श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 18

श्रीमद्भागवद्गीता अध्याय 15 श्लोक 18

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥ ।।18।।

क्योंकि मैं नाशवान जड़वर्ग- क्षेत्र से तो सर्वथा अतीत हूँ और अविनाशी जीवात्मा से भी उत्तम हूँ, इसलिए लोक में और वेद में भी पुरुषोत्तम नाम से प्रसिद्ध हूँ।

यह उत्तम परुष क्षर और अक्षय से भी परे होता है औए इन दोनों का स्रोत होता है। इसी वजह से यह पुरूषोत्तम है। यह पुरुषोत्तम पुरुष कोई और नहीं यही सभी का स्व है। इसे अपने अक्षर अथवा चेतना से स्वयं के अंदर ही पाया जा सकता है। चेतना जब शरीर, बुद्धि और विवेक से परे होती है और अपने शुद्धतम अवस्था में ही मूल चेतना होती है और तभी मूल स्व को पहचानी है जो उत्तमपुरुष कहलाता है। सम्पूर्ण चेष्टा और ज्ञान इसी स्व से आते हैं, इसी परम् चेतना से आते हैं। यही पुरूषोत्तम व्यक्ति की वास्तविकता है जो उसके शरीर, बुद्धि, विवेक और समस्त इन्द्रियों के परे कलुषित अवस्था में है और जिसे सम्पूर्ण संसार के प्रति पूर्ण प्रेम से पाया जाता है। जब समपर्ण, श्रद्धा और ध्यान का योग होता है और व्यक्ति अपने क्षर प्रकृति से लिपट अपनी अक्षर चेतना को अलग कर उसे शुद्ध अवस्था में देखता और अनुभव करता है तो वही उसका उत्तम पुरुष की अवस्था है जो समस्त ज्ञान का स्रोत भी होता है।

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