श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 17
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 17
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥ ।।17।।
इन दोनों से उत्तम पुरुष तो अन्य ही है, जो तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका धारण-पोषण करता है एवं अविनाशी परमेश्वर और परमात्मा- इस प्रकार कहा गया है।
अनेक से दो तक की यात्रा पूरी करने के उपरांत व्यक्ति को एकमात्र सत्य की यात्रा करनी है। सम्पूर्ण संसार को क्षर और अक्षर में समझने के उपरांत हमें यह भी समझना होता है कि यह क्षर अक्षर से भिन्न नहीं है बल्कि उसी अक्षर में समाहित है। क्षर प्रकृति सिर्फ जानने या देखने योग्य ही नहीं है बल्कि वह तो स्वयं ही उस ज्ञान अथवा दृष्टि का ही अंश है क्योंकि जब तक वह ज्ञान नहीं है, जब तक वह द्रष्टा ही नहीं है तो फिर जानने योग्य या देखने योग्य कँहा से हो सकती है। और इस प्रकार हमारा मूल अस्तित्व कँही शून्य में नहीं विचर रहा होता है बल्कि वह तो हमारे ही अंदर अंतर्निहित है। सर्वप्रथम हम किसी दूरस्थ स्थित शक्ति को अपना स्वामी, अपना प्रभु समझ कर उससे अलग रह कर उसकी आराधना करते हैं। तब परमात्मा क्षर और अक्षर से भी अलग सत्ता होती है हमारे लिए। फिर हमें ज्ञान होता है कि प्रभु तो कण कण में विद्यमान हैं और तब हमें ज्ञान होता है कि प्रभु तो हमारे भीतर भी हैं, हमारे सम्पूर्ण अस्तित्व में हैं। तब ईश्वर हमारे लिए और समीप होते हैं लेकिन फिर भी हम ईश्वर को स्वयं से भिन्न सत्ता के रूप में हीं स्वीकारते हैं। किन्तु जब इस सत्य का ज्ञान होता है कि हमारी परम् चेतना ही हमारा ईश है तब हमें ज्ञात होता है कि ईश्वर कोई अन्य नहीं हम स्वयं है लेकिन तब यह स्वयं का भाव मिट चुका होता है। न तो हमारा कुछ है और न ही हमारा पराया कुछ है। सब कुछ हममे है और हम सब कुछ में हैं। ईश्वर के साथ यही संयोग हमारे अहम को ईश्वर में विलीन कर देता है तब सम्पूर्ण दृश्य और अदृश्य जगत ईश्वरमयी हो जाता है, न कोई हमसे अलग है और न हम किसी से अलग हैं। यही परमात्मा हमारे तीनों लोकों, हमारी जागृत, स्वप्न और सुसुप्त अवस्था का नियामक होता है। तब न कोई जानने योग्य , न कोई जानने वाला और न कोई जानना अलग अलग रह जाते हैं बल्कि सभी एक परम् आत्मा में समाहित हमारे स्व में विलीन हो जाते हैं।
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