श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 19 एवम 20
श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 19 एवम 20
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥ ।।19।।
भारत! जो ज्ञानी पुरुष मुझको इस प्रकार तत्त्व से पुरुषोत्तम जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार से निरन्तर मुझ वासुदेव परमेश्वर को ही भजता है।
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥ ।।20।।
हे निष्पाप अर्जुन! इस प्रकार यह अति रहस्ययुक्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया, इसको तत्त्व से जानकर मनुष्य ज्ञानवान और कृतार्थ हो जाता है।
संसार से मोक्ष किसे मिलता है अर्थात संसार में रहकर भी संसार के बंधनों से कौन मुक्त होता है? जो व्यक्ति संसार को क्षर और अक्षर पुरुष के युग्म से परे अपने स्व को पाता है और समझता है कि उसका वास्तविक अस्तित्व उस उत्तम पुरुष का है जो संसार को क्षर और अक्षर के संयोग से आगे यह समझता है कि ये दोनों भी एक ही परम् के अंग है और जो परम् पुरुष अर्थात पुरूषोत्तम उसके मूल स्व का ही अंश है वही इस मोक्ष को प्राप्त करता है। वह पुरुष और प्रकृति से मुक्त होकर उत्तम पुरुष की श्रेणी को प्राप्त हुआ होता है। श्रद्धा, भक्ति और ध्यान के योग से निष्काम कर्मयोगी ही इस अवस्था को प्राप्त करता है। वह पुरुष सर्वज्ञाता है और उसके जीवन में मात्र एक स्व का ही महत्व होता है सो वह निरन्तर उसी एक परम् आत्मा के ध्यान में रहता है। वह व्यक्ति अपने शरीर, बुद्धि, विवेक से परे सम्पूर्ण संसार को एक स्व का ही विस्तार मानता है और इस प्रकार सम्पूर्ण संसार को एक परमात्मा की ही अभिव्यक्ति मानता है। यही ईश्वर का भजन है।
इस प्रकार जीवन के रहस्य को समझने वाला ही ज्ञानी और परम् मोक्ष प्राप्त व्यक्ति होता है। इस प्रकार स्व को सही सही समझने वाला ही मोक्ष को प्राप्त होता है।
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुन संवादे पुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोऽध्यायः ।
Comments
Post a Comment