श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 23 ,24, 25, 26, 27
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 17 श्लोक 23, 24, 25, 26, 27
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा॥ 23।।
तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपः क्रियाः।
प्रवर्तन्ते विधानोक्तः सततं ब्रह्मवादिनाम्॥ 24।।
तदित्यनभिसन्दाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।
दानक्रियाश्चविविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः॥ 25।।
सद्भावे साधुभावे च सदित्यतत्प्रयुज्यते।
प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥ 26।।
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्यवाभिधीयते॥ 27।।
ॐ, तत्, सत्-ऐसे यह तीन प्रकार का सच्चिदानन्दघन ब्रह्म का नाम कहा है, उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादि रचे गए।
इसलिए वेद-मन्त्रों का उच्चारण करने वाले श्रेष्ठ पुरुषों की शास्त्र विधि से नियत यज्ञ, दान और तपरूप क्रियाएँ सदा 'ॐ' इस परमात्मा के नाम को उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं।
तत् अर्थात् 'तत्' नाम से कहे जाने वाले परमात्मा का ही यह सब है- इस भाव से फल को न चाहकर नाना प्रकार के यज्ञ, तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ कल्याण की इच्छा वाले पुरुषों द्वारा की जाती हैं।
सत्'- इस प्रकार यह परमात्मा का नाम सत्यभाव में और श्रेष्ठभाव में प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ! उत्तम कर्म में भी 'सत्' शब्द का प्रयोग किया जाता है।
तथा यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति है, वह भी 'सत्' इस प्रकार कही जाती है और उस परमात्मा के लिए किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत्-ऐसे कहा जाता है।
व्यक्ति के कल्याणार्थ जिन चार सोपानों की चर्चा की गई है उनको सात्विक, राजसी और तामसिक भाव में बाँटा गया है । अब प्रश्न उठता है कि वो कौन सी विधि है जिस विधि से कर्म को करने से ये कर्म सात्विक भाव के होते हैं। करने योग्य इन चारों कर्मों को सात्विक भाव से करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। लेकिन मोक्ष मृत्यु उपरांत प्राप्त होने वाली स्थिति नहीं है और न हीं कर्मकांडों के आश्रय की अवस्था है। वास्तविकता यह है कि मोक्ष बन्धनों से मुक्ति की अवस्था की स्थिति है। व्यक्ति स्वयं को शरीर, मन , बुद्धि , विवेक से बना हुआ समझता है और इस स्थिति में व्यक्ति अपने शरीर के आयतन और उसके पदार्थ, और बुद्धि एवं विवेक की सीमा के अधीन अपने को उतना भर ही समझता है जितने तक उसका ईगो उसे समझाता है। लेकिन यह तथ्य सत्य के परे है। दरअसल प्रत्येक जीव परमात्मा का अंश है। प्रत्येक जीव अपरिमित परमात्मा की ही अभिव्यक्ति भर होता है। जब व्यक्ति अपनी सीमा से बाहर निकलकर अपरिमित परमात्मा से युक्त होता है तब वह अपनी वास्तविक स्थिति को प्राप्त होता है और यह वास्तविक स्थिति शरीर, मन, बुद्धि, विवेक और ईगो की सीमा को समाप्त कर देने से प्राप्त होती है। इस अवस्था में व्यक्ति समस्त भेदो को समाप्त कर समस्त चर-अचर संसार को परमात्मा का स्वरूप समझकर उसके साथ एकाकार हो जाता है। लेकिन यह पहेली अभी भी बनी हुई है कि बन्धन कटे तो कैसे कटे।
इस हेतु कर्म करने की विधि को ईश्वर के नाम से जोड़कर समझाया गया है। यह है ॐ तत सत। जब भी कोई कर्म प्रारम्भ करें ॐ के रूप में ईश्वर का स्मरण करें। यानी व्यक्ति को चाहिए कि कर्म को वह ईश्वरीय निदेश समझ कर करे न कि स्वयं की सन्तुष्टि हेतु करे। जब इस भाव से व्यक्ति कर्म में प्रवृत्त होता है तो उसे कर्म करने का मान नहीं होता है, उसके कर्ता होने का दम्भ जाते रहता है और कर्तव्य भाव से कर्म में वह प्रवृत्त होता है। समस्त संसार को ईश्वरीय अंश के रूप में समझने वाले के लिए कोई भी कर्म स्वार्थ सिद्धि का साधन नहीं रह जाता है और ॐ यानी परमात्मा का स्मरण कर कर्म प्रारम्भ करने से यही भाव कर्म में परिलक्षित भी होता है। इस स्थिति में व्यक्ति कर्मों में सात्विक भाव से प्रवेश करता है। जब व्यक्ति कर्म में यानी इन चार में से किसी भी क्रिया को करने लगता है तो उस समय भी उसे इसी परमात्मा का यानी तत् का स्मरण होना चाहिए। अगर स्मरण में ईश्वर की भवना बैठी है तो फिर कर्म करने के भाव में यह सत्य उद्घाटित होता है कि हम जो कर रहें हैं उसे ईश्वर को समर्पित करने के उद्देश्य से कर रहें हैं। जब परमात्मा को समर्पित करने के भाव से व्यक्ति कर्म करता है तो उसे ज्ञात होता है कि कर्मों की शुचिता बनाये रखनी है और उनको किसी भी राजसी या तामसी भाव से भ्रष्ट नहीं होने देना है। तब उसके कर्म सेवा बन जाते हैं। ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि कर्तव्यबोध और ईश्वरीय निदेश समझकर कर्मों को करने से और कर्मों को ईश्वर के प्रति समर्पित करने के भाव से कर्म सात्विक गुणों को लिए सम्पन्न होते हैं।
यह सम्पूर्ण संसार ईश्वर का ही अंश है सो कर्म में प्रवृत्त व्यक्ति के भाव में संसार सत्यभाव में अवस्थिय होता है और न केवल सत भाव में होता है बल्कि शुभ भी होता है। प्रत्येक कण, प्रत्येक घड़ी शुभ है क्योंकि सब में परमात्मा का अंश है। तो फिर कर्म करने में समस्त सजीव और निर्जीव के प्रति व्यक्ति का भाव निश्चित ही सद्भाव का होना ही चाहिए, तभी उसके कर्म , चाहे वो यज्ञ हो, तप हो, दान हो अच्छे माने जाएंगे। कर्म करने के इसी भाव के कारण कर्म , चाहे जो कर्म हो सात्विक हो पाता है और इस भाव के साथ कोई भी व्यक्ति चाहे वह किसी भी श्रेणी का हो कर के अपनी सीमित सीमा को तोड़कर अपरिमित ब्रह्म में युक्त हो सकता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि जो कर्म नियत हैं अर्थात जिनको करना ही हमारा कर्तव्य है, उन कर्मों को ईश्वरीय निदेश मानकर, ईश्वर को समर्पित कर , उनको सत अर्थात ईश्वर का ही अंश समझकर और उनको शुभ मानते हुए उनके प्रति सद्भाव रखकर और साथ ही बिना उन कर्मों और कर्मफल से सम्बद्ध हुए करने से वे कर्म सात्विक कहे जाते हैं और उनको करने से कोई भी व्यक्ति ब्रह्म से युक्त हो सकता है।
इस प्रकार प्रतेक कर्म का कर्मफल उसके करने की श्रद्धा यानी ईश्वर पर भरोसा रखकर करने पर निर्भर करती है। सो कर्म को और कर्मफल को ईश्वरीय निदेश और प्रसाद समझकर करने से उसमें सात्विकता आती ही है और यही मार्ग है सात्विक भाव से कर्म करने का ।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्री कृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्याय :
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