परिष्कृत कर उत्थान की तरफ बढ़े। यदि स्वभाब के विपरीत जाते हैं तो सारी ऊर्जा निष्फल जाती है । मन विचलित रहता है। लेकिन स्वभाब की अच्छाई और कमियों को समझ कर उसमें लगे रहकर उसीमें आवश्यकता अनुसार परिष्करण करते हैं तो सिद्धि का मार्ग खुलता है। दूसरे की नकल करने से पतन ही होता है। शेर लोमड़ी की तरह और लोमड़ी शेर की तरह व्यवहार करने की कोशिश करे तो दोनों असफल हो जाते हैं। स्वभाव को पहचान लेने से अपने कर्मों को करने का सही तरीका भी हमें मिलता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 55

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 55 भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः। ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्‌॥ 55।। उस पराभक्ति के द्वारा वह मुझ परमात्मा को, मैं जो हूँ और जितना हूँ, ठीक वैसा-का-वैसा तत्त्व से जान लेता है तथा उस भक्ति से मुझको तत्त्व से जानकर तत्काल ही मुझमें प्रविष्ट हो जाता है। जब व्यक्ति के अंदर कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग और ध्यानयोग से अपने वास्तविक सत्य की प्राप्ति होती है यानी  इस प्रकार से वह अपनी ही आत्मा को, आत्मस्वरूप को जानता है तो इसी को पराभक्ति या परम् ज्ञान कहते हैं जिसके माध्यम से वह ईश्वर को उसके समस्त तत्वों से पहचान कर उन्हीं में विलीन हो जाता है।  वह ईश्वर को उनके निर्गुण स्वरूप को सगुन स्वरूप को प्राप्त होता है।    जब तक आप अपने "मैं" और मेरा को ढोते हैं तब तक आप इस स्तर पर नहीं पहुँचते हैं और तब तक आपको कर्म, ज्ञान,भक्ति और ध्यान योग के रास्ते चलना ही होता है।    मैं और मेरा के त्याग का एकमात्र मार्ग यही योग है जिसपर चलकर आप ईश्वरत्व को प्राप्त कर  उसी ब्रह्म से एकाकार हो परम् शांति को प्राप्त होत...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 56, 57

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 56 57 सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः। मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्‌॥ 56।। चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः। बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव॥ 57।। मेरे परायण हुआ कर्मयोगी तो संपूर्ण कर्मों को सदा करता हुआ भी मेरी कृपा से सनातन अविनाशी परमपद को प्राप्त हो जाता है। सब कर्मों को मन से मुझमें अर्पण करके (गीता अध्याय 9 श्लोक 27 में जिसकी विधि कही है) तथा समबुद्धि रूप योग को अवलंबन करके मेरे परायण और निरंतर मुझमें चित्तवाला हो परम् गति मोक्ष को कहते हैं और मोक्ष वह अवस्था है जब कर्म के बंधन से मुक्ति मिल जाता है। तो क्या मोक्ष प्राप्ति के बाद कर्म नहीं करना होता है? नहीं ये तात्पर्य नहीं है। जीवन पर्यंत कर्म तो करना ही है लेकिन मोक्ष के पूर्व हमारे कर्म गुणों से प्रभावित होते हैं और उस अवस्था में हम कर्म करते हुए कर्म के बन्धन से बंधे होते हैं। लेकिन परम् सिद्धि की अवस्था आते ही हमारे कर्म  हमारे गुणों से पूरी तरह मुक्त हो जाते हैं और फिर हमारे कर्म हमें बाँधते नहीं है।           लेकिन इस अवस्था तक...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 54

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 54 ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम्‌॥ 54।। फिर वह सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में एकीभाव से स्थित, प्रसन्न मनवाला योगी न तो किसी के लिए शोक करता है और न किसी की आकांक्षा ही करता है। ऐसा समस्त प्राणियों में समभाव वाला (गीता अध्याय 6 श्लोक 29 में देखना चाहिए) योगी मेरी पराभक्ति को ( जो तत्त्व ज्ञान की पराकाष्ठा है तथा जिसको प्राप्त होकर और कुछ जानना बाकी नहीं रहता वही यहाँ पराभक्ति, ज्ञान की परानिष्ठा, परम नैष्कर्म्यसिद्धि और परमसिद्धि इत्यादि नामों से कही गई है) प्राप्त हो जाता है।        और जब व्यक्ति उक्त कहे ढंग से यानी कर्मयोग, ज्ञानयोग, भक्ति योग और ध्यान योग के माध्यम से परम् सुख और परम् शांति कि अवस्था को प्राप्त होता है तब वह ब्रहम्मय हो जाता है। यही उसकी परम् प्राप्ति जिसे मोक्ष भी कहते हैं कि अवस्था होती है जब  उसको किसी के लिए न तो शोक रह जाता है और न ही उसे किसी की कोई कामना रह जाती है बल्कि वह तो इन सभी से मुक्त स्व में अवस्थित सभी को समान रूप से देखता है। वह स्वयं को दूसरो...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 51, 52 एवं 53

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 51, 52 एवं 53 बुद्ध्‌या विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च। शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च॥ 51।। विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस। ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः॥ 52।। अहङकारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्‌। विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते॥ 53।। विशुद्ध बुद्धि से युक्त तथा हलका, सात्त्विक और नियमित भोजन करने वाला, शब्दादि विषयों का त्याग करके एकांत और शुद्ध देश का सेवन करने वाला, सात्त्विक धारण शक्ति के (इसी अध्याय के श्लोक 33 में जिसका विस्तार है) द्वारा अंतःकरण और इंद्रियों का संयम करके मन, वाणी और शरीर को वश में कर लेने वाला, राग-द्वेष को सर्वथा नष्ट करके भलीभाँति दृढ़ वैराग्य का आश्रय लेने वाला तथा अहंकार, बल, घमंड, काम, क्रोध और परिग्रह का त्याग करके निरंतर ध्यान योग के परायण रहने वाला, ममतारहित और शांतियुक्त पुरुष सच्चिदानन्दघन ब्रह्म में अभिन्नभाव से स्थित होने का पात्र होता है। कर्मयोग के मार्ग पर चलने से व्यक्ति की बुद्धि और अंतःकरण शुद्ध होते हैं और तब वह आत्मसाक्षातकार की तरफ बढ़ता है जँहा वह स्वयं को...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 50

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 50 सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे। समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा॥ 50।। जो कि ज्ञान योग की परानिष्ठा है, उस नैष्कर्म्य सिद्धि को जिस प्रकार से प्राप्त होकर मनुष्य ब्रह्म को प्राप्त होता है, उस प्रकार को हे कुन्तीपुत्र! तू संक्षेप में ही मुझसे समझ। कर्मयोग से कर्म करते हुए व्यक्ति का मन स्वक्ष होते जाता है। मन की स्वक्षता का अर्थ है कि उसे राग-द्वेष, हर्ष-विषाद, काम, क्रोध, लोभ मद ,अज्ञानता, आदि से मुक्ति। इस अवस्था में जब मन आ जाता है तो उसे शुद्ध और स्वक्ष मन की अवस्था कहते हैं। मन की इस अवस्था में मन सदा प्रसन्न और सुखी रहता है, उसकी प्रसन्नता और उसके सुख के लिए कोई पूर्व शर्त नहीं होती है।         वस्तुतः व्यक्ति स्वयं ही ब्रह्म है लेकिन वह स्वयं ही इस सत्य से अनजान होता है और ईश्वर की प्राप्ति, स्थाई शांति और सुख की प्राप्ति के लिए बाहरी अवयवो को खोजते रहता है। जो आपके अंदर है वह भला बाहर कंहा मिलेगा, सो उसके सारे प्रयास निरर्थक हो जाते हैं।        लेकिन जब व्यक्ति कर्मयोग के अनुसार कर्...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 49

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 49 असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः। नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सन्न्यासेनाधिगच्छति॥ 49।। सर्वत्र आसक्तिरहित बुद्धिवाला, स्पृहारहित और जीते हुए अंतःकरण वाला पुरुष सांख्ययोग के द्वारा उस परम नैष्कर्म्यसिद्धि को प्राप्त होता है। व्यक्ति बिना कर्म किये तो रह नहीं सकता है तो फिर वह कौन सा मार्ग है, वह कौन सी समझ है जिसके अनुसार वह अपना स्वाभाविक कर्म करे कि कर्म करते हुए भी कर्म बन्धन में नहीं पड़े।    तो इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अपना स्वाभाविक कर्म तो करे किंतु उस कर्म और उसके फल से बंधे नहीं। यानी उसे कर्म सहज रूप में करने होते है और कर्म मैं कर रहा हूँ इस भाव से उसे मुक्त होना चाहिए। यह तभी हो सकता है जब कर्म  करते हुए भी कर्म करने में उसे स्वयं न दिखे बल्कि उसे लगे कि यही तो करना है। कर्म में मैं कर रहा हूँ और यह मेरा कर्म है इससे मुक्त हो। जैसे ही लगता है कि मैं ही कर रहा हूँ उसी समय उस कर्म के साथ व्यक्ति का मोह, लोभ, अहंकार, घृणा , वासना आदि जुड़ जाते हैं और वह कर्म फल से बन्धते जाता है और उसकी आसक्ति कर्म में बढ़ जाती है, सो वह ...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 48

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 48 सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्‌। सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः॥ 48।। अतएव हे कुन्तीपुत्र! दोषयुक्त होने पर भी सहज कर्म  नहीं त्यागना चाहिए, क्योंकि धूएँ से अग्नि की भाँति सभी कर्म किसी-न-किसी दोष से युक्त हैं। प्रत्येक व्यक्ति के कर्म उसके गुणों से आते हैं और यही तीनो गुणों से प्रकृति बनती है। जब तक व्यक्ति अपने स्वाभाविक प्रभावकारी गुणों में अभ्यास पूर्वक बदलाव नहीं लाता है तब तक उसके कर्म उसके तत्समय प्रभावी गुण के अनुसार ही होते हैं और इसी गुण के अनुसार किया जाने वाला कर्म व्यक्ति के द्वारा निपुणता और दक्षता के साथ किया जा सकता है। जो कर्म उसके सहज नहीं है उसमें उसकी निपुणता और दक्षता भी नहीं होती है या फिर निम्न कोटि की होती है और तब ऐसा कर्म किया जाए तो न तो कर्म ढंग से सम्पादित होगा और न हीं अभीष्ट की प्राप्ति ही होगी।       इसी लिए व्यक्ति को चाहिए कि सब अपना स्वाभाविक कर्म ही करे, नकल न करे किसी की।जब तक कोई अन्य गुण साधना से आत्मसात कर उसे अपने स्वभाव में नहीं ढाल लें तब तक कोई प्रयास न करें क्योंकि तब वह प्...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 47

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 47 श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌। स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्‌॥ 47।। अच्छी प्रकार आचरण किए हुए दूसरे के धर्म से गुणरहित भी अपना धर्म श्रेष्ठ है, क्योंकि स्वभाव से नियत किए हुए स्वधर्मरूप कर्म को करता हुआ मनुष्य पाप को नहीं प्राप्त होता। व्यक्ति बिना कर्म किये तो रह नहीं सकता है और कर्म जब कर्मयोग के मार्ग से किया जाता है तो वही कर्म कर्मबन्धन से मुक्त हो पाता है। कर्मों को त्यागने से कोई किसी का कल्याण सम्भव ही नहीं है। कर्म को कर्मयोग से करने की एक अन्य विशेषता है कि व्यक्ति को उसी भाव से कर्म करना चाहिए जिस भाव से उसका स्वभाव निर्मित है। प्रत्येक व्यक्ति सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के भिन्न भिन्न मात्रा के अनुपात से उसका स्वभाव बनता है। जो गुण सबसे प्रभावी है स्वभाव में उसी के अनुसार कर्म करना चगये। प्रत्येक भाव से ईश्वर की प्राप्ति सम्भव है जब उस भाव से कर्म किया जाए। यदि किसी व्यक्ति में क्षत्रिय का गुण सर्वाधिक है और वह ब्राह्मण के स्वभाव का कर्म करना चाहता है तो वह न अपने स्वाभाविक कर्म को कर पाता है और न वह ब्राह्म...

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 46

श्रीमदमागवादगीता अध्याय 18 श्लोक 46 यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्‌। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥ 46।। जिस परमेश्वर से संपूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह समस्त जगत्‌ व्याप्त है  उस परमेश्वर की अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा पूजा करके मनुष्य परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है।  हर तरह के प्राणी को अपने स्वाभाव जनित कर्म ही करना चाहिए भले उसके सांसारिक कर्म कोई भी हों। लेकिन ये तो मात्र कर्म हुए । इन कर्मों को करें कैसे कि ये कर्म कर्मतोग के अनुसार हो पाएं? तो कर्मों को करने में कुछ बातों को ध्यान में रखना अनिवार्य हैं।       इस संसार की गति सर्वोच्च सत्य से ही निर्धारित होती है। सर्वोच्च सत्य ही विभिन्न नामों से जाना जाता है, जैसे ईश्वर, भगवान, परमात्मा, आदि। यही हमारी परम् चेतना है। सभी कुछ इसे से उतपन्न होता है और अपने अंत में फिर उसी में समाहित हो जाता है। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। सागर की लहरें सागर के जल से निकलती हैं, उसी में उनका अस्तिव दिखता है और फिर उसी में वे विलीन हो जाती हैं। सागर की लहरों के लिए सागर का जल ही सर्व...