श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 26
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 26
मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्धयसिद्धयोर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते॥ 26।।
जो कर्ता संगरहित, अहंकार के वचन न बोलने वाला, धैर्य और उत्साह से युक्त तथा कार्य के सिद्ध होने और न होने में हर्ष -शोकादि विकारों से रहित है- वह सात्त्विक कहा जाता है।
ज्ञान और कर्म का प्रकार समझने के उपरांत व्यक्ति अपने ज्ञान और अपने कर्मों के अनुसार स्वयं का आकलन कर सकता है कि वह स्वयं किस प्रकार का कर्ता यानी व्यक्ति है। ज्ञान और कर्म के तीन तीन प्रकारों के अनुसार व्यक्ति कर्ता यानी कर्म करने वाले के रूप में भी तीन प्रकार का होता है।
पहले हम सात्विक कर्ता के लक्षणों को समझें। सात्विक कर्ता के निम्न प्रकार के लक्षण होते हैं-
(1) सात्विक दृष्टि वाला व्यक्ति सात्विक भाव से ही कर्म करता है। वह कर्म करते हुए भी उस कर्म से बन्धता नहीं है, उससे आसक्त नहीं होता है। वह इसलिए कर्म नहीं करता है कि फलाना कर्म करने से उसे लाभ होगा या हानि बल्कि वह कर्म इसलिए करता है क्योकि उसे अपनी दृष्टि में लगता है कि वह कर्म उसकी स्वाभाविक क्रिया है और क्योंकि वही कर्म सही है। कर्म करने की उसकी प्रेरणा उसे कर्म के सही और गलत होने से मिलती है। वह अपनी पसंद और नापसन्द से आसक्त होकर कर्म नहीं करता है।
(2) कर्म से अनासक्त व्यक्ति जब कर्म करता है तो उसे बस सही और गलत से मतलब रहता है, कर्तव्य और अकर्तव्य से मतलब रहता है। उसका ध्यान कर्म के गुण दोष पर रहता है। इस कारण प्रयोजन से वह बन्धता नहीं है। मान लीजिये कि आप किसी से प्रेम करते हैं। आपका प्रेम एक कर्म है जो आप किसी के प्रति करते हैं। यदि आप उस व्यक्ति से जिसे प्रेम करते हैं उससे आसक्त होकर कर्म करते हैं तो फिर आप उस व्यक्ति के अस्तित्व को नकार कर उसमें भी अपना ही अस्तित्व जड़ देते हैं। आप चाहते हैं कि वह व्यक्ति जिसे आप प्रेम करते हैं आप ही के अनुसार रहे, और इस प्रकार आप उस व्यक्ति की स्वतंत्रता को समाप्त कर उसपर स्वयं को लाद देते हैं। इस प्रकार का प्रेम(कर्म) आपको बन्धन में बाँध देता है, मुक्त नहीं होने देता है। लेकिन यदि आप उसे प्रेम इसलिए करते हैं क्योंकि प्रेम करना ही सही है, तब आप प्रेम के महत्व को स्वीकार कर उस व्यक्ति को फलने फूलने का मौका देते हैं और आप उससे प्रेम करते हुए भी बन्धते नहीं हैं।
(3) जब व्यक्ति सही गलत से प्रेरित होकर कर्म करता है तो उसमें कर्त्तापन का अभिमान नहीं आता है और इस प्रकार वह अहंकार से मुक्त होता है।
(4) कर्म से नहीं बंधकर कर्ता भाव से मुक्त होकर जो कर्म करता है उसे कर्म की गुणवत्ता में दृढ़ अभिरुचि होती है। चूँकि वह सही और गलत से प्रेरित है सो वह अपने कर्म को इस प्रकार से करने की कोशिश करता है कि उससे गलत नहीं हो और इस प्रयास की वजह से वह बहुत दृढ़ता, धैर्य और उत्साह से अपने कर्म को करता है।
(5) जब व्यक्ति कर्म करने में ही अपना दायित्व समझता है, अपने पसन्द और नापसन्द से ऊपर सही और गलत को स्थान देता है तो फिर इस अवस्था में कर्म के परिणाम क्या होंगे इससे उसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। वह कर्म करने से मतलब रखता है और कर्मफल को नियति कब हवाले छोड़ देता है।
इस प्रकार से कर्म करने वाले कर्ता के मन में कर्म और फल से अनासक्ति के कारण उसे शांति प्राप्त होती है, शांति से सुख मिलता है और सुख से प्रसन्नता आती है सो बिना कुछ की आशा रखे हए भी वह प्रसन्न होते रहता है। उसकी खुशी बिना किसी शर्त के होती है। इस प्रकार के व्यक्ति को सात्विक कर्ता कहते हैं।
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