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Showing posts from May, 2021

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 21

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 21 बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्‌। स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते॥ बाहर के विषयों में आसक्तिरहित अन्तःकरण वाला साधक आत्मा में स्थित जो ध्यानजनित सात्विक आनंद है, उसको प्राप्त होता है, तदनन्तर वह सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा के ध्यानरूप योग में अभिन्न भाव से स्थित पुरुष अक्षय आनन्द का अनुभव करता है। ।।21।। 6. हम बार बार देखे हैं, समझे हैं कि व्यक्ति अपनी पराकाष्ठा पर उस समय पहुँच पाता है जब उसे वो सुख मिलता है जो कभी समाप्त नहीं होता है। चूँकि व्यक्ति अपने ही आत्मा, यानी अपने ही सेल्फ अथवा कॉन्सियसनेस में स्थिर हो चुका होता है सो उसे जो भी सुख मिलता है वह उसे खुद से प्राप्त होता है क्योंकि वह खुद को शरीर मात्र नहीं समझ कर सम्पूर्ण विस्तार का अंश समझता है। जब व्यक्ति अपने सेंसेस यानी इन्द्रियों पर निर्भर होता है तो इंसान को अपने सुख के लिए खुद से बाहर की तरफ देखना होता है जो उसे अपनी इन्द्रियों के द्वारा मिल पाता है लेकिन वह सुख स्थाई नहीं होता है क्योंकि बाहरी संसार तो नित परिवर्तनशील है और उस परिवर्तन से उसे उसकी इन्द्रियों ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 20

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 20 न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्‌। स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः॥  जो पुरुष प्रिय को प्राप्त होकर हर्षित नहीं हो और अप्रिय को प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिरबुद्धि, संशयरहित, ब्रह्मवेत्ता पुरुष सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्मा में एकीभाव से नित्य स्थित है। ।।20।। 5.  अब आगे हम देखते हैं कि जिस व्यक्ति को ज्ञान प्राप्त हो चुका है, जो इस ज्ञान को आत्मसात कर चुका है वो व्यक्ति सारे संसार को अपने से बाहर नहीं देखता समझता है। सम्पूर्ण विस्तार के सेल्फ के साथ स्वयम का एकीकरण सापेक्षता को समाप्त कर देता है है। उसके लिए उसकी बुद्धि इस एक  सेल्फ के ज्ञान में स्थिर होती है जिसके कारण वह परम सत्य के साथ एकीकृत हुआ रहता है। ऐसी अवस्था में जो कुछ घट रहा होता है वह उस व्यक्ति के लिए उस सम्पूर्ण विस्तार का ही स्वरूप होता है, जिसके कारण उसे प्रिय-अप्रिय की प्राप्ति भी एक सी प्रतीत होती है, वह न तो प्रिय को प्राप्त कर प्रसन्नता महसूस करता है न ही अप्रिय उसे उद्विग्न कर पाते हैं। क्योंकि      ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 19

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 19 इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः। निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः॥ जिनका मन समभाव में स्थित है, उनके द्वारा इस जीवित अवस्था में ही सम्पूर्ण संसार जीत लिया गया है क्योंकि सच्चिदानन्दघन परमात्मा निर्दोष और सम है, इससे वे सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही स्थित हैं। ।।19।। 4. जिस व्यक्ति को कर्मयोग के मार्ग पर चलते हुए ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी होती है वह व्यक्ति अपने मन से हर द्वंदात्मक युग्म जैसे सुख-दुख, जय-पराजय, प्रेम-घृणा आदि में हमेशा समान भाव रखता है। इस तरह का व्यक्ति मन में हर अवस्था के प्रति समभाव रखने के कारण उत्तेजित या उद्वेलित नहीं होता है बल्कि वह शांत चित्त, प्रसन्न चित्त, अपने ही सेल्फ में बना रहता है, उसे किसी विषमता से कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। और यह क्षमता व्यक्ति को अपने जीवन काल में ही आनी चाहिए। मृत्यु के बाद किसी अन्य उपलब्धि के लोभ में यह व्यक्ति नहीं होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 13 सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्‌॥ अन्तःकरण जिसके वश में है, ऐसा सांख्य योग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनंदपूर्वक सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है। ।।13।। कर्मयोग के मार्ग से कर्म करता हुआ व्यक्ति जब ज्ञान की मंजिल पर पहुँचता है तो उसके आचरण में जो खूबियाँ आई रहती हैं उनके बारे में श्रीकृष्ण ने पहले भी दो बार विस्तार से चर्चा किया है और पुनः उसी चर्चा को यँहा भी कहते हुए उस ज्ञानी व्यक्ति की विशेषताओं के बारे में बात करते हैं जो कर्मयोग के माध्यम से कर्म करते हुए ज्ञान प्राप्त करता है। इन विशेषताओं को हम क्रम से फिर से समझते हैं। 1.इस तरह के व्यक्ति का अपने अन्तःकरण पर पूर्ण नियंत्रण होता है अर्थात जब व्यक्ति कर्मयोग के रास्ते कर्म करते हुए ज्ञान को प्राप्त करता है तो उसका अपने समस्त ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों  पर अपने विवेक के माध्यम से पूरा नियंत्रण होता है। इंद्रियाँ विवेक को संचालित नहीं क...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 18

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 18 विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥ वे ज्ञानीजन विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गौ, हाथी, कुत्ते और चाण्डाल में भी समदर्श होते हैं। ।।18।।    2. जब व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है तो उसके पास विद्या और विनय दोनों होते हैं। इससे स्पष्ट है कि यदि व्यक्ति विद्वान है लेकिन विनयशील नहीं है तो ज्ञानी नहीं है। 3. यह व्यक्ति जीव में जीव की हैसियत, उसके स्वरूप अथवा प्रकार के कारण भेद नहीं बरतता है। उसके लिए संसार के सभी प्राणी एक समान प्रिय होते हैं। ऐसा इसलिए सम्भव हो पाता है क्योंकि वह यह तथ्य समझता है कि सभी के अंदर एक ही सेल्फ है, एक ही आत्मा है, सभी एक ही विस्तृत , सर्वव्यापी सत्य के रूप हैं। इस कारण उसके अंदर सभी के प्रति प्रेम, सेवा और अहिंसा का भाव होता है। उसे किसी से न तो विशेष अनुराग होता है, न ही विराग।       लेकिन यँहा ध्यान देने की बात है कि यह व्यक्ति भी जिसे इन विशेषताओं के कारण , पण्डित कह कर सम्बोधित किया गया है वह व्यवहार के स्तर पर सभी से समान भाव रखते हुए भी उन सभी के...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 17

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 17 तद्‍बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः। गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः॥ जिनका मन तद्रूप हो रहा है, जिनकी बुद्धि तद्रूप हो रही है और सच्चिदानन्दघन परमात्मा में ही जिनकी निरंतर एकीभाव से स्थिति है, ऐसे तत्परायण पुरुष ज्ञान द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति को अर्थात परमगति को प्राप्त होते हैं। ।।17।।  अब श्रीकृष्ण ज्ञान प्राप्त व्यक्ति की विशेषताओं को बताते हैं। वे पूर्व में भी समझाये हैं कि व्यक्ति जब कर्मयोग के मार्ग से चलकर कर्म करता है तो उसे ज्ञान प्राप्ति के बाद उसकी विशेषताएँ क्या होती हैं। तो आइए हम एक एक कर समझें कि वे कौन सी विशेषताएँ हैं जो एक कर्मयोगी ज्ञानी व्यक्ति की होती हैं। 1. जब ये ज्ञान प्राप्त होता है तो व्यक्ति की बुद्धि, उसकी समझदारी, उसका ज्ञान परमतत्व में अवस्थित हो जाता है। तब व्यक्ति की बुद्धि, उसका विवेक ये समझने में सक्षम होता है कि उसका सेल्फ क्या है, वह वास्तव में वो नहीं है जो उसका ईगो है, बल्कि वो तो ईगो से परे सेल्फ है, वह विस्तृत कॉन्सियसनेस्स का ही एक भाग है, वह परमात्मा का ही एक अंश है जैसा अन्य सभ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 16

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 16 ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः। तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम्‌॥ परन्तु जिनका वह अज्ञान परमात्मा के तत्व ज्ञान द्वारा नष्ट कर दिया गया है, उनका वह ज्ञान सूर्य के सदृश उस सच्चिदानन्दघन परमात्मा को प्रकाशित कर देता है। ।।16।। यह तो हमें ज्ञात हो ही गया है कि खुद के लिए कर्तापन का बोध होना और यह समझना कि प्रभु करते कराते हैं, वे हमारे कर्मों के फलों के दाता हैं, रचियता हैं समझना अज्ञानता है। लेकिन इसका बोध मात्र होने से यह अज्ञानता दूर नहीं होती है जब तक हम खुद के अभ्यास से ये न समझ लें। आपको ये सिद्धान्त तो याद हो गया लेकिन कर्मफल से आपकी सम्बद्धता गई नहीं हो, उससे लगाव बना हुआ हो, इन्द्रियाँ उस लगाव के अनुसार आचरण कर रहीं हो तो अपने कर्मों को करते हुए हमें यही लगता है कि ये हम हीं कर रहें हैं, या फिर ईश्वर हमसे करा रहे हैं और फल भी उन्हीं के हाथों में है। इसी भाव से प्रेरित होकर मन में कई कामनाओं को पाले उनकी पूर्ति के लिए हम तरह तरह के जतन करते रहते हैं, और इसी क्रम में विभिन्न इक्षाओं की पूर्ति हेतु कई जगह माथा भी टेकते हैं, कई तरह क...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 15

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 15 नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः। अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥ सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभकर्म को ही ग्रहण करता है, किन्तु अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं। ।।15।। व्यक्ति के ज्ञान और अज्ञान के फर्क को समझाते हुए श्रीकृष्ण आगे समझाते हैं कि जो व्यक्ति ज्ञानी नहीं है वह यही समझता है कि परमात्मा उसके पाप कर्मों और पुण्यकर्मों को ग्रहण कर उसके अनुसार उसे फल प्रदान करते हैं। पीछे श्रीकृष्ण बताये हैं कि जिस व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति हुई है उसे इस बात की समझ है कि व्यक्ति जो कुछ भी करता या कराता है वह सब वह अपने स्वभाव के अनुसार अर्थात तीन गुणों के अनुपातिक उपस्थिति के अनुसार ही करता या कराता है और उसमें परमात्मा की कोई भूमिका नहीं होती है अर्थात व्यक्ति अपने कर्मों और उन कर्मों के फल के लिए स्वयं ही उत्तरदायी है न कि परमात्मा। यँहा इसी तथ्य को पुनः रेखांकित करते हैं कि जिस व्यक्ति को लगता है कि उसके पूण्य कर्म और पाप कर्म दोनों को परमात्मा ग्रहण कर उसके अनु...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 14

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 14 न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः। न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते। परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं, किन्तु स्वभाव ही बर्त रहा है। ।।14।। ज्ञानी व्यक्ति की विशेषताओं को समझाते हुए श्रीकृष्ण आगे बताते हैं कि 4. जब व्यक्ति यह जानता है कि प्रभु यानी ईश्वर किसी व्यक्ति के न तो कर्मों के रचयिता हैं न ही कर्मफल के तो ये भी तय जानता है कि ईश्वर किसी व्यक्ति के कर्तापन के लिए उत्तरदायी नहीं होते हैं। लेकिन ध्यान रहें कि ज्ञान की ये अनुभूति तब होती है जब व्यक्ति कर्मयोग के लिए निर्धारित आचरण को करते हुए कर्म कर इस अनुभूति को प्राप्त करता है। किसी भी सामान्य व्यक्ति के लिए उस व्यक्ति के कर्मों और उनके फलों का निर्धारण ईश्वर के द्वारा किया जाना समझा जाता है, किन्तु यँहा पांचवे अध्याय के श्लोक संख्या  14 में श्रीकृष्ण साफ साफ समझाते हैं कि व्यक्ति जो कुछ भी करता है उसके लिए ईश्वर को उत्तरदायी नही। कह सकता और न ही प्राप्त फलों के लिए ही वह ईश्वर को जबाबदेह बना सकता है।      ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 13

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 13 सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी। नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन्‌॥ अन्तःकरण जिसके वश में है, ऐसा सांख्य योग का आचरण करने वाला पुरुष न करता हुआ और न करवाता हुआ ही नवद्वारों वाले शरीर रूप घर में सब कर्मों को मन से त्यागकर आनंदपूर्वक सच्चिदानंदघन परमात्मा के स्वरूप में स्थित रहता है। ।।13।। कर्मयोग के मार्ग से कर्म करता हुआ व्यक्ति जब ज्ञान की मंजिल पर पहुँचता है तो उसके आचरण में जो खूबियाँ आई रहती हैं उनके बारे में श्रीकृष्ण ने पहले भी दो बार विस्तार से चर्चा किया है और पुनः उसी चर्चा को यँहा भी कहते हुए उस ज्ञानी व्यक्ति की विशेषताओं के बारे में बात करते हैं जो कर्मयोग के माध्यम से कर्म करते हुए ज्ञान प्राप्त करता है। इन विशेषताओं को हम क्रम से फिर से समझते हैं। 1.इस तरह के व्यक्ति का अपने अन्तःकरण पर पूर्ण नियंत्रण होता है अर्थात जब व्यक्ति कर्मयोग के रास्ते कर्म करते हुए ज्ञान को प्राप्त करता है तो उसका अपने समस्त ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों  पर अपने विवेक के माध्यम से पूरा नियंत्रण होता है। इंद्रियाँ विवेक को संचालित नहीं क...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 12

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 12 युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्‌। अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते॥ कर्मयोगी कर्मों के फल का त्याग करके भगवत्प्राप्ति रूप शान्ति को प्राप्त होता है और सकामपुरुष कामना की प्रेरणा से फल में आसक्त होकर बँधता है।  ।।12।। इस तथ्य को श्रीकृष्ण बार बार कह चुके हैं, बता चुके हैं अलग अलग ढंग से। दरअसल कर्म करने की जो विधि उन्होंने कर्मयोग में बताया है उसी का संक्षेप में पुनः उल्लेख किया है कि कर्मयोगी कैसे कर्म करता है। कर्मयोगी को कर्मफल से कोई मतलब नहीं होता है, उससे उसको कोई लगाव नहीं होता है, सो उसे परम् शांति की प्राप्ति होती है जिसके फलस्वरूप उसे ईश्वत की प्राप्ति होती है।         इसके विपरीत जो व्यक्ति कर्मयोग के रास्ते से कर्म नहीं करता है , वह कर्म तो करता है किंतु इक्षाओं के वशीभूत होकर कर्म में आसक्त होकर उनसे बन्धा हुआ रह जाता है, और उसे न तो शांति मिल पाती है , न ही ईश्वर की  प्राप्ति ही होती है।      ये अंतर होता क्यों है, कर्म के परिणाम से बन्धने से ऐसा क्या होता है कि हमें शांति...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 11

 श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 11 कायेन मनसा बुद्धया केवलैरिन्द्रियैरपि। योगिनः कर्म कुर्वन्ति संग त्यक्त्वात्मशुद्धये॥ कर्मयोगी ममत्वबुद्धिरहित केवल इन्द्रिय, मन, बुद्धि और शरीर द्वारा भी आसक्ति को त्याग कर अन्तःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं। ।।11।। ज्ञानयोग अथवा कर्मसन्यास का मार्ग कर्मयोग के रास्ते से चलकर ही प्राप्त किया जा सकता है, ज्ञान या कर्मसन्यास की प्राप्ति का कोई अन्य मार्ग नहीं है। बिना कर्मयोग के रास्ते कर्म किये हमें ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती है और न कर्मसन्यास की अवस्था ही प्राप्त हो सकती है। कोई भी व्यक्ति कर्मों का सम्पूर्ण त्याग नहीं कर सकता है। कुछ न कुछ कर्म हम सभी करते हीं हैं किंतु सभी कर्म हमें ज्ञान के मार्ग पर ले जा सकते हों यह भी नहीं होता है। जब असंगत भाव से बिना कर्तापन का अहंकार पाले कर्मयोग के अनुसार हम कर्म करते हैं तभी हम ज्ञानयोग/कर्मसन्यास के मार्ग पर चल पाते हैं। इसके आगे ध्यान की अवस्था मिलती है जब व्यक्ति अपने कर्मों में ही ध्यान की अवस्था को प्राप्त कर पाता है। दरअसल कर्म करने के क्रम में जब हम अपने उच्च आदर्शों जिसे हम ईश्वर कहते...

श्रीमद्भागवद्गीता अद्याय 5 श्लोक 10

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 10 ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्‍गं त्यक्त्वा करोति यः। लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥ जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्याग कर कर्म करता है, वह पुरुष जल से कमल के पत्ते की भाँति पाप से लिप्त नहीं होता। ।।10।। श्रीकृष्ण ने बारम्बार इस बात पर जोर दिया है कि असंगत भाव से कर्म करना चाहिए। हम सभी तो दिन भर कर्म ही करते हैं लेकिन हर कर्म कर्मयोग के दायरे में नहीं आता, सिर्फ वही कर्म कर्मयोग केवनुसार कर्म होते हैं  1. जिनको करने में कर्म फल के प्रति कोई आसक्ति नहीं होती। अर्थात जब हम कर्म करते हैं तो उसके फल की अपेक्षा नहीं करते, हम कर्म इसलिए नहीं करते कि उसे करने से हमें कोई सुख की प्राप्ति हो, किसी विशेष फल की प्राप्ति हो। अगर ऐसी भावना रखकर कर्म करते हैं तो फिर उस फल से हम जुड़ जाते हैं। उसकी पूर्ति होने पर मोह, लोभ , लालच, अहंकार आदि भाव आ जाते है कि उसे फिर करें, फिर वही सुख मिले। और यदि उसकी पूर्ति नहीं होती है तो क्रोध, ईर्ष्या , जलन, हिंसा आदि के भाव आते हैं। इस प्रकार दोनों ही स्थिति में हम कर्मों से बन्ध जाते हैं। 2....

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 8 एवम 9

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 8 एवम 9 नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्‌। पश्यञ्श्रृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपंश्वसन्‌॥ प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि॥ इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्‌॥ तत्व को जानने वाला सांख्ययोगी तो देखता हुआ, सुनता हुआ, स्पर्श करता हुआ, सूँघता हुआ, भोजन करता हुआ, गमन करता हुआ, सोता हुआ, श्वास लेता हुआ, बोलता हुआ, त्यागता हुआ, ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता और मूँदता हुआ भी, सब इन्द्रियाँ अपने-अपने अर्थों में बरत रही हैं- इस प्रकार समझकर निःसंदेह ऐसा मानें कि मैं कुछ भी नहीं करता हूँ। ।।8 एवम9।। कर्म तो सभी करते हैं , जब तक प्राण शरीर में हैं क्रियाएँ होती ही रहती हैं किंतु जो व्यक्ति कर्मयोग के रास्ते चलकर कर्म करता है और जो बिना उस मार्ग को अपनाए कर्म करता है, दोनों में अंतर है।        सामान्यतः जब हम कोई क्रिया करते हैं तो हम यह समझते हैं कि ये अमुक क्रिया या कर्म हम कर रहें हैं। ये समझना बहुत स्वाभाविक भी है क्योंकि व्यक्ति खुद को अपने "मैं" से पहचानता है। उसे लगता है कि जो कुछ कर रहा है उसका "मैं...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 7

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 7 योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः। सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते॥ जिसका मन अपने वश में है, जो जितेन्द्रिय एवं विशुद्ध अन्तःकरण वाला है और सम्पूर्ण प्राणियों का आत्मरूप परमात्मा ही जिसका आत्मा है, ऐसा कर्मयोगी कर्म करता हुआ भी लिप्त नहीं होता। ।।7।। अब श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि एक व्यक्ति के लिए कर्मयोगी बनने के लिए उसके अंदर कौन से गुण होने चाहिए। ये बात श्रीकृष्ण पूर्व में भी समझा चुके है, लेकिन हमारी समझ को और साफ करने के लिए फिर से कर्मयोगी के गुणों को बताते हैं। उद्देश्य है कि हम सीख सकें कि हमें किस तरह से अपने कर्मों को करना है ताकि हम कर्म करते हुए कर्म से मुक्त भी हो जाएं और समाज के लिए उपयोगी भी बने रहें और ज्ञान की उस सीमा तक पहुँच सकें जँहा से हम गिर नहीं सकें कर्मयोगी के गुणों को समझाते हुए श्रीकृष्ण हमसे अपेक्षा करते हैं कि हम  1.अपने मन को वश में रखें। 2.इन्द्रियों पर नियंत्रण हो। 3.हमारा अंतःकरण पूरी तरह से स्वक्ष हो।    अब आइये हम देखते हैं, कि इनका अर्थ क्या हुआ। जब हम कर्मयोग का आचरण करते हैं ...

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 6

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 5 श्लोक 6 सन्न्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः। योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म  नचिरेणाधिगच्छति॥ परन्तु हे अर्जुन! कर्मयोग के बिना संन्यास अर्थात्‌ मन, इन्द्रिय और शरीर द्वारा होने वाले सम्पूर्ण कर्मों में कर्तापन का त्याग प्राप्त होना कठिन है और भगवत्स्वरूप को मनन करने वाला कर्मयोगी परब्रह्म परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त हो जाता है। ।।6।। कर्मसंन्यास के मार्ग में कर्तापन का बोध नहीं रह जाता। व्यक्ति अपने मन ,इन्द्रिय और शरीर से कर्ता होने का बोध गँवा देता है। इस स्थिति में ममत्व और लगाव का अभाव हो जाता है और परिणाम में अहंकार भी नहीं रह जाता है। लेकिन ये स्थिति इस सिद्धान्त को रट कर, याद कर नहीं आती है। ये अभ्यास का परिणाम है। तो किस चीज का अभ्यास कीजियेगा कि लगाव, ममत्व, अहंकार, और कर्तापन के बोध से मुक्ति मिल सकता है? ये भाव हम एक ही तरीके सकते हैं, पा सकते हैं और वह तरीका है कर्मयोग के मार्ग का अनुसरण जिसमें हम स्वधर्म के अनुसार , परिणाम के लगाव से मुक्त होकर, यज्ञ की भावना से कर्म करते हैं। सामान्यतः प्रत्येक व्यक्ति के अंदर ढेरों ऐसे गुण होते हैं जो उसके अंदर...