श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 21
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 21
पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्॥ 21।।
किन्तु जो ज्ञान अर्थात जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण भूतों में भिन्न-भिन्न प्रकार के नाना भावों को अलग-अलग जानता है, उस ज्ञान को तू राजस जान।
सभी सजीव और निर्जीव में एक मूल कारक, ब्रह्म की उपस्थिति को समझकर भेद नहीं करने का ज्ञान सात्विक कहलाता है लेकिन जब व्यक्ति जीव जीव में , जीव निर्जीव में भेद करता है तो वह यह नहीं समझ पाता है कि सभी में एक ब्रह्म ही अवस्थित है। ऐसे में व्यक्ति अपने काँशसनेस को दूसरे से भिन्न समझता है। उसे लगता है कि हर दो भिन्न हैं। वह यह नहीं समझ पाता कि आकार प्रकार की भिन्नता मात्र बाहरी है जो हमें जैविक आंखों से दिखती है। ऐसे व्यक्ति की जैविक और बौद्धिक आँखें एक हो जाती हैं और वह जो देखता है उसी को परम् सत्य समझ लेता है। ऐसा नहीं है कि ऐसा व्यक्ति अपने व्यवहार और आचरण से गलत ही हो लेकिन दो में भिन्नता समझने वाले व्यक्ति में भेद भाव, लोभ लालच, क्रोध, मद, अहंकार आदि का प्रवेश हो जाता है। तब वह किसी को हीन और किसी को उच्च समझ कर , किसी को कीमती तो किसी को मूल्यहीन समझकर अपनी समझ के अनुसार अपनी पसंद बनाकर उसके पीछे भागने लगता है। तब उसके अंदर असंख्य कामनाएँ जन्म लेती रहती हैं जिनकी वजह से उसका चित्त चंचल बना रहता है। यह स्थिति व्यक्ति को शांत, और ब्रह्म के साथ एकाकार होने से रोकती है। यही राजसी ज्ञान कहलाता है।
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