श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 15 एवं 16 एवं 17
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 15 एवं 16 एवं 17
आढयोऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः॥ ।।15।।
अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।
प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ॥ ।।16।।
आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम्॥ ।।17।।
मैं बड़ा धनी और बड़े कुटुम्ब वाला हूँ। मेरे समान दूसरा कौन है? मैं यज्ञ करूँगा, दान दूँगा और आमोद-प्रमोद करूँगा। इस प्रकार अज्ञान से मोहित रहने वाले तथा अनेक प्रकार से भ्रमित चित्त वाले मोहरूप जाल से समावृत और विषयभोगों में अत्यन्त आसक्त आसुरलोग महान् अपवित्र नरक में गिरते हैं।
वे अपने-आपको ही श्रेष्ठ मानने वाले घमण्डी पुरुष धन और मान के मद से युक्त होकर केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा पाखण्ड से शास्त्रविधिरहित यजन करते हैं
ज्ञान से रहित मूर्ख व्यक्ति जिसकी प्रवृत्ति आसुरी होती है उसे अपने धन और परिवार की पृष्ठभूमि पर बड़ा ही गर्व होता है। उसे लगता है कि उसके धन और कुटुम्ब के आगे सभी तुक्ष हैं। इस तरह के व्यक्ति के द्वारा यदि यज्ञ, और दान जैसे कर्म किये भी जाते हैं तो उनमें भी उसका अहंकार ही होता है। उसे इस बात का भ्रम होता है कि वह अपने धन और जन के बल पर जो पूजा पाठ, यज्ञ , दान आदि कर रहा है वह बहुत ही उत्तम है, अतुलनीय है और ऐसा कर के वह दूसरों पर उपकार कर रहा है। इस तरह से उसके वे कर्म जो पूण्य सदृश्य होते हैं वे भी उसे मोह से नहीं निकाल पाते हैं क्योंकि उसके अंदर तो अहंकार बना रहता है जो उसके मोह को नष्ट नहीं होने देता है। फलस्वरूप वह भ्रम में पड़ा रहा जाता है। उनका तथाकथिय धर्म का आचरण पाखण्ड से अधिक कुछ नहीं होता है जिससे वे दूसरों को तो ठगते ही हैं स्वयं को भी ठगा करते हैं। उनके द्वारा किया जाने वाला कर्म दिखावे के लिए सद्कर्म होता है जबकि सच्चाई यह होती है कि उनके इस दिखावे के उद्देश्य स्वयं को औरों से श्रेष्ठ और अन्य को नीचा दिखाना होता है। यह मात्र आसुरी प्रवृत्ति का ही परिचायक है। कई धनी मानी लोग, कई स्वयम्भू सन्त जो अपने पीछे भक्तों की भीड़ लगाकर तरह तरह से उनको अपने दिखावे के प्रदर्शन से मोहित करने की कोशिश करते हैं और स्वयं को ईश्वर बताकर लोगों को उसी मूर्खता में धकेलते हैं। ये लोग कँही से धर्म का भला नहीं कर रहे होते हैं बल्कि धर्म के नाम पर लोगों को अज्ञानी और अकर्मण्य बनाते हैं।
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