श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 27
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 27
रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः॥ 27।।
जो कर्ता आसक्ति से युक्त कर्मों के फल को चाहने वाला और लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने के स्वभाववाला, अशुद्धाचारी और हर्ष-शोक से लिप्त है वह राजस कहा गया है।
सात्विक कर्ता से भिन्न राजस दृष्टि रखने वाले व्यक्ति के द्वारा राजसी कर्म किये जाते हैं सो इस प्रकार के व्यक्ति को राजसी कर्ता कहते हैं। राजसी कर्ता के लक्षण निम्न प्रकार के होते हैं-
(1) व्यक्ति कर्म को उसके सही या गलत होने के कारण नहीं करता है बल्कि कर्म करने की प्रेरणा व्यक्ति को अपनी पसंद और नापसन्द से मिलता है। वह वही कर्म करने के लिए प्रेरित होता है जो उसे पसन्द होते हैं और सो कर्म करते हुए वह कर्मों में लिप्त रहता है।
(2) जब व्यक्ति कर्म को अपनी पसंद और नापसन्द के अनुरूप करता है तो तय है कि उसे कर्मफल की भी चिंता रहती है । वह इस बात में अभिरुचि रखता है कि उसके कर्मों के फल क्या मिलते हैं। सो ऐसा व्यक्ति कर्म से तो बन्धता ही है, अपने कर्मफल से भी बन्धा होता है।
(3) जब व्यक्ति कर्मफल से आसक्त होता है तो तय है कि जिस कर्मफल में उसे लाभ दिखता है , उसके प्रति उसे लोभ होता है और तब उस फल की प्राप्ति हेतु जो भी प्रयोजन उससे बन पड़ता है जैसे किसी को हानि करना, किसी से द्वेष करना, किसी से लोभ वश लगाव रखना, किसी पर क्रोध करना, किसी के प्रति हिंसा करना आदि उसके स्वाभाविक गुण हो जाते हैं। परिणाम से चिंतित व्यक्ति परिणाम के प्रति लोभ के कारण हर तरह के अनाचार और व्यभिचार को अपना लेता है।
(4) चूँकि ऐसा व्यक्ति फल के प्रति आसक्त होकर सिर्फ अपने पसन्द का ही परिणाम चाहता है सो इसकी पूर्ति नहीं होने पर क्रोध, निराशा, विषाद, द्वेष जैसे भाव उसके मन में आते हैं । इसी प्रकार यदि मनोकुल परिणाम उसे मिलता है तो उस परिणाम को पा कर उसे हर्ष होता है, उसके अंदर अहंकार जगता है, और फल मिल जाए इसके लिए लाभ होता है।
सो कर्म और कर्मफल से बंधे व्यक्ति को जीवन में कभी शांति नहीं मिलती है। शांति के अभाव में उसे सुख नहीं मिल पाता है भले ही उसे कितना भी प्राप्त हो जाये वह और की इक्षा से अशांत और दुखी बना रह जाता है और इस कारण उसे जीवन भी खुशी नहीं मिलती भले उसकी कितनी भी इक्षाएँ क्यों नहीं पूरी हो जाएं। इस प्रकार उसकी खुशी सशर्त होती है और क्षणभंगुर होती हैं। इक्षाएँ उसे शीघ्र अशांत कर देती हैं और वह फिर दुखी हो जाता है। इस प्रकार के व्यक्ति को राजसी कर्ता कहते हैं।
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