उत्थान के मार्ग की समझ(श्रीमद्भागवद्गीता के अध्याय 18 के श्लोक 18 और 19 पर आधारित)
उत्थान के मार्ग की समझ
(श्रीमद्भागवद्गीता के अध्याय 18 के श्लोक 18 और 19 पर आधारित)
जिन पाँच कारकों की चर्चा की गई है अर्थात अधिष्ठान, कर्ता भाव, करण, प्राण और दैव, वे सभी कर्म होने के कारण हैं लेकिन कर्म किसकी प्रेरणा से होता है, यह समझना भी जरूरी है। कर्म के प्रेरणास्रोत हैं ज्ञान, ज्ञेय और ज्ञाता।
अब आइए समझें कि ये तीन क्या हैं,
ज्ञाता -जानने वाले का नाम 'ज्ञाता' है,
ज्ञान- जिसके द्वारा जाना जाए, उसका नाम 'ज्ञान' है
ज्ञेय -जानने में आने वाली वस्तु का नाम 'ज्ञेय' है
इनकी समझ व्यक्ति को अपने दायित्वों के निर्वहन में सहायता देता है और व्यक्ति समझ पाता है कि उसे किस प्रकार अपने जीवन में साधना करनी चाहिए। एक ही परिस्थिति में एक ही पदार्थ से बने भिन्न भिन्न मनुष्य भिन्न भिन्न तरह से कर्म करते हैं, भिन्न भिन्न तरह के कर्म करते हैं। ऐसा क्यों होता है?
ज्ञाता आपका अह्महार है। स्वयं से , स्वयं के अवयवों से आपकी पहचान आपको ज्ञाता बनाती है। "मैं देखता हूँ"। यँहा "मैं" ज्ञाता है। मैं अपनी आंखों से अपनी पहचान का तादाम्य बैठाता है। इस प्रकार आपकी इंद्रियां, आपकी बुद्धि, आपका विवेक ज्ञाता की भूमिका में होते हैं। जो देखा जाता है वही ज्ञेय है और देखे जाने की इस प्रक्रिया से जो समझा जाता है वही ज्ञान है। वह सभी जो जाना जाता है, जो जानने योग्य है ज्ञान है वही ज्ञेय है और इस प्रकार सम्पूर्ण संसार और संसार से परे जो कुछ है वह जानने योग्य है जिसे जान लेने पर वही ज्ञान है। जानने की यह प्रक्रिया शरीर से, कर्मेन्द्रियों से, ज्ञानेन्द्रियों से , बुद्धि से और विवेक से सम्पन्न होती है। यह संसार जानने योग्य है और सो यह कर्म की प्रेरणा है।
जो कुछ हम इस संसार और इसके परे जानते हैं वही ज्ञान है, यानी हमारा ज्ञान वही है जितना हम जानते हैं। हम जो जानते हैं , वह हमारे पास लम्बे समय तक बना रहता है। और इसके साथ हमारा ईगो भी होता है जो हमारे व्यक्तित्व, हमारे विवेक और हमारी बुद्धि और इनके साथ हमारे शरीर का तादाम्य भी होता है। हमारा संचित ज्ञान और हमारा ईगो ये दोनों मिलकर हमें ज्ञाता बनाते हैं जो हमारे कर्मों का प्रेरणास्रोत होता है।
इस प्रकार हम समझते हैं कि हमारे द्वारा कर्म होने के पीछे पाँच कारणों(अधिष्ठान, कर्तापन, करण प्राण, और देव) के अतिरिक्त तीन प्रेरक भी होते हैं जो हैं ज्ञान, ज्ञेय, और ज्ञाता। हम जो कर्म करते हैं, उसके पीछे उसे जानने की प्रेरणा होती है, इसके लिए हम अपने पूर्व संचित ज्ञान के आधार पर प्रेरित होते हैं और हम ऐसा इसलिए कर पाते हैं क्योंकि हम स्वयं को अपने ईगो से पहचानते हैं। अगर आग से हाथ जलता है इसका पूर्व संचित ज्ञान हमें नहीं है तो फिर हमारी प्रतिक्रिया यानी हमारा कर्म भिन्न होगा और अगर ये ज्ञान पूर्व से है तो हमारी प्रतिक्रिया यानी हमारा कर्म भिन्न होगा।
इस प्रकार यह संसार, संसार के प्रति हमारी जानकारी और हमारा ईगो(जो पूर्व संचित ज्ञान और शरीर, इन्द्रिय , बुद्धि और विवेक के तादाम्य से बना हुआ) ये सब हमें कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं।
अब समझते हैं कि कर्म के मुख्य अवयव क्या हैं। वैसे तो पाँच कारक मिलकर कर्म होने का के कारण का निर्माण करते हैं लेकिन इनमें से मुख्य रूप से कर्ता, करण और स्वयं कर्म ये तीन को मिलाकर कर्म संग्रह कहते हैं।
अब देखें कि जो कर्म है उनमें सुधार के लिए , उनके परिष्करण के लिए व्यक्ति क्या कर सकता है। इसे दो चरणों में समझें।
पहले चरण में देखे कि कर्मों के होने में जो कारक हैं क्या हम उनमें सुधार कर अपने कर्म में सुधार कर सकते हैं। कर्म संग्रह के तीन में से एक अवयव यानी करण तो सभी में एक हैं, सभी में एक ही ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ है तो फिर उनमें आपका कोई वश नहीं। लेकिन व्यक्ति स्वयं में सुधार कर सकता है और स्वयं कर्म में भी। इस प्रकार यदि व्यक्ति को अपने कर्म परिष्कृत करने हैं तो कर्म होने के पाँच कारणों में से उसे सर्वाधिक स्वयं यानी कर्ता(जो ज्ञाता भी है) को और स्वयं कर्म यानी अपनी क्रियाओं में सुधार लाना होगा।
दूसरे चरण में हम देखें कि कर्म होने
के जो प्रेरक कारण हैं उनमें व्यक्ति क्या सुधार कर सकता है। कर्म होने के जो तीन प्रेरक हैं यानी ज्ञाता(यानी कर्ता), ज्ञेय और ज्ञान उनमें ज्ञेय तो एक ही है और ज्ञाता स्वयं वह व्यक्ति है। ऐसी स्थिति में कर्मों में परिष्करण हेतु ज्ञान में सुधार की अवश्वकता है।
इस प्रकार जब व्यक्ति स्वयं के कर्म को परिष्कृत करने की साधना में प्रवृत्त होता है तो उसे स्वयं यानी कर्ता, स्वयं के ज्ञान और स्वयं क्रिया पर सर्वाधिक ध्यान देना अनिवार्य होता है।
इन तीनों में सुधार हेतु आवश्यक है कि हम इन तीनों यानी ज्ञान, कर्ता और कर्म के भिन्न भिन्न स्वरूपों को समझें।
वही व्यक्ति कर्ता है, यानी कर्म करने वाला है, वही ज्ञाता है अर्थात वही ज्ञान को जानता है और वही भोक्ता भी है यानी अपने कर्मों का परिणाम प्राप्त करने वाला है। अर्थात जब एक व्यक्ति स्वयं में उत्थान चाहता है तो उसे स्वयं के ज्ञान में, स्वयं की क्रियाओं में और स्वयं में ही परिवर्तन लाने होते हैं। लेकिन प्रश्न है कि वह कौन सा मार्ग है जिससे वह इनमें परिवर्तन ला सकता है। तो समझना जरूरी है कि संसार के सभी अवयव तीन गुणों से बने हुए हैं जो हैं सात्विक, राजसी और तामसिक। गुणों में परिवर्तन कर व्यक्ति स्वयं के कर्तापन, स्वयं के ज्ञान और स्वयं के परिणामों में उत्थान या पतन जो चाहे ला सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति इन तीन को यानी कर्तापन को ज्ञान को और कर्म को इन गुणों के अनुसार समझे ताकि उनमें वह अपेक्षित सुधार ला सके।
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