श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 20

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 20

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम्॥ 20।।

जिस ज्ञान से मनुष्य पृथक-पृथक सब भूतों में एक अविनाशी परमात्मभाव को विभागरहित समभाव से स्थित देखता है, उस ज्ञान को तू सात्त्विक जान।

जब व्यक्ति स्वयं के उत्थान की यात्रा पर निकलता है तो उसे निश्चित होना चाहिए कि उसका लक्ष्य है अपने ज्ञान में बढ़ोत्तरी, स्वयं यानी कर्ता के गुण में सुधार और सात्विक कर्म करने की प्रवृत्ति। इसके लिए ज्ञान, कर्ता और कर्म के गुणों के आधार पर उनको समझना पहचानना भी होगा तभी अवांछित से वाँछित की तरफ की यात्रा सफल होती है।
   तो आईये, ज्ञान के विषय के समझे कि कौन सा ज्ञान कैसा है जिसे अपनाना चाहिए। अपने गुणों के अनुसार ज्ञान तीन तरह के होते हैं, सात्विक ज्ञान, राजसी ज्ञान और तामसीक ज्ञान।
        दरअसल ज्ञान आँखों से परे व्यक्ति के अन्तस् की दृष्टि है, उसका दृष्टिकोण है जिसके अनुसार व्यक्ति स्वयं के साथ, स्वयं का संसार के साथ और स्वयं का ईश्वर के साथ सम्बन्ध देखता है। सभी व्यक्ति एक ही पदार्थ के बने होते हैं किंतु ज्ञान यानी अपने दृष्टिकोण की भिन्नता की वजह से वे एक ही चीज को अलग अलग ढंग से देखते हैं। ज्ञान से दृष्टि प्राप्त होती है और दृष्टि से हम तय करते हैं कि हम स्वयं क्या हैं , संसार के प्रति हम क्या हैं और ईश्वर के साथ हम क्या हैं। कुछ लोग स्वयं को बहुत सामर्थ्यवान समझते हैं तो कुछ स्वयं को बहुत बेचारा। कुछ लोग उत्साह, प्रेम, अनुराग आदि से भरे होते हैं तो कुछ लोग स्वयवकी दृष्टि में हताश, हारे हुए, । यह सब अंतर उस दृष्टि की वजह से है जिससे हम स्वयं का आकलन करते हैं। इसी प्रकार कुछ लोगों के लिए यह संसार मौज मस्ती, धनोपार्जन और बल दिखाने की जगह है तो कुछ लोग इसी संसार में स्वयं की मुक्ति की जगह पा लेते हैं। किसी के लिए यही संसार दुख का सागर है तो कोई इसे अपनी संघर्ष स्थली समझता है। यह अंतर भी स्वयं हमारे ही दृष्टि में अंतर की वजह से है और यह अंतर हमारे अर्जित ज्ञान के गुण के अनुसार ही होता है।
      यह सत्य है कि भिन्न भिन्न व्यक्ति, भिन्न भिन्न प्राणी, और निर्जीव भी अलग अलग दिखते हैं। दो व्यक्ति एक से नहीं दिखते जबकि वे एक ही तरह के पदार्थों  से  बने होते हैं और जैविक रूप से समान होते हैं। भिन्न भिन्न  रुप रंग  वाले , भिन्न भिन्न पहचान के बावजूद सभी में  एक कारक होता है जो सभी में एक ही समान होता है, जिसे विभाजित नहीं किया जा सकता है और यही उसकी आत्मा होती है। जब व्यक्ति की दृष्टि में  बाहरी रूप रंग, आकार प्रकार से इतर सभी मानव में  मूल अविभाज्य स्वरूप जो उसकी आत्मा है ही आता है और वह व्यक्तियों के इसी मूल स्वरूप के कारण उनमें कोई भेद नहीं करता है और समझता है कि तमाम बाहरी भिन्नताओं के भी सभी एक ही मूल स्वरूप के भिन्न भिन्न अभिव्यक्ति हैं तो उसके ज्ञान को सात्विक ज्ञान कहा जाता है। इसमें मानव, और यँहा तक कि सभी जीवों और निर्जीव में भी भेद भाव नहीं किया जाता है। बल्कि सात्विक ज्ञान तो यही बतलाता है कि सभी एक ही हैं।
     भेद देखने के लिए किसी विशेष ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है, वह तो बाहर से दिख ही रहा है कि हर दो चीज, हर दो व्यक्ति भिन्न है लेकिन इस भिन्नता के बावजूद दोनों में अविभाज्यकारी इकाई समान है इसे समझने के लिए सात्विक दृष्टि चाहिये होती है। 
     जैसे हम समझते हैं कि हम एक राष्ट्र के लोग एक हैं लेकिन जब हमारा ज्ञान और सूक्ष्म तत्व को देखने के योग्य हो जाता है तो हमें लगता है कि चूँकि सभी देशों के निवासी मानव ही हैं सो सभी एक हैं। यह मानवीय दृष्टि है जिसमें हम बाहरी भिन्नता के आधार पर मनुष्यों में भेद नहीं करते हैं। यह मानवीय दृष्टि है।
       जब ज्ञान के और सूक्ष्म के स्तर पर हम जाते हैं तो समझते हैं कि मानव और अन्य सभी जीवों में , सभी प्राणियों में जीवन तो एक ही है सो सभी प्राणधारी एक ही हैं । यह जीवनदृष्टि है।
    लेकिन और सूक्ष्मतर स्तर पर हम पाते हैं कि जिनमें जीवन है और जिनमें जीवन नहीं है, सभी का अस्तित्व तो है। जीवधारी मनुष्य का भी अस्तित्व है, जीवधारी जानवर का भी अस्तित्व है, जीवधारी पेड़-पौधों का भी अस्तित्व है और निर्जीव नदी , पहाड़, पत्थर आदि का भी अस्तित्व है सो अस्तित्व के स्तर पर सभी में एक हि अविभाजकारी इकाई उपस्थित है और यह दृष्टि अस्तित्व की दृष्टि है।
    और इस प्रकार हम समझते हैं कि यह समस्त ज्ञात और अज्ञात ब्रह्माण्ड एक ही इकाई से आच्छादित है जो दृश्य तो नहीं है लेकिन ज्ञेय है  जिसे हम भिन्न भिन्न नाम देते हैं और वही ब्रह्म है जो सबों में , सभी कालों में मूल रूप से  और पूर्ण रूप से उपस्थित है। यही सत्य है। यही ज्ञान , यही दृष्टि सात्विक है।
    और इस प्रकार  भेद की समझ से एक कि समझ की यात्रा ही सात्विक ज्ञान की प्राप्ति की यात्रा है। और यह ज्ञान अपने ईगो को त्यागने से आता है। भेद हम अपने ईगो से बनाते हैं जो कृत्रिम है जबकि सार्वभौमिक एकात्मकता स्वाभाविक सत्य है।
    इस ज्ञान की प्राप्ति के साथ ही व्यक्ति के अंदर का अंधकार समाप्त हो जाता है और व्यक्ति पूर्ण प्रकाशित रहता है और यही उसका वास्तविक मोक्ष होता है।

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