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Showing posts from June, 2022

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 8

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12, श्लोक 8 मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः॥ ।।8।। मुझमें मन को लगा और मुझमें ही बुद्धि को लगा, इसके उपरान्त तू मुझमें ही निवास करेगा, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। ईश्वरीय उपासना की विधि क्या हो, इसे समझना भी आवश्यक है। व्यक्ति के लिए सरोत्तम मार्ग है कि वह अपने मन, इन्द्रिय, बुद्धि और चित्त से ईश्वर का निरंतर स्मरण करे। ईश्वर का स्मरण करने का तरीका भिन्न हो सकता है , कोई नाम जपकर करे, कोई पूजा कर के करे लेकिन जिस विधि से व्यक्ति ईश्वर का ध्यान करता है उसकी इन्द्रियाँ उसे ग्रहण कर उसे स्पंदित करती हैं। अब भला कोई निरन्तर ईश्वर के नाम का जप कैसे करे या पूजा पाठ कैसे करे। इसका सबसे उत्तम मार्ग है कि व्यक्ति को ईश्वरीय ध्यान की आदत अपने कर्मों में ढाल लेनी चाहिए। उसे चाहिये कि वह इस समझ को अपने अंदर गहरे बैठा ले कि उसका जो भी कर्म है वह उसे ईश्वरीय निर्देश पर कर रहा है और उसके सभी कर्मों के एक मात्र उद्देश्य ईश्वर ही हैं। जब व्यक्ति इस प्रकार  ईश्वरीय ध्यान के साथ अपने समस्त कर्मों को करता है तो ईश्वर का निरन्तर चिंतन म...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12, श्लोक 6 एवं 7

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12, श्लोक 6 एवम 7 ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि सन्नयस्य मत्पराः। अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते॥ ।।6।। तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात्‌। भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम्‌॥ ।।7।। परन्तु जो मेरे परायण रहने वाले भक्तजन सम्पूर्ण कर्मों को मुझमें अर्पण करके मुझ सगुणरूप परमेश्वर को ही अनन्य भक्तियोग से निरन्तर चिन्तन करते हुए भजते हैं। हे अर्जुन! उन मुझमें चित्त लगाने वाले प्रेमी भक्तों का मैं शीघ्र ही मृत्यु रूप संसार-समुद्र से उद्धार करने वाला होता हूँ। सगुण और निर्गुण उपासना के महत्व को समझाते हुए श्रीकृष्ण ये स्पष्ट कर चुके हैं कि हालांकि दोनों ही उपासना विधि में अंतिम रूप से ईश्वर ही प्राप्त होते है,किन्तु निर्गुण उपासना के बनिस्पत सगुण उपासना विधि ज्यादा सरल है।    अब ये समझने की जरूरत है कि श्रीकृष्ण जिस सगुण उपासना की बात कर रहें हैं वो है क्या। बहुधा सगुण उपासना का अर्थ लोग ये लगाते हैं कि भगवान की तस्वीर या मूर्ति लगा ली और उसके सामने बैठकर भजन पूजन करने लगे, जो सगुण उपासना है। इस भ्रम को श्रीकृष्ण यंहा तोड़ देते हैं।     ...

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 5

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 5 क्लेशोऽधिकतरस्तेषामव्यक्तासक्तचेतसाम्‌। अव्यक्ता हि गतिर्दुःखं देहवद्भिरवाप्यते॥ ।।5।। उन सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म में आसक्त चित्तवाले पुरुषों के साधन में परिश्रम विशेष है क्योंकि देहाभिमानियों द्वारा अव्यक्तविषयक गति दुःखपूर्वक प्राप्त की जाती है । सगुण और निर्गुण दोनों तरह की उपासना का परिणाम ईश्वर की प्राप्ति ही है। किंतु निर्गुण उपासना का मार्ग थोड़ा कठिन है। दरअसल व्यक्ति अपने शरीर और शरीर से जुड़ी अपनी पहचान और आवश्यकताओं से आसानी से मुक्त नहीं हो पाता है। दूसरी तरफ ईश्वर की उपासना में व्यक्ति को अपनी फहचान को ईश्वर के साथ विलीन करना होता है। इन दोनों के बीच मनुष्य का सामंजन बैठाने में कठिनाई आती ही है। सांसारिक जीवन जीते हुए इस सामंजन को प्राप्त करने के मार्ग में कई तरह की बाधाएँ भी आती हैं जिनमें प्रमुख निम्न हैं अविद्या यानी ignorance of reality at all levels ,lack of understanding wrong decisions अस्मिता यानी notion about I, notions of others about me. There may be diff in two notions.we hv to drop our notion about I. Identity. राग यानी a...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 3 एवम 4

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 3 एवम 4 ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते। सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम्‌॥ ।।3।। सन्नियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः। ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः॥ ।।4।। परन्तु जो पुरुष इन्द्रियों के समुदाय को भली प्रकार वश में करके मन-बुद्धि से परे, सर्वव्यापी, अकथनीय स्वरूप और सदा एकरस रहने वाले, नित्य, अचल, निराकार, अविनाशी, सच्चिदानन्दघन ब्रह्म को निरन्तर एकीभाव से ध्यान करते हुए भजते हैं, वे सम्पूर्ण भूतों के हित में रत और सबमें समान भाववाले योगी मुझको ही प्राप्त होते हैं। किन्तु कुछ उपासक भगवान को उनके व्यक्त रूप में नहीं बल्कि अव्यक्त रूप में भजते हैं। ऐसे उपासक ईश्वर को किसी रूप विशेष में नहीं देखते हैं। उनके लिए ईश्वर  रूप विहीन, आकार विहीन होते हैं। वे प्रभु को भजने के लिए वे प्रभु के उन लक्षणों का ध्यान करते हैं जिनसे उनको प्रभु की समझ तो बनती ही है साथ साथ वे अपने अस्तित्व को भी अलग न मानकर उसी परम् पिता परमेश्वर का अंश मात्र मानते हैं और इस प्रकार वे स्वयं के ईगो और स्वयं की पहचान से मुक्त होकर ईश्वर को उनके महान लक्षणो...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 2

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 12 श्लोक 2 श्रीभगवानुवाच मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते। श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥ ।।2।। श्री भगवान बोले- मुझमें मन को एकाग्र करके निरंतर मेरे भजन-ध्यान में लगे हुए जो भक्तजन अतिशय श्रेष्ठ श्रद्धा से युक्त होकर मुझ सगुणरूप परमेश्वर को भजते हैं, वे मुझको योगियों में अति उत्तम योगी मान्य हैं। अर्जुन के प्रश्न के उत्तर में श्रीकृष्ण ने स्पष्ट कर दिया है कि जो ईश्वर को उनके ठोस रूप में, उनके स्वरूप में उनके गुणों के रूप में पूजते हैं वे ईश्वर के विशेष प्रिय होते हैं। तो क्या इसका अर्थ ये निकालना चाहिए कि जो ईश्वर की मूर्ति गढ़कर , उसे मंदिरों में स्थापित कर पूजते भजते हैं वे ही श्रेष्ठ हैं? नहीं , कदापि नहीं। दरअसल ध्यान देना होगा कि श्रीकृष्ण कह क्या रहें हैं और अबतक क्या क्या कहें हैं। दरअसल ईश्वर अपने सगुन रूप में सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं और प्रत्येक जीव में , प्रत्येक निर्जीव में ईश्वर व्याप्त है। ईश्वरीय विभूतियों का वर्णन करते हुए और ईश्वर के विश्वरूप का दर्शन कराते हुए श्रीकृष्ण स्पष्ट कर चुके हैं कि सम्पूर्ण ब्रह्मांड ही ईश्...

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोकरहित

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 परिचय अहम ब्रह्मास्मि। मैं ब्रह्म हूँ। लेकिन इस महा वाक्य तक व्यक्ति पहुँचता कैसे है? क्या मात्र इस वाक्य को दुहराते रहने से यह आत्मसात हो जाता है? नहीं। इस सत्य तक पहुंचाने के तीन क्रम हैं। 1.स्व यानी सेल्फ क्या है यानी मैं कौन हूँ? 2. ब्रह्म कौन है? 3.स्व और ब्रह्म एक कैसे हैं?     स्व यानी सेल्फ क्या है इसकी व्याख्या श्रीमद्भागवादगीता के प्रथम छह अध्यायों में यानी अध्याय एक से छह तक में है ।     ब्रह्म कौन है, इसकी व्याख्या श्रीमद्भागवादगीता के दूसरे छह अध्यायों यानी सातवें से बारहवें अध्याय तक में है।    स्व और ब्रह्म दोनों एक हैं , इसकी व्याख्या अंतिम छह अध्यायों यानी तेरहवें से अठारहवें अध्याय तक में है।       स्व की प्राप्ति के मार्ग की परिणति छठे अध्याय में व्यक्त ध्यान की क्रिया से होती है तो ब्रह्म की समझ बारहवें अध्याय के भक्ति मार्ग से पूरी होती है।       और सब का ब्रह्म से संयोग अठारहवें अध्याय के त्याग से पूरी होती है।        सो हम अभ...

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 परिचय अहम ब्रह्मास्मि। मैं ब्रह्म हूँ। लेकिन इस महा वाक्य तक व्यक्ति पहुँचता कैसे है? क्या मात्र इस वाक्य को दुहराते रहने से यह आत्मसात हो जाता है? नहीं। इस सत्य तक पहुंचाने के तीन क्रम हैं। 1.स्व यानी सेल्फ क्या है यानी मैं कौन हूँ? 2. ब्रह्म कौन है? 3.स्व और ब्रह्म एक कैसे हैं?     स्व यानी सेल्फ क्या है इसकी व्याख्या श्रीमद्भागवादगीता के प्रथम छह अध्यायों में यानी अध्याय एक से छह तक में है ।     ब्रह्म कौन है, इसकी व्याख्या श्रीमद्भागवादगीता के दूसरे छह अध्यायों यानी सातवें से बारहवें अध्याय तक में है।    स्व और ब्रह्म दोनों एक हैं , इसकी व्याख्या अंतिम छह अध्यायों यानी तेरहवें से अठारहवें अध्याय तक में है।       स्व की प्राप्ति के मार्ग की परिणति छठे अध्याय में व्यक्त ध्यान की क्रिया से होती है तो ब्रह्म की समझ बारहवें अध्याय के भक्ति मार्ग से पूरी होती है।       और सब का ब्रह्म से संयोग अठारहवें अध्याय के त्याग से पूरी होती है।        सो हम अभ...

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 1

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 श्लोक 1 अर्जुन उवाच एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते। ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाः॥ अर्जुन बोले- जो अनन्य प्रेमी भक्तजन पूर्वोक्त प्रकार से निरन्तर आपके भजन-ध्यान में लगे रहकर आप सगुण रूप परमेश्वर को और दूसरे जो केवल अविनाशी सच्चिदानन्दघन निराकार ब्रह्म को ही अतिश्रेष्ठ भाव से भजते हैं- उन दोनों प्रकार के उपासकों में अति उत्तम योगवेत्ता कौन हैं?                    ईश्वर की प्राप्ति के दो मार्ग सुझाये गए हैं। एक है, ईश्वर को उनके  रूप में ध्यान कर भजना तो दूसरे मार्ग में ईश्वर को निराकार रूप में ध्यान किया जाता है।  श्रीमद्भागवादगीता में भी श्रीकृष्ण ने  अर्जुन को दोनों विधि कहा है।  निराकरर ब्रह्म की आराधना में ईश्वर को आकार रहित पाकर उनके अविनाशी, निर्गुण, अक्षर स्वरूप को ध्यान में लाया जाता है  साधक प्रभु को उस निराकार स्वरूप में ध्यान में लाता है। दूसरी तरह  ईश्वर का ठोस जीव रूप भी है जिनको ध्यान में धरकर साधक प्रभु को भजता है।         ...

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 परिचय

श्रीमद्भागवादगीता अध्याय 12 परिचय अहम ब्रह्मास्मि। मैं ब्रह्म हूँ। लेकिन इस महा वाक्य तक व्यक्ति पहुँचता कैसे है? क्या मात्र इस वाक्य को दुहराते रहने से यह आत्मसात हो जाता है? नहीं। इस सत्य तक पहुंचाने के तीन क्रम हैं। 1.स्व यानी सेल्फ क्या है यानी मैं कौन हूँ? 2. ब्रह्म कौन है? 3.स्व और ब्रह्म एक कैसे हैं?     स्व यानी सेल्फ क्या है इसकी व्याख्या श्रीमद्भागवादगीता के प्रथम छह अध्यायों में यानी अध्याय एक से छह तक में है ।     ब्रह्म कौन है, इसकी व्याख्या श्रीमद्भागवादगीता के दूसरे छह अध्यायों यानी सातवें से बारहवें अध्याय तक में है।    स्व और ब्रह्म दोनों एक हैं , इसकी व्याख्या अंतिम छह अध्यायों यानी तेरहवें से अठारहवें अध्याय तक में है।       स्व की प्राप्ति के मार्ग की परिणति छठे अध्याय में व्यक्त ध्यान की क्रिया से होती है तो ब्रह्म की समझ बारहवें अध्याय के भक्ति मार्ग से पूरी होती है।       और सब का ब्रह्म से संयोग अठारहवें अध्याय के त्याग से पूरी होती है।        सो हम अभी बारहवें अध्याय के मुहाने प...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 54 एवं 55

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 54 एवं 55 भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप॥ ।।54।। परन्तु हे परंतप अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा इस प्रकार चतुर्भुज रूपवाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिए, तत्व से जानने के लिए तथा प्रवेश करने के लिए अर्थात एकीभाव से प्राप्त होने के लिए भी शक्य हूँ। ।।54।। मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्‍गवर्जितः। निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव॥ ।।55।। हे अर्जुन! जो पुरुष केवल मेरे ही लिए सम्पूर्ण कर्तव्य कर्मों को करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्तिरहित है और सम्पूर्ण भूतप्राणियों में वैरभाव से रहित है , वह अनन्यभक्तियुक्त पुरुष मुझको ही प्राप्त होता है। ।।55।।            ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नामैकादशोऽध्यायः ईश्वर को प्राप्त करने , उन्हें उनके विराट स्वरूप में अनुभूत करने का क्या मार्ग है? कर्म , ज्ञान और तप के मार्ग हमें ईश्वर की तरफ ले तो जाते हैं किंतु एक सीमा के बाद उनकी उपलब्धि रु...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 52, 53

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 52, 53  श्रीभगवानुवाच सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम। देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्‍क्षिणः॥ ।।52।। नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया। शक्य एवं विधो द्रष्टुं दृष्ट्वानसि मां यथा॥ ।।53।। श्री भगवान बोले- मेरा जो चतुर्भज रूप तुमने देखा है, वह सुदुर्दर्श है अर्थात्‌ इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं। देवता भी सदा इस रूप के दर्शन की आकांक्षा करते रहते हैं। ।।52।। जिस प्रकार तुमने मुझको देखा है- इस प्रकार चतुर्भुज रूप वाला मैं न वेदों से, न तप से, न दान से और न यज्ञ से ही देखा जा सकता हूँ। ।।53।। अब प्रश्न उठता है कि ईश्वर की साक्षात अनुभूति किस तरह से हो सकती है। तो स्पष्ट जानें कि किसी एक मार्ग से ईश्वरीय अनुभूति होना सम्भव नहीं है। ज्ञान हो, कर्म, यज्ञ हो, किसी एक में आप पारंगत हो सकते हैं, आप सिद्ध हो सकते हैं लेकिन कोई एक मार्ग आपको ईश्वरीय साक्षात्कार से परिचित नहीं कराता है। तो क्या ज्ञान का मार्ग अथवा कर्म का मार्ग बेकार हैं? नहीं उनकी महत्ता है, दो तरह की महत्ता है। पहला तो ये कि ज्ञान और कर्म हमें ईश्वरीय पथ पर आगे बढ़ने का रास्ता सुझ...

श्रीमद्भागवादगीत अध्याय 11 श्लोक 51

श्रीमद्भागवादगीत अध्याय 11 श्लोक 51 अर्जुन उवाच दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन। इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः॥ ।।51।। अर्जुन बोले- हे जनार्दन! आपके इस अतिशांत मनुष्य रूप को देखकर अब मैं स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थिति को प्राप्त हो गया हूँ। ।।51।। ईश्वर को पुनः मानव रूप में देख कर अर्जुन की घबराहट, उसका भय, उसकी अकुलाहट दूर हो जाती है। व्यक्ति को ईश्वर की विभूतोयों से लगाव तो होता है लेकिन उनके विकराल रूप से भय भी होता है। दरअसल व्यक्ति ईश्वर के साथ अधिक सुगमता से तभी तारतम्य बना पाता है जब वह ईश्वरीय स्वरूप को अपनी तरह के स्वरूप का ही पाता है। अन्यथा ईश्वर के विकराल स्वरूप से उसकी दूरी भय या आसक्ति से बढ़ जाती है। यही वजह है कि अर्जुन ईश्वर को मानव रूप में पुनः वापस देखकर शांति और महसूस करता है, वह आश्वस्त होता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 50

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 50 संजय उवाच इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः। आश्वासयामास च भीतमेनंभूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा॥ ।।50।। संजय बोले- वासुदेव भगवान ने अर्जुन के प्रति इस प्रकार कहकर फिर वैसे ही अपने चतुर्भुज रूप को दिखाया और फिर महात्मा श्रीकृष्ण ने सौम्यमूर्ति होकर इस भयभीत अर्जुन को धीरज दिया। ।।50।। ईश्वर के साम्य स्वरूप का ध्यान कर व्यक्ति शांत हो जाता है। प्रभु के विकराल स्वरूप, उनके चतुर्भुज स्वरूप और पुनः उनके मानव स्वरूप में क्रमशः लौटने का क्रम व्यक्ति को यह ध्यान दिलाता है कि जो ब्रह्मांडीय सत्य है वही तो प्रकट में वो है, उसी का अंश है। ईश्वर ही समस्त ब्रह्मांड भी है और वही एक सामान्य स्वरूप में स्थित इकाई भी है। सो ईश्वर के हर स्वरूप के प्रति उसका समर्पण ही उसकी आराधना है। और इसी मार्ग से व्यक्ति साम्य को प्राप्त करता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 49

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 49 मा ते व्यथा मा च विमूढभावोदृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्‍ममेदम्‌। व्यतेपभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वंतदेव मे रूपमिदं प्रपश्य॥ ।।49।। मेरे इस प्रकार के इस विकराल रूप को देखकर तुझको व्याकुलता नहीं होनी चाहिए और मूढ़भाव भी नहीं होना चाहिए। तू भयरहित और प्रीतियुक्त मनवाला होकर उसी मेरे इस शंख-चक्र-गदा-पद्मयुक्त चतुर्भुज रूप को फिर देख। ।।49।। ईश्वर तो निर्माण और संहार दोनों के ही कारण हैं, दोनों की उत्पत्ति उन्हीं से होती है सो प्रभु के विकराल स्वरूप जो महाकाल को।अभिव्यक्त करता है उससे भयभीत नहीं होना चाहिए और व्यक्ति को चाहिए कि वह मन में साम्य अवस्था(equaniminous state) बनाये रख कर प्रभु के प्रति समर्पित रहे।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 48

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 48 न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः। एवं रूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर॥ ।।48।। हे अर्जुन! मनुष्य लोक में इस प्रकार विश्व रूप वाला मैं न वेद और यज्ञों के अध्ययन से, न दान से, न क्रियाओं से और न उग्र तपों से ही तेरे अतिरिक्त दूसरे द्वारा देखा जा सकता हूँ। ।।48।। भगवान के विराट रूप के दर्शन से अर्जुन सम्मोहित भी हुआ, पुलकित भी हुआ और व्याकुल भी हुआ लेकिन श्रीकृष्ण ने उसे समझाया है कि व्याकुलता सही नहीं है। ईश्वर की समस्त विभूतियों को एक साथ उनके दिव्य रूप में जान लेना किसी भी तरह के ज्ञान, यज्ञ या तप या किसी भी अन्य क्रिया से सम्भव नहीं है। 

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 47

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 47 श्रीभगवानुवाच मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदंरूपं परं दर्शितमात्मयोगात्‌। तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यंयन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम्‌॥ ।।47।। श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! अनुग्रहपूर्वक मैंने अपनी योगशक्ति के प्रभाव से यह मेरे परम तेजोमय, सबका आदि और सीमारहित विराट् रूप तुझको दिखाया है, जिसे तेरे अतिरिक्त दूसरे किसी ने पहले नहीं देखा था। ।।47।। अर्जुन के आग्रह पर श्रीकृष्ण का कथन है कि ईश्वर के विश्वरूप का उसे इसलिए दर्शन हो सका क्योंकि ईश्वर की ही अनुकम्पा उसपर है। जिस किसी को ईश्वरीय विभूति पर अर्जुन सरीखा विश्वास होता है, उनके प्रति श्रद्धा होती है उसे ही  ईश्वर के इस विश्वरूप की अनुभूति की कृपा मिल सकती है। वही व्यक्ति ईश्वर के इस परम् तेजमयी , अनंत स्वरूप को देख सकता है। तात्पर्य है कि  हमें ईश्वर को उसकी सम्पूर्णता के साथ समझने के लिए अनिवार्य है कि ईश्वर के प्रति हमारे मन में अगाध श्रद्धा हो , उनके प्रति समर्पण हो । उस स्थिति में व्यक्ति ईश्वर को उंसके सभी शक्तियों के साथ देख समझ पाता है, जान पाता है कि ईश्वर ही सब का प्रारम्भ, अंत और हेतु है और...