श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 17
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 17
यस्य नाहङ्कृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते॥ 17।।
जिस पुरुष के अन्तःकरण में 'मैं कर्ता हूँ' ऐसा भाव नहीं है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों में और कर्मों में लिपायमान नहीं होती, वह पुरुष इन सब लोकों को मारकर भी वास्तव में न तो मरता है और न पाप से बँधता है। (जैसे अग्नि, वायु और जल द्वारा प्रारब्धवश किसी प्राणी की हिंसा होती देखने में आए तो भी वह वास्तव में हिंसा नहीं है, वैसे ही जिस पुरुष का देह में अभिमान नहीं है और स्वार्थरहित केवल संसार के हित के लिए ही जिसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ होती हैं, उस पुरुष के शरीर और इन्द्रियों द्वारा यदि किसी प्राणी की हिंसा होती हुई लोकदृष्टि में देखी जाए, तो भी वह वास्तव में हिंसा नहीं है क्योंकि आसक्ति, स्वार्थ और अहंकार के न होने से किसी प्राणी की हिंसा हो ही नहीं सकती तथा बिना कर्तृत्वाभिमान के किया हुआ कर्म वास्तव में अकर्म ही है, इसलिए वह पुरुष 'पाप से नहीं बँधता'।)
जब व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति होती है तो उसका अहंकार समाप्त हो जाता है। अहंकार का अर्थ है स्वयं को कर्ता समझना, समझना कि वही कर रहा है । कर्तापन के इस भाव की वजह से व्यक्ति "मैं" के साथ संयुक्त हो जाता है। मैं ही कर्ता हूँ। इस भाव, इस समझ के कारण व्यक्ति को लगता है कि जो कर्म हो रहें हैं उन सब को वही कर रहा है। बस तब क्या, व्यक्ति कर्म और कर्मफल के प्रति आसक्त हो जाता है और ताउम्र कर्म और उसके फल से बंधा हुआ रहता है। लेकिन जब व्यक्ति में कर्तापन का यह भाव नहीं होता है अर्थात जब वह अपने अहंकार से मुक्त जाता है तब कर्म करते हुए भी वह कर्मों से और उनके फलों से आसक्त नहीं होता है।
कर्ता भाव से मुक्त व्यक्ति अपने क्षयशील और असत्य बाहरी पहचानों को छोड़ देता है। वह समझता है कि वह मात्र शरीर भर नहीं है , बल्कि वह पदार्थ निर्मित देह और इन्द्रिय संचालित बुद्धि और भावना से अधिक है। वह मात्र अपना नाम, अपना गोत्र, अपनी जाति और सम्प्रदाय में सीमित नहीं है, और न हीं समय की परिधि में बंधा उम्र की गिनती भर है। वह इन सब से परे है , वही ब्रह्म है, अपरिमित है, सम्पूर्णता का द्योतक है। व्यक्ति समझ जाता है वह सीमित नहीं है बल्कि अविभाज्यकारी ब्रह्म है जो अपरिमित है। उसे ज्ञान हो जाता है कि वह मात्र ज्ञानेन्द्रियाँ नहीं है, वह मात्र कर्मेन्द्रीय नहीं है। तो फिर क्या है? वह समझता है कि वह तो विशुद्ध चेतना है, वही अंतिम सत्य है, वही अंतिम बिना शर्त प्रसन्नता है जो अक्षय है। वही ब्रह्म है।
यह पढ़ने और रटने का ज्ञान नहीं है। बल्कि यह तो केवल और केवल अनुभव से ही प्राप्त होता है जो कर्म करते हुए कर्म और कर्मफल से अनासक्ति से आता है। व्यक्ति की यह अनुभूति उसके बुद्धि को भी साफ करती है। उसकी बुद्धि को भी यह समझ आ जाता है कि व्यक्ति कोई परिमित, सीमित जीव मात्र नहीं है और वह कर्ता नहीं है। सो इस व्यक्ति की बुद्गी भी सीमित लाभ और लोभ, सीमित पहचान में नहीं अटकी रहती है बल्कि उसकी बुद्धि को भी समझ में आ जाता है कि व्यक्ति सीमित पहचान से आगे असीमित सम्पूर्णता का ही द्योतक है। सो इस व्यक्ति की बुद्धि भी कर्म और उसके फल से लिप्त नहीं होती है।
इस प्रकार एक दिव्य और ज्ञानी व्यक्ति भले ही संसार के प्रति जागरूक होता है लेकिन वह स्वयं की पहचान को इस संसार से जोड़कर नहीं समझता है।पहचान तो तब स्थापित होती है जब व्यक्ति स्वयं के प्रति जागरूक होता है और अपने महत्व को, अपने अस्तित्व को स्वयं के बाहर के तत्वों से परिभाषित करता है। वैसी स्थिति तभी तक होती है जब तक उसका "मैं" और "मेरा" शेष रहते हैं। जैसे जैसे मैं और मेरा समाप्त होते जाते हैं बाहरी संसार से व्यक्ति की पहचान भी समाप्त होते जाती है। जैसे जब तक मैं और मेरा है व्यक्ति स्वयं को अपने शरीर के रूप में देखता है, उसे लगता है कि यही शरीर उसकी पहचान है, उसके आस पड़ोस, उसकी सांसारिक छवि ही उसे उसकी पहचान है। कर्तापन के भाव से मुक्त हुआ व्यक्ति कर्म करता हुआ भी कर्म से नहीं आसक्त होता है क्योंकि वह शरीर से कर्म कर रहा होता है और स्वयं को शरीर के रूप में नहीं स्थापित करता है। ऐसी स्थिति में यदि ऐसा व्यक्ति कल्याणार्थ हिंसा भी करता है तो उस हिंसा करने में उसकी कोई आसक्ति नहीं होती है बल्कि मन , बुद्धि और दैव से कल्याणार्थ प्रेरित होकर ही वह हिंसा करता है प्राण और शरीर के द्वारा लेकिन अलिप्त होने के कारण उसके सेल्फ यानी उसके विशुद्ध चेतना को उस हिंसा से कोई आसक्ति नहीं होती है, वह उससे बन्धता नहीं है। ऐसा व्यक्ति स्वयं के शारीरिक स्वरूप और अपने संसार के प्रति जागरूक तो होता है किंतु स्वयं को न तो अपने शरीर से और न हीं अपने संसार से पहचानता है क्योंकि वह इन सब से मुक्त हुआ स्वयं को मात्र अपनी आत्मा से जानता पहचानता है।
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