कर्म अकर्म और हिंसा* *(कर्म क्यों करते हैं, कर्म कब अकर्म होता है और हिंसा कब जायज है)* (अध्याय 18 श्लोक 13 से 17 के आधार पर)

*कर्म अकर्म और हिंसा* *(कर्म क्यों करते हैं, कर्म कब अकर्म होता है और हिंसा कब जायज है)* 
(अध्याय 18 श्लोक 13 से 17 के आधार पर)

कर्म करना देहधारी मनुष्यों के लिए अनिवार्य है किंतु उनके लिए यह भी आवश्यक है कि वे कर्मों के बंधन से मुक्त हों। सबसे महत्वपूर्ण सत्य यह है कि कर्म के बंधन से मुक्ति कर्म करके ही मिलना सम्भव है, कोई अन्य मार्ग नहीं है। कर्म के बन्धन से मुक्त होने के लिए कर्मफल से मुक्त होना होता है । और कर्मफल से अनासक्त होने के लिए यह आवश्यक है कि हम समझें कि दरअसल हम कर्म करते हीं क्यों हैं। ऐसा क्यों है कि देहधारी को कर्म करना ही पड़ता है। वस्तुतः कर्मों के होने के पाँच कारण बताए जाते हैं। कर्म होने के पाँच कारण सांख्य दर्शन में बताए जाते हैं और ये साँख्य दर्शन उपनिषदों की शिक्षाएँ हैं जिन्हें हम वेदांत भी कहते हैं। यँहा यह समझना अति महत्वपूर्ण है कि कर्म से मुक्ति का अर्थ कर्म नहीं करने से नहीं है बल्कि कर्मबन्धन से मुक्ति का अर्थ है कर्ता भाव से मुक्ति। इसके लिए यह समझना जरूरी है कि हम समझें कि कर्म होते ही क्यों हैं और यह भी समझें कि कर्म होने में व्यक्ति के सेल्फ की कोई भूमिका ही नहीं होती है। जब हम यह समझ लेंगे की व्यक्ति के सेल्फ के कारण नहीं बल्कि अन्य कारण कर्म होने के लिए उत्तरदायी हैं तो कर्तापन के भाव से सेल्फ को मुक्त करना सम्भव हो जाएगा। जैसे ही इस सत्य की वास्तविक अनुभूति होगी कि सेल्फ कर्ता नहीं है कर्म करते हुए भी कर्म के  बन्धन से मुक्ति का मार्ग मिल जाएगा।
      कर्म किये जाने के लिए जो पाँच कारण हैं उनमें सबसे पहला अधिष्ठान है। अधिष्ठान यानी जिसके आश्रय कर्म किया जा है और यह है शरीर। व्यक्ति के लिए शरीर से परे कोई कर्म नहीं होता है। कर्म होने के लिए पहली अनिवार्य  शर्त है कि देहधारी ही कर्म करता है।

    लेकिन मात्र शरीर के होने भर से कर्म नहीं होता है इसके लिए कर्ता भाव का होना अनिवार्य है। कर्ता भाव के होने का अर्थ है कि इस शरीर से स्वयं की पहचान स्थापित करना यानी ईगो का होना।

      तीसरी अनिवार्य शर्त है करण यानी उन माध्यम का होना जिनसे कर्म किया जाता है। ये माध्यम हैं इन्द्रिय, मन, बुद्धि विवेक । इनके माध्यम से ही व्यक्ति कर्म में प्रवृत्त हो पाता है। 

     लेकिन ये करण तभी कर्म करते हैं जब विभिन्न चेष्टाएँ होती हैं यानी प्राण का होना जिसके अभाव में  न तो कर्ता भाव कुछ कर पाता है न ही करण।

    लेकिन इन चारों की उपस्थिति के बावजूद कर्म का होना तब तक सम्भव नहीं होता है जब तक दैव न हो यानी वह शक्ति जो व्यक्ति के अंदर तो नहीं है लेकिन जिसकी उपस्थिति कर्म होने के लिए अनिवार्य है। जैसे शरीर भी है, शरीर में स्वस्थ आँख भी है , लेकिन प्रकाश नहीं है तब व्यक्ति अपनी आँखों से देख नहीं पाता। व्यक्ति के नेत्र स्वतः अपने अंदर से प्रकाश उतपन्न भी नहीं कर सकते है और इसके अभाव में व्यक्ति देखने का कर्म नहीं कर सकता है। दैव न हो तो अन्य चार अंततः निश्चेष्ट और निष्प्रभावी  हो जाते हैं। दैव को आप कह सकते हैं कि यह आपका भाग्य है अथवा यह प्रकृति की शक्ति है अथवा सम्पूर्ण कॉसमॉस का प्रभाव है। यानी कर्म होने के लिए लिए सब कुछ व्यक्ति के अंदर ही नहीं है बल्कि कुछ है जो उसके बाहर है जिसकी उपस्थिति में व्यक्ति कर्म कर पाता है। भौतिक रूप से समझें तो व्यक्ति के कर्म उसके परिवेश, उसके समाज, आदि वे बाहरी कारक हैं जो व्यक्ति के कर्म करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं अथवा निर्धारित करते हैं जो हमेशा व्यक्ति के वश में नहीं होते हैं। कोई इसे पूर्वजन्म का प्रभाव कहता है तो कोई ग्रहों का फेर। दरअसल जो आपके अंदर , आपके वश से बाहर है वही दैव है।
      मनुष्य मन, वाणी और शरीर से शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है- उसके ये पाँचों कारण हैं।
    इससे स्पष्ट है कि व्यक्ति के द्वारा कर्म किये जाने के लिए ये पाँच कारक ही उत्तरदायी हैं। आत्मा यानी व्यक्ति की विशुद्ध चेतना का व्यक्ति के द्वारा कर्मों को किये जाने में कोई योगदान नहीं होता है हालांकि सत्य यह है कि उसकी विशुद्ध चेतना यानी आत्मा उसके कर्मों का द्रष्टा मात्र है,। आत्मा के द्वारा कार्य किये जाने का भ्रम हमारी अज्ञानता का परिचायक होता है। शरीर, इन्द्रिय, कर्ता भाव , प्राण और दैव के द्वारा कर्म सम्पादित होते हैं लेकिन व्यक्ति को लगता है कि उसकी शुद्ध चेतना कर्म कर रही है, वह स्वयं के अस्तित्व को कर्म में लिप्त पाता है और ऐसा उसके अपने कर्त्तापन के भाव की वजह से होता है। जबकि सत्य यह है कि उसकी विशुद्ध चेतना अर्थात उसके आत्मा का उसके कर्मों के होने से कोई लेना देना नहीं होता है। लेकिन उसे लगता है कि गति उसके चेतना में है। उसका भ्रम उसके अंदर सापेक्षता के भ्रम के कारण होता है। करता कोई है लेकिन उसे लगता है कि यह तो वही है जो कर रहा है। और जो कर्ता है वह हमारे तीन गुणों-सत्व, राजस और तमो गुण के कारण है। ऐसा भ्रम कर्म होने के पाँच कारणों से हमारी अज्ञानता के कारण है। कर्म तो इन पाँच के कारण हो रहें है लेकिन व्यक्ति की अज्ञानता और भ्रम उसे अहसास दिलाते हैं कि व्यक्ति ही कर्ता है। 

       यह भ्रम इसलिए होता है क्योंकि व्यक्ति स्वयं को अपने शरीर, अपनी बुद्धि, अपने इन्द्रिय और आने दैव से स्वयं को पहचानता है । लेकिन जैसे जैसे व्यक्ति इन सब से स्वयं को अलग करते जाता है अर्थात अपनी पहचान को अपने शरीर, इन्द्रिय और बुद्धि-विवेक से अलग करता है उसे ज्ञात होते जाता है कि वस्तुतः वह जो कर्म करता है उसका कर्ता वह यानी उसकी विशुद्ध चेतना  यानी आत्मा नहीं है । कर्म होने के लिए तो ये पाँच जबाबदेह हैं लेकिन भ्रमवश व्यक्ति इन पाँच की भूमिका से अनजान होकर यही समझता है कि उसकी आत्मा ही उसके कर्मों का कर्ता है, वही सब कुछ कर रहा है। कर्तापन के इसी भ्रम की वजह से व्यक्ति कर्म और कर्मफल के बंधन से बँधा रह जाता है। ध्यान रहे कि जो भी कर्म करता है वह गतिशील है, और सो परिवर्तनशील भी है और इसी कारण से सत्य नहीं है बल्कि परिवर्तनीय है। यदि कोई परिवर्तन को देखना समझना चाहे तो उसे उस परिवर्तन के सापेक्ष अपरिवर्तनीय होना होता है। गति को गति में आकर नहीं अनुभव किया जाता है बल्कि गति को वही जानता है जो स्थिर है। सो आत्मा अपरिवर्तनीय है, गतिहीन है और सो वह व्यक्ति के द्वारा किये जाने वाले परिवर्तनीय, गतिशील कर्मों का द्रष्टा बना रहता है। यदि आत्मा ही कर्म में लिप्त हो जाये तो वह परिवर्तनीय और अस्थिर हो जाता है । फिर वह क्षयशील हो जाता । लेकिन सत्य तो यह है कि आत्मा अपरिवर्तनीय और अक्षय है औए इसी कारण से वह कर्ता नहीं मात्र द्रष्टा है।
     जब व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति होती है तो उसका अहंकार समाप्त हो जाता है। अहंकार का अर्थ है स्वयं को कर्ता समझना, समझना कि वही कर रहा है । कर्तापन के इस भाव की वजह से व्यक्ति "मैं" के साथ संयुक्त हो जाता है। मैं ही कर्ता हूँ। इस भाव, इस समझ के कारण व्यक्ति को लगता है कि जो कर्म हो रहें हैं उन सब को वही कर रहा है। बस तब क्या, व्यक्ति कर्म और कर्मफल के प्रति आसक्त हो जाता है और ताउम्र कर्म और उसके फल से बंधा हुआ रहता है। लेकिन जब व्यक्ति में कर्तापन का यह भाव नहीं होता है अर्थात जब वह अपने अहंकार से मुक्त जाता है तब कर्म करते हुए भी वह कर्मों से और उनके फलों से आसक्त नहीं होता है।

      कर्ता भाव से मुक्त व्यक्ति अपने क्षयशील और असत्य बाहरी पहचानों को छोड़ देता है। वह समझता है कि वह मात्र शरीर भर नहीं है , बल्कि वह पदार्थ निर्मित देह और इन्द्रिय संचालित बुद्धि और भावना से अधिक है। वह मात्र अपना नाम, अपना गोत्र, अपनी जाति और सम्प्रदाय में सीमित नहीं है, और न हीं समय की परिधि में बंधा उम्र की गिनती भर है। वह इन सब से परे है , वही ब्रह्म है, अपरिमित है, सम्पूर्णता का द्योतक है। व्यक्ति समझ जाता है वह सीमित नहीं है बल्कि अविभाज्यकारी ब्रह्म है जो अपरिमित है। उसे ज्ञान हो जाता है कि वह मात्र ज्ञानेन्द्रियाँ नहीं है, वह मात्र कर्मेन्द्रीय नहीं है। तो फिर क्या है? वह समझता है कि वह तो विशुद्ध चेतना है, वही अंतिम सत्य है, वही अंतिम बिना शर्त प्रसन्नता है जो अक्षय है। वही ब्रह्म है।

    यह पढ़ने और रटने का ज्ञान नहीं है। बल्कि यह तो केवल और केवल अनुभव से ही प्राप्त होता है जो कर्म करते हुए कर्म और कर्मफल से अनासक्ति से आता है। व्यक्ति की यह अनुभूति उसके बुद्धि को भी साफ करती है। उसकी बुद्धि को भी यह समझ आ जाता है कि व्यक्ति कोई परिमित, सीमित जीव मात्र नहीं है और वह कर्ता नहीं है। सो इस व्यक्ति की बुद्गी भी सीमित लाभ और लोभ, सीमित पहचान में नहीं अटकी रहती है बल्कि उसकी बुद्धि को भी समझ में आ जाता है कि व्यक्ति सीमित पहचान से आगे असीमित सम्पूर्णता का ही द्योतक है। सो इस व्यक्ति की बुद्धि भी कर्म और उसके फल से लिप्त नहीं होती है।

    इस प्रकार एक दिव्य और ज्ञानी व्यक्ति भले ही संसार के प्रति जागरूक होता है लेकिन वह स्वयं की पहचान को इस संसार से जोड़कर नहीं समझता है।पहचान तो तब स्थापित होती है जब व्यक्ति स्वयं के प्रति जागरूक होता है और अपने महत्व को, अपने अस्तित्व को स्वयं के बाहर के तत्वों से परिभाषित करता है। वैसी स्थिति तभी तक होती है जब तक उसका "मैं" और "मेरा" शेष रहते हैं। जैसे जैसे मैं और मेरा समाप्त होते जाते हैं बाहरी संसार से व्यक्ति की पहचान भी समाप्त होते जाती है। जैसे जब तक मैं और मेरा है व्यक्ति स्वयं को अपने शरीर के रूप में देखता है, उसे लगता है कि यही शरीर उसकी पहचान है, उसके आस पड़ोस, उसकी सांसारिक छवि ही उसे उसकी पहचान है। कर्तापन के भाव से मुक्त हुआ व्यक्ति कर्म करता हुआ भी कर्म से नहीं आसक्त होता है क्योंकि वह शरीर से कर्म कर रहा होता है और स्वयं को शरीर के रूप में नहीं स्थापित करता है। ऐसी स्थिति में यदि ऐसा व्यक्ति कल्याणार्थ हिंसा भी करता है तो उस हिंसा करने में उसकी कोई आसक्ति नहीं होती है बल्कि मन , बुद्धि और दैव  से कल्याणार्थ प्रेरित होकर ही वह हिंसा करता है प्राण और शरीर के द्वारा लेकिन अलिप्त होने के कारण उसके सेल्फ यानी उसके विशुद्ध चेतना को उस हिंसा से कोई आसक्ति नहीं होती है, वह उससे बन्धता नहीं है। ऐसा व्यक्ति स्वयं के शारीरिक स्वरूप और अपने संसार के प्रति जागरूक तो होता है किंतु स्वयं को न तो अपने शरीर से और न हीं अपने संसार से पहचानता है क्योंकि वह इन सब से मुक्त हुआ स्वयं को मात्र अपनी आत्मा से जानता पहचानता है।

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