श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 9
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 9 एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः। प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः॥ ।।9।। इस मिथ्या ज्ञान को अवलम्बन करके- जिनका स्वभाव नष्ट हो गया है तथा जिनकी बुद्धि मन्द है, वे सब अपकार करने वाले क्रुरकर्मी मनुष्य केवल जगत् के नाश के लिए ही समर्थ होते हैं। 3. प्रत्येक व्यक्ति का अपना एक दृष्टिकोण होता है। वह एक खास तरह से स्वयं के बारे में , इस संसार के बारे में और ईश्वर के बारे में एक धारणा रखता है। जब व्यक्ति की धारणा उसके आसुरी स्वभाव से प्रभावित होती है तब वह व्यक्ति स्वार्थ और कामनाओं के अँधेरे में पड़ जाता है और उसकी भ्रष्ट हुई बुद्धि कोई भी विवेकपूर्ण निर्णय लेने में सक्षम नहीं होती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति मात्र अपने स्वार्थ सिद्धि और अपने कामनाओं और इक्षाओं को पूरा करने हेतु किसी के विरुद्ध किसी भी स्तर तक चला जाता है जिसमें वह अपने ही परिवेश का भी नाश कर देने से नहीं हिचकिचाता है। स्वार्थ, लोभ, असत्य, हिंसा, दुराचरण आदि ही इस तरह के व्यक्ति के संचालक होते हैं जो नाशकारी होते हैं।