श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 23

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 23

नियतं सङ्‍गरहितमरागद्वेषतः कृतम।
अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते॥ 23।।

जो कर्म शास्त्रविधि से नियत किया हुआ और कर्तापन के अभिमान से रहित हो तथा फल न चाहने वाले पुरुष द्वारा बिना राग-द्वेष के किया गया हो- वह सात्त्विक कहा जाता है।
        व्यक्ति के द्वारा कर्म किया जाना अवश्यम्भावी होता है क्योंकि उसका  कर्म हीं व्यक्ति के स्वयं, संसार और ब्रह्म के साथ के सम्बन्धों को परिभाषित करता है। लेकिन व्यक्ति के कर्म उसकी दृष्टि, उसकी समझ और उसके ज्ञान पर आधारित होती है। अर्थात जैसी व्यक्ति की दृष्टि वैसा उसका कर्म। यही वजह है कि एक ही परिस्थिति में भिन्न भिन्न मनुष्यों के कर्म भिन्न भिन्न होते हैं। चूँकि व्यक्ति के कर्म उसकी दृष्टि यानी ज्ञान पर आधारित होते हैं सो जिस स्तर का ज्ञान व्यक्ति प्राप्त किये रहता है, उसी स्तर के उसके कर्म भी होते हैं। अगर व्यक्ति का ज्ञान सात्विक स्तर का है तो उसके कर्म भी सात्विक हीं होते हैं।
      सात्विक ज्ञान के सम्बंध में हम समझते हैं कि जब व्यक्ति की दृष्टि में  बाहरी रूप रंग, आकार प्रकार से इतर सभी मानव में  मूल अविभाज्य स्वरूप जो उसकी आत्मा है ही आता है और वह व्यक्तियों के इसी मूल स्वरूप के कारण उनमें कोई भेद नहीं करता है और समझता है कि तमाम बाहरी भिन्नताओं के भी सभी एक ही मूल स्वरूप के भिन्न भिन्न अभिव्यक्ति हैं तो उसके ज्ञान को सात्विक ज्ञान कहा जाता है। इसमें मानव, और यँहा तक कि सभी जीवों और निर्जीव में भी भेद भाव नहीं किया जाता है। बल्कि सात्विक ज्ञान तो यही बतलाता है कि सभी एक ही हैं।
      इस दृष्टि से लैस व्यक्ति नित्य-नैमित्य कर्म ही करता है न कि काम्य(कामना आधारित) और न ही निषिद्ध कर्म(नहीं करने योग्य कर्म)।व्यक्ति कर्म तो करता है लेकिन कर्म करने के पीछे कोई मंशा, कोई लाभ, कोई कामना पूर्ति के भाव नहीं होते हैं। वह तो सिर्फ अपने स्वभाव के अनुसार, अपनी स्थिति के अनुसार किये जा सकने वाले कर्म को ही करता है। कर्म करने के पीछे कोई  एजेंडा नहीं होता है, कर्म करना उसका स्वभाव है सो कर रहा है।
    इसके साथ ही सात्विक दृष्टि से उसे यह भी समझ होती है कि कर्मफल से उसे कोई लेना देना नहीं है। चूँकि वह तो कर्म ही स्वभावतः कर रहा है तो फिर कर्मफल से क्यों लगाव हो। जो भी कर्मफल हो उसे उसकी परवाह नहीं होती है।
      इसका तातपर्य है कि सात्विक ज्ञान से युक्त कर्ता कर्म और कर्मफल में बिना आसक्त हुए आने स्वभाव(स्वधर्म) के अनुसार कर्म किये जाता है और इस प्रकार स्वार्थरहित भाव से बिना कर्मफल से आसक्त हुए  किये जाने वाले कर्म सात्विक कर्म होते हैं।

           


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