श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 14
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 14
असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी॥ ।।14।।
वह शत्रु मेरे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओं को भी मैं मार डालूँगा। मैं ईश्वर हूँ, ऐश्र्वर्य को भोगने वाला हूँ। मै सब सिद्धियों से युक्त हूँ और बलवान् तथा सुखी हूँ।
धन के साथ साथ ऐसे व्यक्ति को अपने बल का भी घमण्ड हो जाता है। लेकिन ऐसे व्यक्ति बल का उपयोग अपने वैरियों को हानि पँहुचा कर लाभ उठाने का होता है। उनको लगता है कि वे अपने धन -संपदा और बल के बदौलत सभी को हरा देंगे और संसार के सभी ऐश्वर्य, सभी सुख सुविधा उनके भोगने के लिए है। इस अहंकार में चूर ये व्यक्ति को यह भ्रम होता है कि संसार की समस्त उपलब्धियाँ उसी की है। ऐसे व्यक्ति में क्रोध और अहंकार भरा हुआ होता है तथा इसी के कारण ऐसे व्यक्ति को न तो कोई सुख मिलता है और न हीं कोई शांति। इन लोगों को लगता है कि वे भोगों और शक्ति के बल पर सुखी हो रहें हैं लेकिन क्रोध और अहंकार में चंचल चित्त को सुख और शांति प्राप्त नहीं हो पाती है।
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