श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 16
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 18 श्लोक 16
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः॥ 16।।
परन्तु ऐसा होने पर भी जो मनुष्य अशुद्ध बुद्धि (सत्संग और शास्त्र के अभ्यास से तथा भगवदर्थ कर्म और उपासना के करने से मनुष्य की बुद्धि शुद्ध होती है, इसलिए जो उपर्युक्त साधनों से रहित है, उसकी बुद्धि अशुद्ध है, ऐसा समझना चाहिए।) होने के कारण उस विषय में यानी कर्मों के होने में केवल शुद्ध स्वरूप आत्मा को कर्ता समझता है, वह मलीन बुद्धि वाला अज्ञानी यथार्थ नहीं समझता।
इससे स्पष्ट है कि व्यक्ति के द्वारा कर्म किये जाने के लिए ये पाँच कारक ही उत्तरदायी हैं। आत्मा यानी व्यक्ति की विशुद्ध चेतना का व्यक्ति के द्वारा कर्मों को किये जाने में कोई योगदान नहीं होता है हालांकि सत्य यह है कि उसकी विशुद्ध चेतना यानी आत्मा उसके कर्मों का द्रष्टा मात्र है,। आत्मा के द्वारा कार्य किये जाने का भ्रम हमारी अज्ञानता का परिचायक होता है। शरीर, इन्द्रिय, कर्ता भाव , प्राण और दैव के द्वारा कर्म सम्पादित होते हैं लेकिन व्यक्ति को लगता है कि उसकी शुद्ध चेतना कर्म कर रही है, वह स्वयं के अस्तित्व को कर्म में लिप्त पाता है और ऐसा उसके अपने कर्त्तापन के भाव की वजह से होता है। जबकि सत्य यह है कि उसकी विशुद्ध चेतना अर्थात उसके आत्मा का उसके कर्मों के होने से कोई लेना देना नहीं होता है। लेकिन उसे लगता है कि गति उसके चेतना में है। उसका भ्रम उसके अंदर सापेक्षता के भ्रम के कारण होता है। करता कोई है लेकिन उसे लगता है कि यह तो वही है जो कर रहा है। और जो कर्ता है वह हमारे तीन गुणों-सत्व, राजस और तमो गुण के कारण है। ऐसा भ्रम कर्म होने के पाँच कारणों से हमारी अज्ञानता के कारण है। कर्म तो इन पाँच के कारण हो रहें है लेकिन व्यक्ति की अज्ञानता और भ्रम उसे अहसास दिलाते हैं कि व्यक्ति ही कर्ता है।
यह भ्रम इसलिए होता है क्योंकि व्यक्ति स्वयं को अपने शरीर, अपनी बुद्धि, अपने इन्द्रिय और आने दैव से स्वयं को पहचानता है । लेकिन जैसे जैसे व्यक्ति इन सब से स्वयं को अलग करते जाता है अर्थात अपनी पहचान को अपने शरीर, इन्द्रिय और बुद्धि-विवेक से अलग करता है उसे ज्ञात होते जाता है कि वस्तुतः वह जो कर्म करता है उसका कर्ता वह यानी उसकी विशुद्ध चेतना यानी आत्मा नहीं है । कर्म होने के लिए तो ये पाँच जबाबदेह हैं लेकिन भ्रमवश व्यक्ति इन पाँच की भूमिका से अनजान होकर यही समझता है कि उसकी आत्मा ही उसके कर्मों का कर्ता है, वही सब कुछ कर रहा है। कर्तापन के इसी भ्रम की वजह से व्यक्ति कर्म और कर्मफल के बंधन से बँधा रह जाता है। ध्यान रहे कि जो भी कर्म करता है वह गतिशील है, और सो परिवर्तनशील भी है और इसी कारण से सत्य नहीं है बल्कि परिवर्तनीय है। यदि कोई परिवर्तन को देखना समझना चाहे तो उसे उस परिवर्तन के सापेक्ष अपरिवर्तनीय होना होता है। गति को गति में आकर नहीं अनुभव किया जाता है बल्कि गति को वही जानता है जो स्थिर है। सो आत्मा अपरिवर्तनीय है, गतिहीन है और सो वह व्यक्ति के द्वारा किये जाने वाले परिवर्तनीय, गतिशील कर्मों का द्रष्टा बना रहता है। यदि आत्मा ही कर्म में लिप्त हो जाये तो वह परिवर्तनीय और अस्थिर हो जाता है । फिर वह क्षयशील हो जाता । लेकिन सत्य तो यह है कि आत्मा अपरिवर्तनीय और अक्षय है औए इसी कारण से वह कर्ता नहीं मात्र द्रष्टा है।
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