श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 10

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 16 श्लोक 10

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्‍गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः॥

वे दम्भ, मान और मद से युक्त मनुष्य किसी प्रकार भी पूर्ण न होने वाली कामनाओं का आश्रय लेकर, अज्ञान से मिथ्या सिद्धांतों को ग्रहण करके भ्रष्ट आचरणों को धारण करके संसार में विचरते हैं।

4. आसुरी प्रवृत्ति के व्यक्ति कभी न समाप्त होने वाली  कामनाओं और इक्षाओं से भरे रहते हैं। वे सदा किसी न किसी कामना के अधीन होते हुए उसकी पूर्ति के प्रयास में लगे रहते हैं। इन कामनाओं की पूर्ति के क्रम में वे यह भी नहीं सोचते हैं कि उनके इक्षा पूर्ति के कर्मों से कई अन्य लोगों और भौतिक संसाधनों की कितनी क्षति हो रही होती है। बिना इन सब की परवाह किये ऐसे व्यक्ति अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए पूरे जीवन काल में लगे रहते हैं।
      ऐसे लोग दम्भ यानी  पाखण्ड, मान यानी अहंकार और मद यानी अभिमान, और मोह से भरे रहते हैं। ऐसे लोग नकारात्मक दृष्टिकोण वाले होते हैं। ऐसे लोगों की जीवन दृष्टि हमेशा ही असत्य और नकारात्मक सिधान्तो से प्रभावित रहती है। ऐसे लोगों के संकल्प समाज के भलाई के विपरीत तमाम तरह की गलत चीजों, मान्यताओं से भरे रजते हैं। उनकी सोच जीवन भर उनके जीवन को गलत रास्ते पर ही ले जाती रहती है। ऐसे लोग स्वयं के जीवन को और दूसरों के जीवन को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करते रहते हैं जिसके कारण समाज में व्यापक र्रूप से गलत चीजों को बढ़ावा मिलता है।

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