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Showing posts from May, 2022

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 41 से 46

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 41 से 46 सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति। अजानता महिमानं तवेदंमया प्रमादात्प्रणयेन वापि॥ ।।41।। यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु। एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षंतत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्‌॥ ।।42।। पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्‌। न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्योलोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव॥ ।।43।। तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायंप्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्‌। पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्‌॥ ।।44।। अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे। तदेव मे दर्शय देवरूपंप्रसीद देवेश जगन्निवास॥ ।।45।। किरीटिनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव। तेनैव रूपेण चतुर्भुजेनसहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते॥ ।।46।। आपके इस प्रभाव को न जानते हुए, आप मेरे सखा हैं ऐसा मानकर प्रेम से अथवा प्रमाद से भी मैंने 'हे कृष्ण!', 'हे यादव !' 'हे सखे!' इस प्रकार जो कुछ बिना सोचे-समझे हठात्‌ कहा है और हे अच्युत! आप जो मेरे द्वारा विनोद के लिए विहार, शय्या, आसन और भोजनादि में अ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 39एवं 40

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 39 एवं 40 वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्‍क: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च। नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते॥ ।।39।। नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।  अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वंसर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः॥ ।।40।। आप वायु, यमराज, अग्नि, वरुण, चन्द्रमा, प्रजा के स्वामी ब्रह्मा और ब्रह्मा के भी पिता हैं। आपके लिए हजारों बार नमस्कार! नमस्कार हो!! आपके लिए फिर भी बार-बार नमस्कार! नमस्कार!! ।।39।। हे अनन्त सामर्थ्यवाले! आपके लिए आगे से और पीछे से भी नमस्कार! हे सर्वात्मन्‌! आपके लिए सब ओर से ही नमस्कार हो, क्योंकि अनन्त पराक्रमशाली आप समस्त संसार को व्याप्त किए हुए हैं, इससे आप ही सर्वरूप हैं। ।।40।। ईश्वरीय विभूति का साक्षात अनुभव होने पर व्यक्ति का ईगो समाप्त हो जाता है और उसे अहसास हो जाता है कि ईश्वर ही एकमात्र अस्तित्व है और सभी उसी की रचना मात्र है। ईगो का समापन व्यक्ति के अंदर ईश्वर के प्रति अगाध श्रद्धा का भाव उतपन्न करता है जिससे ईश्वर के प्रति व्यक्ति बारम्बार नतमस्तक होता है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 38

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 38 त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणस्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्‌। वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप।। ।।38।। आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इन जगत के परम आश्रय और जानने वाले तथा जानने योग्य और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप! आपसे यह सब जगत व्याप्त अर्थात परिपूर्ण हैं। ।।38।। ईश्वर के विराट रूप के दर्शन से अर्जुन को वो बातें समझ में आने लगी जो अबतक उसे समझाई जा रहीं थी लेकिन अपने पूर्वाग्रहों के कारण उसे समझ में नहीं आ पा रहीं थी। ईश्वर के अद्भुत तेज, और उनके उद्गम और काल के रूप को देख कर, उनके अंदर ही भूत, वर्तमान और भविष्य को देखकर अर्जुन को जो बातें समझ में आईं उनको उसने भगवान के समक्ष व्यक्त किया।           ईश्वर ही प्रारम्भ है अर्थात जो कुछ भी होने के पहले से हैं अर्थात पुराण हैं किंतु वे हमेशा ही हैं अर्थात सनातन हैं। वे आदि होकर भी नूतन हैं और भविष्य में भी जो होने वाला है वँहा भी हैं। क्योंकि ईश्वर काल से परे हैं। वे पुरुष हैं यानी ईश्वर ही हैं जो कण कण में व्याप्त हैं । ऐसा कुछ भी नहीं है जो बिना ईश्वरीय विभूति क...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 37

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक  37 कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्‌ गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे। अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्‌॥ ।।37।। हे महात्मन्‌! ब्रह्मा के भी आदिकर्ता और सबसे बड़े आपके लिए वे कैसे नमस्कार न करें क्योंकि हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! जो सत्‌, असत्‌ और उनसे परे अक्षर अर्थात सच्चिदानन्दघन ब्रह्म है, वह आप ही हैं। ।।37।। ईश्वरीय विभूतियों का ज्ञान होने, उनकी महत्ता की समझ होने से व्यक्ति के अंदर श्रद्धा तो जागृत होती हीं है, साथ साथ विनयशीलता भी आती है। व्यक्ति ईश्वरीय विभूति के समक्ष श्रद्धा और विनय से नतमस्तक हो जाता है। वह समझ लेता है कि ईश्वर ही वह परम सत्ता हैं जो सृजनकर्ता के भी सृजनकर्ता हैं, जो सभी देवों के भी स्वामी हैं, जो नाश नहीं होने वाले हैं, जिनमें समस्त जगत का वास है और जो सत, चित्त, आनंद से परे परम् ब्रह्म हैं। ऐसे ईश्वर के प्रति नगमस्तक होकर उनको बारम्बार नमस्कार करना ही हमारा कर्तव्य है। जँहा एक तरफ श्रद्धा से  बारम्बार नमस्कार करते हैं हम वंही बारम्बार नमस्कार करने से भी श्रद्धा गहरी होती जाती है।

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 36

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 36 अर्जुन उवाच स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च। रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्‍घा:॥ ।।36।। अर्जुन बोले- हे अन्तर्यामिन्! यह योग्य ही है कि आपके नाम, गुण और प्रभाव के कीर्तन से जगत अति हर्षित हो रहा है और अनुराग को भी प्राप्त हो रहा है तथा भयभीत राक्षस लोग दिशाओं में भाग रहे हैं और सब सिद्धगणों के समुदाय नमस्कार कर रहे हैं। ।।36।।      जब ईश्वरीय विभूतियों का प्रत्यक्ष अनुभव होता है तो यह ज्ञान होता है कि ईश्वर अंतर्यामी भी हैं और हमारे इंद्रियों का स्वामी भी। जिसके मन में ईश्वर के प्रति अनुराग का भाव होता है उसे ईश्वरीय विभूतोयों के प्रत्यक्ष अनुभव से अति प्रसन्नता होती है, उसका मन हर्ष से ओत प्रोत हो जाता है। उसे ईश्वरीय प्राप्ति का बोध होता है जिससे उसके विकार समाप्त होते हैं और विकार रहित मन ईश्वर की स्तुति में लगा प्रसन्नचित्त हो जाता है। ऐसे लोग ईश्वर के प्रति श्रद्धावान होकर उनके समक्ष नतमस्तक होते हैं।     किन्तु जिसके मन में मोह, माया, लोभ, क्रोध, ईर्ष्या ,शत्रुता आदि के ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 35

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 35 संजय उवाच एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृतांजलिर्वेपमानः किरीटी। नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णंसगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य॥ ।।35।। संजय बोले- केशव भगवान के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़कर काँपते हुए नमस्कार करके, फिर भी अत्यन्त भयभीत होकर प्रणाम करके भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गद्‍गद्‍ वाणी से बोले। ।।35।। गीताकार ने अचानक पुनः संजय को यँहा लाया है तो उनका खास उद्देश्य  रहा है। ईश्वर के विराट स्वरूप को देखने वाले अर्जुन अकेले नहीं रहे बल्कि संजय भी साथ साथ उस विराट स्वरूप को देख पा रहे थे और उस स्वरूप का वर्णन वे धृतराष्ट्र को कर रहे थे। जिस विराट स्वरूप का दर्शन दुर्लभ था धृतराष्ट्र उसका साक्षात वर्णन सुन रहे थे किंतु मोह रूपी धृतराष्ट्र भगवान के विराट रूप का अर्थ समझने में अक्षम था क्योंकि मोह से ढँका हुआ मन ईश्वर में लगता ही नहीं है, वह तो अपने ही लोभ की पूर्ति में भटकता रह जाता है। उसके समक्ष साक्षात ईश्वर भी आ जाते हैं तो उसे अपना मोह ही प्यारा लगता है, वह ईश्वर की तरफ देखता तक नहीं है। संजय का उल्लेख इसी लिए किया गया है ताकि हम समझ सकें कि ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 32,33 एवं 34

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 32, 33 एवं 34 श्रीभगवानुवाच कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धोलोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः। ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः॥ ।।32।। तस्मात्त्वमुक्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ्‍क्ष्व राज्यं समृद्धम्‌। मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्‌॥ ।।33।। द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान्‌। मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठायुध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान्‌॥ ।।34।। श्री भगवान बोले- मैं लोकों का नाश करने वाला बढ़ा हुआ महाकाल हूँ। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। इसलिए जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा लोग हैं, वे सब तेरे बिना भी नहीं रहेंगे अर्थात तेरे युद्ध न करने पर भी इन सबका नाश हो जाएगा। ।।32।। अतएव तू उठ! यश प्राप्त कर और शत्रुओं को जीतकर धन-धान्य से सम्पन्न राज्य को भोग। ये सब शूरवीर पहले ही से मेरे ही द्वारा मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन! (बाएँ हाथ से भी बाण चलाने का अभ्यास होने से अर्जुन का नाम 'सव्यसाची' हुआ था) तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा। ।।33।। द्रोणाचार्य...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 31

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 31 आख्याहि मे को भवानुग्ररूपोनमोऽस्तु ते देववर प्रसीद। विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यंन हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्‌॥ ।।31।। मुझे बतलाइए कि आप उग्ररूप वाले कौन हैं? हे देवों में श्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो। आप प्रसन्न होइए। आदि पुरुष आपको मैं विशेष रूप से जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति को नहीं जानता। ।।31।। हम ईश्वर पर श्रद्धा तो रखते हैं , उनकी पूजा भी करते हैं, स्तुति भी करते हैं किंतु हम ये नहीं जान पाते हैं कि ईश्वर हैं कौन। किन्तु जब व्यक्ति की दृष्टि में दिव्यता आती है यानी जब वह ईश्वर के  असीम विस्तार को समझता है तो उसके मन में ईश्वर को जानने की उत्कण्ठा उतपन्न होती है। ईश्वरीय विभूतियों से चकित व्यक्ति किंचित भयभीत भी हो जाता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति के मन में श्रद्धा पूर्वक यह प्रश्न उठता है कि इतने विराट स्वरूप वाले , सब के जन्म और मृत्यु के कारण, सभी कर्मों के हेतु ये आदि देव कौन हैं। उसके मन में तब ईश्वर के प्रति विमन्र श्रद्धा भाव भी होता है और भय भी।      ईश्वर के विराट स्वरूप को देखकर अर्जुन के मन में भी यही भा...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 28 .29 एवं 30

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 28 , 29 एवं 30 यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति। तथा तवामी नरलोकवीराविशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति॥ ।।28।। यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतंगाविशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः। तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः॥ ।।29।। लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः। तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रंभासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो॥ ।।30।। जैसे नदियों के बहुत-से जल के प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्र के ही सम्मुख दौड़ते हैं अर्थात समुद्र में प्रवेश करते हैं, वैसे ही वे नरलोक के वीर भी आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।      जैसे पतंग मोहवश नष्ट होने के लिए प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में अतिवेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं।          आप उन सम्पूर्ण लोकों को प्रज्वलित मुखों द्वारा ग्रास करते हुए सब ओर से बार-बार चाट रहे हैं। हे विष्णो! आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण जगत को तेज द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है। ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 26 एवं 27

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 26 एवं 27 अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसंघैः। भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः॥ ।।26।। वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि। केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्‍गै॥ 27।। वे सभी धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित आप में प्रवेश कर रहे हैं और भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धाओं के सहित सबके सब आपके दाढ़ों के कारण विकराल भयानक मुखों में बड़े वेग से दौड़ते हुए प्रवेश कर रहे हैं और कई एक चूर्ण हुए सिरों सहित आपके दाँतों के बीच में लगे हुए दिख रहे हैं। 26 एवं 27 प्रभु के विराट स्वरूप में अर्जुन भूत, वर्तमान और भविष्य तीनों को देख पाता है, वह देख पाता है कि आने वाले समय में। उन वीरों का क्या होगा जो महाभारत के युद्ध में आये हुए हैं। वह देखता है कि सभी धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित आप में प्रवेश कर रहे हैं और भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य तथा वह कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धाओं के सहित सबके सब आपके दाढ़ों के कारण वि...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11, श्लोक 23, 24, 25

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 23, 24 25 रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रंमहाबाहो बहुबाहूरूपादम्‌। बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालंदृष्टवा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम्‌॥ ।।23।। नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णंव्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्‌। दृष्टवा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो॥ ।।24।। दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानिदृष्टैव कालानलसन्निभानि। दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास॥ ।।25।। हे महाबाहो! आपके बहुत मुख और नेत्रों वाले, बहुत हाथ, जंघा और पैरों वाले, बहुत उदरों वाले और बहुत-सी दाढ़ों के कारण अत्यन्त विकराल महान रूप को देखकर सब लोग व्याकुल हो रहे हैं तथा मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ। ।।23।। क्योंकि हे विष्णो! आकाश को स्पर्श करने वाले, दैदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त तथा फैलाए हुए मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत अन्तःकरण वाला मैं धीरज और शान्ति नहीं पाता हूँ। ।।24।। दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलयकाल की अग्नि के समान प्रज्वलित आपके मुखों को देखकर मैं दिशाओं को नहीं जानता हूँ और सुख भी नहीं पाता हूँ। इसलिए हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न हों। ।।2...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 22

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 22 रुद्रादित्या वसवो ये च साध्याविश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च। गंधर्वयक्षासुरसिद्धसङ्‍घावीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे॥ ।।22।। जो ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य तथा आठ वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार तथा मरुद्गण और पितरों का समुदाय तथा गंधर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय हैं- वे सब ही विस्मित होकर आपको देखते हैं। ।।22।। ईश्वर की अनुपम शक्ति और कीर्ति को देखकर मनुष्य तो क्या देवगण, यक्ष और राक्षस, सभी आश्चर्यचकित हो जाते हैं। उन्हें आश्चर्य इसलिए होता है क्योंकि उनके पास ईश्वर के इस विराट स्वरूप की कोई व्यख्या नहीं होती है। इसीलिए अर्जुन का कथन है कि ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य तथा आठ वसु, साध्यगण, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार तथा मरुद्गण और पितरों का समुदाय तथा गंधर्व, यक्ष, राक्षस और सिद्धों के समुदाय हैं- वे सब ही विस्मित होकर आपको देखते हैं। जब हमारे पास किसी घटना या चीज की कोई व्याख्या नहीं होती है तब उसके अंदर आश्चर्य की भावना का जन्म होता है। 

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 21

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 11 श्लोक 21 अमी हि त्वां सुरसङ्‍घा विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति। स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्‍घा: स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः॥ ।।21।। वे ही देवताओं के समूह आप में प्रवेश करते हैं और कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े आपके नाम और गुणों का उच्चारण करते हैं तथा महर्षि और सिद्धों के समुदाय 'कल्याण हो' ऐसा कहकर उत्तम-उत्तम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं। ।।21।। ईश्वर के विराट विश्वरूप को अपनी  आँखों से देख कर यह सत्य समझ में आता है कि सभी देवता भी इसी परम् पिता परमेश्वर से न सिर्फ उतपन्न होते हैं बल्कि उनमें ही समाहित भी हो जाते हैं यानी दिव्य गुणों का अपना कोई निजी अस्तित्व नहीं है। ये सभी ईश्वर से ही निकल कर पुनः ईश्वर में ही मिल जाते हैं।        जिसकी जैसी श्रद्धा होती है उसकी भावनाएँ भी वैसी ही होती हैं। सो कोई ईश्वर की अनुपम कीर्ति के सम्मुख श्रद्धा से नतमस्तक होता है तो कुछ के अंदर भय भी संचारित होता है। लेकिन अंततः सभी का उद्देश्य, वही एकमात्र ईश्वर ही होते हैं। लेकिन जो मोक्ष प्राप्त ऋषि, महर्षि, सिद्ध लोग हैं वे त...