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Showing posts from January, 2023

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 9

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 9 एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः। प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥ ।।9।। इस मिथ्या ज्ञान को अवलम्बन करके- जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है तथा जिनकी बुद्धि मन्द है, वे सब अपकार करने वाले क्रुरकर्मी मनुष्य केवल जगत्‌ के नाश के लिए ही समर्थ होते हैं। 3. प्रत्येक व्यक्ति का अपना एक दृष्टिकोण होता है। वह एक खास तरह से स्वयं के बारे में , इस संसार के बारे में और ईश्वर के बारे में एक धारणा रखता है। जब व्यक्ति की धारणा उसके आसुरी स्वभाव से प्रभावित होती है तब वह व्यक्ति स्वार्थ और कामनाओं  के अँधेरे में पड़ जाता है और उसकी भ्रष्ट हुई बुद्धि कोई भी विवेकपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम नहीं होती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति मात्र अपने स्वार्थ सिद्धि और अपने कामनाओं और इक्षाओं को पूरा करने हेतु किसी के विरुद्ध किसी भी स्तर तक चला जाता है जिसमें वह अपने ही परिवेश का भी नाश कर देने से नहीं हिचकिचाता है। स्वार्थ, लोभ, असत्य, हिंसा, दुराचरण आदि ही इस तरह के व्यक्ति के संचालक होते हैं जो नाशकारी होते हैं।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 8

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 8 असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम्‌। अपरस्परसम्भूतं किमन्यत्कामहैतुकम्‌॥ ।।8।। वे आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य कहा करते हैं कि जगत्‌ आश्रयरहित, सर्वथा असत्य और बिना ईश्वर के, अपने-आप केवल स्त्री-पुरुष के संयोग से उत्पन्न है, अतएव केवल काम ही इसका कारण है। इसके सिवा और क्या है? 2.जिन व्यक्तियों को आसुरी प्रकृति का समझा जाता है उनका अन्य लक्षण होता है कि ऐसे लोग मानते हैं कि इस संसार में कुछ भी सत्य नहीं है बल्कि सब कुछ लाभ-हानि के समीकरण से संचालित होता है। ऐसे लोग यह मानते हैं कि सब कुछ  वैसा ही होता है जैसा मनुष्यों की इक्षाएँ और वासनाएँ चाहती हैं । उनके अनुसार संसार में ऐसा नहीं है कि कोई ईश्वर है जो इसे संचालित करता है। ये लोग अच्छाई को नकारते हुए मात्र कामनाओं की पूर्ति को ही परम् लक्ष्य मानते हैं और उसी के अनुरूप उनकी बुद्धि भी होती है और कर्म भी। 

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 7

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 7 प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च जना न विदुरासुराः। न शौचं नापि चाचारो न सत्यं तेषु विद्यते॥ ।।7।। आसुर स्वभाव वाले मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति- इन दोनों को ही नहीं जानते। इसलिए उनमें न तो बाहर-भीतर की शुद्धि है, न श्रेष्ठ आचरण है और न सत्य भाषण ही है। आसुरी प्रकृति तमोगुण की प्रचुरता का परिणाम होती है जिसमें तमोगुण के लक्षण  बड़े प्रभावी ढंग से सामने आते हैं। हम क्रम से इनको इस प्रकार समझ सकते हैं- 1.जब मनुष्य में आसुरी प्रकृति का बोल बाला होता है तब वह मनुष्य अज्ञानता से भरा रहता है और वह यह नहीं समझ सकता है कि उसे क्या करना चाहिए अर्थात उसकी प्रवृत्ति क्या होनी चाहिए और उसे क्या नहीं करना चाहिए अर्थात उसकी निवृत्ति क्या होनी चाहिए। इस अवस्था में व्यक्ति इन्द्रियों के बेलगाम इक्षाओं का दास मात्र होता है जिनकी पूर्ति के लिए वह बुरा से बुरा कर्म करने के लिए भी तत्पर होता है। वह व्यक्ति मन, वचन और कर्म में शुद्धता के अभाव से ग्रस्त होकर व्यवहार करता है। ऐसे में उसका आचरण दुराचरण बनकर रह जाता है और वह अज्ञानता के वश में हुए सत्य से भगता है। ऐसे में वह अपने...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 6

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 6 द्वौ भूतसर्गौ लोकऽस्मिन्दैव आसुर एव च। दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ में श्रृणु॥ ।।6।। हे अर्जुन! इस लोक में भूतों की सृष्टि यानी मनुष्य समुदाय दो ही प्रकार का है, एक तो दैवी प्रकृति वाला और दूसरा आसुरी प्रकृति वाला। उनमें से दैवी प्रकृति वाला तो विस्तारपूर्वक कहा गया, अब तू आसुरी प्रकृति वाले मनुष्य समुदाय को भी विस्तारपूर्वक मुझसे सुन। संसार मे प्राणियों की दो ही श्रेणी होती है , एक जिनमें दैवी गुणों की प्रचुररता होती है और दूसरे वे जिनमें आसुरी गुणों की प्रचुरता होती है। प्रत्येक मनुष्य में ये दोनों गुण होते हैं लेकिन इन गुणों का अनुपात सभी में भिन्न होता है तथा साथ ही सभी में इनको पहचानने की क्षमता भी अलग अलग होती है। हममें कौन से गुण अधिकता में हैं और हमें किन गुणों को अपनाने चाहिए यह तभी सम्भव होता है जब हम इन दोनों तरह के गुणों को पहचान पाने में सक्षम होते हैं। दैवी गुणों का विस्तृत परिचय प्राप्त करने के उपरांत आइये हम आसुरी गुणों को समझे।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 5

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 5 दैवी सम्पद्विमोक्षाय निबन्धायासुरी मता। मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव॥  ।।5।। दैवी सम्पदा मुक्ति के लिए और आसुरी सम्पदा बाँधने के लिए मानी गई है। इसलिए हे अर्जुन! तू शोक मत कर, क्योंकि तू दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुआ है। दैवी और आसुरी सम्पदाओं में फर्क यह है कि जँहा आसुरी सम्पदाएँ व्यक्ति को इस संसार से  बांधे रहती हैं वहीं दैवी सम्पद व्यक्ति को संसार के बंधनों से छुड़ाकर उनकोऔर आगे मुक्ति की तरफ ले जाती हैं। ऐसा इसलिए होता क्योंकि आसुरी सम्पदाएँ सांसारिक चीजों से बन्धन और उनके प्रति मोह से निकलती हैं। हमारे अंदर सांसारिक चीजों, फिर चाहे वो भौतिक हों या अभौतिक के प्रति गहरा लगाव होता है जिसके कारण उनके लिए मोह, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या आदि भाव हमारे मन में बने रहते हैं और इन भावों के अनुरूप ही हम कर्म करते करते उनसे और गहराई से बंधते जाते हैं।    इसके विपरीत जब इन बन्धनों से हमारा लगाव कम होते होते समाप्ति की तरफ अग्रसर होता है तब इनके प्रति हमारा लोभ, क्रोध, ईर्ष्या आदि के भाव समाप्त होते हैं और दैवी सम्पद बढ़ते जाते हैं। मूल च...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 4

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 4 दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च। अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम्‌॥ ।।4।। हे पार्थ! दम्भ, घमण्ड और अभिमान तथा क्रोध, कठोरता और अज्ञान भी- ये सब आसुरी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं।          दैवी गुणों के विपरीत जो है वही आसुरी गुण हैं जो संक्षेप में दम्भ, घमण्ड, अभिमान , क्रोध, कठोरता एव अज्ञान हैं।  दम्भ      दम्भ यानी पाखंड। अर्थात व्यक्ति वास्तव में दैवी गुणों से रहित होते हुए भी यह प्रदर्शित करता है कि वह दैवी गुणों से युक्त है।इससे उस व्यक्ति के अंदर भी भ्रम यानी dellusion का जन्म होता है। ऐसा व्यक्ति दूसरों का जान बूझकर नुकसान करता है। ऐसा व्यक्ति वास्तव में कलुषित, हिंसक, होते हुए भी गलत मंशा से लोगों के सामने यह दिखाता है कि वह बहुत विनम्र है, सत्य भाषण करने वाला है, सात्विक व्यवहार करने वाला है। ऐसा नकारात्मक गुणों को सही दिखाने के लिए करते हैं । जबकि यदि नकारात्मकता को पहचान कर उसे दूर करने का प्रयास करने वाला अपनी नकारत्मकता से छुटकारा पा लेता है। दर्प अर्थात घमण्ड ...

धम्मपद

मन मन का बहुत ही महत्व है क्योंकि हमारा संसार हमारे मब से हीं हमें समझ में आता है। मन हीं वह महान सारथी है जो हमें सही रास्ते पर भी ले जाता है और वही हमें गलत रास्ते पर भी ले जाता है। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। सो मन को वश में रखना सबसे जरूरी है। मन से हीं सद्विचार निकलते हैं और दुर्विचार भी। यदि मन नियंत्रित है तो सद्विचारों का आगमन मन में होता है और यदि अनियंत्रित है तो फिर दुर्विचार हमें गलत रास्ते पर ले कर चले जाते हैं। हर विचार कर्म में उतरने के पहले मन में आता है। सो यदि मन में अच्छे विचार आएं तो कर्म भी अच्छा होगा हीं और यदि मन में गलत विचार आते हैं तो कर्म भी गलत हीं होंगे। जैसे ही मन में कोई बुरा विचार आता है, मन उद्वेलित हो उठता है, ऐसा लगता है मानो कोई तूफान सा चल रहा हो मन में। बेचैनी का जन्म होता है और मन चंचल भी हो उठता है। क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, हिंसा, बदले की भावना, अनाचार, वासना आदि ऐसे ही विचार हैं जो मन को उद्वेलित कर देते हैं। जिन विचारों से मन उद्वेलित होता है वे विचार मन को अशांत कर देते हैं, और उस स्थिति में हमारे कर्म भी उत्तेजना वाले ही होते हैं। इसके विप...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 3

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 3 तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहोनातिमानिता। भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत॥ ।।3।। तेज (श्रेष्ठ पुरुषों की उस शक्ति का नाम 'तेज' है कि जिसके प्रभाव से उनके सामने विषयासक्त और नीच प्रकृति वाले मनुष्य भी प्रायः अन्यायाचरण से रुककर उनके कथनानुसार श्रेष्ठ कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं), क्षमा, धैर्य, बाहर की शुद्धि (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी देखनी चाहिए) एवं किसी में भी शत्रुभाव का न होना और अपने में पूज्यता के अभिमान का अभाव- ये सब तो हे अर्जुन! दैवी सम्पदा को लेकर उत्पन्न हुए पुरुष के लक्षण हैं। 21.तेज    व्यक्ति के व्यक्तित्व में जो ओज, ऊर्जा, जोश, उत्साह स्पष्टतः प्रकट रहता है वह उसका तेज है जो उसके अंदुरुनी और मानसिक शक्ति का द्योतक होता है। जब व्यक्ति सत्य, ईमान, अहिंसा, ज्ञान जैसे गुणों से लैस होता है और उसमें आत्मविश्वास होता है तो उसका तेज उसके व्यक्तित्व से झलकता है। 22.क्षमा     शक्ति  होने के बावजूद दंड नहीं देना, बल्कि क्रोध, घृणा, हिंसा को छोड़कर गलती करने वाले को अन्य को उसकी गलती के लिए दण्ड नहीं देना। क्षमा अ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 2

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 2 अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम्‌। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्‌॥ मन, वाणी और शरीर से किसी प्रकार भी किसी को कष्ट न देना, यथार्थ और प्रिय भाषण (अन्तःकरण और इन्द्रियों के द्वारा जैसा निश्चय किया हो, वैसे-का-वैसा ही प्रिय शब्दों में कहने का नाम 'सत्यभाषण' है), अपना अपकार करने वाले पर भी क्रोध का न होना, कर्मों में कर्तापन के अभिमान का त्याग, अन्तःकरण की उपरति अर्थात्‌ चित्त की चञ्चलता का अभाव, किसी की भी निन्दादि न करना, सब भूतप्राणियों में हेतुरहित दया, इन्द्रियों का विषयों के साथ संयोग होने पर भी उनमें आसक्ति का न होना, कोमलता, लोक और शास्त्र से विरुद्ध आचरण में लज्जा और व्यर्थ चेष्टाओं का अभाव। अहिंसा      मन, वचन, कर्म से न तो स्वयम का और न ही किसी दूसरे को किसी तरह की हानि पहुँचाना ही अहिंसा है। इसमें व्यक्ति अपने कर्मों से, या अपनी वाणी से या अपनी सोच से न तो अपने को और न ही किसी अन्य को कोई हानि, पीड़ा, कष्ट , प्रताड़ना पहुँचाता है या ऐसा करने की सोचता भी नहीं है। सत्य     मन , वचन और कर्म से सत्य भाषण ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 (श्लोकरहित)

                                                             श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16  परिचय श्रीमद्भागवद्गीता के नवम अध्याय में आसुरी और दैवी सम्पद की चर्चा की गई है। सम्पूर्ण जगत त्रिगुणात्मक प्रकृति से हीं बना हुआ है। ये तीन गुण हैं-सत्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण। इन्हीं गुणों के आपसी अनुपात पर जगत और उसके अवयवों का व्यवहार निर्भर करता है। व्यक्ति भी इन्हीं तीन गुणों के अनुपात के अनुसार अपना स्वभाव रखता है। संसार में आकर , संसार से मोक्ष की प्राप्ति व्यक्ति के प्रयासों पर ही निर्भर करता है। मोक्ष प्राप्ति को हम सरलतम ढंग से यूँ समझ सकते हैं कि व्यक्ति को स्वयं में सत्वगुण को प्रभावकारी बनाना होता है। इसी को और सरल ढंग से हम समझ सकते हैं कि जब सत्वगुण प्रदर्शित करने वाले व्यवहारगत गुणों की वृद्धि होती है तो व्यक्ति मोक्ष की तरफ बढ़ता है। सत्वगुण सम्पन्न व्यवहारहत गुणों को ही इस अध्याय में दैवी सम्पद कहा गया है और जो कुछ इसके विपर...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 1

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 1 श्रीभगवानुवाच अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः। दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्‌॥ ।।1।। श्री भगवान बोले- भय का सर्वथा अभाव, अन्तःकरण की पूर्ण निर्मलता, तत्त्वज्ञान के लिए ध्यान योग में निरन्तर दृढ़ स्थिति (परमात्मा के स्वरूप को तत्त्व से जानने के लिए सच्चिदानन्दघन परमात्मा के स्वरूप में एकी भाव से ध्यान की निरन्तर गाढ़ स्थिति का ही नाम 'ज्ञानयोगव्यवस्थिति' समझना चाहिए) और सात्त्विक दान (गीता अध्याय 17 श्लोक 20 में जिसका विस्तार किया है), इन्द्रियों का दमन, भगवान, देवता और गुरुजनों की पूजा तथा अग्निहोत्र आदि उत्तम कर्मों का आचरण एवं वेद-शास्त्रों का पठन-पाठन तथा भगवान्‌ के नाम और गुणों का कीर्तन, स्वधर्म पालन के लिए कष्टसहन और शरीर तथा इन्द्रियों के सहित अन्तःकरण की सरलता। अभी तक हमने श्रीमद्भागवद्गीता में जो प्रशिक्षण प्राप्त किया है उसे समझने में, उसे दैनिक जीवन से जोड़ने में कभी कभी बुद्धि के स्तर पर  कठिनाई आ सकती है। इसीलिए अब आगे कल से हम सोलहवें अध्याय में हम देखेंगे कि किस प्रकार श्रीमद्भागवद्गीता की शिक्षाओं को हम व्यव...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 (श्लोकरहित)

                                      श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15(श्लोकरहित)        सम्पूर्ण श्रीमद्भागवद्गीता में श्रीकृष्ण की शिक्षा आत्मा को पहचानने की प्रक्रिया को ही समझाती है, वह भी अलग अलग रूपको के माध्यम से तो कभी सीधे सीधे। एक व्यक्ति की सांसारिक पहचान उसके शरीर, मन और विवेक से निर्धारित होती है किंतु उस एक व्यक्ति के लिए उसकी वास्तविक पहचान उसके आत्मस्वरूप यानी उसके सेल्फ में निहित होती है जिसे उसे समझना है और जिसे समझे बिना वह स्वयं की स्थिति को समझ ही नहीं सकता है। श्रीमद्भागवद्गीता इसी ज्ञान को व्यक्ति को देने की शिक्षा है।          अब पुनः एक ज्ञात से अज्ञात को समझाया गया है। और इस बार इसे वृक्ष का उदाहरण दे कर समझाया गया है।  संसार को और संसार के साथ व्यक्ति के सम्बंध को समझाने के लिए वृक्ष की उपमा ली गई है। संसार की तुलना पीपल के बृक्ष से करते हुए जो समझाया गया है उसके अनुसार यह संसार नित्य होते हुए भी नित्य परिवर्तनशील है। इसका...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16  परिचय श्रीमद्भागवद्गीता के नवम अध्याय में आसुरी और दैवी सम्पद की चर्चा की गई है। सम्पूर्ण जगत त्रिगुणात्मक प्रकृति से हीं बना हुआ है। ये तीन गुण हैं-सत्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण। इन्हीं गुणों के आपसी अनुपात पर जगत और उसके अवयवों का व्यवहार निर्भर करता है। व्यक्ति भी इन्हीं तीन गुणों के अनुपात के अनुसार अपना स्वभाव रखता है। संसार में आकर , संसार से मोक्ष की प्राप्ति व्यक्ति के प्रयासों पर ही निर्भर करता है। मोक्ष प्राप्ति को हम सरलतम ढंग से यूँ समझ सकते हैं कि व्यक्ति को स्वयं में सत्वगुण को प्रभावकारी बनाना होता है। इसी को और सरल ढंग से हम समझ सकते हैं कि जब सत्वगुण प्रदर्शित करने वाले व्यवहारगत गुणों की वृद्धि होती है तो व्यक्ति मोक्ष की तरफ बढ़ता है। सत्वगुण सम्पन्न व्यवहारहत गुणों को ही इस अध्याय में दैवी सम्पद कहा गया है और जो कुछ इसके विपरीत है वह तमोगुण सम्पन्न गुण है जो आसुरी सम्पद कहलाता है। प्रत्येक व्यक्ति में तीन गुण यानी सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण होते हीं हैं।  सो प्रत्येक व्यक्ति में दैवी और आसुरी सम्पद से युक्त होता है। और इनदोनों में प्...