श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 25

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 25

अनुबन्धं क्षयं हिंसामनवेक्ष्य च पौरुषम्‌।
मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते॥ 25।।

जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य को न विचारकर केवल अज्ञान से आरंभ किया जाता है, वह तामस कहा जाता है।

सात्विक कर्म सही गलत को पहचान कर स्वभावतः किये जाते हैं, तो राजसी कर्म पसन्द-नापसन्द के अनुसार लाभ और लोभ वश, कामना पूर्ति के उद्देश्य से किये जाते हैं। लेकिन कई बार कर्म बिना किसी सोच विचार के , बिना किसी बुद्धि और विवेक के बिना परिणाम को तौले  सिर्फ और सिर्फ मोह और भ्रम के अधीन होकर किये जाते हैं जिनमें न तो सही गलत की चिंता होती है, न ही पसन्द नापसन्द की गणना ही होती है बल्कि तैश में आकर किये जाते हैं उन्हें तामसी कर्म कहते हैं। ये कर्म क्रोध, घृणा, हिंसा , अविवेक और मूर्खता से ओतप्रोत होते हैं जिनसे करने वाले को भी क्षति होती है और जो लोग उस कर्म की परिधि में आते हैं उनकी भी क्षति होती है। करने वाले को ज्ञात ही नहीं होता है कि जो वह कर्म कर रहा है उसे करने की क्षमता भी है या नहीं उसमें। तामसी कर्म करने में पूरी तरह से अज्ञानता ही हावी होती है जिसके कारण इसके परिणाम सदा विध्वंसकारी ही होते हैं।

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