मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है- उसके ये पाँचों कारण हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 16
तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥ 16।।
परन्तु ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि (सत्संग और शास्त्र के अभ्यास से तथा भगवदर्थ कर्म और उपासना के करने से मनुष्य की बुद्धि शुद्ध होती है, इसलिए जो उपर्युक्त साधनों से रहित है, उसकी बुद्धि अशुद्ध है, ऐसा समझना चाहिए।) होने के कारण उस विषय में यानी कर्मों के होने में केवल शुद्ध स्वरूप आत्मा को कर्ता समझता है, वह मलीन बुद्धि वाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता।
इससे स्पष्ट है कि व्यक्ति के द्वारा कर्म किये जाने के लिए ये पाँच कारक ही उत्तरदायी हैं। आत्मा यानी व्यक्ति की विशुद्ध चेतना का व्यक्ति के द्वारा कर्मों को किये जाने में कोई योगदान नहीं होता है हालांकि सत्य यह है कि उसकी विशुद्ध चेतना यानी आत्मा उसके कर्मों का द्रष्टा मात्र है,। आत्मा के द्वारा कार्य किये जाने का भ्रम हमारी अज्ञानता का परिचायक होता है। शरीर, इन्द्रिय, कर्ता भाव , प्राण और दैव के द्वारा कर्म सम्पादित होते हैं लेकिन व्यक्ति को लगता है कि उसकी शुद्ध चेतना कर्म कर रही है, वह स्वयं के अस्तित्व को कर्म में लिप्त पाता है और ऐसा उसके अपने कर्त्तापन के भाव की वजह से होता है। जबकि सत्य यह है कि उसकी विशुद्ध चेतना अर्थात उसके आत्मा का उसके कर्मों के होने से कोई लेना देना नहीं होता है। लेकिन उसे लगता है कि गति उसके चेतना में है। उसका भ्रम उसके अंदर सापेक्षता के भ्रम के कारण होता है। करता कोई है लेकिन उसे लगता है कि यह तो वही है जो कर रहा है। और जो कर्ता है वह हमारे तीन गुणों-सत्व, राजस और तमो गुण के कारण है। ऐसा भ्रम कर्म होने के पाँच कारणों से हमारी अज्ञानता के कारण है। कर्म तो इन पाँच के कारण हो रहें है लेकिन व्यक्ति की अज्ञानता और भ्रम उसे अहसास दिलाते हैं कि व्यक्ति ही कर्ता है।
यह भ्रम इसलिए होता है क्योंकि व्यक्ति स्वयं को अपने शरीर, अपनी बुद्धि, अपने इन्द्रिय और आने दैव से स्वयं को पहचानता है । लेकिन जैसे जैसे व्यक्ति इन सब से स्वयं को अलग करते जाता है अर्थात अपनी पहचान को अपने शरीर, इन्द्रिय और बुद्धि-विवेक से अलग करता है उसे ज्ञात होते जाता है कि वस्तुतः वह जो कर्म करता है उसका कर्ता वह यानी उसकी विशुद्ध चेतना यानी आत्मा नहीं है । कर्म होने के लिए तो ये पाँच जबाबदेह हैं लेकिन भ्रमवश व्यक्ति इन पाँच की भूमिका से अनजान होकर यही समझता है कि उसकी आत्मा ही उसके कर्मों का कर्ता है, वही सब कुछ कर रहा है। कर्तापन के इसी भ्रम की वजह से व्यक्ति कर्म और कर्मफल के बंधन से बँधा रह जाता है। ध्यान रहे कि जो भी कर्म करता है वह गतिशील है, और सो परिवर्तनशील भी है और इसी कारण से सत्य नहीं है बल्कि परिवर्तनीय है। यदि कोई परिवर्तन को देखना समझना चाहे तो उसे उस परिवर्तन के सापेक्ष अपरिवर्तनीय होना होता है। गति को गति में आकर नहीं अनुभव किया जाता है बल्कि गति को वही जानता है जो स्थिर है। सो आत्मा अपरिवर्तनीय है, गतिहीन है और सो वह व्यक्ति के द्वारा किये जाने वाले परिवर्तनीय, गतिशील कर्मों का द्रष्टा बना रहता है। यदि आत्मा ही कर्म में लिप्त हो जाये तो वह परिवर्तनीय और अस्थिर हो जाता है । फिर वह क्षयशील हो जाता । लेकिन सत्य तो यह है कि आत्मा अपरिवर्तनीय और अक्षय है औए इसी कारण से वह कर्ता नहीं मात्र द्रष्टा है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 18
ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना।
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः॥ 18।।
ज्ञाता (जानने वाले का नाम 'ज्ञाता' है।), ज्ञान (जिसके द्वारा जाना जाए, उसका नाम 'ज्ञान' है। ) और ज्ञेय (जानने में आने वाली वस्तु का नाम 'ज्ञेय' है।)- ये तीनों प्रकार की कर्म-प्रेरणा हैं और कर्ता (कर्म करने वाले का नाम 'कर्ता' है।), करण (जिन साधनों से कर्म किया जाए, उनका नाम 'करण' है।) तथा क्रिया (करने का नाम 'क्रिया' है।)- ये तीनों प्रकार का कर्म-संग्रह है।
जिन पाँच कारकों की चर्चा की गई है अर्थात अधिष्ठान, कर्ता भाव, करण, प्राण और दैव, वे सभी कर्म होने के कारण हैं लेकिन कर्म किसकी प्रेरणा से होता है, यह समझना भी जरूरी है। कर्म के प्रेरणास्रोत हैं ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता।
अब आइए समझें कि ये तीन क्या हैं,
ज्ञाता -जानने वाले का नाम 'ज्ञाता' है, ज्ञान- जिसके द्वारा जाना जाए, उसका नाम 'ज्ञान' है
ज्ञेय -जानने में आने वाली वस्तु का नाम 'ज्ञेय' है
इनकी समझ व्यक्ति को अपने दायित्वों के निर्वहन में सहायता देता है और व्यक्ति समझ पाता है कि उसे किस प्रकार अपने जीवन में साधना करनी चाहिए। एक ही परिस्थिति में एक ही पदार्थ से बने भिन्न भिन्न मनुष्य भिन्न भिन्न तरह से कर्म करते हैं, भिन्न भिन्न तरह के कर्म करते हैं। ऐसा क्यों होता है?
ज्ञाता आपका अह्महार है। स्वयं से , स्वयं के अवयवों से आपकी पहचान आपको ज्ञाता बनाती है। "मैं देखता हूँ"। यँहा "मैं" ज्ञाता है। मैं अपनी आंखों से अपनी पहचान का तादाम्य बैठाता है। इस प्रकार आपकी इंद्रियां, आपकी बुद्धि, आपका विवेक ज्ञाता की भूमिका में होते हैं। जो देखा जाता है वही ज्ञेय है और देखे जाने की इस प्रक्रिया से जो समझा जाता है वही ज्ञान है। वह सभी जो जाना जाता है, जो जानने योग्य है ज्ञान है वही ज्ञेय है और इस प्रकार सम्पूर्ण संसार और संसार से परे जो कुछ है वह जानने योग्य है जिसे जान लेने पर वही ज्ञान है। जानने की यह प्रक्रिया शरीर से, कर्मेन्द्रियों से, ज्ञानेन्द्रियों से , बुद्धि से और विवेक से सम्पन्न होती है। यह संसार जानने योग्य है और सो यह कर्म की प्रेरणा है।
जो कुछ हम इस संसार और इसके परे जानते हैं वही ज्ञान है, यानी हमारा ज्ञान वही है जितना हम जानते हैं। हम जो जानते हैं , वह हमारे पास लम्बे समय तक बना रहता है। और इसके साथ हमारा ईगो भी होता है जो हमारे व्यक्तित्व, हमारे विवेक और हमारी बुद्धि और इनके साथ हमारे शरीर का तादाम्य भी होता है। हमारा संचित ज्ञान और हमारा ईगो ये दोनों मिलकर हमें ज्ञाता बनाते हैं जो हमारे कर्मों का प्रेरणास्रोत होता है।
इस प्रकार हम समझते हैं कि हमारे द्वारा कर्म होने के पीछे पाँच कारणों(अधिष्ठान, कर्तापन, करण प्राण, और देव) के अतिरिक्त तीन प्रेरक भी होते हैं जो हैं ज्ञान, ज्ञेय, और ज्ञाता। हम जो कर्म करते हैं, उसके पीछे उसे जानने की प्रेरणा होती है, इसके लिए हम अपने पूर्व संचित ज्ञान के आधार पर प्रेरित होते हैं और हम ऐसा इसलिए कर पाते हैं क्योंकि हम स्वयं को अपने ईगो से पहचानते हैं। अगर आग से हाथ जलता है इसका पूर्व संचित ज्ञान हमें नहीं है तो फिर हमारी प्रतिक्रिया यानी हमारा कर्म भिन्न होगा और अगर ये ज्ञान पूर्व से है तो हमारी प्रतिक्रिया यानी हमारा कर्म भिन्न होगा।
इस प्रकार यह संसार, संसार के प्रति हमारी जानकारी और हमारा ईगो(जो पूर्व संचित ज्ञान और शरीर, इन्द्रिय , बुद्धि और विवेक के तादाम्य से बना हुआ) ये सब हमें कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं।
अब समझते हैं कि कर्म के मुख्य अवयव क्या हैं। वैसे तो पाँच कारक मिलकर कर्म होने का के कारण का निर्माण करते हैं लेकिन इनमें से मुख्य रूप से कर्ता, करण और स्वयं कर्म ये तीन को मिलाकर कर्म संग्रह कहते हैं।
अब देखें कि जो कर्म है उनमें सुधार के लिए , उनके परिष्करण के लिए व्यक्ति क्या कर सकता है। इसे दो चरणों में समझें।
पहले चरण में देखे कि कर्मों के होने में जो कारक हैं क्या हम उनमें सुधार कर अपने कर्म में सुधार कर सकते हैं। कर्म संग्रह के तीन में से एक अवयव यानी करण तो सभी में एक हैं, सभी में एक ही ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ है तो फिर उनमें आपका कोई वश नहीं। लेकिन व्यक्ति स्वयं में सुधार कर सकता है और स्वयं कर्म में भी। इस प्रकार यदि व्यक्ति को अपने कर्म परिष्कृत करने हैं तो कर्म होने के पाँच कारणों में से उसे सर्वाधिक स्वयं यानी कर्ता(जो ज्ञाता भी है) को और स्वयं कर्म यानी अपनी क्रियाओं में सुधार लाना होगा।
दूसरे चरण में हम देखें कि कर्म होने
के जो प्रेरक कारण हैं उनमें व्यक्ति क्या सुधार कर सकता है। कर्म होने के जो तीन प्रेरक हैं यानी ज्ञाता(यानी कर्ता), ज्ञेय और ज्ञान उनमें ज्ञेय तो एक ही है और ज्ञाता स्वयं वह व्यक्ति है। ऐसी स्थिति में कर्मों में परिष्करण हेतु ज्ञान में सुधार की अवश्वकता है।
इस प्रकार जब व्यक्ति स्वयं के कर्म को परिष्कृत करने की साधना में प्रवृत्त होता है तो उसे स्वयं यानी कर्ता, स्वयं के ज्ञान और स्वयं क्रिया पर सर्वाधिक ध्यान देना अनिवार्य होता है।
इन तीनों में सुधार हेतु आवश्यक है कि हम इन तीनों यानी ज्ञान, कर्ता और कर्म के भिन्न भिन्न स्वरूपों को समझें।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 19
ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः।
प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छ्णु तान्यपि॥ 19।।
गुणों की संख्या करने वाले शास्त्र में ज्ञान और कर्म तथा कर्ता गुणों के भेद से तीन-तीन प्रकार के ही कहे गए हैं, उनको भी तु मुझसे भलीभाँति सुन।
वही व्यक्ति कर्ता है, यानी कर्म करने वाला है, वही ज्ञाता है अर्थात वही ज्ञान को जानता है और वही भोक्ता भी है यानी अपने कर्मों का परिणाम प्राप्त करने वाला है। अर्थात जब एक व्यक्ति स्वयं में उत्थान चाहता है तो उसे स्वयं के ज्ञान में, स्वयं की क्रियाओं में और स्वयं में ही परिवर्तन लाने होते हैं। लेकिन प्रश्न है कि वह कौन सा मार्ग है जिससे वह इनमें परिवर्तन ला सकता है। तो समझना जरूरी है कि संसार के सभी अवयव तीन गुणों से बने हुए हैं जो हैं सात्विक, राजसी और तामसिक। गुणों में परिवर्तन कर व्यक्ति स्वयं के कर्तापन, स्वयं के ज्ञान और स्वयं के परिणामों में उत्थान या पतन जो चाहे ला सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति इन तीन को यानी कर्तापन को ज्ञान को और कर्म को इन गुणों के अनुसार समझे ताकि उनमें वह अपेक्षित सुधार ला सके।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 20
सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥ 20।।
जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक सब भूतों में एक अविनाशी परमात्मभाव को विभागरहित समभाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तू सात्त्विक जान।
जब व्यक्ति स्वयं के उत्थान की यात्रा पर निकलता है तो उसे निश्चित होना चाहिए कि उसका लक्ष्य है अपने ज्ञान में बढ़ोत्तरी, स्वयं यानी कर्ता के गुण में सुधार और सात्विक कर्म करने की प्रवृत्ति। इसके लिए ज्ञान, कर्ता और कर्म के गुणों के आधार पर उनको समझना पहचानना भी होगा तभी अवांछित से वाँछित की तरफ की यात्रा सफल होती है।
तो आईये, ज्ञान के विषय के समझे कि कौन सा ज्ञान कैसा है जिसे अपनाना चाहिए। अपने गुणों के अनुसार ज्ञान तीन तरह के होते हैं, सात्विक ज्ञान, राजसी ज्ञान और तामसीक ज्ञान।
दरअसल ज्ञान आँखों से परे व्यक्ति के अन्तस् की दृष्टि है, उसका दृष्टिकोण है जिसके अनुसार व्यक्ति स्वयं के साथ, स्वयं का संसार के साथ और स्वयं का ईश्वर के साथ सम्बन्ध देखता है। सभी व्यक्ति एक ही पदार्थ के बने होते हैं किंतु ज्ञान यानी अपने दृष्टिकोण की भिन्नता की वजह से वे एक ही चीज को अलग अलग ढंग से देखते हैं। ज्ञान से दृष्टि प्राप्त होती है और दृष्टि से हम तय करते हैं कि हम स्वयं क्या हैं , संसार के प्रति हम क्या हैं और ईश्वर के साथ हम क्या हैं। कुछ लोग स्वयं को बहुत सामर्थ्यवान समझते हैं तो कुछ स्वयं को बहुत बेचारा। कुछ लोग उत्साह, प्रेम, अनुराग आदि से भरे होते हैं तो कुछ लोग स्वयवकी दृष्टि में हताश, हारे हुए, । यह सब अंतर उस दृष्टि की वजह से है जिससे हम स्वयं का आकलन करते हैं। इसी प्रकार कुछ लोगों के लिए यह संसार मौज मस्ती, धनोपार्जन और बल दिखाने की जगह है तो कुछ लोग इसी संसार में स्वयं की मुक्ति की जगह पा लेते हैं। किसी के लिए यही संसार दुख का सागर है तो कोई इसे अपनी संघर्ष स्थली समझता है। यह अंतर भी स्वयं हमारे ही दृष्टि में अंतर की वजह से है और यह अंतर हमारे अर्जित ज्ञान के गुण के अनुसार ही होता है।
यह सत्य है कि भिन्न भिन्न व्यक्ति, भिन्न भिन्न प्राणी, और निर्जीव भी अलग अलग दिखते हैं। दो व्यक्ति एक से नहीं दिखते जबकि वे एक ही तरह के पदार्थों से बने होते हैं और जैविक रूप से समान होते हैं। भिन्न भिन्न रुप रंग वाले , भिन्न भिन्न पहचान के बावजूद सभी में एक कारक होता है जो सभी में एक ही समान होता है, जिसे विभाजित नहीं किया जा सकता है और यही उसकी आत्मा होती है। जब व्यक्ति की दृष्टि में बाहरी रूप रंग, आकार प्रकार से इतर सभी मानव में मूल अविभाज्य स्वरूप जो उसकी आत्मा है ही आता है और वह व्यक्तियों के इसी मूल स्वरूप के कारण उनमें कोई भेद नहीं करता है और समझता है कि तमाम बाहरी भिन्नताओं के भी सभी एक ही मूल स्वरूप के भिन्न भिन्न अभिव्यक्ति हैं तो उसके ज्ञान को सात्विक ज्ञान कहा जाता है। इसमें मानव, और यँहा तक कि सभी जीवों और निर्जीव में भी भेद भाव नहीं किया जाता है। बल्कि सात्विक ज्ञान तो यही बतलाता है कि सभी एक ही हैं।
भेद देखने के लिए किसी विशेष ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है, वह तो बाहर से दिख ही रहा है कि हर दो चीज, हर दो व्यक्ति भिन्न है लेकिन इस भिन्नता के बावजूद दोनों में अविभाज्यकारी इकाई समान है इसे समझने के लिए सात्विक दृष्टि चाहिये होती है।
जैसे हम समझते हैं कि हम एक राष्ट्र के लोग एक हैं लेकिन जब हमारा ज्ञान और सूक्ष्म तत्व को देखने के योग्य हो जाता है तो हमें लगता है कि चूँकि सभी देशों के निवासी मानव ही हैं सो सभी एक हैं। यह मानवीय दृष्टि है जिसमें हम बाहरी भिन्नता के आधार पर मनुष्यों में भेद नहीं करते हैं। यह मानवीय दृष्टि है।
जब ज्ञान के और सूक्ष्म के स्तर पर हम जाते हैं तो समझते हैं कि मानव और अन्य सभी जीवों में , सभी प्राणियों में जीवन तो एक ही है सो सभी प्राणधारी एक ही हैं । यह जीवनदृष्टि है।
लेकिन और सूक्ष्मतर स्तर पर हम पाते हैं कि जिनमें जीवन है और जिनमें जीवन नहीं है, सभी का अस्तित्व तो है। जीवधारी मनुष्य का भी अस्तित्व है, जीवधारी जानवर का भी अस्तित्व है, जीवधारी पेड़-पौधों का भी अस्तित्व है और निर्जीव नदी , पहाड़, पत्थर आदि का भी अस्तित्व है सो अस्तित्व के स्तर पर सभी में एक हि अविभाजकारी इकाई उपस्थित है और यह दृष्टि अस्तित्व की दृष्टि है।
और इस प्रकार हम समझते हैं कि यह समस्त ज्ञात और अज्ञात ब्रह्माण्ड एक ही इकाई से आच्छादित है जो दृश्य तो नहीं है लेकिन ज्ञेय है जिसे हम भिन्न भिन्न नाम देते हैं और वही ब्रह्म है जो सबों में , सभी कालों में मूल रूप से और पूर्ण रूप से उपस्थित है। यही सत्य है। यही ज्ञान , यही दृष्टि सात्विक है।
और इस प्रकार भेद की समझ से एक कि समझ की यात्रा ही सात्विक ज्ञान की प्राप्ति की यात्रा है। और यह ज्ञान अपने ईगो को त्यागने से आता है। भेद हम अपने ईगो से बनाते हैं जो कृत्रिम है जबकि सार्वभौमिक एकात्मकता स्वाभाविक सत्य है।
इस ज्ञान की प्राप्ति के साथ ही व्यक्ति के अंदर का अंधकार समाप्त हो जाता है और व्यक्ति पूर्ण प्रकाशित रहता है और यही उसका वास्तविक मोक्ष होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 21
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥ 21।।
किन्तु जो ज्ञान अर्थात जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को तू राजस जान।
सभी सजीव और निर्जीव में एक मूल कारक, ब्रह्म की उपस्थिति को समझकर भेद नहीं करने का ज्ञान सात्विक कहलाता है लेकिन जब व्यक्ति जीव जीव में , जीव निर्जीव में भेद करता है तो वह यह नहीं समझ पाता है कि सभी में एक ब्रह्म ही अवस्थित है। ऐसे में व्यक्ति अपने काँशसनेस को दूसरे से भिन्न समझता है। उसे लगता है कि हर दो भिन्न हैं। वह यह नहीं समझ पाता कि आकार प्रकार की भिन्नता मात्र बाहरी है जो हमें जैविक आंखों से दिखती है। ऐसे व्यक्ति की जैविक और बौद्धिक आँखें एक हो जाती हैं और वह जो देखता है उसी को परम् सत्य समझ लेता है। ऐसा नहीं है कि ऐसा व्यक्ति अपने व्यवहार और आचरण से गलत ही हो लेकिन दो में भिन्नता समझने वाले व्यक्ति में भेद भाव, लोभ लालच, क्रोध, मद, अहंकार आदि का प्रवेश हो जाता है। तब वह किसी को हीन और किसी को उच्च समझ कर , किसी को कीमती तो किसी को मूल्यहीन समझकर अपनी समझ के अनुसार अपनी पसंद बनाकर उसके पीछे भागने लगता है। तब उसके अंदर असंख्य कामनाएँ जन्म लेती रहती हैं जिनकी वजह से उसका चित्त चंचल बना रहता है। यह स्थिति व्यक्ति को शांत, और ब्रह्म के साथ एकाकार होने से रोकती है। यही राजसी ज्ञान कहलाता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 22
यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पंच तत्तामसमुदाहृतम्॥ 22।।
परन्तु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीर में ही सम्पूर्ण के सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्त्विक अर्थ से रहित और तुच्छ है- वह तामस कहा गया है।
सभी में एक समान समरूपता देखने और बाहरी अंतर के कारण भेद नहीं करने वाले ज्ञान को सत्वविक ज्ञान कहते हैं जो सभी सजीव और निर्जीव में एक ब्रह्म की उपस्थिति से भिज्ञ होता है। राजस ज्ञान के कारण व्यक्ति चेतना के एकात्मक स्वरूप को नहीं पहचान पाता है जिसकी वजह से भिन्न भिन्न स्वरूपों को एक सूत्र में पिरोने वाले सार्वभौमिक सत्य ब्रह्म को नहीं देख पाता है।
लेकिन जब व्यक्ति सम्पूर्णता के अस्तित्व से ही अनभिज्ञ हो और मात्र किसी एक ही पक्ष को देखे तो इस दृष्टिकोण को तामसी ज्ञान कहते हैं। एकांगी होने की वजह से यह ज्ञान व्यक्ति को कट्टर, उग्र, व्यसनभोगी और हिंसक बना देता है और यह ज्ञान बुद्धि विवेक और तर्क को हर लेता है। इसी एकांगी दृष्टि की वजह से कोई सिर्फ पैसे के पीछे भागता है तो किसी को नशे की लत लग जाती है तो कोई सत्ता को ही सर्वस्व समझ बैठता है तो कोई दिन रात वासना के व्यसन में ही डूबा रहता है। इस तामस ज्ञान की वजह से व्यक्ति सत्य को नहीं देख पाता है और ब्रह्म की समझ तो सिरे से लुप्त रहती है। इस दृष्टि में न कोई तर्क होता है, न ही विवेक। धार्मिक अंधविश्वास और कट्टरता भी इसी की उपज हैं। किसी को लगता है कि मात्र उसी का धर्म श्रेष्ठ है शेष सभी का निकृष्ट है। तब ऐसी स्थिति में उस व्यक्ति में स्वयं की मान्यताओं के प्रति कट्टरता भर जाती है और दूसरों की मान्यताओं के प्रति घृणा। यह उसे हिंसा तक लेकर चली जाती है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 23
नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥ 23।।
जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित हो तथा फल न चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष के किया गया हो- वह सात्त्विक कहा जाता है।
व्यक्ति के द्वारा कर्म किया जाना अवश्यम्भावी होता है क्योंकि उसका कर्म हीं व्यक्ति के स्वयं, संसार और ब्रह्म के साथ के सम्बन्धों को परिभाषित करता है। लेकिन व्यक्ति के कर्म उसकी दृष्टि, उसकी समझ और उसके ज्ञान पर आधारित होती है। अर्थात जैसी व्यक्ति की दृष्टि वैसा उसका कर्म। यही वजह है कि एक ही परिस्थिति में भिन्न भिन्न मनुष्यों के कर्म भिन्न भिन्न होते हैं। चूँकि व्यक्ति के कर्म उसकी दृष्टि यानी ज्ञान पर आधारित होते हैं सो जिस स्तर का ज्ञान व्यक्ति प्राप्त किये रहता है, उसी स्तर के उसके कर्म भी होते हैं। अगर व्यक्ति का ज्ञान सात्विक स्तर का है तो उसके कर्म भी सात्विक हीं होते हैं।
सात्विक ज्ञान के सम्बंध में हम समझते हैं कि जब व्यक्ति की दृष्टि में बाहरी रूप रंग, आकार प्रकार से इतर सभी मानव में मूल अविभाज्य स्वरूप जो उसकी आत्मा है ही आता है और वह व्यक्तियों के इसी मूल स्वरूप के कारण उनमें कोई भेद नहीं करता है और समझता है कि तमाम बाहरी भिन्नताओं के भी सभी एक ही मूल स्वरूप के भिन्न भिन्न अभिव्यक्ति हैं तो उसके ज्ञान को सात्विक ज्ञान कहा जाता है। इसमें मानव, और यँहा तक कि सभी जीवों और निर्जीव में भी भेद भाव नहीं किया जाता है। बल्कि सात्विक ज्ञान तो यही बतलाता है कि सभी एक ही हैं।
इस दृष्टि से लैस व्यक्ति नित्य-नैमित्य कर्म ही करता है न कि काम्य(कामना आधारित) और न ही निषिद्ध कर्म(नहीं करने योग्य कर्म)।व्यक्ति कर्म तो करता है लेकिन कर्म करने के पीछे कोई मंशा, कोई लाभ, कोई कामना पूर्ति के भाव नहीं होते हैं। वह तो सिर्फ अपने स्वभाव के अनुसार, अपनी स्थिति के अनुसार किये जा सकने वाले कर्म को ही करता है। कर्म करने के पीछे कोई एजेंडा नहीं होता है, कर्म करना उसका स्वभाव है सो कर रहा है।
इसके साथ ही सात्विक दृष्टि से उसे यह भी समझ होती है कि कर्मफल से उसे कोई लेना देना नहीं है। चूँकि वह तो कर्म ही स्वभावतः कर रहा है तो फिर कर्मफल से क्यों लगाव हो। जो भी कर्मफल हो उसे उसकी परवाह नहीं होती है।
इसका तातपर्य है कि सात्विक ज्ञान से युक्त कर्ता कर्म और कर्मफल में बिना आसक्त हुए आने स्वभाव(स्वधर्म) के अनुसार कर्म किये जाता है और इस प्रकार स्वार्थरहित भाव से बिना कर्मफल से आसक्त हुए किये जाने वाले कर्म सात्विक कर्म होते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 24
यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम्॥ 24।।
परन्तु जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त होता है तथा भोगों को चाहने वाले पुरुष द्वारा या अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा किया जाता है, वह कर्म राजस कहा गया है।
जब कर्म को बिना कर्ता भाव के, बिना कामना पूर्ति के उद्देश्य से मात्र सही और गलत के अनुसार कर्तव्य समझ कर किया जाता है तब वह कर्म सात्विक कर्म कहलाता है जो सबसे उच्च श्रेणी का कर्म है जो व्यक्ति को कर्मबन्धन से मुक्ति दिलाता है और उसे ब्रह्मलीन करता है।
लेकिन जब वही कर्म कामनावश होकर किया जाए, और इसलिए नहीं किया जाए कि वह सही है बल्कि उसे करने के पीछे व्यक्तिगत पसन्द नापसन्द के भाव हों तो ऐसा कर्म अहंकारयुक्त होता है, कर्तापन का अहंकार होता है उसे करने में और चूँकि वह कर्म कामना पूर्ति के लिए किया जाता है सो उसे करने में बहुत श्रम भी लगाया जाता है। इस स्थिति में कर्म और कर्मफल दोनों में घोर आसक्ति होती है और कर्मफल की प्राप्ति के लोभ में व्यक्ति सही और गलत को भूलकर मात्र अपनी इक्षापूर्ती की लालसा और अहंकार वश कर्म करता है। यह राजस कर्म है जो राजस ज्ञान से संचालित होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 25
अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥ 25।।
जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचारकर केवल अज्ञान से आरंभ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।
सात्विक कर्म सही गलत को पहचान कर स्वभावतः किये जाते हैं, तो राजसी कर्म पसन्द-नापसन्द के अनुसार लाभ और लोभ वश, कामना पूर्ति के उद्देश्य से किये जाते हैं। लेकिन कई बार कर्म बिना किसी सोच विचार केU , बिना किसी बुद्धि और विवेक के बिना परिणाम को तौले सिर्फ और सिर्फ मोह और भ्रम के अधीन होकर किये जाते हैं जिनमें न तो सही गलत की चिंता होती है, न ही पसन्द नापसन्द की गणना ही होती है बल्कि तैश में आकर किये जाते हैं उन्हें तामसी कर्म कहते हैं। ये कर्म क्रोध, घृणा, हिंसा , अविवेक और मूर्खता से ओतप्रोत होते हैं जिनसे करने वाले को भी क्षति होती है और जो लोग उस कर्म की परिधि में आते हैं उनकी भी क्षति होती है। करने वाले को ज्ञात ही नहीं होता है कि जो वह कर्म कर रहा है उसे करने की क्षमता भी है या नहीं उसमें। तामसी कर्म करने में पूरी तरह से अज्ञानता ही हावी होती है जिसके कारण इसके परिणाम सदा विध्वंसकारी ही होते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 26
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥ 26।।
जो कर्ता संगरहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष -शोकादि विकारों से रहित है- वह सात्त्विक कहा जाता है।
ज्ञान और कर्म का प्रकार समझने के उपरांत व्यक्ति अपने ज्ञान और अपने कर्मों के अनुसार स्वयं का आकलन कर सकता है कि वह स्वयं किस प्रकार का कर्ता यानी व्यक्ति है। ज्ञान और कर्म के तीन तीन प्रकारों के अनुसार व्यक्ति कर्ता यानी कर्म करने वाले के रूप में भी तीन प्रकार का होता है।
पहले हम सात्विक कर्ता के लक्षणों को समझें। सात्विक कर्ता के निम्न प्रकार के लक्षण होते हैं-
(1) सात्विक दृष्टि वाला व्यक्ति सात्विक भाव से ही कर्म करता है। वह कर्म करते हुए भी उस कर्म से बन्धता नहीं है, उससे आसक्त नहीं होता है। वह इसलिए कर्म नहीं करता है कि फलाना कर्म करने से उसे लाभ होगा या हानि बल्कि वह कर्म इसलिए करता है क्योकि उसे अपनी दृष्टि में लगता है कि वह कर्म उसकी स्वाभाविक क्रिया है और क्योंकि वही कर्म सही है। कर्म करने की उसकी प्रेरणा उसे कर्म के सही और गलत होने से मिलती है। वह अपनी पसंद और नापसन्द से आसक्त होकर कर्म नहीं करता है।
(2) कर्म से अनासक्त व्यक्ति जब कर्म करता है तो उसे बस सही और गलत से मतलब रहता है, कर्तव्य और अकर्तव्य से मतलब रहता है। उसका ध्यान कर्म के गुण दोष पर रहता है। इस कारण प्रयोजन से वह बन्धता नहीं है। मान लीजिये कि आप किसी से प्रेम करते हैं। आपका प्रेम एक कर्म है जो आप किसी के प्रति करते हैं। यदि आप उस व्यक्ति से जिसे प्रेम करते हैं उससे आसक्त होकर कर्म करते हैं तो फिर आप उस व्यक्ति के अस्तित्व को नकार कर उसमें भी अपना ही अस्तित्व जड़ देते हैं। आप चाहते हैं कि वह व्यक्ति जिसे आप प्रेम करते हैं आप ही के अनुसार रहे, और इस प्रकार आप उस व्यक्ति की स्वतंत्रता को समाप्त कर उसपर स्वयं को लाद देते हैं। इस प्रकार का प्रेम(कर्म) आपको बन्धन में बाँध देता है, मुक्त नहीं होने देता है। लेकिन यदि आप उसे प्रेम इसलिए करते हैं क्योंकि प्रेम करना ही सही है, तब आप प्रेम के महत्व को स्वीकार कर उस व्यक्ति को फलने फूलने का मौका देते हैं और आप उससे प्रेम करते हुए भी बन्धते नहीं हैं।
(3) जब व्यक्ति सही गलत से प्रेरित होकर कर्म करता है तो उसमें कर्त्तापन का अभिमान नहीं आता है और इस प्रकार वह अहंकार से मुक्त होता है।
(4) कर्म से नहीं बंधकर कर्ता भाव से मुक्त होकर जो कर्म करता है उसे कर्म की गुणवत्ता में दृढ़ अभिरुचि होती है। चूँकि वह सही और गलत से प्रेरित है सो वह अपने कर्म को इस प्रकार से करने की कोशिश करता है कि उससे गलत नहीं हो और इस प्रयास की वजह से वह बहुत दृढ़ता, धैर्य और उत्साह से अपने कर्म को करता है।
(5) जब व्यक्ति कर्म करने में ही अपना दायित्व समझता है, अपने पसन्द और नापसन्द से ऊपर सही और गलत को स्थान देता है तो फिर इस अवस्था में कर्म के परिणाम क्या होंगे इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह कर्म करने से मतलब रखता है और कर्मफल को नियति कब हवाले छोड़ देता है।
इस प्रकार से कर्म करने वाले कर्ता के मन में कर्म और फल से अनासक्ति के कारण उसे शांति प्राप्त होती है, शांति से सुख मिलता है और सुख से प्रसन्नता आती है सो बिना कुछ की आशा रखे हए भी वह प्रसन्न होते रहता है। उसकी खुशी बिना किसी शर्त के होती है। इस प्रकार के व्यक्ति को सात्विक कर्ता कहते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 27
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥ 27।।
जो कर्ता आसक्ति से युक्त कर्मों के फल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाववाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोक से लिप्त है वह राजस कहा गया है।
सात्विक कर्ता से भिन्न राजस दृष्टि रखने वाले व्यक्ति के द्वारा राजसी कर्म किये जाते हैं सो इस प्रकार के व्यक्ति को राजसी कर्ता कहते हैं। राजसी कर्ता के लक्षण निम्न प्रकार के होते हैं-
(1) व्यक्ति कर्म को उसके सही या गलत होने के कारण नहीं करता है बल्कि कर्म करने की प्रेरणा व्यक्ति को अपनी पसंद और नापसन्द से मिलता है। वह वही कर्म करने के लिए प्रेरित होता है जो उसे पसन्द होते हैं और सो कर्म करते हुए वह कर्मों में लिप्त रहता है।
(2) जब व्यक्ति कर्म को अपनी पसंद और नापसन्द के अनुरूप करता है तो तय है कि उसे कर्मफल की भी चिंता रहती है । वह इस बात में अभिरुचि रखता है कि उसके कर्मों के फल क्या मिलते हैं। सो ऐसा व्यक्ति कर्म से तो बन्धता ही है, अपने कर्मफल से भी बन्धा होता है।
(3) जब व्यक्ति कर्मफल से आसक्त होता है तो तय है कि जिस कर्मफल में उसे लाभ दिखता है , उसके प्रति उसे लोभ होता है और तब उस फल की प्राप्ति हेतु जो भी प्रयोजन उससे बन पड़ता है जैसे किसी को हानि करना, किसी से द्वेष करना, किसी से लोभ वश लगाव रखना, किसी पर क्रोध करना, किसी के प्रति हिंसा करना आदि उसके स्वाभाविक गुण हो जाते हैं। परिणाम से चिंतित व्यक्ति परिणाम के प्रति लोभ के कारण हर तरह के अनाचार और व्यभिचार को अपना लेता है।
(4) चूँकि ऐसा व्यक्ति फल के प्रति आसक्त होकर सिर्फ अपने पसन्द का ही परिणाम चाहता है सो इसकी पूर्ति नहीं होने पर क्रोध, निराशा, विषाद, द्वेष जैसे भाव उसके मन में आते हैं । इसी प्रकार यदि मनोकुल परिणाम उसे मिलता है तो उस परिणाम को पा कर उसे हर्ष होता है, उसके अंदर अहंकार जगता है, और फल मिल जाए इसके लिए लाभ होता है।
सो कर्म और कर्मफल से बंधे व्यक्ति को जीवन में कभी शांति नहीं मिलती है। शांति के अभाव में उसे सुख नहीं मिल पाता है भले ही उसे कितना भी प्राप्त हो जाये वह और की इक्षा से अशांत और दुखी बना रह जाता है और इस कारण उसे जीवन भी खुशी नहीं मिलती भले उसकी कितनी भी इक्षाएँ क्यों नहीं पूरी हो जाएं। इस प्रकार उसकी खुशी सशर्त होती है और क्षणभंगुर होती हैं। इक्षाएँ उसे शीघ्र अशांत कर देती हैं और वह फिर दुखी हो जाता है। इस प्रकार के व्यक्ति को राजसी कर्ता कहते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 28
आयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठोनैष्कृतिकोऽलसः।
विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते॥ 28।।
जो कर्ता अयुक्त, शिक्षा से रहित घमंडी, धूर्त और दूसरों की जीविका का नाश करने वाला तथा शोक करने वाला, आलसी और दीर्घसूत्री (दीर्घसूत्री उसको कहा जाता है कि जो थोड़े काल में होने लायक साधारण कार्य को भी फिर कर लेंगे, ऐसी आशा से बहुत काल तक नहीं पूरा करता। ) है वह तामस कहा जाता है
कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जिनके मन , बुद्धि, विवेक, भावना और शरीर की क्रियाओं में कोई तालमेल ही नहीं होता है। ऐसे व्यक्ति तामस कर्ता कहे जाते हैं। चूँकि इस तरह के व्यकि की भावना और विवेक में कोई तालमेल नहीं होता है सो ऐसे व्यक्ति के अंदर न तो अपनी भावना को लेकर समझदारी होती है और न ही अपनी बुद्धि और विवेक के प्रति। इस समझदारी के अभाव में उस व्यक्ति क्रियाएँ भी बुद्धि रहित होती हैं।
इस अयुक्त व्यक्तित्व के कारण व्यक्ति समझ नहीं पाता है कि किस परिस्थिति में उसे किस तरह के कर्म करने चाहिए। सो ऐसा व्यक्ति हठी और अहंकारी होता है, समय , काल परिस्थिति के अनुसार स्वयं में अपेक्षित बदलाव भी नहीं ला पाता है। अपने लाभ के लिए ऐसा तामस व्यक्ति दूसरों के साथ बेईमानी करने से भी नहीं चूकता है और दूसरों के लिए और स्वयं के लिए बराबर समस्या खड़ी करने वाला होता है।
तामस व्यक्ति निराशावादी होता है और हर चीज का मात्र निराशावादी पहलू ही देखता है।
इन अवगुणों के कारण ऐसा कर्ता न केवल अलसी होता है बल्कि कार्य को टालते रहने वाला भी होता है। उत्साह और समझदारी से अनभिज्ञ तामस व्यक्ति समय पर कोई काम नहीं करता है और समय बीतने पर हड़बड़ी में कार्य करने का उपक्रम करता है जिससे उसके कर्म दोषपूर्ण होते हैं।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 29
बुद्धेर्भेदं धृतेश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु।
प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंजय॥ 29।।
हे धनंजय ! अब तू बुद्धि का और धृति का भी गुणों के अनुसार तीन प्रकार का भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णता से विभागपूर्वक कहा जाने वाला सुन।
प्रत्येक व्यक्ति बाहरी उत्प्रेरकों के प्रति भावना व्यक्त करता है। इस भावना को समझ कर, उसकी जाँच पड़ताल कर उसपर अपनी समझ विकसित करता है और इसप्रकार समझदारी प्राप्त करता है।
बाहरी उत्प्रेरकों से मन में जो भावनाएँ उतपन्न होती हैं उनके प्रति जो समझदारी विकसित करता है वही बुद्धि है और जो समझदारी विकसित होती है वह ज्ञान है। इसप्रकार बुद्धि के अनुरूप ही ज्ञान होता है। मान लीजिए कि किसी ने आपको गाली दी। गाली एक बाहरी उत्प्रेरक है । अब उस गाली के प्रति हमारी भावना में प्रतिक्रिया स्वरूप हिंसक भाव आ सकता है अथवा क्षमा कर देने का भाव आ सकता है या फिर उसे नजरअंदाज करने का भी भाव आ सकता है। इन तीनों में हम कौन सा भाव अपनाते हैं यह हमारे बुद्धि और विवेक पर निर्भर करता है। और इस बुद्धि के अनुरूप हम जो निर्णय लेते हैं वही हमारे ज्ञान को प्रदर्शित करता है। इस प्रकार बुद्धि मन और ज्ञान के बीच की कड़ी है। बुद्धि के कारण ही व्यक्ति चीजों में भेद कर उनके प्रकार और व्यवहार को समझता है। बुद्धि ही समझदारी की जननी है। बुद्धि व्यक्ति के मन को, उसके इंद्रियों को प्रभावित करती है , अपने अनुरूप बना लेती है सो बुद्धि से बाहर जाना सम्भव नहीं होता है। बुद्धि ही वह लगाम है जो मन को साध कर सही ज्ञान के रास्ते पर ले जाता है। यदि बुद्धि भ्रष्ट है तो मन पर लगाम कमजोर होगा और व्यक्ति का ज्ञान भी निम्न स्तर का होगा। नतीजा में उसके कर्म भी निम्न श्रेणी के होंगें और वह उसी के अनुरूप का कर्ता भी कहलायेगा।
बुद्धि सही दिशा में हो तो ज्ञान की दिशा सही होगी और कर्म की भी। लेकिन बुद्धि हो जाने से कर्म होंगे ही या व्यक्ति कर्म करेगा ही कोई जरूरी नहीं है। सो एक अन्य महत्वपूर्ण कारक है और वह है धृति या धैर्य (perserverance ) जिसके कारण व्यक्ति बुद्धि द्वारा निर्धारित मार्ग पर अंतिम तक चलने के लिए स्वयं को प्रतिबद्ध कर पाता है।
इसके आलोक में बुद्धि और धृति के प्रकार को समझने की आवश्यकता है ताकि कर्म और कर्ता को और साफ ढंग से समझा जा सके।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 30
प्रवत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी॥ 30।।
हे पार्थ ! जो बुद्धि प्रवृत्तिमार्ग (गृहस्थ में रहते हुए फल और आसक्ति को त्यागकर भगवदर्पण बुद्धि से केवल लोकशिक्षा के लिए बरतने का नाम 'प्रवृत्तिमार्ग' है।) और निवृत्ति मार्ग को (देहाभिमान को त्यागकर केवल सच्चिदानंदघन परमात्मा में एकीभाव स्थित हुए संसार से उपराम होकर विचरने का नाम 'निवृत्तिमार्ग' है।), कर्तव्य और अकर्तव्य को, भय और अभय को तथा बंधन और मोक्ष को यथार्थ जानती है- वह बुद्धि सात्त्विकी है।
सात्विक ज्ञान की समझ सात्विक बुद्धि ही कराती है जिसके कारण व्यक्ति सात्विक कर्म में प्रवृत्त होता है और सात्विक कर्ता कहलाता है। सात्विक बुद्धि के कुछ लक्षण निम्नवत हैं-
सन्सार में दो तरह के लोग होते हैं। एक जो सांसारिक कर्मो में लगे रहते हैं। ऐसे लोग सांसारिक जीवन में प्रवृत्त कहे जाते हैं। दूसरी तरफ वे लोग हैं जो रहते तो संसार में ही हैं लेकिन वे सांसारिकता से बन्धते नहीं हैं। ऐसे लोग संसार से निवृत्त कहे जाते हैं।
संसार में रहकर व्यक्ति को कर्म तो करने ही होते हैं, लेकिन जब व्यक्ति की बुद्धि उसे संसार के मोह और बन्धन से मुक्त होकर कर्म करने के लिए प्रेरित करती है तो वह व्यक्ति कर्म करते हुए भी कर्म और कर्मफल से आसक्त नहीं होता है । इस प्रकार उसकी बुद्धि उसे हर सांसारिक कर्म बन्धन और कर्म के परिणाम से मुक्त करती है भले उस व्यक्ति के कर्म संसार से सम्बंधित क्यों न होते हों। जो बुद्धि कर्म से युक्त व्यक्ति को कर्म और कर्मफल से मुक्त रखती है वही सात्विक बुद्धि कही जाती है।
ऐसा व्यक्ति कैसे कर्म करता है? ऐसा कर्म करते हुए अपनी पसंद और नापसन्द के अनुसार नहीं करता है बल्कि उस कर्म के सही और गलत का भेद समझकर सही के लिए करता है। वह स्वधर्म से प्रेरित होता है। सो उसका कर्म लोक कल्याणार्थ होता है न कि अपनी किसी स्वार्थ सिद्धि के लिए। प्रत्येक व्यक्ति का अपने , परिवार , समाज, देश, राष्ट्र, संसार, सजीव और निर्जीव के प्रति कुछ दायित्व होते हैं जिनके निर्वहन से वह सभी का कल्याण कर पाता है। यही कराने वाली बुद्धि सात्विक है। उसकी बुद्धि चूँकि स्वधर्मवश होकर रहती है सो उसे भी नही। होता है। उसके अंदर स्वार्थ पूर्ति की कामना नहीं होती है और न हीं कर्मफल के प्रति उसकी कोई लिप्सा होती है, सो ऐसा व्यक्ति निर्भय होता है। भय तो तब आता है जब कर्म करने के कोई विशेष फल की लालसा होती है जिसकी पूर्ति नहीं होने से उसे कुछ खोने का डर सताता है। लेकिन जब कर्म कर्तव्य वश किये जाते हैं, सिर्फ यह समझ कर किये जाते हैं कि उसकी स्थिति वशेष में वही कर्म श्रेयष्कर है सभी के लिए तो कर्म करने में व्यक्तिगत पसन्द और नापसन्द की बात ही खत्म हो जाती है। इसी कारण से व्यक्ति के अंदर कर्मफल के प्रति आसक्ति नहीं होती है बल्कि इस प्रकार से कर्म करने वाले को तो इसी से सुख और शांति मिलती है कि उससे जो कर्म हो रहें हैं वही उसकी स्थिति के अनुसार सबके कल्याणार्थ सही हैं। इसी कारण से ऐसी बुद्धि बन्धन से मुक्त करती है और मोक्ष दायिनी होती है। सो इस बुद्धि से युक्त व्यक्ति सभी सांसारिक कर्म करके भी संसार से निवृत्त होता है और मोक्ष गामी होता है।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 31
यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी॥ 31।।
हे पार्थ! मनुष्य जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को तथा कर्तव्य और अकर्तव्य को भी यथार्थ नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।
राजसिक बुद्धि को जुनून की विशेषता है, जिससे भ्रम और त्रुटि हो सकती है। जब बुद्धि राजसिक है, तो सही और गलत, धर्म और अधर्म के बीच ठीक से अंतर करने में असमर्थ होती है। ऐसे में व्यक्ति ऐसा निर्णय ले सकता है जो स्वयं या दूसरों के लिए हानिकारक हैं। उदाहरण के लिए, राजसिक बुद्धि वाले व्यक्ति को आगे बढ़ने के लिए धोखा देने या चोरी करने का प्रलोभन दिया जा सकता है। उनके हिंसा या अन्य विनाशकारी व्यवहारों में संलग्न होने की अधिक संभावना हो सकती है। राजसिक बुद्धि से सम्मोहन या भ्रम पैदा हो सकता है। जब बुद्धि भ्रमित होती है, तो यह स्पष्ट निर्णय लेने में असमर्थ होती है। इससे व्यक्ति गलतियाँ कर सकता है कि बाद में पछतावा हो सकता है। सात्विक बुद्धि का महत्व यह कहता है कि सात्विक बुद्धि सबसे अच्छी बुद्धि है। सात्विक बुद्धि स्पष्टता, ज्ञान और भेदभाव की विशेषता है। जब बुद्धि सात्विक है, तो यह सही और गलत, धर्म और अधर्म के बीच ठीक से अंतर करने में सक्षम है। यह लोगों को बुद्धिमान निर्णय लेने योग्य बनाता है जो उनके सर्वोत्तम हित में हैं और दूसरों के सर्वोत्तम हित में होते हैं। यदि आप जीवन में बुद्धिमान निर्णय लेना चाहते हैं, तो एक सात्विक बुद्धि के अनुसार कर्म करना महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ है योग, ध्यान और अन्य आध्यात्मिक विषयों का अभ्यास करना जो मन को शुद्ध करने में मदद कर सकते हैं। इसका अर्थ उन गतिविधियों से बचना है जो मन को बादल सकते हैं, जैसे कि भोजन, लिंग और शराब में अत्यधिक भोग। सात्विक बुद्धि से व्यक्ति अधिक स्पष्टता, ज्ञान और भेदभाव प्राप्त कर सकता हैं। यह बुद्धिमान निर्णय लेने की अनुमति देगा जो एक अधिक पूर्ण और सार्थक जीवन का नेतृत्व करेगा।
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 32
अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥ 32।।
हे अर्जुन! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी 'यह धर्म है' ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य संपूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है।
लेकिन ऐसे व्यक्ति भी होते हैं जिनकी बुद्धि न तो समझने की स्थिति में होती है और न ही समझ के भ्रम से सही और गलत में स्पष्ट अंतर कर पाती है बल्कि उनकी बुद्धि मान्यताओं पर आधारित होती है जिसके कारण वे सही को भी गलत ही मानते रहते हैं और इसके विपरीत गलत को सही मानते हैं। उनमें तर्कशीलता नहीं होती है, बस उनकी मान्यता होती है। जैसे किसी हत्यारे को हत्या करनी है तो वह उस हत्या के पीछे किसी तर्क को नहीं देखता बल्कि उसको यही लगता है कि हत्या कर देना ही उचित है तो वह हत्या कर देता है। तर्कशीलता के अभाव में इस प्रकार की बुद्धि रूढ़ होती है। जैसे उसकी मान्यता हो कि सिर्फ उसी के देवता पूजनीय हैं तो वह अन्य सभी के आस्थाओं का सिर्फ विरोध ही करेगा।
इस प्रकार के तर्कशून्य, सिर्फ मान्यता पर आधारित बुद्धि तामसिक बुद्धि कहलाती है जिसके कारण व्यक्ति सही , गलत, झूठ-सच, उचित-अनुचित का भेद कर पाने में असमर्थ होता है और सदा अपनी और दूसरों की हानि ही करता है।
Comments
Post a Comment