श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 19 एवं 20

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 19 एवं 20

तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान्‌।
क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु॥ ।।19।।

आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि।
मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्‌॥ ।।20।।

उन द्वेष करने वाले पापाचारी और क्रूरकर्मी नराधमों को मैं संसार में बार-बार आसुरी योनियों में ही डालता हूँ। हे अर्जुन! वे मूढ़ मुझको न प्राप्त होकर ही जन्म-जन्म में आसुरी योनि को प्राप्त होते हैं, फिर उससे भी अति नीच गति को ही प्राप्त होते हैं अर्थात्‌ घोर नरकों में पड़ते हैं।

अहंकार, दम्भ, क्रोध, अज्ञान जैसे आसुरी गुणों जिन्हें हम आम बोल चाल की भाषा में दुर्गुण कहते हैं के कारण व्यक्ति का आचरण ईश्वर से विमुख होते जाता है और ऐसे व्यक्ति निरन्तर गलत कार्यो में रमे रहकर अपने भविष्य को भी अंधकारमय करते जाते हैं। बारम्बार ऐसे आचरण के करने के कारण वह व्यक्ति व्याकुल हुआ रहता है, उसके निर्णय हमेशा चंचल होते हैं, वह किसी की अच्छी बात सुनने -मानने को तैयार नही। होता है और अपने आचरण से हमेशा लोगों को दुख देता है जिसके कारण स्वयं भी हमेशा अस्थिर रहा करता है। ऐसी स्थिति में ऐसा व्यक्ति अपने भविष्य में और भी नीच प्रवृत्ति को अपनाता है और मनुष्यों से अपेक्षित व्यवहार भी इससे नहीं हो पाता है।

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